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फ़िल्म रिव्यू : समीर

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समीर. आतंकवादी यासीन का रूममेट. यासीन गायब है और अब समीर को पकड़ लिया गया है. उसे पीटा जा रहा है. वो उल्टियां कर रहा है लेकिन मार का सिलसिला नहीं रुक रहा. अंत में उसे एक ऑप्शन दिया जाता है. ऑप्शन ये कि वो एटीएस को यासीन तक पहुंचाए. नहीं तो वो उसे ही जेल में सड़ा देंगे. इसके लिए एटीएस का मुखिया रचता है एक ऐसा चक्रव्यूह कि उसे लगता था यासीन फंसकर ही मानेगा. ये प्लान कैसा चला, कितना चला, कितनी दूर चला, इसी की कहानी है समीर.

समीर यानी ज़ीशान अयूब. नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का तिकड़मी लड़का. रांझना में मुरारी बना था. शाहिद में शाहिद का बड़ा भाई जो सब कुछ न्योछावर करता जाता है कि शाहिद एक वकील बन जाए और अपनी ज़िन्दगी वैसे ही जिए जैसी वो चाहता है. इन सभी जगहों पर हीरो कोई और ही था. यहां तो ज़ीशान ही लीड हैं. और क्या खूब लीड हैं. फ़िल्म में ज़ीशान एक एक्टर हैं जो आपको पकड़े रखते हैं. इसके अलावा सुब्रत दत्ता जो कि एटीएस चीफ़ बने हुए हैं और जिन्हें पूरी फ़िल्म में ज़ीशान को थप्पड़ जड़ने का लाइसेंस मिला हुआ है, भी दिखते हैं. सुब्रत भी मंझे हुए एक्टर हैं और हमने कई फ़िल्मों में उन्हें छोटे रोल्स करते हुए देखा है. यहां वो एक बड़ी भूमिका निभा रहे थे. एकदम वैसी जैसे नवाज़ुद्दीन को कहानी में मिली थी.

फ़िल्म में एक कमी जो हमेशा झलकती रहती है – पैसा! पैसे की कमी ने इस फ़िल्म का काफी खेल बिगाड़ा है. इसके अलावा फ़िल्म बनाने वाले यानी दक्षिण छारा और लीड एक्टर ज़ीशान का थिएटर बैकग्राउंड भी एक रोड़े जैसा काम करता लगता है. थिएटर में हमें ऐसी सेटिंग्स देखने को मिलती हैं जो वास्तविक नहीं होती हैं. वैसी जैसी नैतिक शिक्षा की किताबों में दिखती थीं. वैसी सेटिंग्स जैसी दसवीं में हिंदी के कोर्स में आई एकांकी सुमन नाम की किताब में दिखती थीं. मसलन एक बच्चा है वो गांधी की मूरत से लिपटकर रो रहा है क्यूंकि उसे बस से उतार दिया गया. उसी वक़्त वहां एक दादा जी टाइप फिगर आ जाता है जो उससे बात करता है और बताता है कि गांधी जी को भी एक बार उतार दिया गया था. विदेश में. लेकिन गांधी जी ने उतारने वालों को माफ़ कर दिया था. फिर वो बच्चे को ‘माफ़ करना’ सिखाते हैं और फ़िल्म के अंत में बच्चा मरते वक़्त समीर को माफ़ कर देता है. ये एक बहुत ही अपचनीय सीक्वेंस मालूम देता है. इसे और स्मार्टली किया जाता तो मज़ा आ जाता. हमने राजकुमार हीरानी की फ़िल्में देखी हैं. उस आदमी ने जैसे गांधी को हमें समझाया, मुझे नहीं लगता कोई भी भूल सकता है. “बन्दे में था दम, वन्दे मातरम!” ऐसा जुमला एक फ़िल्म की ज़रूरत है.

फ़िल्म में एक चीज़ और जो मुझे सबसे ज़्यादा खटकी, वो है सुब्रत दत्ता. एक गुस्सैल और आतंकवादी हमले का डर अपने सर पर लिए घूम रहे ऐंटी टेररिस्ट स्क्वॉड के मुखिया के तौर पर वो जंचते तो हैं लेकिन उन्हें गुजराती नहीं बनाना चाहिए था. क्यूंकि जब वो गुस्से में कुछ भी कहते हैं तो बंगाली टोन आ ही जाती है. उन्हें बंगाली ही दिखा देते तो बेहतर रहता. एक बंगाली भी एटीएस का चीफ़ हो सकता है.

सुब्रत दत्ता
सुब्रत दत्ता

समीर एक अधपकी फ़िल्म है. फ़िल्म में बहुत कुछ दिखाने की कोशिश की गई है लेकिन बात वही है कि चावल ही ठीक से न पका हो तो कितना भी पापड़, दही और सलाद हो, खिचड़ी का मज़ा नहीं आता है. फ़िल्म के द्वारा मुसलमानों को फंसाया जाना, उनके प्रति हो रही ज़्यादतियों के बारे में आगाह ज़रूर किया जा रहा है लेकिन उसका तरीका बहुत सांस्कृतिक है. ऐसा लगता है जैसे फ़िल्म को दूरदर्शन ने फंड किया है और कभी सन्डे को आने वाले सुरभि के डायरेक्टर ने इस बनाया है. फ़िल्म बनाने का फ़ॉर्मूला गायब दिखा. ये एक अच्छा नाटक ज़रूर हो सकता था.

फ़िल्म का क्लाइमेक्स आपको पलटकर रख देता है लेकिन फ़िल्म की बाकी खामियों के चलते वो क्लाइमेक्स भी असरदार नहीं हो पाता.

समीर देखी जानी चाहिए. ये जानने के लिए कि क्या कमियां न छोड़ी जाएं. इसे देखा जाना चाहिए क्यूंकि ये एक ईमानदार कोशिश है किसी की सोच को सभी के सामने लाने की. एक बड़े तबके की मुसीबतों को खुले में लाने की ज़ुर्रत की गई है और इसलिए ये फ़िल्म देखी जानी चाहिए.


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