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फिल्म रिव्यू: गली बॉय

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ज़ोया अख्तर की ‘गली बॉय’ अपने पहले ही में सीन में फिल्म का सार आपके सामने परोस देती है. तब, जब आपको पता ही नहीं लगता हीरो की एंट्री कब हुई. आप स्क्रीन पर दिख रहे दूसरे किरदार पर फोकस कर रहे होते हैं और साइड में चल रहे हीरो को पहचान ही नहीं पाते. ‘गली बॉय’ यहीं से आपका अटेंशन पकड़ लेती है. फिल्म की कहानी का मूड भी यही वाला है. धारावी की तंग गलियों का गुमनाम लड़का जो आपकी बगल से गुज़र जाए और आपको फर्क न पड़े.

गल्ली से दिल्ली तक

मुंबई और महाराष्ट्र में ये फ्रेज़ बहुत चलता है. इसका लिटरली ये मतलब नहीं है कि किसी की शोहरत दिल्ली शहर तक पहुंचे. बल्कि छोटी जगह से निकल कर दुनिया पर छा जाने का मेटाफर है ये. एशिया के सबसे बड़े स्लम धारावी में रहता है मुराद. धारावी है तो घनघोर गरीबी भी होनी ही है. घर का साइज़ लगभग उतना ही है जितनी जगह पर एक लिमोज़िन खड़ी हो सके. पिता ने बुढापे में दूसरी शादी रचा ली है. बाप-बेटे एक दूसरे से नाखुश रहते हैं.

विजय राज संजीदा रोल में बढ़िया काम कर गए हैं.
विजय राज संजीदा रोल में बढ़िया काम कर गए हैं.

बाप के ताने, मां के साथ हुई नाइंसाफी मुराद के भीतर अंगारे भरती रहती है. उसे तलाश है किसी ऐसे ज़रिए की जो उसका फ्रस्ट्रेशन बहा दे. उसके अंदर जो लावा उबल रहा है उसे बाहर आने का रास्ता दे. मुराद लिखता है. जो सूझता है वो सब. फिर एक दिन उसे रैपर एमसी शेर परफॉर्म करता नज़र आता है और मुराद को जैसे अपना एस्केप रूट मिल जाता है. आगे की कहानी कुछ प्रेडिक्टेबल है लेकिन उसका प्रेज़ेंटेशन आपको निराश नहीं करता.

रैप का आक्रोश

जब अमेरिका में रैप म्युज़िक का आगाज़ हुआ था तो उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि वो दुनियाभर की दबी-कुचली आवाज़ों को कितना बड़ा टूल दे रहे हैं. भोगा हुआ यथार्थ अपने पूरे रॉ फॉर्म में पेश करने की जैसी छूट रैप में हासिल है, वो कविताई के किसी और फॉर्म में नहीं. भारत में रैप अभी मेन स्ट्रीम में इतना नहीं है लेकिन उम्मीद है इस फिल्म के बाद आ जाएगा. ‘गली बॉय’ के कितने ही गाने ऐसे हैं जिनके शब्द और उनमें छिपा आक्रोश आपको चमत्कृत कर देता है. ‘अपना टाइम आएगा’, ‘आज़ादी’, ‘दूरी’, और ‘जिंगोस्तान’ जैसे रैप गाने खुरदरे हैं, चुभते हैं और ऐन इसीलिए बेहद भले लगते हैं. असल में तो इसके अल्बम पर अलग से बात होनी चाहिए.

गली बॉय में 18 गाने हैं.
गली बॉय में 18 गाने हैं.

सब हार्ड हैं बॉस

अदाकारी में लगभग सभी इक्कीस हैं. रणवीर का कंट्रोल्ड एग्रेशन कमाल का है. वो चीखने की जगह देहबोली से एक्ट कर रहे हैं और वो परदे पर प्रभावी दिखता है. एक सीन है. जब एक शादी में सिक्योरिटी वाला मुराद को महफ़िल से बाहर जाने को बोलता है. अपमानित मुराद कार में बैठकर अपना लिखा गाना ज़ोर-ज़ोर से गाता है. बेबसी और चिढ़ का मिलाजुला उबाल आपको हैरान कर देगा. रणवीर बिलाशक टॉप फॉर्म में हैं आजकल. इस रोल के लिए जो एनर्जी लेवल चाहिए था उससे सिर्फ रणवीर का प्रोफाइल ही मैच कर सकता था. क्लाइमैक्स सीन में तो महफ़िल ही लूट लेते हैं.

आलिया भट्ट सबको पसंद आएंगी इसकी गारंटी है. हिजाब में लिपटी और अपने हक के लिए लड़-भिड़ जाने के जज़्बे से भरी सफीना को उन्होंने ग़ज़ब कॉन्फिडेंस के साथ निभाया है. सफीना मुराद की ज़िंदगी का मोटिवेशन पॉइंट है पर वो बस इतनी ही नहीं है. उसका अपना एक वजूद है. रैप और रैपर्स की बात करती इस फिल्म में उनके किरदार को इतना सशक्त दिखाने के लिए ज़ोया अख्तर को अलग से मार्क्स देने पड़ेंगे.

आलिया ने मुम्बईया लहजा बड़ी सफाई से पकड़ा है. उनकी रणवीर के साथ केमिस्ट्री आंखों को भली लगती है.

आलिया ने मुम्बईया बोली मस्त बोली है.
आलिया ने मुम्बईया बोली मस्त बोली है.

सबसे ज्यादा चौंकाते हैं सिद्धांत चतुर्वेदी. जिन लोगों ने इनसाइड एज वेब सीरीज़ देखी होगी वो और ज्यादा चौकेंगे. उसमें एक दब्बू लड़के का किरदार निभा चुके सिद्धांत ‘गली बॉय’ में इन योर फेस वाले एटीट्यूड के साथ हैं. वो बिल्कुल असली रैपर लगते हैं, वैसे ही जैसे इनसाइड एज में फास्ट बॉलर लगे थे. कई बार तो वो फ्रेम में मौजूद रणवीर पर भारी पड़ते दिखाई दिए. ख़ास तौर से उस सीन में जब वो रणवीर से पूछते हैं, ‘सब कम्फर्टेबल होते तो रैप कौन करता?”

विजय राज, अमृता सुभाष, कल्कि कोचलिन, विजय वर्मा सबने अपने हिस्से आया काम शानदार ढंग से किया है. विजय राज कॉमेडी वाले अपने जाने-पहचाने टर्फ से हटकर संजीदा रोल में हैं. अच्छे लगे हैं. अमृता सुभाष उन अभिनेत्रियों में से एक हैं, जिन्हें काम सौंपकर आप निश्चिंत हो सकते हैं कि सही से होगा. विजय वर्मा का ट्रैक छोटा है लेकिन दमदार है. दरअसल उनका कैरेक्टर बेहद रियल लगता है. एक ऐसा शख्स, जो किन्हीं ख़ास हालात में विलेन होता है तो कभी हीरो. हमारी असली दुनिया में ऐसे ही लोग बसते हैं. कल्कि कोचलिन धारावी वाली गरीबी की दूसरी साइड कामयाबी से पेश करती हैं.

ये उन चुनिंदा फिल्मों में से एक होगी जहां हर एक कैरेक्टर पूरे रिदम में दिखाई पड़ता है.

रणवीर का एग्रेशन बातों में कम, आंखों में ज़्यादा दिखता है.
रणवीर का एग्रेशन बातों में कम, आंखों में ज़्यादा दिखता है.

मुम्बईया भाषा का जलवा

ज़ोया अख्तर की डिटेलिंग की ख़ास तारीफ़ करनी होगी. फिल्म के किरदार जो भाषा बोलते हैं वो कन्विंसिंग लगती है. कोयता, धोपटूंगी जैसे शब्द वही शख्स बोल सकता है जो मराठी-मिश्रित हिंदी बोलने का आदी हो. ‘गली बॉय’ की मुम्बईया भाषा आएला-गएला और येड़े जैसे शब्दों तक सीमित नहीं है ये बहुत बड़ा प्लस है. विजय मौर्या के डायलॉग्स का ख़ास ज़िक्र होना चाहिए. ‘जब सपना सच्चाई से मेल न खाए तो सपना नहीं सच्चाई बदलो’ जैसे संवाद गूज़बंप्स देने की ताकत रखते हैं. ज़ोया अख्तर की मेहनत दिखती भी है और आप तक पहुंचती भी है.

फिल्म न सिर्फ एक नोबडी लड़के का संघर्ष दिखाती है बल्कि कुछेक और मुद्दों पर भी नज़र मारती है. जैसे श्रेणीवाद. श्रेष्ठतावाद. बेटे के रैप सिंगर बनने से बाप खफा है. एक महिला रिश्तेदार सलाह देती हैं, ‘गाना ही है, तो ग़ज़ल गा ले’. 

ये फिल्म रियल लाइफ रैपर डिवाइन और नेज़ी की ज़िंदगी पर बनी है. इनका फिल्म के म्युज़िक में भी बड़ा योगदान है. शायद ये पहली ऐसी हिंदी फिल्म होगी जिसके सिंगल गानों में एक से ज़्यादा कम्पोज़र्स हैं. सबका काम बढ़िया है.

कुल मिलाकर टीम ‘गली बॉय’ के लिए कहना ही पड़ेगा कि इनका टाइम आ गया है.

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