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वेब सीरीज़ रिव्यू- फ्लेश

स्वरा भास्कर की नई वेब सीरीज़ ‘फ्लेश’ ह्यूमन ट्रैफिकिंग यानी मानव तस्करी के बारे में बात करती है. अपनी बात मनवाने के लिए ये सीरीज़ किसी भी हद तक जाने को तैयार है. वो इस मामले की गंभीरता और गहराई में जाने की बजाय इसे सनसनीखेज़ बनाना चाहती है. इस सीरीज़ में कई ऐसे सीन्स हैं, जिन्हें देखते हुए आप खीज से भर जाते हैं. ये सब करके मेकर्स चाहते हैं कि आप पर इसका गहरा प्रभाव पड़े. मगर उनका ये दांव उल्टा पड़ गया है. गैर-ज़रूरी सेक्स सीन्स से लेकर बच्चों के साथ हो रही अजीबोगरीब हरकतें, बेवजह गाली-गलौज और अति-हिंसक सीन्स का समागम आपको ‘फ्लेश’ में देखने को मिलेगा.

इस सीरीज़ की कहानी शुरू होती है एक एनआरआई जोड़े से. रीबा और शेखर एक शादी अटेंड करने मुंबई आए हैं. शादी के दिन उनकी 16 साल की बेटी ज़ोया गायब हो जाती है. वो पुलिस के पास जाते हैं. मगर पुलिस की तमाम कोशिशें विफल हो रही हैं. दर्शकों को पता है कि मामला लड़कियों को किडनैप कर वेश्यावृत्ति के लिए खरीद-फरोख्त का है लेकिन पुलिस अभी इस बारे में श्योर नहीं है. इसलिए ये मैटर एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग विंग को ट्रांसफर करने में देरी हो रही है. एक छापेमारी के दौरान गोली चलाने की वजह से मानव तस्करी वाले डिपार्टमेंट की एसीपी राधा नौटियाल को सस्पेंड किया जा चुका है. शेखर राधा से मिलता है और उसे ऑफ-ड्यूटी अपनी बेटी को ढूंढने की डील कर लेता है. राधा अपने कुछ जूनियर्स के साथ इस मामले की तह तक जाने की कोशिश में लग जाती है. लेकिन जैसे-जैसे उसकी तफ्तीश आगे बढ़ रही है, उसे अहसास हो रहा है कि ये केस उतना सीधा नहीं है, जितना नज़र आ रहा है. मुंबई-कलकत्ता के बीच कुछ चक्करों के बाद उसे पता चलता है कि इस गेम में कलकत्ता का एक बड़ा बिज़नेसमैन शामिल है.

रीबा और शेखर अपनी बच्ची को ढूंढने की हरसंभव कोशिश में लगे हुए हैं लेकिन बात अब उनके साथ से पूर तरह बाहर निकल चुकी है. मगर इस सबके ज़िम्मेदार भी वो खुद हैं.
रीबा और शेखर अपनी बच्ची को ढूंढने की हरसंभव कोशिश में लगे हुए हैं लेकिन बात अब उनके साथ से पूर तरह बाहर निकल चुकी है. मगर इस सबके ज़िम्मेदार भी वो खुद हैं.

इस कहानी के साथ-साथ पंजाब में बच्चों की तस्करी की भी एक कहानी चल रही है. साइमन नाम का एक किडनैपर बच्चे उठाता है और अपने बॉस के आदेश पर उन्हें एक खाली पड़े अस्पताल में छुपाकर रखता है. इन बच्चों के झुंड में रज्जी नाम की एक लड़की है, जो अपने भाई के साथ वहां से भागने की कोशिशें करती है. इसलिए वो साइमन की आंख की किरकिरी बन जाती है. लेकिन इन दोनों का कहानियों का आपस में क्या कनेक्शन है? यही इस सीरीज़ का सबसे बड़ा राज है.

किडनैप हुई 16 साल की लड़की ज़ोया. सोशल मीडिया के माध्यम से किस तरह से टीनएजर्स की किडनैपिंग हो सकती है, ये सीक्वेंस उसका अच्छा उदाहरण है.
किडनैप हुई 16 साल की लड़की ज़ोया. सोशल मीडिया के माध्यम से किस तरह से टीनएजर्स की किडनैपिंग हो सकती है, ये सीक्वेंस उसका अच्छा उदाहरण है.

‘फ्लेश’ में एसीपी राधा नौटियाल का रोल किया है स्वरा भास्कर ने. राधा किताबी तरीके से काम नहीं करती. इंप्रोवाइज़ करती रहती है. वो चाहती है कि ‘दुनिया के सारे सेक्स ट्रैफिकर्स चौपाटी पर नंगे खड़े हों और मैं उन्हें मशीन गन से उड़ा दूं’. रात को उसे नींद नहीं आती. अगर उसकी बैकस्टोरी जान लें, तो आपकी भी रातों की नींद उड़ सकती है. विद्या मालवाड़े ने रीबा गुप्ता का रोल किया है, जिनकी बेटी गायब हो गई. उन्हें देखकर गेस कर सकते हैं कि अपने बच्चे के गायब हो जाने के बाद कैसा महसूस होता है. उनके पति शेखर के रोल में हैं युधिष्टिर उर्स. गायब हुई ज़ोया का रोल किया है महिमा मकवाना ने. बंगाली बिज़नेसमैन शुवो के लिए लड़कियां उठाने और उनकी स्मगलिंग समेत सारे गैर-कानूनी काम ताज देखता है. ताज शुवो का अपना बच्चा नहीं है लेकिन वो उसे अपना बाप मानता है. अतरंगी कपड़े पहनने वाला सनकी, बाई-सेक्शुअल, अप्रत्याशित, ड्रग अडिक्ट. ताज का रोल अक्षय ओबेरॉय ने किया है. ताज जो कर रहा है, आप उससे बिलकुल भी रिलेट नहीं करते. मगर उस किरदार के साथ अक्षय ने जो किया है, वो बहुत नया तो नहीं मगर मजेदार ज़रूर है. माइनस बंगाली एक्सेंट.

ताज. शुवो का सारा गलत काम हैंडल करने वाला क्रेज़ी कैरेक्टर.
ताज. शुवो का सारा गलत काम हैंडल करने वाला क्रेज़ी कैरेक्टर.

देखिए ‘फ्लेश’ एक बड़े ज़रूरी विषय पर बेस्ड सीरीज़ है. रानी मुखर्जी की ‘मर्दानी’ के अलावा पूरी तरह मानव तस्करी के इर्द-गिर्द घूमने वाली हिंदी फिल्म/सीरीज़ों की संख्या की न के बराबर है. लेकिन ये सीरीज़ अपने सब्जेक्ट के साथ न्याय नहीं करती. ये उसे किसी मेनस्ट्रीम मसाला प्रोजेक्ट की तरह ट्रीट करती है. सबसे पहले ये सीरीज़ ज़रूरी माने गए बॉक्स पर टिक मार्क करती है.

*एक ज़रूरी मसला
* उसके केंद्र में एक गालीबाज, एक्शन करने वाली मजबूत महिला किरदार
* उस किरदार में एक रियल लाइफ में क्रांतिकारी मानी जाने वाली हीरोइन
*ओटीटी प्लैटफॉर्म्स पर सेंसरशिप न होने का फायदा उठाने के लिए जबरदस्ती कई सारे सेक्स सीन्स
*एक सनकी विलन
*’एक पहेली लीला’ टाइप एक बड़ा खुलासा.

बन गई सोशल थ्रिलर वेब सीरीज़. ‘एक पहेली लीला’ को हल्के में मत लीजिए. क्लाइमैक्स के मामले में इसे मॉडर्न ‘गुप्त’ माना जा सकता है. खैर, हम कह ये रहे हैं कि ‘फ्लेश’ में कुछ फ्रेश ढूंढने के लिए आपको फ्लैश लाइट लेकर निकलना पड़ेगा. अगर आपको कुछ मिले, तो हमारा कमेंट बॉक्स खुला है.

एक पहेली लीला का पोस्टर. इस फिल्म में सनी लियोनी के साथ रजनीश दुग्गल, राहुल देव और जय भानुशाली जैसे एक्टर्स नज़र आए थे.
‘एक पहेली लीला’ का पोस्टर. इस फिल्म में सनी लियोनी के साथ रजनीश दुग्गल, राहुल देव और जय भानुशाली जैसे एक्टर्स नज़र आए थे.

‘फ्लेश’ के कुछ सीन्स हम आपको नीचे बता रहे हैं, आप तय करिए कि इन सीन्स से सीरीज़ का क्या तात्पर्य रहा होगा.

1) सीरीज़ के ओपनिंग सीक्वेंस में राधा नौटियाल तस्करों को पकड़ने के लिए बेची जाने वाली लड़कियों में शामिल होकर जाती है. तस्करों के गैंग का सदस्य आकर उसके अंग विशेष को हाथ लगाता है और कहता है कि तुझे शांघाई भेजेंगे.

हम एग्जैक्ट वो सीन नहीं यहां नहीं लगा पाएंगे, इसलिए उस घटना के कुछ सेकंड पहले का दृश्य.
हम एग्जैक्ट वो सीन नहीं यहां नहीं लगा पाएंगे, इसलिए उस घटना के कुछ सेकंड पहले का दृश्य.

2) साइमन के चंगुल से भागने के बाद रज्जी वापस पकड़ ली जाती है. साइमन को इस गलती की सज़ा देने के लिए उसका बॉस रज्जी के सामने उससे ब्लोजॉब देने को बोलता है.

सीरीज़ के एक सीन में साइमन. बच्चों की देखभाल करने के लिए इसके साथ बॉस ने छाया और जयंत को भी नियुक्त किया हुआ, मगर ये उनका मुखिया है.
सीरीज़ के एक सीन में साइमन. बच्चों की देखभाल करने के लिए इसके साथ बॉस ने छाया और जयंत को भी नियुक्त किया हुआ, मगर ये उनका मुखिया है.

3) खंडहर अस्पताल में कैद बच्चों को ट्रेनिंग के तौर पर पॉर्न वीडियोज़ दिखाए जाते हैं.

रज्जी अपने भाई रजत के साथ पहली बार साइमन के चंगुल से भागने के बाद एक ढाबे पर बैठकर खाना खाती हुई.
रज्जी अपने भाई रजत के साथ पहली बार साइमन के चंगुल से भागने के बाद एक ढाबे पर बैठकर खाना खाती हुई.

4) ज़ोया समेत 18 लड़कियों को ट्रक में भरकर मुंबई से कलकत्ता ले जाने से पहले कपड़े उतारकर डायपर पहनने को दिया जाता है. और इस दौरान ट्रक का ड्राइवर लूडो टॉर्च जलाकर अपनी जीभ बाहर लटकाए बैठा रहता है.

लड़कियों से कपड़े उतरवाकर डायपर पहनने वाले सीन का स्क्रीनग्रैब.
लड़कियों से कपड़े उतरवाकर डायपर पहनने वाले सीन का स्क्रीनग्रैब.

ये सीन्स सीरीज़ को अति-विश्वसनीय बनाने के लिए रखे गए हो सकते हैं. या मजबूत डिटेलिंग की तरफ ध्यान आकर्शित करने का भी एक तरीका हो सकता है. लेकिन वो इस सीरीज़ को हल्का करते हैं. इन सीन्स को देखकर मन घिन से भर जाता है. शायद मेकर्स का मक़सद भी यही रहा हो कि आप इस सीरीज़ को देखते समय असहज हों. लेकिन ये ट्रिक यहां काम नहीं करती.

मगर ऐसा नहीं होता कि हर चीज़ सिर्फ बुरी होती है. ‘फ्लेश’ में कुछ अच्छी बातें हैं. जो इसे मज़ेदार और थोड़ा नयापन देती हैं. जैसे सीरीज़ में जिन लड़कियों की तस्करी हो रही है, उसमें सना नाम की एक लड़की है. आपको कुछ एपिसोड्स के बाद पता चलता है कि दरअसल सना तस्करों से मिली हुई है. उसका काम ये एनश्योर करना है कि रास्ते में लड़कियां कुछ गड़बड़ न करें. मगर लड़कियों को ये बात नहीं पता. ये स्मार्ट आइडिया था.

सना ने कई लड़कियों को फांसने में ताज की मदद की लेकिन ताज ने उससे किया अपना वादा तक पूरा नहीं किया.
सना ने कई लड़कियों को फांसने में ताज की मदद की लेकिन ताज ने उससे किया अपना वादा तक पूरा नहीं किया. राधा द्वारा बचा लिए जाने के बाद सना.

इसके अलावा सीरीज़ के कलकत्ता वाले सीन्स में मिस्टर बॉन्ड नाम के एक किरदार की एंट्री होती है. कलकत्ता पुलिस के ह्यूमन ट्रैफिकिंग विंग के हिस्सा इस शख्स का नाम मिस्टर बॉन्दोलॉय है, जिन्हें लोग शॉर्ट में मिस्टर बॉन्ड बुलाते हैं. बॉन्ड साहब की एक बड़ी मज़ेदार आदत है. जब वो कहीं छापा मारने जाते हैं, तो अपनी जेब में कुछ चॉकलेट रखते हैं. रेड में वो जिस भी शख्स को गिरफ्तार करते हैं, उनके बच्चों को वो चॉकलेट देते हैं. ये वो छोटी मगर मोटी बातें हैं, जो इस देखने में मुश्किल सीरीज़ को प्यारा बनाती हैं.

मिस्टर बॉन्डोलॉय aka मिसटर बॉन्ड.
मिस्टर बॉन्डोलॉय aka मिसटर बॉन्ड.

कुल मिलाकर बात ये है कि ‘फ्लेश’ को देखकर आपको बड़ा अधूरा सा लगता है. जिस चीज़ को आप अपने जीवन के 7-8 बेशकीमती घंटे दे रहे हैं, वो आपको कुछ घंटों तक संभालकर रखने लायक कॉन्टेंट भी न दे तो निराशा लाज़िमी. लेकिन एक बार देखना शुरू करने के बाद मजबूत क्लिफ हैंगर्स की वजह से इसे एक-दो एपिसोड के बाद बंद कर पाना भी मुश्किल हो जाता है. शायद यही इस सीरीज़ का एकमात्र हासिल है. मगर आपने जो कुछ भी ऊपर पढ़ा या सुना, वो हमारा देखने का अनुभव था. आप खुद देखकर तय करिए.


वीडियो रिव्यू- फ्लेश

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