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Film Review: ऊपर अल्लाह नीचे धरती, बीच में तेरा जुनून, रे सुल्तान, रे सलमान!

फिल्म: सुल्तान  ।   निर्देशक: अली अब्बास जफर   । कलाकार: सलमान खान, अनुष्का शर्मा, कुमुद मिश्रा, अमित साध, रणदीप हुड्‌डा   ।   अवधि: 2 घंटे 50 मिनट

सुल्तान अली खान घरों में डिश केबल इंस्टॉल करने का काम करता है अपने दोस्त के साथ. हरियाणा के गांव रेवाड़ी में रहता है. फिटनेस अच्छी है. पतंग लूटने में इसका कोई मुकाबला नहीं. पतंग कटने के 3 मिनट में उसे पकड़कर दिखा सकता है. इसके लिए गलियों में तेजी से दौड़ता, भैंसों के ऊपर से उछलता, दीवारों को फांदता और एक छत से दूसरी छतों पर जबरदस्त जंप लगा सकता है.

इसी दौरान वह आरफा से टकरा जाता है. पिटता है. लेकिन पूरी जिंदगी के लिए अपना दिल उसे दे बैठता है. लेकिन आरफा एक रेस्लर है और उसका सपना है अपने और अपने पिता के लिए ओलंपिक में गोल्ड जीतना. अब आगे की scheme of things में इनका प्यार, जिंदगी की कहानी, उतार-चढ़ाव और अंत क्या रहता है इसके लिए सुल्तान देखनी होगी. इतनी कहानी से ही आपका काफी एंटरटेनमेंट यहां खप चुका है.

सुल्तान अच्छी लगी. सारे पात्र अच्छे से चुने हुए हैं. रणदीप हुड्‌डा, अमित साध परफेक्ट कास्टिंग हैं. संवाद अच्छे हैं. अंधी लड़की और मां-भैण को छोड़ दें तो. कहानी ज्यों-ज्यों आगे बढ़ाई गई है वह थ्रिल बनाए रखती है. हां, जाहिर है आपको पता है कि नायक सलमान खान है और वह किसी रेस्लिंग मैच में लड़ रहा है तो चाहे पसलियां टूट जाएं, डॉक्टर बोल दे कि इस बार ये रिंग में गया तो जिंदा नहीं लौटेगा, रिंग में दुनिया के फ्री-स्टाइल रेस्लिंग चैंप से बुरी तरह कूट खाए ले, ख़ून से सन जाए.. तो भी क्या होना है! और उसमें कोई शिकायत नहीं है. दुनिया के सब कमर्शियल सिनेमा में ये एक ऐसी चीज है जो सदा रहेगी. हमारी दादी-नानी की कहानियां भी तो ऐसी नहीं हैं कि अंत में राजकुमार मारा जाए या बुरा आदमी जिंदा रहे. वो सिर्फ वर्ल्ड सिनेमा में या बुद्धिजीवियों की कहानियों में पाया जाता है.

फिल्म में म्यूजिक भी अच्छा है.

मैं भी नाचूं, रिझाऊं सोणे यार को, चलूं मैं तेरी राह बुलैया (पैपों), सच्ची मुच्ची (मोहित चौहान, हर्षदीप कौर) और जग घूमेया थारे जैसा न कोई (राहत फतेह अली खान और नेहा भसीन के गाए दोनों संस्करण) बार-बार सुनने की इच्छा होती है. ये गाने फिल्म को खुशनुमा बना देते हैं. 440 वोल्ट, बेबी को बेस पंसद, टुक टुक .. थिरकने के लिहाज से और हीरो-हीरोइन को नाचने का मौका देने के लिए रखे गए हैं. ठीक हैं.

सलमान/सुल्तान को मिथकीय नायक की छवि देने के लिए लिखा गया प्रमुख गाना है रे सुल्तान. इसके बोल हैं:
ख़ून में तेरे मिट्‌टी
मिट्‌टी में तेरा ख़ून
ऊपर अल्लाह
नीचे धरती
बीच में तेरा जुनून
रे सुल्तान…

ये जब जब आता है पक्के फैंस के रोंगटे खड़े होते हैं. फिल्म में एक और जुमला स्थापित किया गया. जब सुल्तान का दोस्त उसे उत्साहित करने के लिए कई जगह कहता है, रे सुल्तान, कर दे चढ़ाई. उसके बोलने का अंदाज काफी प्रभावी है.

सुल्तान को देखने का मापदंड सिर्फ एंटरटेनमेंट ही है. उर्फ सलमान खान. इसी फिल्म, इसी कहानी, इसी म्यूजिक से अगर सलमान को निकाल दें और किसी नए एक्टर को ले लें तो सारी प्रभावोत्पादकता खत्म हो चुकी होगी. इसी क्राइटेरिया को रखते हुए भी देखें तो फिल्म में कुछ बातें हैं जो काफी अच्छी हैं जिनकी तारीफ कर सकते हैं.

1. अब तक ये आलोचना की जाती रही है कि आमिर, सलमान, शाहरुख अल्पसंख्यक होने के बावजूद देश के टॉप फिल्म स्टार हैं इस बात में कोई दम नहीं है क्योंकि ये जितनी भी फिल्मों की वजह से इतने लोकप्रिय हुए हैं उनमें उनके पात्र हिंदू थे. ऐसे स्टीरियोटाइप वाकई में हैं. लेकिन सुल्तान में ये सांचा टूटा है. सुल्तान, आरफा इस कहानी के नायक हैं. और उन्हें देखते हुए खुशी होती है. फिल्म के निर्देशक भी अली अब्बास हैं.

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2. इस कहानी को देखते हुए कहीं पर भी किसी धर्म की रेखा शुरू नहीं होती, कहीं खत्म नहीं होती. हमारा दिमाग कहीं भी गणना नहीं कर पाता कि कौन किस धर्म का है. वे बस एक देस के वासी हैं. सुल्तान का सबसे पक्का दोस्त और उसकी जीवन रेखा है गोविंद. (गोविंद के रोल में संबंधित एक्टर में बहुत उम्दा एक्टिंग की है, उनका हरियाणवी लहजा फिल्म को रियलिस्टिक बनाने में बहुत मदद करता है.)

3. आरफा एक मजबूत महिला पात्र है. वो कुश्ती करती है. दिल्ली से अंग्रेजी में पढ़ी है. ऐसे गांव से है जहां बच्चियों को न मारा जाए उसके लिए दीवारों पर नारे अटे पड़े हैं. उसे ओलंपिक में गोल्ड जीतना है. वह एक लड़के के लट्‌टू हो जाने के लॉजिक पर नरम नहीं पड़ती. वह कहती है कि दोस्त बनोगे? और दोस्ती गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड वाली नहीं. जीवन में हर फैसले को लेकर वह बहुत क्लियर है.

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4. फिल्म में सबसे बड़ी गड़बड़ तब होती है जब आरफा एक जगह पर भावुक होकर सुल्तान की खुशी के लिए अपने सबसे बड़े सपने को छोड़ने को तैयार हो जाती है. दूसरी सबसे बड़ी गड़बड़ ये है कि जब आरफा पूछती है कि उसे लड़का चाहिए कि लड़की और वो कहता है लड़का ही होगा. लेकिन क्रेडिट्स के दौरान इन दोनों चीजों को दुरुस्त किया जाता है और इस कहानी के अंत में जबरदस्त जान आ चुकी होती है. जो लोग क्रेडिट्स आने से पहले थियेटर से निकल गए होंगे उन्होंने पूरी फिल्म मिस कर दी होगी.

5. सलमान खान की ये पहली फिल्म है जिसके लिए वे शारीरिक बदलाव करने को तैयार हुए. जो मेथड एक्टिंग का एक हिस्सा होता है. जिनसे आमिर गुजरते हैं. इसी के तहत वे ऐसे पहलवान के रूप में दिखे जिसका पेट निकला है.

6. रेस्लिंग के खेल की छवि फिल्म से कुछ हद तक अच्छी होती है. हालांकि कमर्शियल लीग को इसका अगला और मुकम्मल पड़ाव दिखाया गया है जो बहस के दायरे की बात है.

7. कि ग्रामीण परिवेश में भी प्रगतिवादी हुआ जा सकता है, महिला-पुरुष की बराबरी को स्थापित किया जा सकता सकता है.

8. कि लड़कियां शादी करने से पहले अपने करियर की सोचें, कि शादी करने के बाद भी वे अपने सपनों का पीछा करना, कामकाजी होना जारी रख सकती हैं.

फिल्म में सबसे उभरती कमी एक्शन दृश्यों में टेक्नीक की और तार्किकता की कमी की है. इसकी भरपाई बॉलीवुड के निर्देशक-निर्माता भावनात्मक एंगल पैदा करके कर देते हैं. काम तो चल जाता है लेकिन ये दीर्घकालिक उपाय नहीं है. कुछ अरसा पहले अक्षय कुमार, सिद्धार्थ मल्होत्रा की ब्रदर्स आई थी, उसमें भी यही दिक्कत थी.

अंत में: फिल्म के शुरू में लिखा आता है कि कुश्ती किसी बाहर वाले से लड़कर जीतने की नहीं बल्कि उससे भिड़ने की कला है जो भीतर है. विस्तृत मायनों में ये बहुत ही अच्छी बात है जिसे ज्यादा यथार्थपरक और औसत व्यक्तियों के किस्से के जरिए बताया जाए तो थियेटर के बाहर भी हमें बहुत मदद मिल सकती है. साथ ही इन कहानियों में हमें जीवन की उच्चतर फिलॉसफी की भी जरूरत है जो हमारे अस्तित्व के मूलभूत सवालों के जवाब दे सकें जिनके उत्तर न जानने के कारण जीवन में तमाम गड़बड़ियां होती हैं, हम में तमाम कमजोरियां आती हैं.

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