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गिल्टी: मूवी रिव्यू (नेटफ्लिक्स)

#MeToo में जिनके भी नाम सामने आए, एक साल बाद वो वापस अपने काम पर लग गए. पार्टियां कर रहे हैं. भारत में 95% बलात्कारियों को अब तक सज़ा नहीं मिली है. 97% रेपिस्ट, पीड़ित के जानने वाले होते हैं. इस सब में हम बराबर के ‘गिल्टी’ हैं.

नेटफ्लिक्स पर 06 मार्च, 2020 को रिलीज़ हुई मूवी ‘गिल्टी’ इस नोट के साथ खत्म होती है. लेकिन आपको एंड क्रेडिट तक रुकने की ज़रूरत नहीं, ये जानने के लिए कि ठीक 2 घंटे की इस मूवी की सेंट्रल थीम #MeToo और उसका आफ्टरमेथ है.

# कहानी-

एक कॉलेज है. वहां नानकी और उसका बॉयफ्रेंड वीजे पढ़ते हैं. वीजे इतना अमीर है कि फैमिली दिल्ली के सबसे पॉश इलाके ‘सैनिक फार्म’ में रहती है. इन दोनों के दो दोस्त और है, ताशी और हार्डी. ये चारों एक म्यूज़िक बैंड चलाते हैं. उनके ग्रुप में एक और लड़की आती है. तनु कुमार. वैलेंटाइंस डे के अगले दिन तनु आरोप लगाती है कि वीजे ने उसके साथ रेप किया. मामला सेंसेशनल हो जाता है. वीजे की फैमिली तनु पर मानहानि का केस कर देती है. उधर नानकी भी मानती है कि वीजे ने तनु का रेप नहीं किया. अब सवाल है कि क्या वाकई रेप हुआ है? और अगर हुआ है, तो इसका गिल्टी कौन है?

# कंटेंट में क्या अच्छा, क्या बुरा?

एक छोटे शहर से आई तनु-

# दिल्ली के हाई-फाई कॉलेज में पढ़ती है.

# वो ‘छोटे’ कपड़े पहनती है.

# लोगों का ध्यान खींचने के लिए लाउड हरकतें करती है.

# विक्टिम कार्ड खेलने के लिए बिना पलक झपकाए झूठ बोल लेती है (जब नहाने के समय बाथरूम में कपड़े धोने की बात पर उसका झगड़ा हुआ नानकी से और वॉर्डन के आगे तनु ने झूठ कहा कि नानकी ने उसकी ‘वर्नाकुलर भाषा’ का मज़ाक उड़ाया).

# वो खुद VJ के पीछे पड़ी है, उससे चिपकती है.

# वो ख़ुद शराब के नशे में VJ के कमरे में जाती है, बल्कि ज़िद करके ले जाती है.

जब हम 'तनु' को जज कर रहे होते हैं, तब ये मूवी हमें जज कर रही होती है.
जब हम ‘तनु’ को जज कर रहे होते हैं, तब ये मूवी हमें जज कर रही होती है.

आप सोच सकते हैं कि बनाने वालों ने बहुत सुविधाजनक तरीके से तनु को स्टीरियोटाइप किया. मगर इसका डिफेंस है. ये कि स्टीरियोटाइप तो सोसाइटी के स्तर पर है. इस तरह की लड़की अगर किसी पर रेप का इल्ज़ाम लगाए, तो इन्हीं बातों के आधार पर लोग उसके इल्ज़ाम को तवज्जो नहीं देंगे. मान लेंगे कि तनु ने झूठ कहा होगा. यहीं पर आकर ‘गिल्ट’ बनाने वालों को छूट मिलती है. क्योंकि उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ‘ऐसी’ तनु के लगाए इल्ज़ाम को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए? क्या बिना जांच के मान लिया जाना चाहिए कि वो झूठ ही बोल रही होगी? ये सवाल आपको कचोटते हैं. गिल्ट देते हैं. अगर हमने कभी किसी लड़की को इन वजहों से जज किया हो, दिमाग में उसकी एक खास छवि बनाई हो, तो हमको अपराधबोध होना चाहिए.

एक जगह तनु के फेवर में बोलते हुए नानकी कहती है-

यू आर गिल्टी. बिकॉज़, तुम उसे पसंद करती थी. तुमने उसके साथ फ्लर्ट किया था. एंड यू वॉन्टेड टू हेव सेक्स विद हिम. सो इट्स ऑब्वियस, दैट यू आर गिल्टी. वैसे भी तुम कुछ भी कहती हो, किसी से भी. इतनी कॉन्फिडेंट हो. ऑलवेज वाना बी द सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन. द प्रॉब्लम इज़ दैट यू वॉन्ट टू मैनी थिंग्स एंड यू गो आफ्टर ऑल ऑफ़ इट. 

फिर थोड़ा रुककर कहती है,

फनी एक्चुअली. बिकॉज़, वीजे के पास भी सेम क्वॉलिटी हैं. बट दैट्स वॉट आइ लाइक अबाउट हिम. 

यहां पर समझ में आ जाता है इस हिपोक्रेट समाज में एक लड़के और लड़की के लिए कैसे दोहरे मानदंड हैं.

कियारा आडवानी इस मूवी से 'एक्टर' होने की एक और सीढ़ी चढ़ गई हैं.
कियारा आडवानी इस मूवी से ‘एक्टर’ होने की एक और सीढ़ी चढ़ गई हैं.

फ़िल्म का अंत बेशक अति नाटकीय है. ये सबसे बड़ी कमज़ोरी है इसकी. कारण ये है कि अधिकतर मामलों में सोसाइटी ख़ुद को सही नहीं करती. जैसा फ़िल्म के क्लाइमेक्स में स्टेज पर खड़ी तनु की बातें सुनकर वहां खड़े लोगों के आंसू निकलते हैं, तनु को जज करने का अपराधबोध उन्हें रुलाता है, वैसा असल जीवन में कम को ही महसूस होता है.

वैसे अति-नाटकीयता पूरी फिल्म के दौरान पसरी रहती है. अकीरा कुरोसावा की ‘रोशोमोन’ की तरह, इस मूवी में भी घटना को अलग-अलग नज़र से देखने की कोशिश की गई लगती है. लेकिन जहां ये चीज़ ‘रोशोमोन’ की यूएसपी थी, वहीं ‘गिल्टी’ में आपको परेशान करती है, दांत में अटके किसी रेशे की तरह.

# कास्ट एंड क्रू-

तारीफ़ मूवी के प्रोड्यूसर करण जौहर के भी हिस्से जाती है. ‘मी टू’ ने उस फिल्मी दुनिया को चपेटे में लिया, जिसका हिस्सा हैं करण. कई बड़े-बड़े नामों की कलई खुली. मगर ज़्यादातर बच निकले. करण का इस मुद्दे पर फ़िल्म बनाना नोट किया जाना चाहिए. वो इस असहज करने वाले, ‘हश हश’ करके दबा दिए जाने वाले मुद्दे पर फ़िल्म बना रहे हैं, कुछ तो साहस लगा ही होगा इसमें.

मूवी की डायरेक्टर रुचि नारायण ने ‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ और ‘कलकत्ता मेल’ जैसी फिल्मों के लिए स्टोरी लिखी है. उनकी एक डायरेक्टर के तौर पर 2005 में एक हिंदी मूवी आई थी ‘कल: यस्टरडे एंड टुमारो’. इसके बाद उन्होंने एक एनिमेटेड मूवी ‘हनुमान द दमदार’ डायरेक्ट की थी. ‘गिल्ट’ मूवी, भी उन्होंने अतिका-कणिका के साथ मिलकर लिखी तो अच्छी, लेकिन डायरेक्टर के तौर पर वो इस पूरे कॉन्सेप्ट को बेहतर ढंग से एग्ज़ीक्यूट नहीं कर पाई हैं. मूवी की कुल फील ‘स्टूडेंट ऑफ़ दी इयर’ और ‘शैतान’ जैसी दो मूवीज़ के कॉकटेल सरीखी हो जाती है. कॉकटेल जो हैंगओवर पैदा करता है.

# एक्टिंग-

एक सीन है जहां पर कियारा का किरदार नानकी कहता है-

I’m not as privileged as you. Right?…

इस दौरान कियारा आवाज़ और पिच को जिस तरह बदलती हैं, काफी नैचुरल लगता है. अपनी ड्रेस, अपने टैटूज़ और  ‘हाईलाइट’ किए हुए बालों को कियारा ने अच्छे से कैरी किया है. वो एक टीनएजर स्टूडेंट के तौर पर  काफी कन्विंसिंग लगी हैं. इंट्रेस्टिंग बात ये है कि कियारा की एक्टिंग तो कन्विंस करती है, लेकिन उनका किरदार नहीं. ननकी ‘काफ्का’ कोट करती है. बढ़िया लिरिक्स लिखती है, लेकिन दूसरी तरफ नैतिकता को लेकर अंत तक इग्नोरेंट रहती है.

 

कॉलेज और टीनएजर्स पर बेस्ड 'शैतान' जितनी डार्क थी उतनी ही 'स्टूडेंट...' कलरफुल. बात ये नहीं है कि कौन सी मूवी अच्छी थी, कौन सी बुरी. बात ये भी नहीं है कि गिल्ट में दोनों की परछाई लगती है. दिक्कत ये है कि डार्कनेस और कलर को मिलाकर जो प्रोडक्ट बनाया गया वो कुछ अजीब सा बन गया. कोई एक टेंपलेट रखते तो बेहतर होता.
कॉलेज और टीनएजर्स पर बेस्ड ‘शैतान’ जितनी डार्क थी उतनी ही ‘स्टूडेंट…’ कलरफुल. बात ये नहीं है कि कौन सी मूवी अच्छी थी, कौन सी बुरी. बात ये भी नहीं है कि गिल्ट में दोनों की परछाई लगती है. दिक्कत ये है कि डार्कनेस और कलर को मिलाकर जो प्रोडक्ट बनाया गया वो कुछ अजीब सा बन गया. कोई एक टेंपलेट रखते तो बेहतर होता.

बाकी एक्टर्स (तनु के रोल में आकंक्षा रंजन,  वीजे के रोल में गुरफतेह सिंह, दानिश के रोल में ताहिर और वीजे के वकील के रोल में सीजन्ड एक्टर दलीप ताहिल) ने भी अच्छा काम किया है.

# अंत में हमें ये कहना है

‘गिल्ट’ जैसी फ़िल्म देखते हुए आपको हरदम याद रखना होगा कि ये हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री से निकलकर आई है. ये ऐसा कारखाना है, जहां साहस, नैतिकता और विषय के प्रति ईमानदारी को लेकर ज्यादा लोड नहीं लिया जाता. इसीलिए ‘गिल्ट’ की तारीफ़ होनी चाहिए. उसकी कमियों के बावजूद. जब ऐसी फिल्में और बनने लगेंगी, तब शायद हमको और कड़क आलोचक बनना होगा. तब हम इन फिल्मों के प्रति ज़्यादा क्रूर, ज्यादा निर्मम हो सकेंगे. उनसे ज्यादा की उम्मीद कर सकेंगे. जब तक ऐसा नहीं हो जाता, ‘गिल्ट’ को शुरुआत तो माना ही जा सकता है.


वीडियो देखें:

कामयाब मूवी रिव्यू: एक्टिंग करने की एक्टिंग करना, बड़ा ही टफ जॉब है बॉस!-

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