Submit your post

Follow Us

वो चार वॉर मूवीज़ जो बताती हैं कि फौजी जैसे होते हैं, वैसे क्यूं होते हैं

फिल्म अच्छी है, लेकिन जैसा दिखाया है, वैसा होता नहीं है.

खुद पर बनी फिल्मों से फौजियों को ये सबसे बड़ी शिकायत होती है. क्यों? क्योंकि फौजियों पर बनी ज़्यादातर फिल्मों में नायक फौजी होते ही नहीं. उन फिल्मों का नायक युद्ध होता है. फौजियों से यही अपेक्षित होता है कि वो कुछ भावुक बातें कहें, फिर मर जाएं. फिर कुछ फिल्में होती हैं जिनमें फौजी उन्मादी रोबोट्स की तरह दिखाए जाते हैं. सबसे बड़ी नाइंसाफी दुश्मन सेना के साथ होती है. उन्हें कभी पेशेवर फौजी की तरह दिखाने की कोशिश ही नहीं की जाती.

फौजी सिर्फ बहादुर ही नहीं होते. उन्हें मालूम होता है कि डर किसे कहते हैं. वो भोले हो सकते हैं, लेकिन क्रूर से क्रूर फैसला ले सकते हैं, निर्दयता से उसपर अमल कर सकते हैं. वो हुकम के पक्के होते हैं, लेकिन उनसे बड़ा ज़िद्दी आपको ढूंढने से नहीं मिलेगा. ये सब आपने कितनी बार पर्दे पर देखा है? अगर आप जानना चाहते हैं कि फौजी जैसे होते हैं, वैसे क्यों होते हैं, तो आपको देखनी चाहिए ये चार फिल्में. ये आपको फौजियों के मन में झांकने का एक मौका देंगी. आप ये भी देख पाएंगे कि एक फौजी की आंखों से ये दुनिया कैसी नज़र आती है.

तो जवान, सावधान !

Meri Movie List Lallantop Movie Series Books Recommendation Series Copy

1. द ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई (1957)

द्वितीय विश्वयुद्ध का समय. नवंबर 1942 तक जापान की सेनाएं बर्मा तक आ चुकी हैं. वो अब रंगून को बैंकॉक से जोड़ने के लिए एक रेलवे लाइन बना रहे हैं. और इसके लिए थाइलैंड में क्वाई नदी पर बनना है एक पुल. जापानी सेना के कर्नल साइतो (सेसुए हायाकावा) को ये काम ब्रिटिश युद्धबंदियों से करवाना है. असफल रहा, तो साइतो को आत्महत्या करनी होगी. कैंप में लाए गए ब्रिटिश युद्धबंदी यातनाओं के चलते पूरी तरह टूट चुके हैं. ऐसे वक्त में ब्रिटिश सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल निकलसन (एलेक गिनिस) साइतो को चुनौती देता है. निकलसन एक बेहद दिलचस्प पात्र है. वो कैंप से भागने की कोशिश नहीं करना चाहता. क्यों? क्योंकि सिंगापुर में ब्रिटिश फौज के कमांड हेडक्वार्टर ने खुद आत्मसमर्पण का हुक्म दिया था. लेकिन उसकी मांग है कि कैंप के युद्धबंदियों के साथ जिनीवा संधि के मुताबिक बर्ताव हो. बदले में निकलसन ब्रिटिश सैनिकों से क्वाई पर वो पुल बनवा देगा, जो जापानी सेना के इंजीनियर बंदूक की नोक पर बनवा नहीं पा रहे.

यहां पैदा होता है द्वंद्व. फौज का कानून कहता है कि युद्धबंदी काम से इनकार नहीं कर सकते. लेकिन अगर दुश्मन का काम लगन से किया जाए, तो क्या ये गद्दारी नहीं होगी. निकलसन का जवाब है,

‘ … ये दिखाना ज़रूरी है कि वो हमारे शरीर और आत्मा को चाहकर भी तोड़ नहीं सकते. एक दिन युद्ध खत्म हो जाएगा. आने वाले वक्त में इस पुल को इस्तेमाल करने वाले याद करेंगे कि इसे बनाने वाले कौन थे. वो गुलाम नहीं थे. बंधक ही सही, लेकिन वो ब्रिटिश फौजी थे. ‘

लेकिन अपने जवानों को एक मकसद देने की कोशिश कर रहा निकलसन नहीं जानता कि कैंप से बचकर निकला कमांडर शियर्स (विलियम होल्डन) ब्रिटिश फौज के एक दल के साथ वापस आ रहा है. और उसे मिशन दिया गया है – क्वाई पर बन रहे निकलसन के पुल को उड़ाना. कहानी इन दो मिशन्स के साथ ही आगे बढ़ती है.

1952 में आए पियेर बूल के फ्रेंच उपन्यास ‘द ब्रिज ओवर द रिवर क्वाई’ पर बनी इस फिल्म को दुनिया में आज भी चोटी की कल्ट वार फिल्म्स में गिना जाता है. फिल्मों में मार्च करते फौजियों से सीटी बजवाने का खयाल दुनियाभर के निर्देशकों को इसी फिल्म ने दिया था. ये फिल्म बताती है कि उसूल, अनुशासन और मान को लेकर एक फौजी किस हद तक जा सकता है. जब उसके पास कुछ नहीं बचता, तो वो इन्हीं चीज़ों में जीने की वजह खोजता है.

निर्देशक – डेविड लीन
कहां देखेंयूट्यूब, गूगल प्ले

***

2. फुल मेटल जैकेट (1987)

हथियारों की दुनिया में एक तरह की गोली और फिल्मों की दुनिया में एक कल्ट क्लासिक. अगर आप देखना चाहते हैं कि वियतनाम युद्ध के दौर में यूएस मरीन्स कैसे तैयार किए जाते थे, तो फुल मैटल जैकेट देखिए. फौज में कहा जाता है कि आप ट्रेनिंग के दौरान अपने सभी उस्तादों को भूल सकते हैं. लेकिन ड्रिल इंस्ट्रक्टर हमेशा याद रहता है. गनरी सार्जेंट हार्टमैन (स्टाफ सार्जेंट रॉनल्ड ली अर्मी) ऐसा ही एक ड्रिल इंस्ट्रक्टर है, जो जवान कभी भूलेंगे नहीं. उसे अब तक सिविलियन्स की ज़िंदगी जी रहे लड़कों को मरीन राइफलमैन बनाना है. लेकिन इसके पहले उन्हें तोड़ना होगा. इसीलिए हार्टमैन बेहद सख्ती से ड्रिल करवाता है. एक की गलती पर पूरी पल्टन को सज़ा होती है. यही गलतियां हमारा ध्यान ले जाती हैं दो रिक्रूट्स पर – प्राइवेट जोकर (मैथ्यू मोडीन) और प्राइवेट पाइल (विंसेंट डी’ऑनोफ्रियो). प्राइवेट पाइल का दिमाग़ बाकियों जितना ‘तेज़’ नहीं है, तो वो गलतियां करता रहता है. प्राइवेट जोकर को पाइल की मदद करने का काम सौंपा जाता है. लेकिन मरीन बनने से पहले की टूटन एक दिन पाइल को एक ऐसी जगह लाकर खड़ा कर देती है, जहां से वो लौटने के सारे रास्ते खो देता है.

फौजियों की ट्रेनिंग का महिमामंडन अनगिनत फिल्मों में हुआ है. लेकिन बहुत कम फिल्में हैं जो फुल मैटल जैकेट की तरह उस मिलिट्री ब्रेनवॉशिंग को पर्दे पर लाती हैं जो ट्रेनिंग के दौरान की जाती है. फिल्म का दूसरा हिस्सा विएतनाम में लड़ रहे मरीन्स की ज़िंदगी दिखाता है. प्राइवेट जोकर वहां सेना के अखबार के लिए पत्रकार बनकर जाता है. फुल मेटल जैकेट दिखाती है कि एक दिशाहीन युद्ध लड़ने को मजबूर फौजी के दिमाग में कैसी कैसी बातें आती हैं. वो हुकम बजा रहा है, लेकिन उसके मन में ये सवाल भी है कि इस सब से असल में हो क्या रहा है. मकसद क्या है? ये न जानना मृत्यु जितनी शाश्वत चीज़ तक से मतलब छीन सकता है. चाहे वो साथी फौजी की हो, या दुश्मन की.

फिल्म सेना और युद्ध को लेकर अपना दर्शन बड़ी सफाई से पर्दे पर रखती है. इस दर्शन के अलावा फिल्म की सबसे बड़ी पूंजी है प्रामाणिकता. पर्दे पर इतनी असली लगने वाली फौज आपको बहुत ढूंढने के बाद ही किसी और फिल्म में मिल पाएगी. इसका स्क्रीनप्ले 1979 में आए गुस्ताव हासफोर्ड के उपन्यास ‘द शॉर्ट टाइमर्स’ के आधार पर लिखा गया था. गुस्ताव खुद मरीन रहे थे. इसके अलावा रॉनल्ड ली अर्मी सचमुच एक मरीन ड्रिल इंस्ट्रक्टर थे जिन्हें फिल्म में सलाहकार के तौर पर लिया गया था. लेकिन वो कैमरे के सामने इतने सहज लगते थे कि हार्टमैन का पात्र उन्हें ही दे दिया गया. और फिर कूब्रिक तो कूब्रिक थे ही.

निर्देशक – स्टैनली कूब्रिक. महान फिल्मकार कूब्रिक ने ‘पाथ्स ऑफ ग्लोरी’ नाम से भी एक वॉर फिल्म बनाई थी. उसे भी देखा जाए.
कहां देखेंनेटफ्लिक्स

***

3. प्रहार – द फाइनल अटैक (1991)

फौज और फौजियों को दिखाने के मामले में ‘प्रहार’ भारत की ‘फुल मेटल जैकेट’ है. उतनी ही प्रामाणिक, उतनी ही ईमानदार. मेजर चौहान (नाना पाटेकर) एक सख्त कमांडो ट्रेनर है. सैनिक बनना अगर मुश्किल है, तो कमांडो बनना बहुत मुश्किल है. कमांडो ट्रेनिंग के दौरान लीडो टैंक (एक तरह का गहरा स्विमिंग पूल) में कॉन्फिडेंस ट्रेनिंग कराई जाती है. इसमें कमांडो रिक्रूट को 50 फीट की ऊंचाई पर 1 फीट चौड़े पट्टे पर चलना होता है, 55 फीट की ऊंचाई से पूल में ऐसे कूदना होता है कि कम से कम छींटें उड़ें. इस ट्रेनिंग का मकसद होता है ऊंचाई का डर खत्म करना. ऐसी कई चीज़ों को ‘प्रहार’ में हूबहू दिखाया गया है और उन्हें फिल्म के मशहूर सीन्स के तौर पर याद किया जाता है. मेजर चौहान के लिए अपने जोकर्स (रिक्रूट्स) का मनोबल तैयार करना एक सैनिक मिशन के साथ साथ एक भावनात्मक मुद्दा भी है. उसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है. चाहे उसके लिए अस्पताल में भर्ती ज़ख्मी रिक्रूट को डांटना ही पड़ जाए.

हमने समाज से सेना में जाने वाले शख्स की यात्रा खूब देखी है. लेकिन ये आधी कहानी होती है. ‘प्रहार’ इस पहिए को पूरा घुमाती है. हमें बताती है कि एक दिशाहीन, असंवेदनशील और निर्दयी समाज में जब एक ऐसा शख्स लौटता है जिसकी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा नियम, उसूल और अनुशासन के इर्द गिर्द घूम रहा था, तो कैसा टकराव पैदा होता है. और यहीं ‘प्रहार’ भारत में फौज पर बनी तमाम फिल्मों से हटकर खड़ी हो जाती है. सेकंड लेफ्टिनेंट पीटर डिसूज़ा (गौतम जोगलेकर) ने अपने इंस्ट्रक्टर मेजर चौहान से एक ही चीज़ सीखी है – फौजी मैदान नहीं छोड़ता. और इसकी उसे बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ती है.

मेजर चौहान इसे स्वीकार नहीं कर पाता. और तब वो वही करता है जो उसने पीटर को सिखाया था. वो अपनी पूरी ताकत से इस सड़ांध मारते सिस्टम पर प्रहार कर देता है. दुनिया उसे समझ नहीं पाती. क्योंकि दुनिया चीज़ों को वैसे देखती ही नहीं है जैसे मेजर चौहान देखता है. मंत्री जी का काफिला गुज़रना है इसलिए एक गर्भवती औरत सड़क पार करके अस्पताल नहीं जा सकती. उसका बच्चा फुटपाथ पर ही पैदा होकर मर जाता है. 1991 से पहले न जाने कितनी बार ये हुआ होगा. दुनिया तमाशा देखती है, मेजर चौहान रास्ता रोकने वाले पुलिस वाले से भिड़ जाता है.

नाना पाटेकर की सबसे उम्दा फिल्मों में से एक प्रहार में वैसे माधुरी दीक्षित और हबीब तनवीर भी हैं. लेकिन नाना के बाद अगर किसी का ज़िक्र करने का सबसे ज़्यादा मन करता है, तो वो हैं डिंपल कपाड़िया. अगर आप फौज पर बनी एक फिल्म ही देखना चाहते हैं, तो आपको बिना सोचे ‘प्रहार’ देखनी चाहिए.

निर्देशक – नाना पाटेकर
कहां देखेंयूट्यूब, गूगल प्ले.

***

4. अ फ्यू गुड मेन (1992)

अ फ्यू गुड मेन की कहानी बड़ी सीधी सी है. दो मरीन्स – लान्स कॉर्पोरल डॉसन और प्राइवेट फर्स्ट क्लास लाउडेन डाउनी पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने एक साथी मरीन विलियम सांटीयागो की हत्या कर दी है. आरोपी मरीन्स कहते हैं कि उन्हें सांटीयागो पर ‘कोड रेड’ कार्रवाई का हुक्म मिला था. चेन ऑफ कमांड से आया कोई भी आदेश उनके लिए पत्थर की लकीर है. उन्होंने बस उसका पालन किया. लेकिन समस्या ये है कि कोड रेड जैसा कोई नियम कहीं लिखा नहीं होता. लेकिन दुनिया भर की सेनाओं में बार बार गलती करने वाले सैनिकों को रास्ते पर लाने के लिए यातनाएं देना आम हैं. ग्वानतानमो बे में तैनात मरीन्स एक वक्त इसके लिए कोड रेड शब्द का इस्तेमाल करते थे.

कोर्ट मार्शल में इन दोनों का मुकदमा लड़ने का काम मिलता है लेफ्टिनेंट डैनियल कैफी (टॉम क्रूज़), लेफ्टिनेंट कमांडर जोएन गैलोवे और लेफ्टिनेंट सैम वीनबर्ग (केविन पॉलक) को. कैफी दोनों मरीन्स को विकल्प देता है कि अगर वो इल्ज़ाम स्वीकार कर लें तो उन्हें बख्श दिया जाएगा. लेकिन डॉसन और डाउनी इस बात पर अडिग हैं कि उन्होंने सिर्फ ऑडर्स का पालन किया है. तब एक ऐसे मुकदमे की शुरुआत होती है जिसमें जीत शुरुआत से नामुमकिन लगती है. एक फौजी के लिए परंपरा, वफादारी, अनुशासन और मान का कितना महत्व होता है, डॉसन का पात्र बड़े अच्छे से दिखाता है. मरीन्स की यूनिट के सीओ कर्नल नेथन जेसप (जैक निकलसन) एक दूसरे चरम को पर्दे पर लाते हैं. जो कहता है, फौजी उद्देश्य सर्वोपरि होते हैं, और उनके लिए किसी भी नियम या व्यक्ति की बलि दी जा सकती है. दुनिया में किसी फौजी को इन दोनों में से एक को चुनने को कहिए – वो दुविधा में पड़ जाएगा. इस दुविधा का चित्रण ही अ फ्यू गुड मेन का हासिल है.

फिल्म इसी नाम से लिखे गए एरन सॉर्किन के नाटक पर आधारित है. 1989 में इसे ब्रॉडवे पर खेला गया था. 1985-86 में मरीन कोर के ग्वानतानमो बेस पर बिलकुल वैसा ही एक हादसा हुआ था जैसा फिल्म में दिखाया गया है. तब भी कोड रेड में हिस्सा लेने वाले मरीन डेविड कॉक्स ने समझौते से इनकार करते हुए कोर्ट मार्शल का सामना किया था. भारत में इस फिल्म को देखने वालों को भी एक नाटक याद आएगा – स्वदेश दीपक का लिखा ‘कोर्ट मार्शल’. कोर्ट मार्शल 1991 में आया था. ‘कोर्ट मार्शल’ और ‘अ फ्यू गुड मेन’ की कहानी में बहुत समानताएं हैं. बस एक फर्क है. ‘कोर्ट मार्शल’ का अंत पोएटिक जस्टिस की बात करता है और ‘अ फ्यू गुड मेन’ तर्क पर आधारित न्याय की. फौज में ज़्यादा संभावना दूसरे तरह के फैसले की ही होती है. ये फिल्म आपको ‘शौर्य’ (2008) की याद भी दिलाएगी. लेकिन शौर्य मेलोड्रामा की भेंट चढ़ जाती है. मेलोड्रामा ‘अ फ्यू गुड मेन’ में भी है. लेकिन वो असल ज़िंदगी के ज़्यादा करीब खड़ी होती है.

निर्देशक – रॉब रीनर.
कहां देखेंयूट्यूब, गूगल प्ले.

वीडियोः यहूदी नरसंहार करने वाले नाज़ियों पर बनी ‘जोजो रैबिट’ देखना बहुत ज़रूरी है

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पोस्टमॉर्टम हाउस

क्या तनिष्क के बायकॉट से कंपनी को 2700 करोड़ रुपए का नुकसान हो गया?

क्या तनिष्क के बायकॉट से कंपनी को 2700 करोड़ रुपए का नुकसान हो गया?

पहले ही नाच पड़ने वाले पूरा सच जानकर खिसिया जाएंगे.

ये गेम आस्तीन का सांप ढूंढना सिखा रहा है और लोग इसमें जमकर पिले पड़े हैं!

ये गेम आस्तीन का सांप ढूंढना सिखा रहा है और लोग इसमें जमकर पिले पड़े हैं!

पॉलिटिक्स और डिप्लोमेसी वाला खेल है Among Us.

फिल्म रिव्यू- कार्गो

फिल्म रिव्यू- कार्गो

कभी भी कुछ भी हमेशा के लिए नहीं खत्म होता है. कहीं न कहीं, कुछ न कुछ तो बच ही जाता है, हमेशा.

फिल्म रिव्यू: सी यू सून

फिल्म रिव्यू: सी यू सून

बढ़िया परफॉरमेंसेज़ से लैस मजबूत साइबर थ्रिलर,

फिल्म रिव्यू- सड़क 2

फिल्म रिव्यू- सड़क 2

जानिए कैसी है संजय दत्त, आलिया भट्ट स्टारर महेश भट्ट की कमबैक फिल्म.

वेब सीरीज़ रिव्यू- फ्लेश

वेब सीरीज़ रिव्यू- फ्लेश

एक बार इस सीरीज़ को देखना शुरू करने के बाद मजबूत क्लिफ हैंगर्स की वजह से इसे एक-दो एपिसोड के बाद बंद कर पाना मुश्किल हो जाता है.

फिल्म रिव्यू- क्लास ऑफ 83

फिल्म रिव्यू- क्लास ऑफ 83

एक खतरनाक मगर एंटरटेनिंग कॉप फिल्म.

बाबा बने बॉबी देओल की नई सीरीज़ 'आश्रम' से हिंदुओं की भावनाएं आहत हो रही हैं!

बाबा बने बॉबी देओल की नई सीरीज़ 'आश्रम' से हिंदुओं की भावनाएं आहत हो रही हैं!

आज ट्रेलर आया और कुछ लोग ट्रेलर पर भड़क गए हैं.

करोड़ों का चूना लगाने वाले हर्षद मेहता पर बनी सीरीज़ का टीज़र उतना ही धांसू है, जितने उसके कारनामे थे

करोड़ों का चूना लगाने वाले हर्षद मेहता पर बनी सीरीज़ का टीज़र उतना ही धांसू है, जितने उसके कारनामे थे

कद्दावर डायरेक्टर हंसल मेहता बनायेंगे ये वेब सीरीज़, सो लोगों की उम्मीदें आसमानी हो गई हैं.

फिल्म रिव्यू- खुदा हाफिज़

फिल्म रिव्यू- खुदा हाफिज़

विद्युत जामवाल की पिछली फिल्मों से अलग मगर एक कॉमर्शियल बॉलीवुड फिल्म.