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ये 13 ताकतवर विदेशी जो इंडिया में पढ़कर बड़े बने

शैशव दशा में देश प्रायः जिस समय सब व्याप्त थे,
निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे.
संसार को पहले हमीं ने ज्ञान भिक्षा दान की,
आचार की, व्यापार की, व्यवहार की, विज्ञान की.

ये पंक्तियां राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गु्प्त की कविता हमारा अतीत (भारत-भारती से) की हैं. जो दिखाती हैं कि कैसे भारत हमेशा से विश्व में लोगों के लिए ज्ञान का केंद्र रहा है. जब ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसी यूनिवर्सिटीज का अता-पता भी नहीं था, तब हमारे पास नालंदा, तक्षशिला (पेशावर) और विक्रमशिला (भागलपुर) जैसे विश्वविद्यालयों में दुनिया भर के छात्र पढ़ने आते थे.

ये पुराने विश्वविद्यालय हो गए. पर आपको ये जानकर हैरानी होगी कि भारत के आधुनिक विश्वविद्यालयों में भी दुनिया के कई बड़े नेता तक पढ़ने आ चुके हैं. ये 13 इंटरनेशनल नेता इंडिया में शिक्षा लेने आए थे:

1. आंग सान सू की

पद: म्यांमार की पहली विदेशमंत्री बनीं और अब स्टेट काउंसलर हैं, परदे के पीछे से राज यही चलाती हैं

पढ़ाई: जीसस एंड मेरी कॉन्वेंट, लेडी श्रीराम कॉलेज दिल्ली और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज शिमला 

source- reuters
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19 अप्रैल 1945 को पैदा हुई आंग अपने मांबाप की सबसे छोटी संतान हैंआंग सान सू की का नाम इनके तीन परिवार वालों के नाम से मिलकर बना है. आंग सान पिता का नाम है, की मां के नाम से लिया गया है और सू दादी के नाम से.

 इनके पापा बर्मा इंडिपेंडस आर्मी के कमांडर थे. और वो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर काम कर चुके थे. इनकी मां किन की 1960 में भारत और नेपाल में बर्मा की राजदूत थीं. इसी दौरान आंग सान ने जीसस एंड मेरी कॉन्वेंट से पढ़ाई की और 1964 में ग्रेजुएशन पूरा किया. शिमला के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज से इन्होंने दो साल का फेलोशिप भी किया है.

1972 में आंग ने माइकल एरिस से शादी की. इन दोनों के 2 बच्चे हैं. पति माइकल एरिस को जब कैंसर हुआ तो बर्मा (अब म्यांमार) की सरकार ने उनके पति को बर्मा आने का वीजा नहीं दिया था. सरकार ने आंग सान को कहा कि पति से मिलना है तो आप विदेश चल जाओ. लेकिन वो नहीं गई क्योंकि वो जानती थीं कि अगर वो गईं तो दोबारा बर्मा नहीं सकती.

बर्मा के लोग इनको प्यार से ‘डौ’ बुलाते हैं. ‘डौ’ का मतलब आंटी होता है. आंग ने 1988 में नेशनल लेबर पार्टी का गठन किया. आंग सान का भाषणफ्रीडम फ्रॉम फियरदुनिया के महानतम भाषणों में गिना जाता है.

1960 में जवाहर लाल नेहरू ने आंग सान की मां किन को भेंट के तौर पर बंगला दिया था. जिसे कुछ समय के लिए बर्मा हाउस के नाम से पुकारा जाता था. आज वही बंगला 24 अकबर रोड में कांग्रेस का हेडक्वार्टर है.

आंग के पिता जवाहर लाल नेहरू के अच्छे मित्र थे. आंग सान के पिता बर्मा की आजादी के समझौते के लिए जब लंदन जा रहे थे तो नेहरू ने उन्हें भेंट में नए कपड़े और समझौते के लिए कुछ सुझाव दिए थे.

आंग सान भारत में रही हैं तो जाहिर है कि इस जगह से उनको लगाव भी है. 2012 में अपने कॉलेज के छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था: ‘मैं भारत की नागरिक जैसी हूं. यहां के लोगों ने मुझे अपनों जैसे प्यार और इज्जत दी है.’


2. हामिद करजई

पद: अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति

पढ़ाई: हिमाचल यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल रिलेशन और पॉलिटिकल साइंस में एमए

hamid karzai
source- reutres

हामिद करजई अफगान के राजा मोहम्मद जाहिर शाह के खानदान से आते हैं और वहां की प्रमुख जनजाति पश्तून के सदस्य हैं. हामिद करजई 1976 ने स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत हिमाचल यूनिवर्सिटी से एमए किया है. करजई पांच भाषाओं में आसानी से बात कर सकते हैं जिनमें अंग्रेजी, फ्रेंच, हिंदी, पश्तो और दारी भाषाएं शामिल हैं.

हामिद करजई को पांच बार मारने की कोशिश की गई थी. हामिद पहले तालिबान के समर्थक थे. लेकिन पिता के मर्डर के बाद तालिबान के खिलाफ मुहिम छेड़ दीहामिद करजई ने सोवियत के खिलाफ मोर्चा 25 की उम्र में ही खोल दिया था और लगभग उसी वक्त अफगानिस्तान नेशनल लिबरेशन फ्रंट के डायरेक्टर भी बने. सरकार के नेता चुने जाने से पहले करजई कंधार में 4000 सैनिकों का नेतृत्व करते थे.

भारत में अपने बिताए पल को याद करते हुए हामिद ने एक बार कहा था: ‘भारत आप में संस्कार लाता है. मैं आज भी शिमला की सभ्यता को याद कर खुश हो जाता हूं. मुझे हिंदी फिल्म मौसम का वो गाना याद आ जाता है: दिल ढूंढता है, फिर वही फुर्सत के रात-दिन.’


3. बिंगु वा मुथारिका

पद: मलावी के पूर्व राष्ट्रपति

पढ़ाई: श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से ग्रेजुएशन और इकॉनमिक्स से एमए

source- reuters
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मुथारिका का असली नाम ब्राइट्सन वेब्सटर राइसन थोम था. 1964 में 32 छात्रों को मलावी के तत्कालीन राष्ट्रपति हेस्टिंग कामुजु बांदा ने इंदिरा गांधी स्कॉलरशिप के तहत भारत भेजा थाबीबीसी के कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार उस वक्त राष्ट्रपति बांदा अपने सभी राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को खत्म कर रहे थे. इसलिए थोम ने अपने नाम को बदल कर मुथारिका रखा और भारत में स्कॉलरशिप ले लिया.

मुथारिका 1961-1964 तक भारत में रहे थे. भारत सरकार की तरफ से मिलने वाली छात्रवृत्ति पर उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से ग्रेजुएशन किया था. और दिल्ली के स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स से अर्थशास्त्र में मास्टर्स डिग्री पूरी की थी.

2009 के मलावी के वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार मुथारिका के कार्यकाल में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 52 फीसदी से घटकर 40 फीसदी हो गई. मुथारिका 2010-2011 के बीच अफ्रीकी यूनियन के अध्यक्ष रहे. इनसे पहले यह जगह गद्दाफी ने संभाली थी. वह ऐसा करने वाले पहले मलावियन बने.

मुथारिका के नाम कुछ विवाद भी रहे हैं.  2009 में प्रेसिडेंशियल जेट के लिए उन्होंने 13.26 मिलियन डॉलर यानी लगभग 85 करोड़ खर्च कर दिए. ये वो दौर था जब पूरे देश में ईंधन की कमी के कारण लोगों को बहुत परेशानियां हो रही थीं. कहा जाता है कि उनके हवाई जहाज खरीदने के बाद वेस्टर्न देशों ने इनके देश को मिलने वाले अंतर्राष्ट्रीय ग्रांट कम कर दिए गए.

मुथारिका की मौत के बाद उनकी पत्नी ने इल्जाम लगाया था कि किसी महिला के साथ उनके संबंधों के कारण उनकी मौत हुई थी. 


4. ओलुसेगन ओबासांजो

पद: नाइजीरिया के पूर्व राष्ट्रपति 

पढ़ाई: तमिलनाडु के डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज में पढ़े और कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग पुणे में ट्रेनिंग की

source- Nigerian Watch page
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इनका पूरा नाम ओलुसेगन मैथ्यू ओकीकियोला आरेमू ओबासांजो था. 1976-1979 तक ये नाइजीरिया के सैन्य शासक थे. 1997-2007 तक नाइजीरिया के राष्ट्रपति रहे. साठ के दशक में इंडिया में पढ़ाई की. नाइजीरिया में 16 साल तक चले मिलिट्री शासन के बाद ये पहले चुने हुए राष्ट्रपति थे.

ओलुसेगन ने 4 शादियां की हैं. नाइजीरिया में लोग खेती छोड़ क्रूड ऑयल के काम में लग जाते थे, लेकिन ओलुसेगन ने खेती को बढ़ावा देने के लिए ‘फीड द नेशन’ प्रोग्राम शुरु किया. जो इनकी बड़ी उपलब्धि है.


 

5. बाबूराम भट्टाराई

पद: नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री 

पढ़ाई: चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर और दिल्ली स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर

source- Baburam Bhattarai official page
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बाबूराम भट्टाराई का जन्म 18 जून 1954 को नेपाल के किसान परिवार में हुआ था. बाबूराम बचपन से ही पढ़ने में अच्छे थे. और भारत में कोलम्बो प्लान के तहत मिले स्कॉलरशिप से पढ़ाई करने आए थे. जिसके बाद इन्होंने 70 के दशक में चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर से पढ़ाई की. फिर दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर से मास्टर्स किया. 1986 में जेएनयू से पीएचडी किया. जेएनयू के लिए उनके मन में बेहद प्यार है. एक इंटरव्यू में बाबूराम ने कहा था कि ‘आज मैं जो भी हूं, जेएनयू की वजह से हूं. ये दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी है.’

दिल्ली में पढ़ाई के दौरान ही बाबूराम ने हिसिला यमी यामी से शादी कर ली. हिसिला बाबूराम के साथ ही काम करती थीं और एक माओवादी नेता थीं.

बाबूराम 2011-2013 तक नेपाल के प्रधानमंत्री रहे हैं. चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान इन्होंने ऑल इंडिया नेपाली स्टूडेंट एशोसिएशन बनाया. 1966 में बाबूराम ने नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देवबा को 40 मांगों की सूची दी. मांग पूरी नहीं होने पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के साथ मिलकर 2006 तक सरकार केे खिलाफ लड़ते रहे.


 

6. जिग्मे सिग्मे वांगचुक

पद: भूटान के राजा 

पढ़ाई: सेंट जोसेफ कॉलेज दार्जिलिंग 

source- reuters
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जिग्मे सिंग्मे वांगचुक का जन्म 11 नवंबर 1955 को हुआ. ये भूटान के चौथे राजा रहे हैं. 1972 से 2006 तक इन्होंने भूटान की गद्दी पर राज किया है. मात्र 18 साल की उम्र में ये भूटान के राजा बने थे. इन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई दर्जिलिंग के सेंट जासेफ कॉलेज से की. जिग्मे ने चार शादियां की हैं. इनकी चारों बीवियां आपस में बहन हैं. चारों बीवियों से इनके 10 बच्चे हैं.

जिग्मे भूटान के प्रसिद्ध ‘ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस’ के फाउंडर हैं. 1970 में जब वो युवराज थे, तभी उन्होंने ‘ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस’ को इंट्रोड्यूस किया. ये मानते हैं कि जनता की खुशी देश के विकास का मापदंड है. इसमें जीडीपी की जगह लोगों की खुशी को प्रधानता दी जाती है.


7. लेफ्टिनेंट जनरल अकूफो

पद: घाना के राष्ट्राध्यक्ष 

पढ़ाई: नेशनल डिफेंस कॉलेज ऑफ इंडिया

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पूरा नाम फ्रेड्रिक विलियम क्वाजसी अकूफो. अकूफो का जन्म 21 मार्च 1937 को घाना में हुआ था. उन्होंने 1973 में भारत के नेशनल डिफेंस कॉलेज से पढ़ाई की थी. लेफ्टिनेंट जनरल अकूफो 1978-1979 में घाना के राष्ट्राध्यक्ष रहे थे. राष्ट्राध्यक्ष होने के दौरान इन्होंने घाना में संवैधानिक शासन बहाल करने की कोशिश की थी. लेकिन सैन्य तख्ता पलटकर इनको फांसी दे दी गई थी. जब इनको फांसी दी गई, उस समय इनकी उम्र मात्र 42 साल थी. अकूफो सैन्य तख्तापलट के जरिए घाना के राष्ट्राध्यक्ष बने थे.

अकूफो ने घाना में रोड एक्सीडेंट को कम करने के लिए ऑपरेशन ‘कीप राइट’ चलाया था. जिसके तहत ड्राइविंग को बाएं से दाएं किया गया था.


 

8. जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद

पद: बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति 

पढ़ाई: नेशनल डिफेंस कॉलेज ऑफ इंडिया

source- thefamouspeople.com
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जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद 70 के दशक में इंडिया पढ़ने आए थे. 1982 में सैन्य तख्तापलट की मदद से अब्दुस सत्तार को हटाकर राष्ट्रपति बने थे. और सात साल तक इस पद पर रहे. 1990 में शेख हसीना और खालिदा जिया ने सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी मुहिम चलाई थी. जिसके बाद इन्हें राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ा था. फिलहाल ये सांसद हैं और जातीय पार्टी के अध्यक्ष हैं. बांग्लादेश में जो कि पहले एक सेक्युलर देश हुआ करता था. लेकिन 1989 में इरशाद ने बांग्लादेश को मुस्लिम राष्ट्र बनाने में अहम भूमिका निभाई.

1991-1996 के बीच जब इरशाद भ्रष्टाचार के केस में जेल में थे और इन पर ट्रायल चल रहा था. तब वो लगातार 2 बार संसदीय चुनाव जीते. वो भी 5 अलग-अलग जगहों से. इरशाद बांग्लादेश के पहले नेता हैं, जिन्होंने अपनी गलतियों के लिए लोगों से पब्लिकली माफी मांगी है.


 

9. वीरेंद्र वीर विक्रम शाह

पद: नेपाल के राजा 

पढ़ाई: दार्जिलिंग सेंट जोसेफ कॉलेज

source- reuters
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वीरेंद्र वीर विक्रम शाह की गिनती नेपाल के महानतम राजाओं में होती है. 50 के दशक में उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई सेंट जोसेफ कॉलेज दार्जिलिंग से की थी. पिता महेंद्र वीर विक्रम शाह की मौत के बाद 1972 में वीरेंद्र ने नेपाल की गद्दी संभाली. और फिर 2001 तक नेपाल के राजा रहे. नेपाल के लोग राजा वीरेंद्र को भगवान विष्णु का अवतार मानते थे. 1990-2000 के बीच इनकी पॉपुलैरिटी इतनी बढ़ी कि लोग अपने घरों में इनकी फोटो लगाने लगे और भगवान की तरह पूजने लगे.

1980 में उन्होंने नेपाल की जनता से जनमत संग्रह के द्वारा कई पार्टियों की सरकार या बिना पार्टी की सरकार के बीच एक को चुनने को कहा. 55 फीसदी लोगों ने बिना पार्टी की सरकार चुनी. राजा बनने से पहले उन्होंने पूरे देश में पैदल यात्रा की थी. ताकि वो देश के हालात को अच्छे से समझ सकें.

1977 में कोलंबो प्लान की बैठक के दौरान राजा  वीरेंद्र ने सार्क के गठन का सुझाव दिया था. अपने देश और वहां के लोगों के प्रति राजा वीरेंद्र का प्यार उनके सिग्नेचर में भी दिखता था. वो अपने सिग्नेचर में अपना पूरा नाम नहीं लिखकर BK NEPAL लिखते थे. यानी नेपाल का राजा वीरेंद्र. 2001 में इनके बेटे दीपेंद्र ने पूरे परिवार की गोली मारकर हत्या कर दी थी.


 

10. मानूचेर मोट्टाकी

पद: ईरान के विदेशमंत्री 

पढ़ाई: बेंगलुरू यूनिवर्सिटी

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मानूचेर मोट्टाकी 2005-2010 तक ईरान के विदेशमंत्री थे. 1977 में इन्होंने बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया. 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई. इसके बाद मानूचेर वहां के पहले चुने हुए सांसद बने. इस क्रांति के बाद ईरान सभ्यता में बहुत पीछे चली गई. जहां औरतें हाफ पैंट पहनकर कार चलाती थीं, अब उनकी बेटियों को बुर्का पहन के रहना पड़ा.


 

11. जॉन सेमुअल मेलीसेला

पद: तंजानिया के प्रधानमंत्री 

पढ़ाई: बम्बई यूनिवर्सिटी

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जॉन सेमुअल मेलीसेला 1990 से 1994 तक तंजानिया के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. 1958 में इन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से कॉर्मस में ग्रेजुएशन किया. 1964 से 1968 तक ये यूनाइटेड नेशन में तंजानिया की तरफ से रिप्रजेंटेटिव भी रह चुके हैं.


 

12. सिटीवेनी राबुका

पद: फिजी के पूर्व प्रधानमंत्री

पढ़ाई: डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज तमिलनाडु

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राबुका 1992-1999 तक फिजी के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. फिलहाल ये विपक्ष के नेता हैं. 1987 में ये सेना के अध्यक्ष थे. और इन्होंने दो बार सैन्य तख्तापलट की कोशिश की थी. जिसकी वजह से चर्चित भी हुए. 2004 में फिजी सरकार ने राबुका को यूएस में फिजी का राजदूत नियुक्त किया था, लेकिन अमेरिकी सरकार ने राबुका को अनसुटेबल कैंडिडेट बताकर रिजेक्ट कर दिया था.

1974 के ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम में राबुका फिजी का चार अलग-अलग खेलों में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. राबुका ने 1979 में तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थि‍त डिफेंस सर्विसेज स्टॉफ कॉलेज से एमए की पढ़ाई की है.


 

13. ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह

पद: नेपाल के राजा

पढ़ाई: सेंट जोसेफ कॉलेज दार्जिलिंग

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वीरेंद्र वीर विक्रम शाह के भाई और नेपाल के आखिरी राजा. 2001 में वीरेंद्र वीर विक्रम शाह की मौत के बाद ये नेपाल के राजा बने और 2008 तक गद्दी पर राज किया. 2008 में नेपाल में गणतंत्र बना. अपने बड़े भाई वीरेंद्र की ही तरह इन्होंने भी सेंट जोसेफ कॉलेज दार्जिलिंग से पढ़ाई की है.

कहा जाता है कि ज्ञानेंद्र जब पैदा हुए तो राजमहल के पंडित ने इनके पिता से कहा कि अगर आपने अपने बेटे का चेहरा देखा तो आपका समय खराब चलने लगेगा. ये सुनकर ज्ञानेंद्र के पिता ने इनको इनकी दादी के पास रहने के लिए भेज दिया था.

इनके बारे में एक दिलचस्प बात ये भी है कि 1950 में 3 साल की उम्र में ये नेपाल के राजा बने थे. कुछ राजनीतिक समीकरणों के कारण इनके पूरे परिवार को नेपाल छोड़ भारत आना पड़ा. और राजपरिवार की तरफ से ज्ञानेंद्र इकलौते पुरुष थे, जो उस समय नेपाल में थे. उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहन शमशेर ने ज्ञानेंद्र को राजा घोषित किया. उस समय नेपाल में इनके नाम के सिक्के भी बने थे.

2005 में बड़े भाई वीरेंद्र द्वारा स्थापित संवैधानिक राजतंत्र को ज्ञानेंद्र ने स्थगित कर दिया. इस फैसले का पूरे देश में लोगों ने जमकर विरोध किया. इसी विरोध के दौरान 21 अप्रैल 2006 को 23 लोगों की जान चली गई. जिसके बाद राजा ज्ञानेंद्र ने फिर से संसद का पुनर्गठन किया.


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