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एक क्रिकेटर जिसने राजनीति का इतिहास बदल दिया

कीर्ति आजाद. पूर्व क्रिकेटर हैं. और अभी राजनीति में सक्रिय हैं. जन्मदिन – 2 जनवरी 1959. कीर्ति आजाद का नाम सुनते ही आपके जेहन में दो चीजें आती हैं, एक तो न्यूज़ चैनल पर क्रिकेट और BCCI पर हो रहे पैनल डिस्कशन में शामिल होने वाले पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद की है. और दूसरा BJP के एक बागी नेता के रूप में. अपने क्रिकेट करियर में कीर्ति आजाद ने भारत के लिए 7 टेस्ट और 25 वनडे मैच खेले. कीर्ति के करियर की शुरुआत 1980 में हुई. एक क्रिकेटर के तौर पर वो राईट-हैंड बल्लेबाज और ऑफ स्पिन गेंदबाज थे. चूंकि आज उनके बड्डे का खास मौका है तो हम आपको बताएंगे उनकी जिंदगी की पांच दिलचस्प कहानियां:

1. कीर्ति आजाद का क्रिकेट करियर और 1983 वर्ल्ड कप 

कीर्ति को 1980-81 में सुनील गावस्कर की कप्तानी में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के कंबाइंड टूर पर जाने वाली टीम में शामिल किया गया था. कीर्ति का नाम आते ही उनके सलेक्शन पर विवाद होना शुरू हो गया. क्रिटिक्स का कहना था कि कीर्ति आजाद की जगह टीम में ऑल राउंडर राजेंद्र जडेजा को लिया जाना चाहिए. जो कि उन दिनों रणजी में मुंबई के लिए खेलते हुए जबरदस्त परफॉरमेंस दे रहे थे. कीर्ति का टेस्ट डेब्यू न्यूजीलैंड के खिलाफ वेलिंगटन में हुआ. जिसमें उन्होंने 20 और 16 रन बनाए. उस टेस्ट को न्यूज़ीलैंड की टीम ने 62 रनों से जीत लिया था.

कीर्ति के करियर का सबसे बड़ा अचीवमेंट रहा 1983 वर्ल्ड कप की टीम में शामिल होना. और यहां उनके सेलेक्शन पर दूसरा विवाद खड़ा हुआ. ये वही वर्ल्ड कप था जिसकी आखिरी तस्वीर थी लॉर्ड्स की बालकनी और उसमें कप उठाये खड़े कपिल देव. भारत ने पहली बार वर्ल्ड कप जीता था. इस वर्ल्ड कप में कीर्ति आजाद को शामिल किया जाना उस समय एक बड़े विवाद का सबब बन गया था. कीर्ति के क्रिटिक्स का मानना था कि कीर्ति का सेलेक्शन उनके पिता और उस समय के केंद्रीय मंत्री भगवत झा आजाद के कहने पर हुआ है. उनके क्रिटिक्स में क्रिकेट एक्सपर्ट्स और पूर्व क्रिकेटर्स भी शामिल थे. उनका मानना था कि कीर्ति एक औसत क्रिकेटर हैं. और वर्ल्ड कप खेलने वाली टीम में वो कोई भी जगह डिजर्व नहीं करते हैं. पूरे वर्ल्ड कप में कीर्ति का परफॉरमेंस कुछ खास नहीं रहा. इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए सेमीफाइनल मैच में कीर्ति ने अपना सबसे बढ़िया खेल दिखाया था. वो भी अपनी गेंदबाजी से. जिसमें उन्होंने जबरदस्त परफॉरमेंस में चल रहे इयान बॉथम को क्लीन बोल्ड किया था. भारतीय टीम वो मैच जीत गई थी. फाइनल में भारतीय टीम का मुकाबला दो बार के वर्ल्ड कप चैंपियन रहे वेस्ट इंडीज से हुआ था. जिसमें कीर्ति को पांचवे नंबर पर बल्लेबाजी करने का मौका मिला. पर कीर्ति इस बड़े मैच में जीरो पर आउट हो गए थे.

2. पूनम आजाद के साथ शादी 

अपनी पत्नी पूनम झा आजाद के साथ कीर्ति आजाद
अपनी पत्नी पूनम झा आजाद के साथ कीर्ति आजाद

बात 1985 की है. जब कीर्ति भारतीय टीम के लिए खेल रहे थे. और देश में एक जाने-पहचाने नाम बन चुके थे. उन्हीं दिनों वो अपने परिवार के साथ छुट्टियां बिताने के लिए पटना आए हुए थे. एक दिन ऐसे ही अपनी बहन को छोड़ने कॉलेज गए. तब उनकी मुलाकात बहन की सहेली पूनम झा से हुई थी. बहन ने कीर्ति का परिचय अपनी सहेली पूनम से कराया. पहली ही मुलाकात में दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे. फिर दोनों की दोस्ती हुई. और घर आना-जाना होने लगा. कीर्ति की छुट्टियां खत्म हुई. और टेस्ट खेलने इंग्लैंड के दौरे पर चले गए. पर कीर्ति के जेहन में पूनम की यादें चलती रही. एक रोज उन्होंने पूनम को फोन मिलाया. और अपने दिल की बात कह दी. फिर माता-पिता की सहमति से 30 अप्रैल 1986 को दोनों की शादी हो गई. कीर्ति और पूनम के दो बेटे हैं सौम्य और सूर्य. अपने पिता की ही तरह वो भी क्रिकेटर हैं. अभी जूनियर लेवल पर खेल रहे हैं. पूनम झा भी राजनीति में हैं. पहले BJP में थीं. पर पिछले ही साल आम आदमी पार्टी में शामिल हो गईं.

3. जब कीर्ति आजाद ने बदल दिया इतिहास 

कीर्ति आजाद का वास्ता एक राजनीतिक परिवार से रहा है. उनके पिता भागवत झा आजाद केंद्रीय मंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. पर कीर्ति आजाद ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी से की. शुरुआत में तो वो दिल्ली विधानसभा के सदस्य रहे. लेकिन 1999 के लोक सभा चुनाव में कीर्ति दरभंगा सीट से बीजेपी की टिकट पर मैदान में उतरे. और लंबे समय से काबिज अशरफ अली फातमी को शिकस्त देकर दरभंगा लोक सभा का इतिहास बदल दिया. उससे पहले दरभंगा की सीट कभी भी बीजेपी के खाते में नहीं आई थी. 2004 के लोकसभा के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो ये सीट हमेशा कीर्ति आजाद के ही कब्जे में रही है.

4. DDCA का विवाद 

कीर्ति आजाद और अरुण जेटली
अरुण जेटली और कीर्ति आजाद

कीर्ति आजाद और अरुण जेटली के बीच का विवाद बहुत ही पुराना है. ऐसा माना जाता है कि अपने क्रिकेट करियर से सन्यास लेने के बाद कीर्ति DDCA में इंटरेस्टेड थे. मगर DDCA पर लंबे समय से अरुण जेटली खेमे का प्रभाव है. और माना जाता है कि यही मुद्दा दोनों के बीच के विवाद की जड़ बना. कीर्ति लगातार अरुण जेटली पर DDCA में घोटाले और अनियमितता का आरोप लगते रहे. 2015 में कीर्ति आजाद को पार्टी-विरोधी गतिविधियों के कारण पार्टी से निकाल दिया गया. कीर्ति आजाद, बिशन सिंह बेदी के साथ मिलकर DDCA और BCCI के एडमिनिस्ट्रेशन में बदलाव की मांग लिए प्रोटेस्ट करते रहे हैं. और लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों का समर्थन करते रहे. कीर्ति का कहना था, “DDCA ने कई फर्जी कंपनियों से करार कर करोड़ों रुपये दिए. DDCA में किराए पर लिए गए सामान पर बड़ी फिजूलखर्ची की गई. यहां तक की DDCA ने प्रिंटरों और कंप्‍यूटरों तक को भारी कीमत पर किराए पर लिया. और इसी का विरोध करने पर मुझे पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.”

5. दिल्ली की राजनीति 

कीर्ति आजाद 1993 से 1996 तक दिल्ली विधान सभा के सदस्य रहे. उसके बाद दरभंगा के सांसद बने. लेकिन कीर्ति की राजनीतिक रुझान शुरू से ही दिल्ली की राजनीति में ही रहा. 2009 के लोक सभा चुनाव में कीर्ति दिल्ली के लोकसभा सीट से कंटेस्ट करना चाहते थे. पर कहा जाता है कि अरुण जेटली का खेमा नहीं चाहता था कि कीर्ति दिल्ली की राजनीति में आए. और नतीजतन उन्हें दिल्ली से टिकट नहीं मिला. स्थिति ये हो गई कि उनका टिकट दरभंगा से भी काटने की बात होने लगी थी. दरभंगा से कीर्ति के कंपटीटर संजय झा का नाम आने लगा था. जो कि अरुण जेटली के खेमे से थे. मगर आखिरी वक्त पर उस चुनाव में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण अडवाणी के दखल के बाद दरभंगा के लिए उनके नाम की घोषणा की गई. इस मसले पर कीर्ति खेमे का कहना था कि बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड के सदस्य जेटली नहीं चाहते कि पार्टी में कीर्ति आजाद का कद बढ़े. भले ही उस लोकसभा के चुनाव में भले ही बीजेपी की हार हुई हो लेकिन कीर्ति ने दरभंगा की सीट पर अपनी जीत दर्ज कराई थी.


 ये स्टोरी आदित्य प्रकाश ने की है

 

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