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कंपोजर अजित वर्मन नहीं रहे: मरने से पहले और मरने के बाद भी, उन्होंने हमें बद्दुआ तो दी होगी!

1947 -:- आक्रोश । विजेता । अर्ध सत्य । सारांश । अंधा युद्ध । कर्म यौद्धा -:- 2016

शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग वाले अजित वर्मन ने गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’, ‘विजेता’ और महेश भट्‌ट की ‘सारांश’ जैसी फिल्मों में ऐसे गाने दिए जो ऑलटाइम क्लासिक हैं. ऐसी ही सरलता वाले जैसे लैजेंडरी एस. डी. बर्मन के हुआ करते थे. ऐसे गाने कि सुन कर रो दें. भीतर तक छूने वाले. गुरुवार को मुंबई में अंधेरी स्थित एक अस्पताल में उनका निधन हो गया. वे 69 वर्ष के थे. कुछ हफ्तों से उनकी तबीयत खराब थी. उनके एक पत्नी, बेटी और बेटा हैं जो बाहर ही रहते हैं. आखिरी दिनों में अजितदा अकेले ही थे.

अजित वर्मन 1947-2016
अजित वर्मन 1947-2016

उनकी कहानी फिल्म उद्योग और श्रोताओं की बेकद्री की एक और मिसाल है. उनके साथ भी वही हुआ जो अनेक दूसरे फिल्म उद्योग या गैर-फिल्मी कलावंतों के साथ हमेशा होता आया है. उन्होंने सत्यजीत रे, मृणाल सेन जैसे फिल्मकारों और शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसे संगीतकारों के लिए काम किया था. फिर 1980 से समानांतर सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में म्यूजिक दिया. लेकिन सात बरस बाद उन्हें अच्छा काम मिलना कम हो गया. इसके बाद उन्हें गिनती की फिल्में और छोटे-मोटे काम ही मिले. जैसे-तैसे उन्होंने जीवन निकाला.

पिछले 15-16 साल इतना अच्छा सिनेमा बना लेकिन उन्हें हिस्सा नहीं बनाया गया. उनके आखिरी दिन बहुत बुरे बीते. ख़राब आर्थिक हालात के साथ उन्हें दुख इस बात का भी था कि उन्हें गाने कंपोज करने का काम नहीं मिल रहा था जो उनका पैशन था. आत्म-सम्मान था इसलिए पैसे न होने पर भी उन्होंने किसी से मांगे नहीं. अंतिम दिनों में वे बीमार, कमजोर और कुपोषित हो गए थे और पड़ोसियों ने फिल्म इंडस्ट्री से उनके लिए पैसे जुटाने की कोशिश की. लेकिन किसी ने मदद नहीं की. उनका अंतिम संस्कार मुंबई के अंबोली शमशान में किया गया लेकिन यहां भी बेकद्री इतनी कि बताते हैं फिल्म उद्योग से कोई नहीं आया था.

उनकी आखिरी फिल्म डायरेक्टर अनंत महादेवन की ‘लाइफ इज़ गुड’ है जो अभी रिलीज होनी है. अनंत ने उनके साथ अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘स्टेट ऑफ द आर्ट’ में भी काम किया था. उनके गुजरने पर अनंत ने भी दुख प्रकट किया और कहा कि बेदिल फिल्म इंडस्ट्री ने उनके जीनियस को नहीं पहचाना.

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‘द ग्रेट इंडियन बटरफ्लाई’ जैसी फिल्म के निर्देशक सार्थक दासगुप्ता अंतिम समय में उनके साथ अस्पताल में थे. वे उनके साथ काम करना चाहते थे लेकिन अब ऐसा हो नहीं पाएगा. सार्थक ने लिखा, “RIP अजित वर्मन. ऐसे भुला दिए गए और कम आंके गए जीनियस कंपोजर जिन्हें हमारी इंडस्ट्री ने दरकिनार किया. वे आज शाश्वत आजादी की ओर कूच कर गए, आसमान में अपने गीत गाने के लिए. लेकिन मेरे दिल में एक भारी शून्य रह गया है. हमेशा चाहता था कि मेरी किसी रचना में उनके म्यूजिक का स्पर्श लग जाए. अब उसके लिए हमें दूसरे जनम का इंतजार करना पड़ेगा. हम कई बरस से संपर्क में न थे. लेकिन कल जब वे आईसीयू में लाइफ सपोर्ट पर बेहोश, संघर्ष कर रहे थे तब मैं उनके पास खड़ा था. मैंने उनसे कहा, अजितदा, आई लव यू. मुझे पता है उन्होंने मुझे सुना था. ये बात मेरे साथ मेरे मोक्ष की तरह रहेगी और कम से कम मैं अपनी आत्मा से आंख मिला पाऊंगा. मैं उन्हें मिस करूंगा. उनके म्यूजिक को मिस करूंगा. हमारी कभी-कभार होने वाली फोन चैट को मिस करूंगा. एक भयंकर अंधेरे ने उन्हें चारों तरफ से घेरा हुआ था फिर भी वे प्रेरित करने वाले शब्द बोलते थे.”

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किशोर कुमार के बेटे और गायक अशोक कुमार ने भी उन्हें याद किया. उन्होंने अजितदा के साथ काम किया था और उनकी एक फिल्म के गाने गाए थे.

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अलविदा कहते हुए हम अजितदा को उनके इन 10 गीतों के साथ याद कर रहे हैं. उन्होंने बहुत कम फिल्में कंपोज की लेकिन इनमें से उनके तीन-चार गाने ही उन्हें अमर बनाने के लिए काफी हैं.

#1.

कान्हा रे पीर सही ना जाए

– आक्रोश (1980)

#2.

हर घड़ी ढल रही शाम है ज़िंदगी
दर्द का दूसरा नाम है ज़िंदगी

– सारांश (1984)

#3.

मन आनंद आनंद छायो

– विजेता (1982)

#4.

सांसों में दर्द

– आक्रोश (1980)

#5.

अंधियारा गहराया

– सारांश (1984)

#6.

इतना तो कह दे
तुझे मुझसे प्यार है

– ये आशिकी मेरी (1998)

#7.

जिंदगी जिंदगी जिंदगी

– जनम (1988)

#8.

अंग अंग मेरे

– कर्मयौद्धा (1992)

#9.

ये आशिकी मेरी
ये बेख़ुदी मेरी

– ये आशिकी मेरी (1998)

#10.

बड़ी है बेक़रारी

– जीवन संध्या (1984)

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