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इंडियन मैथ्स जीनियस, जिसे सपने में देवी आकर फॉर्मूले बताती थीं

शुक्रवार की रात. टेलिविज़न पर राखी अौर शशि कपूर की ‘शर्मीली’ आ रही थी. बचपन से मुझे राखी खासी नापसन्द रही हैं, लेकिन उस दिन मैं शिद्दत से शर्मीली देखने के लिए मरा जा रहा था. बिना किसी शक, वो मेरे जीवन की सबसे डरावनी रात थी. आज भी है. पिताजी मुझे एक्स बटा वाई पढ़ा रहे थे अौर मैं भयभीत था.

अगली सुबह मेरा दसवीं बोर्ड का गणित का पर्चा था.

उस समय मुझे लगता था कि यह भय गणित से है. गणित, जिसके समीकरणों में आए एक्स-वाई-ज़ेड जुरासिक पार्क वाले किसी भयानक डायनासॉर की तरह सपनों में आते थे अौर ये सपने अन्य अच्छे सपनों की तरह कभी जल्दी से खत्म नहीं होते थे. गणित, जिसमें तेरह से बड़े तमाम पहाड़ों की याद मुझे सदा हाथों पर स्केल अौर डस्टर की मार के निशान दे जाती थी.

यह मैं बहुत बाद में समझा कि मैं गणित से नहीं, भविष्य के गर्भ में छिपे फेल होने से जुड़े अपमान से कांप रहा था. एक बच्चे का स्वाभिमान सबसे पवित्र वस्तु होता है. अौर जब एक बच्चे का स्वाभिमान आहत होता है, उससे बुरा दुनिया में कुछ नहीं होता.

जब सिनेमा पढ़ने-पढ़ाने लगा तब भी, सिनेमा में गणित का संदर्भ देखते ही मन डर जाता था. लेकिन सिनेमा ने ही मुझे गणित के वो तमाम सतरंगी शेड्स दिखाए जिनसे मैं ग्रामीण भारत के सरकारी स्कूल में गणित पढ़ते हुए अनजान था.

‘निल बटे सन्नाटा’ अौर गणितज्ञ रामानुजन पर आनेवाली फिल्मों का संदर्भ फिर सिनेमा में गणित के ज़िक्र को सामने ले आया.

तो आज पेश हैं ऐसी ही पांच फिल्में जिनमें गणित के तमाम मानवीय रंग बिखते हुए हैं.

 

निल बटे सन्नाटा : मैथ्स में डब्बा गुल

अश्विनी तिवारी की हालिया रिलीज़ ‘निल बटे सन्नाटा’ का विलेन गणित हो सकता था. लेकिन विलेन होने के बजाए यही गणित फिल्म में किशोरवय बेटी अौर उसकी मां के बीच नायाब दोस्ती का आधार बनता है. आगरा में घर का काम करनेवाली चंदा सहाय अपनी बेटी अपेक्षा, जो गणित में कमज़ोर है, की इस भयानक दिखते विषय से दोस्ती करवाने के लिए एक अकल्पनीय काम करती हैं. वे खुद अपनी बेटी की कक्षा में एडमीशन ले लेती हैं. मां का कक्षा में साथी, अौर साथ ही प्रतिद्वंद्वी बनना अपेक्षा को भी विषय को नए सिरे से जानने की अोर ले जाता है.

फिल्म में नायिका स्वरा भास्कर के अभिनय की खूब तारीफें हो रही हैं. खासकर इस बड़प्पन से भरे चयन के लिए, जो उन्होंने अपने करियर के इस शुरुआती दौर में ऐसा नॉन-ग्लैमरेस रोल स्वीकार कर किया है. किशोरवय बेटी की मां की भूमिका स्वीकार कर भी उन्होंने सिनेमा की प्रचलित मान्यताअों को तोड़ा है. इसके साथ ही फिल्म में गणित के अध्यापक अौर स्कूल प्रिंसिपल की खांटी भूमिका के लिए दमदार अभिनेता पंकज त्रिपाठी भी बहुत पसन्द किए जा रहे हैं.

फिल्म दिल्ली में टैक्स फ्री हो गई है. गणित से भयभीत हर बच्चे-बूढ़े-जवान को देखनी चाहिए. डर भगाने में मंतर का असर करेगी.

 

मनीबॉल : आंकड़ों का होम रन

खेलों की दुनिया में एक कहावत मशहूर है, ‘आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते’. लेकिन आखिर खेल खेलनेवाले तो इंसान हैं. अौर देखनेवाले भी. अौर इंसान को दुनिया की तमाम खूबसूरती भरमाती है. हम क्रिकेटप्रेमी देश के वासी भी इसे बखूबी समझ सकते हैं. भारतीय दिल, कभी वो किसी की कवर ड्राइव पर मर मिटता है, कभी किसी की रिवर्स स्विंग पर. कई बार इस दर्शनीय खूबसूरती के सामने हम मेहनती, खुद्दार लेकिन कुछ कम नयनाभिराम खिलाड़ियों अौर उनके खेल को नजरअन्दाज कर जाते हैं. इंसानी स्वभाव है कि हमारे जाने-अनजाने बायस, हमारे पूर्वाग्रह हमारी नज़रों को धुंधला कर देते हैं.

लेकिन आंकड़े इसी इंसानी बायस से आगे जाते हैं.

आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते.

अमेरिकन फ़िल्म ‘मनीबॉल’ उनके देस के क्रिकेट − याने बेसबॉल की दुनिया से उठाई गई कहानी है. लेकिन जितनी ये बेसबॉल की कहानी है उतनी ही आंकड़ों की बाज़ीगरी की कहानी है, गणित की कहानी है.

अमेरिकन बेसबॉल टीम अोक्लाहोमा एथलेटिक्स के मैनेजर बिली बीन, फिल्म में जिनकी ज़िन्दादिल भूमिका ब्रैड पिट ने निभायी है, 2002 में बेसबॉल की दुनिया को हमेशा के लिए बदल देनेवाला प्रयोग करते हैं. उनकी टीम लीग की गरीब टीमों में से है. मनचाहे खिलाड़ियों को खरीदने का पैसा नहीं है. तभी एक दूसरी टीम के दफ़्तर में उनकी मुलाकात पीटर ब्रैंड से होती है. ब्रैंड येल से इकॉनोमिक्स पढ़ा लड़का है जिसके पास बेसबॉल को लेकर कुछ रेडिकल आइडियाज़ हैं. यहीं एक नितंात नई रणनीति जन्म लेती है. वे लीग के चमकते सितारों को किनारे करते हैं. बिली अौर पीटर खेल के पारंपरिक पंडितों से सीधा पंगा लेते हैं अौर येल के पढ़े ब्रैंड की एक्सेल शीट पर लिखे गणितीय आंकड़ों को आधार बना अपनी पूरी टीम की संरचना बदल देते हैं.

यही प्रसंग एरन सोरकिन की लिखी अौर ब्रेनेट मिलर निर्देशित इस कसी हुई पटकथा वाली फिल्म का केन्द्रीय आधार बना. जितनी असंभव अौर जानदार टीम की सफ़लता थी, उतनी ही शानदार फिल्म की आलोचकीय कामयाबी रही.

नतीजा क्या रहा − अोक्लाहोमा एथलेटिक्स की टीम ने लगातार बीस मैच जीते जो उस समय अमेरिकन बेसबॉल लीग का भूतो ना भविष्यति रिकॉर्ड था.

कुछ आंकड़े यहां एक टीम की, अौर काफी हद तक खेल की किस्मत बदलने वाले साबित हुए. फिल्म की भी, जिसे घनघोर आलोचकीय तारीफ़ें मिलीं.

 

दि इम्मिटेशन गेम : नम्बर्स ने विश्वयुद्ध रोका

यह समूचे यूरोप को तबाह कर देनेवाले द्वितीय विश्वयुद्ध की अनदेखी कथा है. यह विज्ञान के सबसे युगांतकारी अविष्कार की अनजानी कथा है. यह अपने से भिन्न व्यक्ति के प्रति हमारे मन में बसे पूर्वाग्रहों की कथा है. अौर साथ ही यह एक वैज्ञानिक की अंकों से, गणनाअों से, समीकरणों से प्रेम की कथा है.

इक्कीसवीं सदी के सबसे चहेते ‘शरलॉक होम्स’ ब्रिटिश अभिनेता बेनेडिक्ट कम्बरबैच यहां एलन ट्यूरिंग की भूमिका में हैं. ‘दि इम्मिटेशन गेम’ की कहानी हमें द्वितीय विश्व युद्ध में चल रही माइंड वार के ऐन बीचोंबीच ले जाती है. जर्मनों की कोडिंग मशीन ‘एनिग्मा’ के संदेशों को तोड़ने के लिए ब्रिटेन की सरकार वैज्ञानिक एलन ट्यूरिंग की सरपरस्ती में वैज्ञानिकों की टोली को ज़िम्मेदारी सौंपती है. लेकिन एलन अंकों के साथ जितना सहज हैं, उतना इंसानों के साथ नहीं. इसीलिए शुरुआत में उनके साथी वैज्ञानिकों से आपसी संबंध बहुत गोते खाते हैं. लकिन फिर यही वैज्ञानिक मौका आने पर ट्यूरिंग के समर्थन में भी खड़े होते हैं.

अपनी अंकों पर मास्टरी के दम पर एलन ट्यूरिंग पूरी नाज़ी मशीनरी को उलट देता है. एक आविष्कार का असर पूरे विश्वयुद्ध की दिशा बदल देता है. आगे जाकर ट्यूरिंग का यह एनिग्मा ब्रेकिंग शाहकार हमारे कम्प्यूटर का पूर्वज बना.

लेकिन इस जीनियस की कहानी का अन्त अच्छा नहीं है. गणित के जीनियस ने नाज़ी मशीनी आतंक को तो अपनी महारथ से जीत लिया, लेकिन इंसानी पूर्वाग्रहों से नहीं जीत पाया. उसी देश ने, विश्वयुद्ध में जिसकी तबाही को ट्यूरिंग ने अपने आविष्कार से पलट दिया था, उसे आत्महत्या के दरवाजे तक पहुंचा दिया. गणित ने विश्वयुद्ध जिताया, लेकिन इंसानी पूर्वाग्रहों से हार गई.

दो दूनी चार : घरेलू गणित

हबीब फ़ैजल की प्यारी फ़िल्म ‘दो दूनी चार’ शायद गणित विषय से जुड़ी सबसे सरल फ़िल्म है. निष्कपट अौर भोली. गणित के मास्टर संतोष दुग्गल उर्फ ‘दुग्गल सर’ प्राइवेट स्कूल में गणित पढ़ाते हैं अौर अपने विषय के चैम्पियन माने जाते हैं. लेकिन उनकी यह गणित की महारथ गृहस्थी के माहवारी हिसाब में हमेशा मात खा जाती है. कितना भी गुणा-भाग लगा लें, महीने का खर्चा हमेशा ज़्यादा अौर कमाई हमेशा कम. यह गणित की तार्किकता की हमारी घरेलू ज़िन्दगियों के नितान्त अतार्किक यथार्थ के सामने की हार है. नीतू सिंह अौर ऋषि कपूर की रीयलटाइम जोड़ी को लेकर बनाई यह फिल्म परदे पर कमाल की कैमिस्ट्री रचती है. साथ ही दिल्ली की अॉथेंटिक घरेलू जीवनचर्या यहां नुमायां होती है.

दुग्गल परिवार की चाहत है ‘दुपहिया’ से ‘चौपहिया’ बनने की. एक अदद कारवाला होने की. इसमें सुविधा से ज़्यादा अोहदेवाला होने का लालच है. दिल्ली में कार कितना बड़ा स्टेटस सिंबल है, यह अॉड-इवन में पुण्य तलाश रहे इस शहर का हर बाशिंदा अच्छी तरह जानता है. लेकिन इस अोहदे को हासिल करने में जब गणित मार खाती है तो दुग्गल परिवार तिकड़म का सहारा लेने की सोचता है. कई मोड़ों से घूमती फिल्म जब अपने क्लाईमैक्स तक पहुंचती है, फिर गणित ही परिवार को विपत्ति से बचाने के लिए आती है.

हिन्दी सिनेमा में गणित के मास्टर विषय की प्रतिष्ठा के अनुसार ही निर्दयी अौर कठोर नज़र आते रहे हैं. लेकिन ‘दो दूनी चार’ गणित के मास्टर को केन्द्र में रखकर बनाई सबसे खुशदिल, सबसे फीलगुड फिल्म है.

 

दि मैन व्यू न्यू इनफ़िनिटी : डूम्ड हीरो की कहानी

‘दि मैन व्हू न्यू इनफ़िनिटी’ की कहानी गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के अौर केम्ब्रिज युनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे प्रोफेसर जी एच हार्डी के मध्य के आत्मीय संबंधों की कथा है. प्रोफेसर हार्डी के बुलावे पर ही रामानुजन 1914 में पानी के जहाज़ की लम्बी अौर कष्टकारी यात्रा करते हुए लंदन पहुँचे थे. यूरोप की धरती पर यह यह प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत का समय था. रामानुजन अौर हार्डी की दोस्ती विरुद्धों का सामंजस्य थी. हार्डी यूरोपियन आधुनिकता अौर तर्क की आग में रचे-पगे थे. नास्तिक, तर्क को अौर प्रमाण को सबसे ऊपर रखनेवाले वैज्ञानिक. वहीं रामानुजन भारतीय मनीषा के प्रतिनिधि थे. घोर पारिवारिक. भोजन में शाकाहारी अौर गहरे विश्वासी, जिनकी प्रतिभा कई बार तर्कों के परे जाती लगती थी. ये दो संस्कृतियां, दो रहन-सहन अौर जीवन जीने के तरीके भी थे.

भिन्न देशों से आए इन दो जीनियसों को जोड़नेवाला था गणित. क्योंकि अन्तत: ये दोनों ही गणित की भाषा समझते थे. अंकों के इस रिश्ते के सहारे ही प्रोफेसर हार्डी रामानुजन की नोटबुक्स में छिपे चमत्कार को समझ पाए. यहां गणित ही दो व्यक्तित्वों, दो सभ्यताअों, दो सोच के तरीकों को साथ लानेवाला अौर आगे जाकर उन्हें एक-दूसरे के भिन्न नज़रिए के प्रति कुछ अौर संवेदनशील बनानेवाला साबित हुआ. दो नितान्त भिन्न लोगों के मध्य दिल का रिश्ता बनाना, नीरस माने जानेवाले गणित का इससे बेहतर इस्तेमाल अौर क्या होगा.

ये इस बार के हमारे सालाना गोवा फिल्म फेस्टिवल की अोपनिंग फिल्म थी. वहां पैरेलल स्क्रीनिंग में दोनों शो हाउसफुल चले अौर फौरन दोबारा स्क्रीनिंग करनी पड़ी. मैथ्यू ब्राउन द्वारा निर्देशित इस फिल्म में स्लमडॉग मिलेनियर वाले देव पटेल श्रीनिवास रामानुजन की भूमिका निभा रहे हैं. अब फिल्म की रिलीज़ का, ख़ासतौर से भारतीय रिलीज का भी बड़ी बेसब्री से इंतजार हो रहा है. वजह है भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की कहानी को सिनेमा के परदे पर जीवंत देखने की उत्सुकता. रामानुजन की कहानी में किसी थ्रिलर फिल्म से उतार चढ़ाव हैं. वे ऐसे गणितज्ञ थे जिनकी अद्वितीय प्रतिभा को समय का रथचक्र लील गया. एक डूम्ड हीरो. याने ऐसी कहानी, जो किसी भी पटकथा लेखक का सपना हो सकती है. फिल्म का घनघोर इन्तज़ार है.

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