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गांववालों के लिए चित्र बनाने वाला पेंटर जिसका काम राष्ट्रीय धरोहर माना जाता है

चित्रकारों की दुनिया अपने आप में खास होती है. कहते हैं कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है. हमारे देश में भी बहुत चित्रकार हुए हैं.  आज ऐसे ही एक महान चित्रकार की 132वीं जयंती है. इनका नाम है जैमिनी रॉय.

इनकी बनाई पेंटिंग्स को हमारे देश में ही नहीं, विदेशों में भी सम्मान मिला है. 2017 में आज ही के दिन गूगल ने भी डूडल के ज़रिए इनकी जयंती पर इनको श्रद्धांजलि दी थी. जैमिनी रॉय ने अपनी पूरी जिंदगी चित्रकारी में ही लगाई थी. वो अपने समय के चित्रकारों से काफी आगे की सोच रखते थे. उन्होंने अपने समय की परंपराओं से अलग अपनी नई शैली बनाई थी. रॉय ने भारत और दुनिया में साहित्य में हुए बदलावों को अपनी पेंटिंग्स के ज़रिए दिखाया.

पढ़िए जैमिनी रॉय की जिंदगी से जुड़ी 10 बातें:

1. जैमिनी रॉय पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले के बलियातोर गांव में 11 अप्रैल 1887 को पैदा हुए. उन्होंने कोलकाता के गवर्नमेंट स्कूल ऑफ़ आर्ट से कला की बारीकियां सीखीं. अवनींद्र नाथ टैगोर उनके गुरु थे जो कि कला के बंगाल स्कूल के संस्थापक भी थे.

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2. रॉय ने पश्चिमी कला की क्लासिक परंपरा की शैली से हटकर आदिवासी कला से चित्रों को बनाना शुरू किया. ये भी माना जाता है कि रॉय पर ‘कालीघाट पाट स्टाइल’ का काफी प्रभाव था, जिसमें मोटे ब्रश स्ट्रोक का इस्तेमाल किया जाता था.

कालीघाट पात स्टाइल में बनी जैमिनी रॉय की पेंटिंग
कालीघाट पाट स्टाइल में बनी जैमिनी रॉय की पेंटिंग

3. 1916 में कोलकाता के गवर्नमेंट आर्ट स्कूल से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने पोर्ट्रेट बनाना शुरू किया. 20वीं शताब्दी के पहले 30 सालों में बंगाल में काफी साहित्यिक बदलाव हुआ. राष्ट्रवादी आन्दोलन के चलते साहित्य और कलाओं में कई प्रयोग होने लगे. 1920 आते-आते रॉय ने भी अपनी पुरानी यूरोपियन प्रकृतिवाद और कला के लिए ऑयल के इस्तेमाल को छोड़कर कला के नए रूपों की तलाश की.

जैमिनी रॉय की ऑयल पेंटिंग
जैमिनी रॉय की ऑयल पेंटिंग

4. रॉय ने एशियाई शैली, पक्की मिट्टी से बने मंदिरों की कला, लोक कलाओं की वस्तुओं और शिल्प परम्पराओं से प्रेरणा ली. 1920 के बाद के सालों में रॉय ने गांव के दृश्यों, जानवरों और लोगों की खुशियों को दिखाने वाले चित्र बनाए. इसमें कोई शक नहीं कि इन चित्रों से उन्होंने ये बताने की कोशिश की कि वे अपनी जड़ों से जुड़े हैं.

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इसी चित्र का डूडल आज गूगल ने लगाया है

5. 1919-1920 के आसपास जैमिनी ने लोगों के पोर्ट्रेट बनाने बंद कर दिए. वे थोड़ा सा पोर्ट्रेट बनाते थे और फिर उसमें कमियां देखते और उसे मिटा देते थे. ऐसा कुछ दिनों तक चलता रहा, फिर अपने पोर्ट्रेट को अपने मन में उठने वाले विचारों से सजाने लगे. अगले कुछ सालों तक उन्होंने संथाल महिलाओं के पोर्ट्रेट बनाए. जिसमें उनके ब्रश का इस्तेमाल नई उभरती शैली का प्रतीक था.

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6. 1920 के आसपास ही उन्होंने रामायण, महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों की घटनाओं को कैनवस पर उतारना शुरू किया. कृष्ण लीला का उनका चित्रण भी काफी सराहा गया.

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7. रॉय के बारे में सबसे अच्छी बात ये थी कि वे धर्मनिरपेक्ष थे. उन्होंने अपने समय में ईसाई धर्म से जुड़ी पौराणिक कथाओं का चित्रण भी इतने खूबसूरत ढंग से किया कि  गांव में रहने वाले एक आम बंगाली को भी समझ आ जाता था. उन्होंने यूरोप के महान कलाकारों के चित्रों को भी कैनवस पर उतारा.

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8. जैमिनी रॉय अक्सर धोती कुर्ता पहना करते थे. जिसके साथ वो कंधे पर चादर लेकर बाहर निकलते थे. उनके काम की वजह से वे देश विदेश में मशहूर हो चुके थे, लेकिन सादगी का आलम ये था कि वो तब भी अपनी पेंटिंग्स गांव-गांव जाकर सस्ते दामों में बेचा करते थे. उनके घर में मेहमानों के बैठने के लिए चमकीले रंग की चित्रकारी की हुई चौकियां होती थीं. जैमिनी रॉय के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा 4 बेटे और 1 बेटी थी.

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9. जैमिनी रॉय के फेमस आर्टवर्क में क्वीन ऑन टाइगर, कृष्णा एंड बलराम, गोपिनी, वर्जिन एंड चाइल्ड, वॉरियर किंग जैसी कई महान कलाकृतियां हैं.

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जैमिनी रॉय की कृष्ण और बलराम की पेंटिंग

10. जैमिनी रॉय को उनके काम के लिए भारत सरकार ने 1955 में पद्मभूषण से सम्मानित किया. 24 अप्रैल 1972 को इस महान चित्रकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी मौत के 4 साल बाद भारत सरकार ने उनको उन 9 मास्टर्स में जगह दी जिनके काम को राष्ट्रीय धरोहर माना गया.


ये आर्टिकल दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहे भूपेंद्र ने लिखा है.


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