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फिल्म रिव्यू: पीहू

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इस हफ्ते सिनेमाघरों में विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पीहू’ लग चुकी है. सिंगल कैरेक्टर ड्रिवेन इस फिल्म के ट्रेलर के बाद सोशल मीडिया पर तारीफों के बहुत पुल बांधे गए थे. बंधने भी चाहिए, फिल्म का ट्रेलर पूरी तरह से वो अटेंशन डिज़र्व करता था. अब वही फिल्म सिनेमाघरों में उतर चुकी है. लेकिन ये चीज़ पिछले काफी समय से लगातार देखने में आ रही है सोशल मीडिया पर जो आग लगती है, कई बार उसका धुआं भी फिल्म तक नहीं पहुंच पाता. ‘पीहू’ के केस में ये चीज़ कितनी सही साबित होती है, ये समय बताएगा. लेकिन हमने ‘पीहू’ देख ली है और हम आपको इस फिल्म के बारे में वो बताने जा रहे हैं, जिसे शास्त्रों में ‘रिव्यू’ कहा गया है.

किस बारे में है पीहू?

पीहू एक बच्ची की कहानी है, जो घर में अकेली है. उसकी मां वहीं बिस्तर पर लेटी है पर पीहू के लाख उठाने पर भी क्यों नहीं जाग रही है. ये स्पॉयलर है, जो हम नहीं देंगे. कई जगह ऐसा पढ़ने-सुनने में आया है कि इसकी तुलना हॉलीवुड फिल्म ‘बेबीज़ डे आउट’ से की जा रही है. वो जहां एक कॉमेडी फिल्म थी वहीं पीहू एक हॉरर फिल्म है. इस पूरी फिल्म में आपको शक्लें तो दो दिख रही हैं लेकिन किरदार सिर्फ एक है. दो साल की बच्ची पीहू. सुबह सवा सात बजे से लेकर शाम के सवा सात बजे तक वो बच्ची अपने घर में अकेली रहती है और इस दौरान वो क्या कुछ और कैसे करती है यही फिल्म की कहानी है.

इस दो साल की बच्ची का असल नाम है मायरा विश्वकर्मा लेकिन फिल्म के बाद से इन्हें पीहू ही बुलाया जा रहा है.
इस दो साल की बच्ची का असल नाम है मायरा विश्वकर्मा लेकिन फिल्म के बाद से इन्हें पीहू ही बुलाया जा रहा है.

काम कैसा है एक्टर्स का?

एक्टर्स नहीं सिर्फ एक दो साल की बच्ची है, जिसका नाम पीहू है. और डायरेक्टर की सारी प्लानिंग उसी बच्ची से शुरू होकर उसी पर खत्म होती है. क्योंकि ये सिंगल कैरेक्टर फिल्म है और आपके पास एक्टर के नाम पर दो साल बच्ची है. इसमें आप क्या क्रिएट करते हैं, ये सब्जेक्ट अपने आप में काफी दिलचस्प है. उस बच्ची से आप क्या काम करवाएंगे और कैसे करवाएंगे ये सबसे बड़ा है चैलेंज है. लेकिन डायरेक्टर विनोद कापड़ी अपनी सारी जंग इस बच्ची के काम से ही जीतते हैं. फिल्म के दौरान स्क्रीन पर जो घट रहा है वो नैचुरल है क्योंकि उस बच्ची को ऑब्वियसली एक्टिंग नहीं आती होगी. वो जो कर रही है अपनी बाल सुलभ चंचलता में कर रही है और एक आदमी कैमरा थामने वो सब कुछ रिकॉर्ड करके हमें दिखा रहा है. ये बहुत कमाल का पीस ऑफ वर्क है.

बच्ची के बालकनी में खड़े होने वाला सीन कुछ देर के लिए आपकी सांस रोक लेता है.
बच्ची के बालकनी में खड़े होने वाला सीन कुछ देर के लिए आपकी धड़कने बढ़ा देता है.

ऐसी कोई चीज़ जो खली हो

कोई चीज़ परफेक्ट नहीं होती. इसका सबसे क्लीशे एक्जा़ंपल चांद पर भी दाग होना तो आपको पता ही होगा. लेकिन जो चीज़ खली है अगर उसका हम यहां ज़िक्र नहीं कर सकते क्योंकि इससे जो लोग भी फिल्म देखने जाएंगे उनकी एक्साइटमेंट खत्म हो जाएगी. कुल जमा बात ये है कि हमारे आसपास में या हमारे समाज में जो घर से बाहर जो चीज़ें घट रही हैं, उसका किसी घर के कमरे में क्या असर पड़ सकता है ये हमें इस फिल्म में जानने को मिलता है. अगर आपको लग रहा है कि वो बच्ची सिर्फ अकेलेपन की शिकार है, तो आप गलत हैं. वो शिकार किसी और चीज़ की है, जिससे तकरीबन हम सभी को दो-चार होना पड़ता है.

फिल्म की शूटिंग के दौरान डायरेक्टर विनोद कापड़ी के साथ मायरा.
फिल्म की शूटिंग के दौरान डायरेक्टर विनोद कापड़ी के साथ मायरा.

बाकी के टेक्निकल इशूज़

डायरेक्टर तो पहले ही बिग फैट थम्ब्स अप डिज़र्व करते हैं. क्योंकि उन्होंने ऐसा मसला चुना बात करने के लिए. और जो बात इस फिल्म से निकली है, वो बहुत दूर तक जाती दिख रही है. कैमरावर्क इस फिल्म का सबसे कठिन टास्क था. क्योंकि आपके दिखाने के लिए सिर्फ एक घर है, वो भी भीतर से. हर सीन फ्रेम से दर्शकों की उम्मीद बंधी हुई है कि अगली सीन में कैमरा क्या दिखाएगा. लेकिन यहां अच्छी बात होती है कि कैमरा, कैमरे वाला फील देता ही नहीं है. ऐसा लगता है जैसे उस घर के अलग-अलग हिस्सों में जाकर आप खुद वो चीज़ें घटते हुए देख रहे हैं. और जहां फ्रेम्स की जरूरत होती, वहां वो उपलब्ध होता है. जैसे एक सीन में पीहू अपनी मां के ऊपर चढ़कर सो रही है और उसी फ्रेम में पीहू और उसके पिता की तस्वीर दिखती है. ये आपको अभी सुनने में अति साधारण लग रहा है लेकिन जब सिनेमाहॉल में ये घटते हुए आप देखेंगे, तो थर्रा कर रह जाएंगे. एक दूसरे में पीहू की डॉल घर के उस व्यस्त माहौल में अकेली पड़ी होती है, उसके पास पूरा बिखरा हुआ घर दिखता है. इस फ्रेम से सिनेमैटोग्रफर साहब फिल्म में अब तक जो कुछ भी घटा है, वो सब दिखा देते हैं. और उसे आप अपनी सहमति भी देते हैं. इस तरह की फिल्मों में बैकग्राउंड म्यूज़िक बहुत मजबूत किरदार निभाता है. यहां उसे बिलकुल टोन डाउन कर के रखा गया है, जिससे वो स्थिति या चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बदले ठीक वैसे ही दिखाती है, जैसे वो असल में है.

यहां ये फोटो दो तस्वीरों को क्लब करते बनाई गई लेकिन फिल्म के दृश्य में इसे एक ही फ्रेम में दिखाया जाता है.
यहां ये फोटो दो तस्वीरों को क्लब करके बनाई गई लेकिन फिल्म के दृश्य में इसे एक ही फ्रेम में दिखाया जाता है.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

अगर आप इस फिल्म को देखने के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहते हैं, तो आप किसी गलत ऑडिटोरियम में घुस आए हैं. ये वो फिल्म नहीं है, जो आपको कहीं लेकर जाएगी. ये आपको छोड़ देगी वहीं, जहां से वापस मुड़कर संभव नहीं है. ये कहानी किसी एक बच्ची या व्यक्ति की नहीं है, दुनिया में ऐसी कई पीहू हैं, जो बिलकुल सेम कंडिशन में न भी रह रही हों, तो भी इसी के आसपास से गुज़र रही हैं. आपको ये फिल्म इस हद तक डरा देगी कि आप सिनेमाहॉल से निकलकर घर कैसे जाना, इसका फैसला भी इसी फिल्म की ज़द में रहकर लेते हैं. या ऐसे भी कह सकते हैं ये फिल्म हमें डराने से ज़्यादा धमकाती है. क्योंकि समझाने-बुझाने का समय तो काफी पीछे छूट चुका है. लेकिन आप अगर इस डर को समझ जाएंगे, तो चीज़ें काफी हद तक सुलझ जाएंगी.


वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू- ठग्स ऑफ हिंदोस्तान

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Film Review Pihu directed by Vinod Kapri

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