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फिल्म रिव्यू- पुष्पा: द राइज़

जब ‘पुष्पा- द राइज़’ का ट्रेलर आया था, तब से हमें ये लग रहा था कि इस फिल्म का बज़ पैन-इंडिया फिल्म लेवल का नहीं है. देश के दूसरे हिस्सों में तो फिल्म का प्रमोशन ज़ोरों-शोरों से चल रहा था. मगर हिंदी बेल्ट में फिल्म को लेकर वो एक्साइटमेंट देखने को नहीं मिल रही थी. 17 दिसंबर को ‘पुष्पा’ रिलीज़ हुई. इस फिल्म को देखने के बाद ये लगता है कि मेकर्स अपने प्रोडक्ट को लेकर श्योर थे. हालांकि इसे सॉर्ट ऑफ ओवर-कॉन्फिडेंस भी कहा जा सकता है. क्योंकि ‘पुष्पा’ फुल ऑन मसाला फिल्म है, जिसका वर्ड ऑफ माउथ हर बीतते दिन के साथ बेहतर होगा. ये चीज़ इस फिल्म की काफी मदद करेगी.

फिल्म 'पुष्पा' का पोस्टर.
फिल्म ‘पुष्पा’ का पोस्टर.

ये कहानी है पुष्पा राज नाम के एक लड़के की. जो अपना करियर शुरू करता है एक मज़दूर के तौर पर. मगर उसका तौर ऐसा है कि वो किसी के सामने झुकता नहीं है. इसे आप उसका एटिट्यूड/एरोगेंस, जो चाहें बुला सकते हैं. उसे किसी से ऑर्डर लेना ठीक नहीं लगता. मगर उसके इस बर्ताव के पीछे एक कुंठा है. इसी फेर में वो नौकरी वगैरह छोड़कर सेशाचलम में लाल चंदन के इल्लीगल धंधे का हिस्सा बन जाता है. अपनी अकड़ और काम करने के तरीके के चलते वो जल्दी ही इस फील्ड में ऊंचाई पर पहुंच जाता है. एक तरह से वो लोकल लेवल पर रेड सैंडलवुड स्मगलिंग का किंगपिन बन जाता है. फिर उसका सामना होता है भंवर सिंह शेखावत नाम के एक पुलिस ऑफिसर से, जो पुष्पा जितना ही अकड़ू और ज़िद्दी है. इन दोनों की भिड़ंत ही इस फिल्म के क्लाइमैक्स और ‘पुष्पा पार्ट 2’ के लिए मसाला देती है.

लाल चंदन स्मगलिंग के शुरुआती दिनों में मजदूर के तौर पर काम करता पुष्पा.
लाल चंदन स्मगलिंग के शुरुआती दिनों में मजदूर के तौर पर काम करता पुष्पा.

‘पुष्पा- द राइज़’ रैग्स टु रिचेज़ या यूं कहें कि एक अंडरडॉग की कहानी है. एक आदमी जिसे समाज ने नकार दिया. वो अपने दम पर एंपायर खड़ा करता है. जैसे परम पूज्य यो यो हनी सिंह कहते हैं- ‘ये सब मैं बहुत देख चुका’. फिल्म के बेसिक प्लॉट के मामले में हमारा ख्याल भी उनसे काफी मिलता-जुलता है. सारा गेम उस फिल्ममेकिंग टेक्निकैलिटी का है, जिसे शास्त्रो में ट्रीटमेंट कहा गया है. इस फिल्म को जैसे ट्रीट किया गया है, वही चीज़ इसे खास बनाती है. सुकुमार, जिन्होंने पिछले दिनों ‘रंगस्थलम’ जैसी फिल्म बनाई थी, ‘पुष्पा’ के डायरेक्टर भी वही हैं. सुकुमार को जनता की नब्ज़ पता है. वो चंदन की लकड़ी की स्मगलिंग से जुड़ी फिल्म को भी ऐसे एंटरटेनिंग अंदाज़ में पेश करते हैं कि देखकर मज़ा आ जाए. वही घिसी-पिटी कहानी. वही हीरोगिरी. वही फैन सर्विस. मगर इस सबका एंड रिज़ल्ट निकलता है एक क्वॉलिटी मसाला फिल्म.

जहां ‘मसाला फिल्म’ जैसे टर्म का इस्तेमाल कर दिया जाता है, वहां फिल्म से पब्लिक की उम्मीदें खत्म हो जाती है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमें पिछले कुछ समय में मसाला फिल्म के नाम पर बेहद खराब क्वॉलिटी का सिनेमा दिखाया गया है. जब रीजनल और हिंदी सिनेमा की तुलना होती है, तो सारा फर्क क्वॉलिटी ऑफ मसाला फिल्म पर ही आकर रुकता है. बाकी कॉन्टेंट ड्रिवन सिनेमा तो हिंदी में भी कमाल का बन रहा है. बस उसके दर्शक कम हैं. जबकि तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ा भाषाओं में खूब एंटरटेनिंग फिल्में बन रही हैं. पब्लिक पसंद कर रही है. इसलिए उस तरह की और फिल्में बन रही हैं.

फिल्म में इस तरह के सीन्स खालिस स्टार्स के फैंस के लिए डाले जाते हैं. क्योंकि लोग अपने पसंदीदा स्टार को फुल स्वैग में एक्शन और कॉमेडी करते हुए देखना चाहते हैं.
फिल्म में इस तरह के सीन्स खालिस स्टार्स के फैंस के लिए डाले जाते हैं. क्योंकि लोग अपने पसंदीदा स्टार को फुल स्वैग में एक्शन और कॉमेडी करते हुए देखना चाहते हैं.

जैसे ‘KGF’, ‘बाहुबली’ या ‘अला वैकुंठपुरमुलो’ को ही ले लीजिए. हमने इन तीन फिल्मों का नाम इसलिए लिया क्योंकि इससे हिंदी भाषी दर्शकों का भी एक बड़ा तबका वाकिफ है. इन फिल्मों में आपको वही सब देखने को मिलता है, जो आप पहले कई बार देख चुके हैं. मगर उन्हीं कहानियों को थोड़ा ट्वीक कर दिया जाता है. प्रोडक्शन वैल्यू बेहतर कर दी जाती है. अपीलिंग विज़ुअल्स से लेकर मासी बैकग्राउंड स्कोर सब ठीक मात्रा में डाला जाता है. टेक्नॉलजी का भरपूर इस्तेमाल होता है. गाने-वाने डालकर मस्त सी फिल्म बना दी जाती है. दर्शक देखकर लहालोट हो जाते हैं. एक्टर्स स्टार बन जाते हैं. डायरेक्टर का करियर सेट हो जाता. प्रोड्यूसर पैसे कमाकर लाल हो जाता है. उन्हीं पैसों को इस्तेमाल करके वो और ऐसी ही फिल्में बनाता है. इस तरह की फिल्मों की बुनियादी शर्त ये है कि वो एंटरटेनिंग हों. और उनके थ्रू कोई प्रॉब्लमैटिक मैसेज पब्लिक को न पहुंचाया जाए. ‘पुष्पा’ ये सब चीज़ें आसानी से कर ले जाती है.

फिल्म 'पुष्पा' का एक धांसू एक्शन सीक्वेंस, जिसे बड़े कायदे से कोरियोग्राफ किया गया है, ताकि उसका ज़्यादा से ज़्यादा प्रभाव पैदा हो.
फिल्म ‘पुष्पा’ का एक धांसू एक्शन सीक्वेंस, जिसे बड़े कायदे से कोरियोग्राफ किया गया है, ताकि उसका ज़्यादा से ज़्यादा प्रभाव पैदा हो.

बहरहाल, ‘पुष्पा’ में अल्लू अर्जुन ने पुष्पा राज नाम के लड़के का टाइटल कैरेक्टर प्ले किया है. इस किरदार की सबसे बड़ी दिक्कत है, उसका ऐटिट्यूड. मगर यही ऐटिट्यूड उसका सबसे बड़ा हथियार भी है. हमारे सिनेमा एडिटर गजेंद्र सिंह भाटी एक बात कहते हैं. उनसे ये बात ‘नो वन किल्ड जेसिका’ फेम राज कुमार गुप्ता ने कही थी. वो कहते हैं, हर आदमी में एक किस्म का पागलपन होता है. वही उसे बाकियों से अलग करता है. वही उसका सुपरपावर है और Achilles heel भी. अकीलीज़ हिल यानी किसी मजबूत चीज़ की सबसे बड़ी कमज़ोरी, जो उसके पतन का कारण बनती है. इस फिल्म में हमें सिर्फ ‘पुष्पा’ का राइज़ देखने को मिलता है. इसलिए यहां वो एटिट्यूड चल जाता है. मगर संभावनाएं हैं कि अगले पार्ट में यही उसके नीचे गिरने का कारण भी बने.

फिल्म का सबसे प्रॉब्लमैटिक हिस्सा है पुष्पा की लव स्टोरी. इस नॉनसेंस सी प्रेम कहानी के अलावा फिल्म में रश्मिका के करने के लिए कुछ नहीं है.
फिल्म का सबसे प्रॉब्लमैटिक हिस्सा है पुष्पा की लव स्टोरी. इस नॉनसेंस सी प्रेम कहानी के अलावा फिल्म में रश्मिका के करने के लिए कुछ नहीं है.

‘पुष्पा’ एक प्रॉपर मेनस्ट्रीम फिल्म है, जिसमें हीरो ऐसे बात करता है, जैसे वो वाकई किसी से बात कर रहा हो. मगर उसमें एक स्वैग है. हर डायलॉग में स्टारडम का बोझ है. जिसकी वजह से उसकी कही हर लाइन पब्लिक तक पहुंचते-पहुंचते पंचलाइन बन जाती है. फिल्म में वेल कोरियोग्राफ्ड एक्शन सीक्वेंसेज़ हैं, जो देखने में बढ़िया लगते हैं. बैकग्राउंड स्कोर में गुंज़ाइश बचती है. मगर म्यूज़िक डायरेक्टर देवी श्री प्रसाद  अपने गानों से ये हिसाब चुका देते हैं. मगर सबसे इंट्रेस्टिंग हिस्सा है फिल्म की सिनेमैटोग्रफी. फिल्ममेकर और सिनेमैटोग्राफर एक ही फिल्म को दो अलग-अलग तरीके से विज़ुअलाइज़ करते हैं. मगर जब ये दोनों लोग एक जैसा सोचने लगें, तो फिल्म की रूपरेखा बदल जाती है. यही चीज़ ‘पुष्पा’ में देखने को मिलती है. सुकुमार के काम को मिरोस्लॉ कुबा ब्रोज़ेक का कैमरा वर्क कॉम्प्लिमेंट करता है. फिल्म का पॉपुलर गाना ‘सामी सामी’ आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं-

तमाम अच्छाइयों को बावजूद ‘पुष्पा’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है, जिसमें कोई कमी न हो. फिल्म की सबसे ज़्यादा खटकने वाली चीज़ है रश्मिका मंदाना और अल्लू अर्जुन की लव स्टोरी. ये फिल्म का सबसे गैर-ज़रूरी और प्रॉब्लमैटिक हिस्सा है. हम उसके डिटेल्स आपसे शेयर नहीं कर सकते. मगर इस दिक्कत भरी चीज़ को भी फिल्म आखिर में जस्टिफाई कर देती है. जिसका बिल्कुल कोई सेंस नहीं बनता. फहाद फाज़िल ने भंवर सिंह शेखावत नाम के पुलिस ऑफिसर का रोल किया है. वो फिल्म के बिल्कुल आखिरी में हिस्से में आता है. जब दो बड़े स्टार्स स्क्रीन पर एक-दूसरे के सामने आते हैं, तो अलग ही लेवल का एड्रेनलीन रश फील होता है. इसी चीज़ को भुनाने के लिए अल्लू अर्जुन और फहाद फाज़िल के बीच फिल्म के आखिर में कुछ कंफ्रंटेशनल सीन्स डाले गए हैं. मगर ये सीन्स वो प्रभाव पैदा नहीं कर पाते, जिस मक़सद से इन्हें फिल्म में जगह दी गई थी. इससे बेहतर तो यही होता कि फहाद को कायद से फिल्म के दूसरे पार्ट में इंट्रोड्यूस किया जाता. इससे दो चीज़ें होतीं, इस तीन घंटे लंबी फिल्म की लंबाई कम से कम 15-20 मिनट कम हो जाती और फिल्म को एक सैटिस्फाइंग एंडिंग मिल जाती.

नए अपॉन्टेड पुलिस ऑफिसर या यूं कहें कि फिल्म के विलन भंवर सिंह शेखावत के रोल में फहाद फाज़िल.
नए अपॉइन्टेड पुलिस ऑफिसर या यूं कहें कि फिल्म के विलन भंवर सिंह शेखावत के रोल में फहाद फाज़िल.

‘पुष्पा’ को देखने को ओवरऑल अनुभव ये है कि अगर लंबे समय से कोई मेनस्ट्रीम मसाला फिल्म नहीं देखी, तो इसे देखा जा सकता है. उसके लिए आपको कुछ चीज़ें करनी होंगी. फिल्म-प्लॉट या नैरेटिव में लॉजिक की तलाश नहीं करनी होगी. जो स्क्रीन पर देखा, उसे एंजॉय करिए. थिएटर से निकलते वक्त फिल्म को नहीं, उसे देखने के अनुभव को अपने साथ लेकर घर जाइए.


वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू- स्पाइडरमैन- नो वे होम

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