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फ़िल्म रिव्यू: रुख

मनोज बाजपई, स्मिता ताम्बे और आदर्श गौरव की फ़िल्म रुख. ट्रेलर न्यूटन के साथ रिलीज़ हुआ था और फ़िल्म मज़ेदार मालूम दे रही थी.

एक लड़का है. हॉस्टल में रहता है. उसके पापा बिज़नेसमैन हैं. पैसे को लेकर कुछ लफड़ा चल रहा था. लेकिन लड़के के पापा ने सब संभाला हुआ था. मम्मी थोड़ा परेशान रहती थीं. क्यूंकि पापा घर नहीं आते थे. एक दिन खबर मिली कि एक गाड़ी ठुंकी मिली है. चौराहे पर. किसी ट्रक ने ठोंक दिया था. पापा की मौत हो गई. मां-बेटा ग़म में डूब जाते हैं. लड़के को किसी वजह से लगता है कि उसके पापा का मर्डर हुआ है. पापा के मर्डर को अंजाम देने वालों की खोज की कहानी है रुख.

पापा यानी मनोज बाजपई. क्या कलाकार आदमी है. परेशानी से घिरा हुआ कैरेक्टर जिसे अपने परिवार को भी देखना है. बीमार बाप को भी वक़्त देना है. साथ ही अपने साथ काम कर रहे लोगों की नौटंकियों को भी संभालना है. उसने लोन लिया हुआ है जिसे किसी भी हाल में चुकाना है लेकिन उसके पार्टनर हैं कि उसका साथ ही नहीं दे रहे. बेटा यानी आदर्श गौरव. फ़िल्म आई थी मॉम. आदर्श को उस फ़िल्म में देखा गया था. एक नालायक लड़का जो एक लड़की को पसंद करता है लेकिन लड़की उसे नहीं पसंद करती है. वो अपने भाई के साथ मिलकर उस लड़की का रेप कर देता है. इस फ़िल्म में मनोज बाजपई का बेटा जो अपने बाप के हत्यारों को ढूंढ रहा है. इस फ़िल्म में लीड के रूप में आदर्श ही हैं. बेहतरीन इंटेंस ऐक्टिंग. एक ऐसा लड़का जो अपने मां बाप से इमोशनली दूर है और कुछ कुछ सनकी भी है. स्मिता ताम्बे. मम्मी. मिडल क्लास की परेशान मां. पूरी फ़िल्म में उदास दिखती हैं. इन्हें देखकर डिप्रेशन हो सकता है.

rukh actors
आदर्श, मनोज बाजपई, स्मिता ताम्बे

फ़िल्म की कहानी ऐसी थी कि न जाने क्या-क्या कियस जा सकता था. एक जगह पर तो फ़िल्म काफी इंटेंस हो जाती है. आप सभी पार्टनर्स पर शक करने लगते हैं. ऐसा लगता है कि भयानक थ्रिलर फ़िल्म होने वाली है. फ़ैमिली ड्रामा, इमोशन, इंटेंसिटी वगैरह वगैरह. कमाल का बिल्ड अप. लेकिन अंत में वही हाल होता है जो राम गोपाल वर्मा की हॉरर फ़िल्मों का होता आया है. सब फुस्स.

*****हॉर्न बजा के आ बगियन में, थोड़ा आगे स्पॉइलर है.*****

एक बात और. फ़िल्म में एक जगह दिखाया गया है कि लड़के ने अपने दोस्त को स्कूल में इतना पीटा कि अगले की टांग टूट गई. उसे स्कूल से निकाल दिया गया इसलिए वो हॉस्टल में रहकर पढ़ रहा था. फ़िल्म के अंत में इन दोनों की मुलाक़ात होती है. और अंत इस बात पे होती है कि पिटने वाला लड़का है कि वो सब कुछ कबका भूल गया था. भक्क! ऐसा कहां होता है? ससुरा सब कुछ हैप्पी एंडिंग क्यूं चाहिए? माने 15-16 साल की उमर में कौन सा लड़का मार खा के (वो भी तब जब वो बड़का बुली हो) दो साल में सब भूल जाता है? अरे ऐसा कौन सा ह्रदय परिवर्तन हो गया? माने ऐसे कौन करता है यार? पापा की मौत की असलियत खुली तो फुस्स. यहां फुस्स. फिर लड़के की वापसी उसी रोने-ढोने वाली नीरस ज़िन्दगी की ओर. माने कोई बात होती है यार? 200 रुपिया खर्च कर के आदमी ये देखने जायेगा कि एक लड़के को अगले ने माफ़ कर दिया. कुछ हुआ ही नहीं. अरे कुछ तो दिखाते. लड़का बदला लेता. उसको बिल्डिंग से नीचे फेंक देता. रोता. पीटता. गाता. बदला लेता. कहता कि तुम्हारे बाप को हम ही ने मारा है. लेकिन नहीं. पिक्चर ही खतम हो गई. भै!


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