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फिल्म रिव्यू: लुका छुपी

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लुका छुपी. ये फिल्म उस नए वाले ट्रेंड में फिट होगी, जिसमें छोटा शहर, मिडल क्लास फैमिली और एक टैबू इशू होता है. पिछले दिनों कई ऐसी फिल्में बन चुकी हैं और आगे कई आने वाली भी हैं. अगर उन फिल्मों के नाम लेने पर आएं, तो ‘शुद्ध देसी रोमैंस’ (लिव इन और शादी का झोल), ‘दम लगाके हइशा’ (मोटापा), ‘शुभ मंगल सावधान’ (एरेक्टाइल डिसफंक्शन), ‘बधाई हो’ (मिडल एज प्रेग्नेंसी) जैसी फिल्में आ जाएंगी. लेकिन कुछ चीज़ें ‘लुका छुपी’ में ऐसी हैं, जो उसे इन फिल्मों से अलग और कमतर बनाती है. वो फिल्में अपने आइडिया वाले लेवल पर ओरिजिनल थीं. साथ ही उसमें इन दिक्कतों की गहराई में जाकर उस समस्या को टटोलने की कोशिश की गई थी. उन फिल्मों में घट रही चीज़ें इतनी ओरिजिनल और हिटिंग थीं कि आप उसे महसूस करते हुए भी हंस रहे थे. ये चीज़ ‘लुका छुपी’ से मिसिंग है. जिस तरह का ट्रीटमेंट इस फिल्म का है, उसे देखकर साफ पता लगता है कि ये एक्सपेरिमेंटल और टैबू बेस्ड फिल्मों को सफलता की गारंटी मानकर बनाई गई है.

फिल्म की कहानी

मथुरा के दो लड़के हैं गुड्डू और अब्बास, जो एक लोकल केबल चैनल के लिए काम करते हैं. एक कैमरा हैंडल करता है और दूसरा कैमरे पर दिखता है. दूसरी ओर एक लोकल नेता है, जिसकी पार्टी लिव इन तो क्या शहर में एक साथ घूम रहे कपल्स को देखकर भी उनका मुंह काला कर देते हैं. इन नेताजी की एक बेटी है रश्मि, जो दिल्ली से मीडिया की पढ़ाई करके आई है. वो मथुरा के इस चैनल में इंटर्नशिप करना चाहती है. पहली नज़र से इनके बीच कुछ कुछ होने लगता है, जो हम और आप नहीं समझेंगे. इनके बीच प्यार हो जाता लेकिन लड़की शादी करने को राज़ी नहीं है और लड़का लिव इन में रहने को लेकर श्योर नहीं है क्योंकि वो इसे सही नहीं मानता. लेकिन जैसे-तैसे दोनों लिव इन में रहने के लिए सहमत हो जाते हैं. इसके बाद कहानी में कुछ टर्न्स एंड ट्विस्ट आते हैं और उनकी इस लिव इन का हिस्सा गुड्डू का पूरा परिवार बन जाता है. यही फिल्म का टैगलाइन जस्टिफाई होता है कि ये पहला लिव इन है, जहां सिर्फ कपल नहीं पूरा फैमिली लिव इन में रह रहा है. बात यहीं खत्म नहीं होती बल्कि यहां से शुरू होती है. रश्मि के पापा के गुस्से से बचने के लिए ये जोड़ा एक बहाना बनाता है, जो आगे चलकर बहुत बड़ा कंफ्यूज़न क्रिएट करता है और पूरी फिल्म इसे ही सुलझाने में निकलती है.

फिल्म के एक सीन में गुड्डू और रश्मि के साथ उनका पूरा परिवार.
फिल्म के एक सीन में गुड्डू और रश्मि के साथ उनका पूरा परिवार.

एक्टर्स का काम

फिल्म का लीड पेयर ऐवरेज है लेकिन सपोर्टिंग कास्ट ने बहुत कमाल तरीके से सपोर्ट किया है. विनय पाठक जो कृति के कैरेक्टर रश्मि के पिता हैं. उनके भांजे उर्फ असिस्टेंट श्रीकांत का रोल जिस एक्टर ने किया वो बहुत कमाल है. फिल्म में वैसे तो शादी के कई सीन्स हैं लेकिन जिन शादियों में विनय पाठक शामिल होते हैं, उसमें श्रीकांत का किरदार सबसे ज़्यादा एंटरटेनिंग है. इसके अलावा पंकज त्रिपाठी, अपारशक्ति खुराना, विनय पाठक और अतुल श्रीवास्तव जैसी सपोर्टिंग कास्ट है. जिसने पिक्चर को पूरी तरह से अपने कंधे पर उठाया हुआ है. पंकज त्रिपाठी ने अपने पूरे करियर में इतना हल्का किरदार कभी नहीं किया. उनके कैरेक्टर के लेंग्थ और रेलेवेंस से आप निराश होते हैं उनके काम से नहीं. कृति सैनन फिल्म के इमोशनल सीन्स में ठीक लगती हैं, वहीं कार्तिक लंबे डायलॉग्स (अपने ट्रेडमार्क) वाले सीन्स में इंप्रेस करते हैं.

ये कार्तिक आर्यन और कृति सैनन की एक साथ पहली फिल्म है.
ये कार्तिक आर्यन और कृति सैनन की एक साथ पहली फिल्म है. बावजूद इसके इनकी केमिस्ट्री इंट्रेस्टिंग है. 

फिल्म का म्यूज़िक एंटरटेनिंग होते हुए भी निराशाजनक है

म्यूज़िकली ये एक अलग तरह का लो है बॉलीवुड के लिए. हाल फिलहाल में शायद ही कोई ऐसी फिल्म आई है, जिसके साउंडट्रैक में कोई गाना ओरिजिनल नहीं हो. लुका छुपी में पांच गाने हैं और सारे के सारे रीमिक्स. ये सभी वो गाने हैं, जिनके ओरिजिनल वर्जन काफी हिट रहे थे. जो बात ऊपर कही गई थी कि फिल्म को बस इस जॉनर की सफलता को भुनाने के लिए बनाया गया है, वो फिल्म का साउंडट्रैक प्रूव करता है. जैसे आप फिल्म का रोमैंटिक गाना ‘दुनिया’ बजाएंगे, जो यूट्यूब ऑटोप्ले पर अपने आप अखिल का सुपरहिट ट्रैक ‘खाब’ बजने लगेगा. हालांकि बैकग्राउंड स्कोर प्यारा लगता है कई जगहों पर. ‘दुनिया’ गाना आप भी देखते जाइए:

दिक्कत कहां आ रही है?

सबसे पहली दिक्कत ये है कि ये फिल्म उन लोगों ने बनाई है, जिन्होंने ‘स्त्री’ जैसी सार्थक और कायदे की एंटरटेनिंग फिल्म बनाई थी. फिल्म में छोटा शहर है, टैबू इशू है, रोमैंस है, गाने हैं. लेकिन डेप्थ नहीं है. फील नहीं है. फिल्म खुद उन बातों को सीरियसली नहीं लेती, जो ये बताना चाहती है. लिव इन जैसे रेलेवेंट मसले को उठाने के लिए इसकी तारीफ की जानी चाहिए, तो उसकी डिटेलिंग नहीं करने के लिए मेकर्स को झाड़ भी लगाई जानी चाहिए. शुरुआत में कई ऐसे कॉमेडी सीन्स आते हैं, जो जबरदस्ती ठूंसे हुए लगते हैं. कुछ सीक्वेंस भी ऐसे हैं, जो फिल्म में कुछ जोड़ते नहीं बस इसकी लंबाई बढ़ाते हैं. जैसे गुड्डू के भतीजे को उसकी शादी की सच्चाई का पता लग जाना फिल्म या कहानी में कुछ सीन्स के अलावा कुछ नहीं जोड़ता. फिल्म में कतई विटी और बोलचाल की भाषा वाले डायलॉग्स हैं. लेकिन एक सीन में जहां पंकज त्रिपाठी का कैरेक्टर बाबूलाल गुड्डू और रश्मि का पीछा कर रहा होता. ये पूछने पर कि वो कहां जा रहा है, बाबूलाल कहता है यूएस. ये जबरदस्ती उस सीन में ह्यूमर डालने की कोशिश थी, जो ऑलरेडी फनी है. लेकिन उससे भी बुरा ये लगता है कि ये सब पंकज त्रिपाठी के मुंह से निकल रहा है.

ऊपर इसी पीछा करने वाले सीन की बात हो रही थी.
ऊपर इसी पीछा करने वाले सीन की बात हो रही थी.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

एक अहम मसले पर बनी इंट्रेस्टिंग लेकिन कम इंपैक्टफुल फिल्म. फिल्म देखते वक्त मज़ा खूब आएगा. हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाएंगे लेकिन ये फन लंबे समय तक संजो कर नहीं रख पाएंगे. शायद थिएटर से निकलते वक्त ही भूल जाएं. फिल्म का रिलीज़ टाइम सही है क्योंकि ये महीने की बिलकुल शुरुआत में लगी है. लोगों को पास फिल्म देखने के लिए जरूरी संसाधन होंगे. और इसे एक बार जाकर देखना भी चाहिए. क्योंकि कम से कोई तो ऐसी फिल्म है, जो एक ऐसे मुद्दे के बारे में बात कर रही है, जिसका नाम भी बहुत सारे लोग सही से नहीं ले पाते. जो हमें अनकंफर्टेबल करते हुए भी हंसने पर मजबूर कर रही है.


वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू- लुका छुपी

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