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पृथ्वी शॉ की जिंदगी से जुड़े वो 5 किस्से जो हर किसी को जानने चाहिए

शुरुआत कहां से करें. हालिया याद से. भारतीय वनडे क्रिकेट की सबसे सुर्ख याद. 2011. हमने वर्ल्ड कप जीता. दूसरी बार. सचिन को पूरी टीम कंधे पर घुमा रही है. दिमाग में आता है. तब पृथ्वी क्या कर रहा था. वो 10 साल का था. रोजाना विरार से साउथ बांद्रा आता. इसके लिए सुबह 3.30 बजे दिन शुरु होता. कभी पापा की बाइक तो कभी मुंबई लोकल. 6 बजे से बांद्रा के एमआईजी क्रिकेट क्लब मैदान पर प्रैक्टिस शुरू. हर दिन बिला नागा. या तो मैच, या उसके लिए सफर या फिर प्रैक्टिस. और उसका नतीजा 4 अक्टूबर 2018 को दिखा. देश के लिए डेब्यू करते हुए पृथ्वी ने 134 रन की पारी खेली. सचिन ने बधाई वाला ट्वीट किया. सबको सचिन की याद आई. छोटा कद. कम उम्र. मगर पृथ्वी की राह में मुश्किलें कुछ ज्यादा थीं.

#1. जब पृथ्वी साढे तीन साल का था, मां गुजर गईं. अस्थमा की बीमारी थी. पिता पंकज शॉ कपड़े की दुकान चलाते थे. उन्होंने बेटे का खेल निहारने के बाद उसी सपने को जीना शुरू कर दिया. दुकान तक बंद कर दी. Beyond All Boundaries नाम की एक डॉक्युमेंट्री में पंकज बताते हैं,  “पृथ्वी दो-ढाई साल का था तो बिल्डिंग के नीचे प्लास्टिक बैट-बॉल से खेलते हुए अच्छे शॉट मारता था. मैं देखकर हैरान होता था. फिर विरार में म्युंसिपैलिटी के ग्राउंड में तीन साल की उम्र से वो लेदर बॉल से खेलने लगा. उस वक्त उसकी हाइट स्टंप के बराबर भी नहीं थी. वो खेलता गया और मैं खिलाता गया.”

#2. वरिष्ठ खेल पत्रकार मकरंद वैगांकर के मुताबिक 10 साल की उम्र में पृथ्वी 18-20 साल के बॉलरों को यूं धोता था जैसे, बरसों से क्रिकेट खेल रहा हो. मगर वो रोज थक जाता. खेल के चलते नहीं. सफर के चलते. विरार से वांद्रा का 70 किलोमीटर का फासला था. उसे रोज एमआईजी क्रिकेट क्लब में आना होता था. बेटे को क्रिकेटर बनाने का जुनून पिता में तो था, मगर हाथ में पैसा नहीं था. फिर भी जहां चाह, वहां राह की वो कहावत सही साबित हुई. एक लोकल टूर्नामेंट में पृथ्वी को यहां के एक स्थानीय नेता ने खेलते देखा. नेता का नाम संजय पोतनीस. शिव सेना के इस नेता ने दोनों बाप-बेटे के लिए मुफ्त में सेंट्रल मुंबई में सैंटा क्रूज की अपनी बिल्डिंग में रहने और खाने का इंतजाम कर दिया. और फिर राह कुछ आसान हो गई.

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पिता पंकज शॉ के साथ पृथ्वी और दायीं तरफ स्थानीय नेता संजय पोतनीस.

#3. यहां बाप शुरुआती कोच या मैनेजर भी था. इसलिए सख्ती भी खूब. एक दम युवराज और उनके पिता योगराज सी कहानी. पृथ्वी को पापा से सिर्फ डांट ही नहीं पड़ती. कभी कभी और भी ज्यादा सख्ती. पंकज ने एक इंटरव्यू में ये कबूलते हुए कहा था कि झापड़ भी पड़ जाता है कभी-कभी. मुझे उसे टाइट रखना पड़ता है.”

#4. टाइट रखने का नतीजा. पृथ्वी अंडर-14 में लगातार शतक पर शतक बना रहा था.इसे देख खेल पत्रकार वैगांकर ने उसे एसजी स्पोर्ट्स से 6 साल के लिए 36 लाख का कॉन्ट्रैक्ट दिलवाया. फिर सुनील गावस्कर की हिस्सेदारी वाले प्रफेशनल मैनेजमेंट ग्रुप ने पृथ्वी शॉ को जोड़ लिया. पूर्व क्रिकेटर नीलेश कुलकर्णी की स्पोर्टस मैनेजमेंट कंपनी भी पृथ्वी शॉ से जुड़ी है. कॉन्ट्रैक्ट मिलने से पृथ्वी की धार भोथरी नहीं हुई 14 साल के पृथ्वी शॉ ने स्कूली क्रिकेट की प्रतिष्ठित हैरिस शील्ड मैच में एक इनिंग्स 546 रन जड़ दिए. ये पृथ्वी का बीते तीन हफ्तों में चौथा शतक था. फिर 17 साल के पृथ्वी को रणजी की कॉल आई. मुंबई के लिए. पहले मैच में उसने सेंचुरी मारी. उसी साल दलीप ट्रॉफी भी खेली और पहले मैच में शतक जड़ा.

#5. इन सबके बीच पिता पंकज बेटे के साथ साये की तरह रहे. मगर जब बात आई बेटे को इंडिया डेब्यू करते देखने की, तो पंकज ने खुद को घर में बंद कर अकेले में वो सपना पूरा होते देखा. वो राजकोट नहीं गए. पूछने पर कहा कि मैंने रणजी ट्रॉफी, दिलीप ट्रॉफी और इंडिया अंडर-19 डेब्यू देखने भी नहीं गया था.


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