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फ़िल्म रिव्यू - एवेंजर्स : इन्फ़िनिटी वॉर

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल.
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें.

दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर.
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र.

शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल.
जंजीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हां-हां दुर्योधन! बांध इन्हें.

भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहां तू है.

बरसों पहले रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने कृष्ण की चेतावनी के रूप में ये लाइनें लिखी थीं. ‘एवेंजर्स इन्फिनिटी वॉर’ देखते हुए बार-बार इनका ख़याल आ रहा था.

थानोस उस असाध्य काम को साधने चला है जहां उसे 6 पत्थर अपनी अंगुलियों पर मणि की तरह चाहिए. वो 6 पत्थर जो हरि को भी बांध सकते हैं. पत्थर मिलते ही ये काम उसके लिए चुटकी बजाने जैसा हो जाएगा. लेकिन जब तक वो पत्थर नहीं मिलते, सब कुछ बेहद मुश्किल है. उसके इस काम को मुश्किल करने वाले लोग हैं वो तमाम सुपरहीरो जो हरि के स्वरुप को इस कदर विस्तार देते हैं कि भगवान कुपित होकर कहते हैं, “जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हां-हां दुर्योधन! बांध मुझे!”

फ़िल्म की कहानी, इसके कैरेक्टर्स और उनके बीच जो कुछ भी मसले हैं, कैसे सभी घटनाएं घटती हैं, कैसे सभी मिलते हैं, कौन मिलता है, कौन नहीं मिलता है, कौन जीता हैं, कौन मरता है – इनमें से एक भी बात यहां नहीं बताई जाएगी. एवेंजर्स: इन्फिनिटी वॉर’ फ़िल्म मार्वेल यूनिवर्स की अब तक की सबसे ताकतवर फ़िल्म है. अच्छे ह्यूमर और मॉरल स्टैंड्स लेने वाले कैरेक्टर्स के साथ भयानक इंटेंस फ़िल्म.

एक महाविलेन से लड़ने की खातिर सभी सुपरहीरो एक हो जाते हैं. मार्वेल यूनिवर्स के सबसे ज़्यादा प्यार किये जाने वाले चेहरे एक साथ देखने को मिलेंगे. शायद इसके लिए थानोस को थैंक यू भी कहा जा सकता है. (आप लोग जैसा ठीक समझें. मैं तो पहले ही कर चुका हूं.) सभी हीरोज़ मुसीबत में हैं. इसी की खातिर वो एक होते हैं. और इस मुश्किल वक़्त में इन सभी की हिम्मत कितने ही गुना और बढ़ गई है. यही हिम्मत और ताकत हमें फ़िल्म देखते वक़्त और भी ज़्यादा रोमांच से भर देती हैं. कई जगहों पर अपने आप तालियां बजती हैं और शोर उठ जाता है. बस एकमात्र समस्या ये मालूम देती है कि ‘कौन मरा’ से ज़्यादा ध्यान ‘ये भी तो नहीं मर जाएगा?’ पर चला जाता है. और हां, एक जगह ऐसी है जहां पूरे थियेटर में ‘आह!’ या ‘ओह्ह नो!’ जैसी आवाज़ सामूहिक रूप से आएगी. यकीनन ये फ़िल्म का सबसे बड़ा ‘शॉकिंग पॉइंट होगा’ लेकिन इसके ठीक बाद वही सवाल उठने लगेंगे जिनके बारे में अभी बात की.

फ़िल्म देखी जाए या न देखी जाए, इसका तो सवाल ही नहीं उठता. जवाब मालूम ही है. सवाल ये होना चाहिए कि एक बार ठीक है या एक बार और देख डाली जाए? 😉 बाकी, लोकी ने तो थानोस को समझा ही दिया था, “You can never be a God!”

और अंत में:

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े.
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे.
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!


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