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फिल्म 'दासदेव' पर कुछ नोट्स उर्फ मूवी रिव्यू

ख़ुदा इस जहां से बरसों से ख़फ़ा है
गनीमत है तुमसे तो इंसां है रूठा
– डॉ. सागर

कविता से शुरू करना चाहिए. टैंपो बनाने में मदद मिलती है. दासदेव सुधीर मिश्रा का तरीका है. जमाने पर टिप्पणी करने का. कुछ महीने पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी था. फिल्मकार को ट्विटर और दूसरे मीडियम पर नहीं बड़बड़ाना चाहिए. जो कहना है, अपनी फिल्म में कहना चाहिए. क्या कहा दासदेव में!

1.) कोई भी नशा. कितना भी बड़ा क्यों न हो. छोड़ा जा सकता है. बशर्ते अपने यकीं कर लें. नशा करने वाले पर. कि वो छोड़ सकता है. राहुल भट्ट का किरदार देव ये कहता है. और करता भी है. नशा. शराब और इंजेक्शन वाला नहीं. वो छोटा है. उस नशे के सामने जो दिखता नहीं. मगर सिर पर चढ़ता है और फिर उतरता नहीं. सत्ता का. सौरभ शुक्ला का किरदार उसे विरासत कहता है. बार-बार कहता है. एक किस्म की वैधानिकता मुहैया कराने के लिए. मगर सब लिजलिजा लगता है. लाशें हैं. जो पहले फ्रेम से आखिरी तक बिखरी हैं. मगर फिर भी वो जिंदगी से चिपका रहना चाहता है. लौटती सांस वाली नहीं. ताकत वाली. जो क्रूर है. घिनौनी है. मगर देव इनसे पार चला जाता है. वो दास था. देव हो जाता है.

दासदेव. राहुल भट. कमज़ोर नायक. मज़बूत अभिनेता.
दासदेव. राहुल भट. कमज़ोर नायक. मज़बूत अभिनेता.

2.) देवदास की एक समस्या है. मूल कथानक की. इसका नायक, जो कि नायक है भी नहीं. बेहद कमजोर है. जमाने को दोष देता. किस्मत पर कलपता. और जो मजबूत किरदार हैं. वो इसके घामड़पने को सहते हैं. खुद सफर करते हैं कि इसके लायक बन सकें. पारो और चंदा. और इस चक्कर में खुद दयनीय हो जाते हैं. सब कुछ प्यार के नाम पर. लेकिन सुधीर मिश्रा की एक ताकत है. उनके क्राफ्ट की. उससे भी ज्यादा कहानी की. हमेशा ही. धारावी से लेकर इनकार तक. कि उनके जहां की औरतें कमजोर नहीं हैं. वे जहां हैं, जिस बाने और वाणी में. उनमें दम है. वे गिरती हैं, मगर उठती भी हैं. और ये उठना उनके किरदार का कोर है. दासदेव इस लिहाज से अर्थपूर्ण है. यहां पारो देवदास के खंभे से लिपटी बेल नहीं. ‘देव, ओ देव…’ की कातर पुकार नहीं. उसे प्यार है. मगर ये भी पता है कि आत्महंता आस्था रखने के नतीजे क्या हो सकते हैं. ऋचा चड्ढा (पारो) जब अपनी शादी से ऐन पहले देव को करीब लाती है. इतना करीब कि देव और उसकी लाल लिपस्टिक के बीच की हवा भी लालामी ले ले.

तब कहती है. पहला वाक्य, फुसफुसाकर. कि जैसे खुद भी न सुनना चाहे.

आई लव यू.

दासदेव के एक दृश्य में रिचा.
दासदेव के एक दृश्य में रिचा.

और इसके बाद स्वर ध्वनि की बटन दबा देता है. जोर आ जाता है.
पारो और कुछ मत बोलो. जो बचा है, वो भी खत्म हो जाएगा.
पारो मूल में ऐसी है. सब कुछ बुरा हो गया. फिर भी कुछ बचा है. जिसे बचाए रखने की जिद है. ये देवत्व है. परिस्थितयों के दास वाले मुहावरे से आगे बढ़ने का करतब.

3.) दासदेव किसकी कहानी है. देवदास की. जो अब यूपी के जहाना नाम के इलाके के एक ताकतवर राजनीतिक परिवार का वारिस है. देव प्रताप सिंह. देव भइया जिंदाबाद सुनने का शनै शनै अभ्यस्त होता. नहीं. ये सिर्फ देव की कहानी नहीं. पारो की कहानी भी है. पारो भाभी जिंदाबाद. जो प्यार देव से करती है. जिसे प्यार मिलन (विनीत सिंह) करता है. मगर जो चुनती इन दोनों को ही नहीं. क्योंकि उसने प्रतिकार चुना है. और उसके लिए उसे कम अज कम ये कहने में भी गुरेज नहीं. कि यही (पढ़ें सेक्स) तो सब कुछ नहीं होता. ये तसल्ली है. जो वो अपने पति को देती है. जो हरामजादा है. देव की नजरों में.

पर नहीं. ये पारो की भी कहानी भर नहीं. ये नजर की कहानी है. जो चांदनी की है. जो मूल कथानक में चंदा थी. इसे अदिति राव हैदरी ने निभाया है. पूरे जतन से. वो जहरीले फूल सी है. जिसने तय कर रखा है कि कब कौन सा कीट हमलावर है, जिस पर हमला करना है. उसके बेदम होने तक. कब किसे अपने रंग और खुशबू के घेरे में लपेटे रखना है. वो कहीं कहीं कमजोर होती है. इसे शास्त्रों में प्यार कहा गया है. वो कहती है. पूरी ठसक के साथ. बिना कंपन के.

देखिए देव साहब,

मैं जानती हूं कि आप मुझसे प्यार नहीं करते
पर आपको मेरा इश्क मुबारक

चांदनी को कोई गिल्ट नहीं है. अपने काम का. देव के छदम संस्कारी सवाल पर भी नहीं. उसकी नजर में एक किस्म की क्लैरिटी है. निसंगता. ये जरूरी है. सब किरदारों को एक एक कर नंगा करने के लिए.

4.) दासदेव एक नंगी फिल्म है. ये दिमाग छीलती है. परत दर परत. बहुत कम खून बहाकर. तो आपको भड़भड़ाने का मौका नहीं मिलता. एक विशंभर है. देव का बाप है. था. अनुराग कश्यप. राजनीति करता है. मुट्ठी भींचकर. किसानों से उनकी जमीन जो छीनेगा. उसकी आंख निकाल देंगे. वो ये कहता है और आंखें निकाल लेता है. बड़ी बड़ी कर लेता है. पर जमाने को ये पसंद नहीं. पुतला बनकर रह जाता है. पुतला सुनकर आपको अपने शहर का कोई बुत याद आता है क्या…

दासदेव का ज़हरीला फूल - अदिति राव हैदरी.
दासदेव का ज़हरीला फूल – अदिति राव हैदरी.

फिर एक अवधेश है. विशंभर का भाई. विरासत को आगे बढ़ाने वाला. ये महज एक संयोग तो नहीं है. सोची समझी युक्ति है. कि फिल्म को अयोध्या के राजसदन में शूट किया जाए. भले ही शहर का नाम जहाना रखा जाए. और वहां के लोकतांत्रिक राजा का नाम अवधेश. ये सौरभ शुक्ला है. और ये सौरभ शुक्ला ही हो सकता है. फिर याद आता है. सुधीर मिश्रा का वही इंटरव्यू. अवधेश का रोल और कोई कर ही नहीं सकता था. बड़े और महीन फिल्मकार किसी एक्टर के लिए ऐसी जिद कम पालते हैं. जब आप दासदेव देखते हैं तो आपको समझ आता है कि ये क्यों जरूरी थी.

तो अवधेश जो है, वो देवदास है. देवता सा दिखता. हालात के दास बन फैसले लेता. इस भरम में कि वो चीजें तय कर रहा है. मगर आखिर में सब नकली है. उसके विग की तरह. और है एक निर्लज्ज हुंकार

ये सत्ता हमारी विरासत है. बड़ी मुश्किल से बनाया है. इसे मत छोड़ देव.

अपने चारों तरफ देखिए. ये हुंकार विरासत की. आपको हर शहर, हर पार्टी में नजर आएगी. गोरे साहब गए. काले साहब आए. गोरे साहब तो मुल्क की ताबेदारी करने आते थे. काले साहब राजाओं का नया अवतरण हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी बनाते. बचाते. आगे बढ़ाते. किसी भी कीमत पर.

तो जैसा मैंने शुरू में कहा. नंगी फिल्म. यहां हर चीज पर आवरण है. सुभीते भर का. प्यार. दोस्ती. जिस्म. शादी. वफादारी. तरफदारी. मगर सब घात को तैयार. और इसका बड़ा जरूरी फायदा होता है. आप किसी पर भी आस्था नहीं रख सकते. किसी की भक्ति नहीं कर सकते. ये समझ आना जरूरी है. कि ये जो है. जिसे तुम नाना प्रकार के तर्कों के जरिए पूज रहे हो. ये सब कहीं न कहीं दास हैं. तो इन्हें देव मत मानो.

5.) दासदेव की ताकत है. स्पीड. ये फिल्म ठहरती नहीं. कई लोग इसे इसकी कमजोरी भी मानते हैं. क्योंकि जो सामने हो रहा है. वो कई स्तरों पर हो रहा है. अगर आपको नहीं पता तो सिर्फ एक अर्थ है. पता है. तो जितना पता है, उतने अर्थ. मसलन एक सीन:

हेलिकॉप्टर में ब्लास्ट और फिर नीचे गिरा मलबा. जलता जूता.
इसका पहला अर्थ. कि हां एक सीन दिखा दिया. अपनी विभीषकता के साथ. दूसरा. हेलिकॉप्टर संजय गांधी की याद दिलाता. और जूता. राजीव का जूता. श्रीपेरंबदूर में मिला. सफेद. लोटो कंपनी का. जिससे उसकी पहचान हुई.

दासदेव के हर सीन में आपको ये पॉलिटिकल रेफरेंस मिलेंगे. यहां आपको कहीं मुलायम-शिवपाल का द्वंद्व दिखेगा, कहीं बाल ठाकरे और राज ठाकरे वाली कशमकश. यहां आपको हर चीज में एक कथित दैवीय दखल देते फिक्सर मिलेंगे. एक चेतावनी के साथ. कि फिक्सिंग के साथ एक समस्या है. कि आप हर चीज फिक्स नहीं कर सकते. और आपको ऐसे में अमर सिंह याद आते हैं. कौन से अमर सिंह. वो अमर सिंह जिनके कभी अंबानी और बच्चन दोस्त थे. और सूबे के सीएम मुलायम सिंह बडे़ भाई. वही अमर सिंह अब लोकदल बना प्रदेश में भटक रहे हैं. जिस अखिलेश को सियासत में लाए उसकी मुखालफत करते. और एक दिन हेलिकॉप्टर से उतर एक रैली के मंच पर जाते वक्त वह गिर जाते हैं. मुंह के बल. जिसके नाम पर यूपीए अमर रहे की हेडिंग लगी, उसका हेड जमीन पर है.

6.) दासदेव नई लगती है. क्योंकि इसके एक्टर अपने नाम, अपनी सिनेमाई छवि का हैंगओवर नहीं दिखाते. राहुल भट्ट, ऋचा और अदिति. इन तीनों ने अपनी रेंज भर एक्टिंग की. राहुल भट्ट इंडस्ट्री के लिए एक लंबी रेस का घोड़ा हैं. अपने लुक्स से बेपरवाह. अदिति की कमनीयता का बेहतर इस्तेमाल हुआ है छलावा और फिर उसे तोड़ने के लिए जो रूपक गढ़े गए, उसके निबाह में. ऋचा तो बनी ही हैं देसी तीखेपन वाले रोल करने के लिए. पर यहां जिक्र करना चाहिए उनका, जिन्होंने इन तीनों को फैलने के लिए परात मुहैया कराई. सौरभ शुक्ला पर क्या ही लिखूं. सत्या लिखने वाला सौरभ. असल जिंदगी में तसल्ली से रहने वाला सौरभ. जॉली एलएलबी वाला सौरभ. और अब दासदेव में अवधेस प्रताप का रोल करने वाला सौरभ. वो ठीक कहता है फिल्म में.

मैं सब ठीक कर दूंगा.

वो फिल्म को एक अलग किस्म के उन्माद की तरफ ले जाता है. उसके रंग को और गाढ़ा करता है. विपिन शर्मा. जो विपक्ष के नेता के रोल में हैं. एक मार्के की बात कहते हैं.

सौरभ शुक्ला का किरदार फिल्म में अहम होने के साथ बहुत जटिल भी है.
सौरभ शुक्ला का किरदार फिल्म में अहम होने के साथ बहुत जटिल भी है.

अगर वाकई पावर की ख्वाहिश हो तो दिल के मामलों को दूर रखना चाहिए, आड़े आते हैं.

वो ठहरकर कहते है. चबा चबा कर. मगर उनकी जबान-उसकी ध्वनि रूखी नहीं. उसमें एक नाक से आती नमी है. जो आपको खतरों के प्रति निसफिकिर बनाती है. और इसीलिए वो ज्यादा खतरनाक हो जाती है. उनके किरदार की तरह.

फिल्म में विपिन का किरदार एक पॉलिटिशियन का है.
फिल्म में विपिन का किरदार एक पॉलिटिशियन का है.

विनीत का किरदार. मिलन शुक्ला. कॉलेज की राजनीति से असल में उतरे, मगर अपनी खुली जीप और शर्ट की खुली बटनों से नीचे नहीं. जो मारता भी है तो एक सात्विक फरियाद के साथ. गाली दो मुझे पारो. उसकी चीख में अनुराग है.

मुक्काबाज के बाद दासदेव में दिखाई देंगे विनीत. छोटा किरदार. बढ़िया काम.
मुक्काबाज के बाद दासदेव में दिखाई देंगे विनीत. छोटा किरदार. बढ़िया काम.

और दीपराज राणा. जिन्हें आपने तिग्मांशु की साहब बीबी में भी खूब देखा-परखा. यहां वो प्रभुनाथ सिंह बने हैं. नेता जी के गुंडे. मगर गुंडे को भी नेता बनना है. भिनकना है. भिनकाना है. ऐसे किरदार जब अपना हक मानते हैं तो उनमें सिर्फ दर्प नहीं होता. एक किस्म का न्याय विधान होता है. कि हम जो मांग रहे हैं, उस पर हमारा ही हक बनता है. अब तक हमें इस्तेमाल किया गया. अब हम करेंगे.

और आखिर में दिलीप ताहिल. जिनके निभाए रोल्स की कमीनगी आपके बचपन के खल तत्व की पूरक रही. वे गोरे हैं. वे साहब हैं. वे सधी हुई जबान में बात करते हैं. वे निरपेक्ष दिखते हैं. छोड़िए साहब. एक वाक्य में समझिए. वे धंधेबाज हैं. वे चलाते हैं. कंपनी, पार्टी, पॉलिटिक्स. वे जानते हैं कि कुछ भी हो जाए. कुछ भी. सब कुछ चलते रहना चाहिए. और इसके लिए कोई भी राजा प्यादे की तरह शहीद किया जा सकता है और किसी भी प्यादे को राजा बनाया जा सकता है.

7.) दासदेव आपको देखनी चाहिए ताकि आपके इर्द गिर्द जो कुछ भी हो रहा है, उसे आप पर्दे पर देखें और फिर समझें कि क्या हो रहा है. लेकिन जिन्हें सियासत में दिलचस्पी नहीं, उन्हें ये सिर्फ प्रेम-प्रतिशोध और मुक्ति की कथा लगेगी. और ऐसा लगने में कोई दोष नहीं. हर निगाह की अपनी तस्वीर होती है.

दासदेव देखनी चाहिए क्योंकि 5 बरस बाद सुधीर मिश्रा पर्दे पर बतौर डायरेक्टर लौटे हैं. और अब जिस जमीन पर खड़े हैं, उस पर ही वह सबसे ज्यादा बढ़े हैं. उत्तर भारत की जमीन. राजनीति वाली जमीन. सुधीर का नजरिया प्रकाश झा की राजनीति की तरह फाइव स्टार लुक वाला नहीं है. इसलिए इस पर ज्यादा भरोसा कर सकते हैं. उनके यहां किरदार बहुत बोलते नहीं. ड्रैमेटिक बातें ज्यादा नहीं करते. वे इंसान बने रहते हैं. जैसे भी हैं, वैसे ही. दासदेव सुधीर मिश्रा की अपने नाना डीपी मिश्रा की कही बात पर लगी सिनेमाई मुहर है. डीपी मिश्रा जिन्होंने इंदिरा गांधी का राजनीति की दीक्षा दी. इस भरोसे के साथ कि नेहरू की बिटिया सबसे अच्छा विकल्प है. मगर संजय राज आने के बाद बेतरह खीझे. और बोले. कोई किसी की कोख से पैदा हुआ है क्या सिर्फ इसीलिए राज करे. देव प्रताप सिंह आखिर में इसका जवाब देता है.

दासदेव को सुधीर और तारिक नावेद सिद्दीकी के डायलॉग्स के लिए भी याद रखा जाए. मसलन ये वाला, जो सौरभ शुक्ला बोलते हैं-

बिगुल बजाओ, द्रौपदी की साड़ी खुल चुकी है.

और डॉ. सागर के गानों के लिए भी. विपिन पटवा के म्यूजिक के लिए भी और जयदीप की राइटिंग के लिए भी.

आखिर में वो बात. जो वो सब कहना चाहते थे. अपने हिस्से के लाइट-साउंड-कैमरा और फिर एक्शन के बाद. आखिरी गाने में. जिसे गौरव सोलंकी ने लिखा है.

हम थे कहां
न याद कर
फिर से मुझे
ईजाद कर
खोल दे न मुझे
आजाद कर
हर इक तबाही से
सारे उजालों से
मुझको जुलूसों की
सारी मशालों से
सारी हकीकत से
सारे कमालों से
मुझको यकीं से तू
सारे सवालों से
आजाद कर

पीएस- आपने दासदेव का पोस्टर देखा है. इसमें तीन लोग हैं, जो भाग रहे हैं. किसी से दूर. किससे. पहाड़ों पर उकेरे चार चेहरों से. जो पथराए हैं. जो पहाड़ से स्थिर रहना चाहते हैं. सत्ता की डांवाडोल जमीन पर. ये पोस्टर अमरीका के माउंट रशमोर नेशनल मेमोरियल से उठाया गया है. अमरीका के साउथ डकोटा में ग्रेनाइट की पहाड़ियों पर आज से 77 साल पहले ये मुजस्समा तैयार हुआ था. मगर अधूरा. चार राष्ट्रपतियों के चेहरे. वॉशिंगटन. जैफरसन. रूजवेल्ट और लिंकन. सिर्फ चेहरे बन पाए. नीचे का हिस्सा नहीं.

ये अधूरापन ही इन्हें पूरा करता है. नहीं नहीं. इनके पेशे की असलियत को. सियासत. जिससे हर कोई सांसत में है.


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