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फिल्म रिव्यू: उरी - दी सर्जिकल स्ट्राइक

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जिस फिल्म में देशभक्ति वाले डायलॉग्स की भरमार हो, उसे रिव्यू करने के अपने ख़तरे होते हैं. फिल्म को क्रिटिसाइज़ करने के आपके अधिकार को किसी खास नुक़्तानिगाह से भी देखा जा सकता है. फिल्म में निकाला गया नुक्स मुल्क में निकाला गया नज़र आने की आशंका होती है. दूसरी तरफ, फिल्म की तारीफ़ आपको किसी ख़ास खेमे का होने का सर्टिफिकेट दिलवा सकती है. बहरहाल, इस मामले में अपन प्रेमचंद जी को फॉलो करते हैं. बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहना नहीं छोड़ते. पाठकों से भी गुज़ारिश है कि अपने तमाम राजनीतिक चश्मे उतार लें और इसे एक आम फिल्म रिव्यू की तरह ही लें.

हाउ’ज़ द जोश?

शुरुआत फिल्म के एक सीन से करते हैं. एक छोटी बच्ची है. मेजर विहान शेरगिल की भांजी. वो मेजर साब को उनकी बटालियन का वॉर क्राई सुना रही है. वॉर क्राई मतलब युद्ध के दौरान लगाए जाने वाले नारे. बच्ची की आवाज़ कमज़ोर है तो मेजर साहब समझाते हैं. वॉर क्राई ऐसी होनी चाहिए कि सैनिकों की रगों में ख़ून गर्दिश करने लगे. इसी जोशो-खरोश के आइडिया को थ्रू-आउट डिस्प्ले करती रहती है ‘उरी’.

इस सीन से शहीद कर्नल एम एन राय की बेटी की तस्वीर याद आ जाती है.
इस सीन से शहीद कर्नल एम एन राय की बेटी की तस्वीर याद आ जाती है.

जैसा कि पूरा मुल्क जानता है, ये फिल्म उरी में हुए फिदायीन हमले और उसके बाद भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान में की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर बेस्ड है. हालांकि यहां ये स्पष्ट कर देना ठीक रहेगा कि ये उन घटनाओं का फिक्शनल अकाउंट है, न कि असली किरदारों की कहानी. मेजर विहान शेरगिल एक फियरलेस आर्मी मैन है. वो खतरनाक मिशन्स को फुल प्रूफ प्लानिंग के साथ अंजाम देने के लिए मशहूर है. नॉर्थ ईस्ट में टेररिस्ट्स का एक बहुत बड़ा नेटवर्क ध्वस्त करके सरकार की नज़र में हीरो बन चुका है. हालांकि, इसके बाद वो अपनी बीमार मां की तीमारदारी के लिए रिटायर होना चाहता था, लेकिन प्रधानमंत्री जी ने बात ही ऐसी कह दी कि मेजर साब सिर्फ ट्रांसफर पर मान गए. पीएम साहब ने कहा था, “देश भी तो हमारी मां ही है”. इस तरह के डायलॉग्स ही ‘उरी’ की सबसे बड़ी खामी है. ऐसे डायलॉग्स बीच-बीच में पिरोने की जगह अगर मेकर्स थ्रिलर वाले पार्ट पर ज़्यादा ध्यान देते, तो फिल्म बेहतर हो सकती थी.

बहरहाल, मेजर साहब को दिल्ली पोस्टिंग मिलती है. उधर, उरी में पाकिस्तानी फिदायीन हमला होता है. कड़ी निंदा से तंग आ चुकी और डायरेक्ट युद्ध से बचने की ख्वाहिशमंद सेना (या सरकार) एक नया प्लान लेकर आती है. सर्जिकल स्ट्राइक. इस मिशन को लीड करने के लिए चुना जाता है मेजर विहान शेरगिल को. आगे का सब आपको बिना देखे भी पता है. इंडियन आर्मी पाकिस्तान में घुसकर आतंकी अड्डे तबाह कर आती है. 18 सितंबर, 2016 का बदला पूरा होता है.

थ्रिल किधर है?

‘उरी’ के साथ दिक्कत ये है कि इसमें एक बेहतरीन थ्रिलर बनने का पूरा पोटेंशियल था, लेकिन फिल्म दूसरी ही बातों में खर्च हो जाती है. जैसे इमोशनल मेलोड्रामा क्रिएट करने में और ‘ग़दर’ ब्रांड संवादों में. मिलिट्री ऑपरेशन्स पर बनी कुछेक अंग्रेज़ी फ़िल्में याद कर लीजिए. जैसे ‘सेविंग प्राइवेट रायन’ या ‘एनिमी ऐट दी गेट्स’. इन फिल्मों में ऑपरेशन की तैयारियों में और ऑपरेशन के दौरान जो टेंशन महसूस होती है, वो ‘उरी’ से बिल्कुल गायब है. कुछ ऐसा नहीं है जो थ्रिलिंग हो. आपको हीरो के उस वादे पर भरोसा है जो उसने पाकिस्तान में घुसने से पहले आर्मी के बड़े अफसरों से किया था. ‘मेरी टीम के हर एक बंदे को ज़िंदा वापस लाने की ज़िम्मेदारी मेरी है’. जब वादा पूरा होना ही है तो कुछ अनएक्सपेक्टेड होने की संभावना सिरे से ख़त्म हो जाती है.

विकी कौशल रिलाएबल हैं लेकिन उनके लिए एक्टिंग का स्कोप कम है.
विकी कौशल रिलाएबल हैं, लेकिन उनके लिए एक्टिंग का स्कोप कम है.

थ्रिल के साथ लॉजिक भी नदारद

फिल्म में कुछेक चीज़ें तो हज़म ही नहीं होतीं. जैसे, इतना बड़ा मिशन जिस इक्विपमेंट के दम पर कामयाब हुआ वो एक इंटर्न के दिमाग की उपज है. और वो भी सिर्फ 24 घंटे पहले इत्तफाकन – आई रिपीट – इत्तफाकन हाथ लगा है. घनघोर प्लानिंग वाले मिशन की बुनियाद एक इत्तफाक हो, ये कुछ जंचता नहीं. ऐसे लम्हों में ही लगता है कि फिल्म ने ‘सिनेमैटिक लिबर्टी’ का कुछ ज़्यादा ही दुरूपयोग कर लिया.

स्टार कास्ट हुई वेस्ट 

फिल्म से एक शिकायत ये भी कि बेहतरीन कास्ट का सही से इस्तेमाल नहीं हुआ है. यामी गौतम के हिस्से कुछ ख़ास नहीं आया है और कीर्ति कुलहरि जैसी बेहतरीन एक्ट्रेस को तो एकदम से ज़ाया किया गया है. परेश रावल और रजित कपूर जैसे कलाकार अपना काम पूरी ईमानदारी से तो करते हैं, पर उनके लिए स्कोप बहुत कम है. सिर्फ मोहित रैना और कुछ हद तक विकी कौशल ही प्रभावित करते हैं. मोहित रैना रफ एंड टफ आर्मी मैन के रोल में बहुत फबते हैं. इतने कि आपका मन करता है उनका रोल थोड़ा और बड़ा होता.

अजित डोभाल जैसा रोल करते परेश रावल का फिल्म में नाम गोविंद सर है.
अजित डोभाल जैसा रोल करते परेश रावल का फिल्म में नाम गोविंद सर है.

विकी कौशल वर्दी में जंचते हैं. एक्शन सीन्स भी वो बेहद कन्विंसिंगली कर जाते हैं. बस, एक्टिंग की इस रोल में ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी. उन्हें एक्टिंग के नाम पर चिल्लाकर डायलॉग्स बोलने को कहा गया होगा, जिसे वो एफर्टलेसली कर जाते हैं. हालांकि, एक इमोशनल सीन उनके हिस्से ज़रूर आया है, जिसमें उनका एक्टिंग टेलेंट वर्दी फाड़कर बाहर आ गया. उस सीन को हम बताएंगे नहीं, फिल्म में खुद खोज लीजिएगा. बहरहाल, विकी तेज़ी से ऐसे वर्सटाइल एक्टर के रूप में उभर रहे हैं, जिनको कैसा भी रोल बेहिचक दिया जा सकता है.

‘बॉर्डर’ नहीं है ‘उरी’

जे पी दत्ता की ‘बॉर्डर’ शायद भारत की सबसे ज़्यादा मक़बूल वॉर मूवी है. उसमें युद्ध के अलावा सैनिकों की पर्सनल लाइफ पर भी फोकस किया गया था. ‘उरी’ भी यही कोशिश करती है और फेल होती है. इस कोशिश की वजह से पहला हाफ तो बेहद बोर करता है. सेकंड हाफ में मिलिट्री मिशन थोड़ी उत्सुकता जगाता है. ख़ास तौर से क्लाइमेक्स में हेलीकॉप्टर वाला सीन तो बेहद उम्दा बन पड़ा है. एक्शन और VFX उम्दा क्वालिटी के हैं.

फिल्म के एक्शन सीक्वेंसेस उम्दा हैं.
फिल्म के एक्शन सीक्वेंसेस उम्दा हैं.

ऐसा नहीं है कि ‘उरी’ सिरे से खारिज की जाने वाली फिल्म है, लेकिन वो उस उम्मीद पर भी खरी नहीं उतरती, जो सर्जिकल स्ट्राइक जैसे सब्जेक्ट की वजह से आप सिनेमाहॉल लेकर पहुंचते हैं. किसी वेब प्लेटफॉर्म पर आने का वेट किया जा सकता है.


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