Submit your post

Follow Us

8 कहानियां, जो बताती हैं कि मुग़लों, तुर्कों के दौर में समलैंगिकता को लेकर कहीं ज़्यादा खुलापन था


यह लेख अंग्रेजी के वेब पोर्टल डेली ओ से लिया गया है. मूल लेख को लुबना इरफ़ान ने लिखा है. दी लल्लनटॉप के लिए इसका अनुवाद और संपादन दर्पण साह ने किया है. 


# सरमद

जब दाराशिकोह के यहूदी साथी सरमद को मृत्युदंड दिया गया तो इस दंड के पक्ष में बेशक उसके खिलाफ ढेरों आरोप थे लेकिन उन आरोपों में समलैंगिकता का नाम तक नहीं था.

सरमद एक यहूदी रब्बी था जो काशन से भारत चला आया और अंततः दाराशिकोह की नौकरी करने लगा.

कुछ लेखों का दावा है कि सरमद ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था जबकि कुछ अन्य लेख ये बताते हैं कि वे नास्तिक और अज्ञेयवादी थे.

बहरहाल, 1660 में उनको मृत्युदंड दिया जाना एक राजनीतिक क्रिया थी क्योंकि वो दाराशिकोह के दरबार से जुड़े थे. उनकी मृत्यु के लिए दिए गए सभी कारण और औचित्य कमोबेश ‘नैतिक’ प्रकृति के थे क्यूंकि किसी को केवल नग्न होने भर के लिए नहीं मारा जा सकता था. सरमद पर मुहम्मद को नकारने और आधा कलमा पढ़ने का आरोप था. आरोप था कि उन्होंने ला इलाहा (कोई भगवान नहीं है) कहा था.

सरमद शहीद की मज़ार: आधा कलमा पढ़ते थे, वस्त्रहीन घूमते थे (तस्वीर: लुबना इरफ़ान)
सरमद शहीद की मज़ार: सरमद आधा कलमा पढ़ते थे, वस्त्रहीन घूमते थे (तस्वीर: लुबना इरफ़ान)

ये मज़ेदार बात है कि 17 वीं शताब्दी में जब मुगलिया प्रतिष्ठान के लोग सरमद का सर कलम करने के लिए कारणों की तलाश कर रहे थे तो उस दौरान उन्हें समलैंगिकता इतना बड़ा कारण नहीं लगा कि उसके लिए किसी को मृत्युदंड दिया जा सके. तब जबकि सरमद की सेक्शुअल प्राथमिकताओं के बारे में सभी को पता था और ये भी सर्वविदित था कि वो थट्टा नाम के एक हिंदू युवक के प्रेम में दीवाना हुआ चाहता था.

कहा जाता है कि इस लड़के से अपने दीवानगी की हद तक प्रेम के चलते सरमद ने सबकुछ छोड़ दिया. अपने बदन के कपड़े तक. यूं वो एक वस्त्रहीन फकीर बन गया था.

सरमद की इस कहानी को इस बात के सबूत के तौर पर देखा जा सकता कि मुगलिया काल के दौरान सेक्शुअल ओरिएंटेशन के प्रति कहीं उदार दृष्टिकोण रहा था. यूं तथाकथित अप्राकृतिक यौन संबंधों से जुड़ी हुई वर्जना हालिया और आधुनिक सिद्ध होती है.


# बाबर

बाबर ने अपने संस्मरणों में सबकुछ खुलेआम लिखा था, इसी के चलते उनकी उस पीड़ा और परेशानी से हर कोई अच्छे से वाकिफ़ है जो उन्हें एक लड़के को छोड़ने के चलते हुई थी. बाबर का उस लड़के को छोड़ने का कारण राजनीति में उलझ जाना रहा था.

बाबर की उस लड़के के लिए जो भावनाएं थीं उन्हें अभिव्यक्त करने में उसे कोई शर्म, झिझक या डर का अनुभव न हुआ. ऐसा लगता है कि इतने पुराने दौर में लोगों के दिमाग में इन भावनाओं से जुड़ी कोई भी चेतना अप्राकृतिक या प्रतिबंधित नहीं थी.

बाबर की ज़िंदगी खुली किताब हो गई जब अपनी किताब में सब कुछ जस-का-तस लिख दिया. (तस्वीर: Wikimedia Commons)
बाबर की ज़िंदगी खुली किताब हो गई जब अपनी किताब में सब कुछ जस-का-तस लिख दिया. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

एक दिलचस्प वाकया है. एक बार एक ही सोफे पर एक-दूसरे के करीब लेटे दो पुरुषों को इसलिए डांटा गया क्यूंकि उनमें से एक ब्राह्मण था और दूसरा महान बलराम खान का पोता था, न कि इसलिए कि कि वे कुछ अप्राकृतिक कर रहे थे.


# जहांनारा बेग़म

उस वक्त के लेखों और दस्तावेज़ों से न केवल पुरुषों बल्कि महिलाओं के बीच भी प्रेम और यौन संबंधों की पुष्टि हुई है.

एक उदाहरण तो जहांनारा बेगम का ही दिया सकता है जिस पर उसके पिता के साथ अनैतिक संबंध होने का आरोप था और इसके चलते उसकी शादी नहीं हो पाई. यह बताया जाता है कि उसका अपनी दासियों में से एक के प्रति विशेष अनुराग हो गया था. प्रेम की हद ये थी कि एक बार नृत्य करते हुए जब उस दासी के कपड़ों में आग लग गई तो राजकुमारी उसे बचाने के चक्कर में खुद बुरी तरह जल गई. इस हादसे से राजकुमारी की हालत गंभीर हो गई थी और उसकी चोटों को ठीक होने में काफी समय लगा.

जहांनारा बेग़म (तस्वीर: Wikimedia Commons)
जहांनारा बेग़म (तस्वीर: Wikimedia Commons)

यूं ये तर्क दिया जा सकता है कि उस दौर में भारत में समान जेंडर के लोगों के बीच भावनात्मक और शारीरिक लगाव की उपस्थिति बहुत सामान्य थी.


# पर्दा जो उठ गया तो

एक और कारण भी है जिसके चलते हरम की स्त्रियों के बीच घनिष्ठ संबंध बड़ी तेज़ी से और बहुतायत में विकसित हुए थे. वो था उस दौर में महिलाओं की कामेच्छा का पितृसत्तात्मक के अधीन बुरी तरह दबा हुआ और ढेरों पर्दे में होना.

पुस्तक 'मूरिश हरम की एक रात' का मुखपृष्ठ
पुस्तक ‘मूरिश हरम की एक रात’ का मुखपृष्ठ

बाद के वर्षों के दौरान कई राजनैतिक कारणों और परिस्थितियों के चलते मुगल राजकुमारियों की शादी नहीं हो पा रही थी. साथ ही उन्हें किसी भी यौन आनंद से वंचित कर दिया गया था. हरम के नियमों के मुताबिक यौन आनंद के लिए इस्तेमाल की जा सकने वाली किसी भी वस्तु की अनुमति न थी. भांग, शराब, अफीम और जायफल जैसे नशों के अलावा मूली और खीरे जैसी सब्जियां भी हरम में वर्जित थीं.


# ख्वाजासरा

‘ख्वाजासरा’ एक और महत्वपूर्ण समूह था जिसे किसी भी प्रकार के यौन आनंदों से वंचित कर दिया गया था. इस समूह में अलग-अलग तरह के लोग आते थे. यदा – वे पुरुष जिनके यौनांग काट दिए गए हों या हिजड़े. उस वक्त के दस्तावेज़ों से पता चलता है कि यौन-अंगों की अनुपस्थिति के बावजूद ये लोग महिलाओं के साथ संबंध रखते थे.

कुछ समृद्ध ‘ख्वाजासरा’ अपने घरों में महिलाओं को रखते थे. इन महिलाओं और ख्वाजसारों के बीच कुछ भावनात्मक और शारीरिक लगाव अवश्य हो जाता होगा, क्योंकि ये बताया जाता है कि इन उनके ख्वाजासारों के महिलाओं के साथ प्रेम संबंध थे.

महिलाओं को उनसे कुछ ढंकने-छिपाने की ज़रूरत न थी. और ये भी इन दोनों के बीच रिश्तों के पनपने का एक बड़ा कारण था. इस तरह के रिश्तों के चलते ही कुछ रईसों ने ख्वाजसारों को अपने घरों में रोजगार नहीं दिया था.

पाकिस्तान का एक समकालीन ख्वाजासरा (तस्वीर: pulitzercenter.org)
पाकिस्तान का एक समकालीन ख्वाजासरा (तस्वीर: pulitzercenter.org)

ये ख्वाजासरा महिलाओं से ‘सेक्शुअल फेवर’ लेने की स्थिति में थे और बदले में वे महिलाएं भी अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनुमति और स्वतंत्रता ले सकती थीं.

मुगल सांस्कृतिक जीवन के एक तत्कालीन पर्यवेक्षक मनुची कहते हैं कि कुछ ख्वाजासरा कुछ राजकुमारियों के पसंदीदा थे. ऐसा कहा जाता है कि राजकुमारियां उनके साथ उदार थीं और वे ख्वाजासरों से ‘उन चीज़ों’ का आनंद लेने का अनुरोध कर सकती थीं जिनको लिखने में मनुची को शर्म आती थी.

इसके अलावा उसी दस्तावेज़ में यह भी बताया गया है कि ख्वाजासरा महिलाओं के लिए बहुत अनुकूल थे और उनकी जीभ और हाथ महिलाओं की जांच में एक साथ काम करते थे. इस टिप्पणी को शारीरिक संबंधों की उस प्रकृति पर एक सूक्ष्म टिप्पणी के रूप में देखा जा सकता है जैसा कि वो अस्तित्व में थीं. इन सारी बातों का दस्तावेज़ीकरण बाज़ारों और उस वक्त के अड्डों में होने वाली बातों के आधार पर किया गया है. मने, मुगल काल में इस तरह के रिश्ते वर्जित नहीं थे और व्यापक रूप से प्रचलित थे.


# धर्म और सेक्स

अधिकांश ख्वाजासरा बड़े धार्मिक स्वभाव के थे. ऐसा कहा जाता है कि वे अपनी मान्यताओं को लेकर अटल थे. उन्हें धार्मिक प्रकृति के कार्य भी दिए जाते थे, जैसा कि बदायूंनी ख्वाज़ा दौलत नज़ीर के बारे में बताते हैं. ख्वाज़ा दौलत नज़ीर एक जो ख्वाजासरा था और अकबर द्वारा इबादतों के लिए नियुक्त किया गया था.

ख्वाजासरों ने मस्जिदों और धार्मिक प्रतिष्ठानों का निर्माण और संरक्षण भी किया था. आगरा में अभी भी एक ऐसी ही मस्जिद मौजूद है.

स्टीव वाई वाई की एल्बम 'सेक्स एंड रिलिजन' का कवर (तस्वीर: अमेज़न)
स्टीव वाई वाई की एल्बम ‘सेक्स एंड रिलिजन’ का कवर (तस्वीर: अमेज़न)

निश्चित ही उस दौर में धार्मिक प्रतिष्ठानों का लोगों की यौन उन्मुखता पर नियंत्रण नहीं था. लेकिन ये निश्चित तौर पर नहीं कहा सकता है कि रूढ़िवाद ने समलैंगिकों के बीच प्रेम और रिश्ते का विरोध नहीं किया होगा.


# अकबर का दौर

शायद अकबर के समय के रूढ़िवादी इतिहासकार बदायूंनी ने ऐसी भावनाओं और रिश्तों को अस्वीकार कर दिया था. तो कुल मिलाकर बेशक ये तो नहीं कहा जा सकता कि कथित ‘अप्राकृतिक यौनताओं’ की प्रति द्वेष पूरी तरह अनुपस्थित था, लेकिन ये ज़रूर था कि ऐसे रिश्तों को एक व्यापक स्वीकृति प्राप्त थी और समाज में तब तक वैसी कठोरता स्थापित नहीं हुई थी.


# तुर्कों और सफ़ाविदों भी कमोबेश यही हाल था

मुगलों की तरह ही तत्कालीन तुर्क और सफ़ाविद के राजवंशों के भी सेक्शुअल ओरिएंटेशन को लेकर समान दृष्टिकोण थे.

पुराने लेखों और दस्तावेज़ों में दसियों जगह पर शाह अब्बास (1588-1629) को आकर्षक (स्मार्ट एंड हेंडसम) खिदमतगारों के शौकीन के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

ईरान में एक फारसी कविता की चित्रकारी (तस्वीर: AP Photo/Ebrahim Noroozi)
ईरान में एक फ़ारसी कविता की चित्रकारी (तस्वीर: AP Photo/Ebrahim Noroozi)

तुर्क शासक, मेहमद को भी हेट्रोसेक्शुअल कहा जाता है और न केवल वो युवा पुरुषों की इच्छा रखते थे बल्कि और उनकी सुंदरता से प्रभावित थे. फ़ारसी कविताएं समलैंगिक संबधों के संदर्भों से भरी पड़ी है और मज़े की बात ये है कि हाफ़िज़ और सादी जैसे फ़ारसी साहित्य के रचियता मध्ययुगीन काल में मदरसे के मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा थे.


वीडियो देखें: 

इम्तियाज़ अली बचपन में फिल्म देखने गए तो किसका पोस्टर देख दर्शकों ने कुर्सियां उखाड़ दीं

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पोस्टमॉर्टम हाउस

बाबा बने बॉबी देओल की नई सीरीज़ 'आश्रम' से हिंदुओं की भावनाएं आहत हो रही हैं!

आज ट्रेलर आया और कुछ लोग ट्रेलर पर भड़क गए हैं.

करोड़ों का चूना लगाने वाले हर्षद मेहता पर बनी सीरीज़ का टीज़र उतना ही धांसू है, जितने उसके कारनामे थे

कद्दावर डायरेक्टर हंसल मेहता बनायेंगे ये वेब सीरीज़, सो लोगों की उम्मीदें आसमानी हो गई हैं.

फिल्म रिव्यू- खुदा हाफिज़

विद्युत जामवाल की पिछली फिल्मों से अलग मगर एक कॉमर्शियल बॉलीवुड फिल्म.

फ़िल्म रिव्यू: गुंजन सक्सेना - द कारगिल गर्ल

जाह्नवी कपूर और पंकज त्रिपाठी अभिनीत ये नई हिंदी फ़िल्म कैसी है? जानिए.

फिल्म रिव्यू: शकुंतला देवी

'शकुंतला देवी' को बहुत फिल्मी बता सकते हैं लेकिन ये नहीं कह सकते इसे देखकर एंटरटेन नहीं हुए.

फ़िल्म रिव्यूः रात अकेली है

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे अभिनीत ये पुलिस इनवेस्टिगेशन ड्रामा आज स्ट्रीम हुई है.

फिल्म रिव्यू- यारा

'हासिल' और 'पान सिंह तोमर' वाले तिग्मांशु धूलिया की नई फिल्म 'यारा' ज़ी5 पर स्ट्रीम होनी शुरू हो चुकी है.

फिल्म रिव्यू- दिल बेचारा

सुशांत के लिए सबसे बड़ा ट्रिब्यूट ये होगा कि 'दिल बेचारा' को उनकी आखिरी फिल्म की तरह नहीं, एक आम फिल्म की तरह देखा जाए.

सैमसंग के नए-नवेले गैलेक्सी M01s और रियलमी नार्ज़ो 10A की टक्कर में कौन जीतेगा?

सैमसंग गैलेक्सी M01s 9,999 रुपए में लॉन्च हुआ है.

अनदेखी: वेब सीरीज़ रिव्यू

लंबे समय बाद आई कुछ उम्दा क्राइम थ्रिलर्स में से एक.