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फिल्म रिव्यू- क्लास ऑफ 83

साल 1981. मुंबई पुलिस का एक ऑफिसर है विजय सिंह. उसे लगता है कि पुलिस फोर्स उसके टैलेंट के साथ न्याय नहीं कर पा रही है. इसलिए वो मुंबई को क्राइम मुक्त बनाने के लिए अपने हिसाब से काम करने लगता है. इसकी सज़ा के तौर पर उसे पुलिसिया सर्विस से हटाकर नासिक पुलिस अकैडमी का डीन बना दिया जाता है. अकैडमी के कोर्स में विजय हेरफेर कर ट्रेनी पुलिसवालों को थिअरी की बजाय प्रैक्टिल ट्रेनिंग देना शुरू कर देता है. 1983 यानी अपने पहले बैच से वो पांच ऐसे स्टुडेंट्स को चुनता है, जिनके नंबर्स क्लास में सबसे कम हैं. इन लड़कों में उसे अपना अक्स नज़र आता है. क्योंकि वो लड़के किसी की ऊंगली के नीचे रहना या अपने उसूलों से समझौता करने को तैयार नहीं हैं. ट्रेनिंग के बाद डीन विजय सिंह इन्हें एक मिशन के लिए चुनता है. कालसेकर गैंग को खत्म करने का मिशन, जिसने मुंबई में तबाही मचाई हुई है. लेकिन गुज़रते समय के साथ ये पांचों लड़के पुलिस फोर्स की ही सिरदर्दी बन जाते हैं. अब विजय उन्हें कैसे रास्ते पर लाता है, फिल्म ‘क्लास ऑफ 83’ इस बारे में बिलकुल नहीं है.

पुलिस अकैडमी में लड़को को पढ़ाते पुलिस टर्न्ड डीन विजय सिंह.
पुलिस अकैडमी में लड़को को पढ़ाते पुलिस टर्न्ड डीन विजय सिंह.

फिल्म में डीन विजय सिंह का रोल बॉबी देओल ने किया है. बॉबी लंबे समय बाद किसी ढंग के किरदार में नज़र आए हैं, जहां वाकई उनके करने के लिए कुछ था. लेकिन ये फिल्म उनकी कहानी नहीं है. इसलिए सारा फोकस भी उनके ऊपर नहीं है. मगर हीरो बनने की ख्वाहिश छोड़ इस तरह का किरदार चुनना, उनका बदला हुआ माइंडसेट दर्शाता है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मनोहर पाटकर के रोल में हैं क्राइम पैट्रोल वाले अनूप सोनी. अनूप फिल्म के बमुश्किल चार-पांच सीन्स में नज़र आते हैं और उनका किरदार कहीं फिल्म के लिए बेहद ज़रूरी होने जैसा भाव पैदा नहीं कर पाता. ये फिल्म है मुंबई और विजय के अंडर में ट्रेनिंग पाए पांच लड़कों असलम, शुक्ला, सुरवे, वरदे और जाधव के बारे में. लेकिन कहानी का बड़ा हिस्सा विष्णु वरदे (हितेश भोजराज) और प्रमोद शुक्ला (भूपेंद्र जड़ावत) की आपसी रंजिश को डेडिकेटेड है. इन पांचों लड़कों की परफॉरमेंस चौंकाने से ज़्यादा संतुष्ट करती है. इसमें सबसे बड़ा योगदान है इनकी आपसी केमिस्ट्री का, जो फिल्मी नहीं लगती.

विजय सिंह के शागिर्द, जो अब उनका सिरदर्द बन चुके हैं. माइनस असलम.
विजय सिंह के शागिर्द, जो अब उनका सिरदर्द बन चुके हैं. माइनस असलम.

आम तौर हिंदी फिल्मों में गैंगस्टर्स को अजीबोगरीब शौक पालने वाले बेहूदा और बद्तमीज़ इंसान के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन ये फिल्म उन्हें एक आम इंसान की तरह ट्रीट करती है, जो गलत धंधा करता है. फिल्म के एक सीन में वरदे, कालसेकर के खास आदमी इस्माइल पठान को मारने जाता है. जहां वरदे अपनी वर्दी की अकड़ में होता है, वही इस्माइल उससे बेहद संजीदगी से बात करता है. इससे ठीक पहले वाले सीन में सुरवे का किरदार जैसे इस्माइल पर नज़र रखने जाता है, वो भी देखने में नया और आकर्षक लगता है.

इस्माइल पर नज़र रखने के लिए सुरवे अचानक से भिखारी में तब्दील हो जाता है. शानदार मोमेंट. फिल्म में जनार्दन सुरवे का किरदार पृत्विक प्रताप ने निभाया है.
इस्माइल पर नज़र रखने के लिए सुरवे अचानक से भिखारी में तब्दील हो जाता है. शानदार मोमेंट. फिल्म में जनार्दन सुरवे का किरदार पृत्विक प्रताप ने निभाया है.

‘क्लास ऑफ 83’ चाहती तो है कि गैंगस्टर्स और पुलिसवालों की कहानी बैलेंस करके दिखाए. मतलब वो क्रिमिनल्स या उनकी मदद करने वाले भ्रष्ट नेताओं को तो गलत मानती है. साथ ही ऐसा दिखाने की कोशिश करती है कि न्याय तंत्र से इतर जाकर पुलिस जो कर रही है, वो भी कहीं न कहीं गलत है. मगर ये बात खुलकर नहीं कहती और यही चीज़ फिल्म के खिलाफ जाती है. तिस पर उसे जस्टिफाई करने के लिए-

‘कभी कभी ऑर्डर बनाए रखने के लिए, लॉ को बलि चढ़ाना पड़ता है.’

ऐसी डायलॉगनुमा बातें कहती हैं. अगर आप इसे सिनेमा की तरह देखेंगे, तो आपको मज़ा आएगा. 80 के दशक की कहानी दिखा रही ये फिल्म हमारी सोच को आगे बढ़ाने की बजाय, उसे 35 साल पीछे ढकेल रही है. उदाहरण के तौर पर कुछ समय पहले रिलीज़ हुई ‘गुंजन सक्सेना’ को ही देख लीजिए. इस फिल्म की तथ्यात्मक त्रुटियों पर बहस हो सकती है. हो रही है. मगर जब आप सोचेंगे कि वो फिल्म कहना क्या चाहती थी, तो आपके सारे सवाल उस जवाब के नीचे दब जाएंगे. हमारे कहने का मतलब ये कि सारा खेल फिल्म बनाने के पीछे की नियत का है. जो ‘क्लास ऑप 83’ के मामले में साफ नहीं लगती.

मुख्यमंत्री मनोहर पाटकर के नेगेटिव शेड लिए हुए अधपके और अनमने ढंग से निभाए किरदार में अनूप सोनी.
मुख्यमंत्री मनोहर पाटकर के नेगेटिव शेड लिए हुए अधपके और अनमने ढंग से निभाए किरदार में अनूप सोनी.

डेढ़ घंटे की इस फिल्म में दूसरी खलने वाली बात इसकी डिटेलिंग है. हमें बताया जाता है कि डीन विजय सिंह ने उन पांच लड़कों को पुलिस फोर्स के हर दांव-पेच की ट्रेनिंग दे दी. लेकिन वो प्रोसेस हमें कहीं नहीं दिखता. इक्का-दुक्का सीन्स में हमें विजय सिंह का ठग लाइफ मोमेंट दिखाकर फिल्म आगे बढ़ जाती है. आपको भी लगता है कि यार ये क्या आदमी है, इसके ट्रेन किए हुए लड़के तो बाजा फाड़ देंगे. भ्रष्टाचार, प्रशासन, दोस्ती, उसूल और ज़िम्मेदारी जैसे भारी-भरकम शब्दों के सामने तर्क जैसा छोटा-क्यूट सा शब्द पानी भरता नज़र आता है. लेकिन दर्शक प्यासा रह जाता है.

अपने ही बालकों के हाथों मजबूर विजय सिंह. 'रेस' में पीछे छूटने के बाद बॉबी देओल की मजबूत वापसी.
अपने ही बालकों के हाथों मजबूर विजय सिंह. ‘रेस’ में पीछे छूटने के बाद बॉबी देओल की मजबूत वापसी.

कुल जमा बात ये है कि ‘क्लास ऑफ 83’ की कहानी नई हो सकती है लेकिन ये देश में पहले बन चुकी पुलिसिला फिल्मों से ही प्रेरित लगती है. आप फिल्म को देखने बैठते हैं, तो फिल्म के साथ होने में ज़्यादा समय नहीं लगता. मगर आप ये तय नहीं कर पाते कि आपको किस पाले में खड़ा होना है. आप हीरो या विलन चुन नहीं पाते. ये कंफ्यूज़न आपको पूरी फिल्म में बना रहता है. कुछ भी करके फिल्म आपको एंटरटेन करना चाहती है और करती है. लेकिन ये खतरनाक मनोरंजन है.

एस. हुसैन ज़ैदी की किताब पर बेस्ड अतुल सभरवाल डायरेक्टेड फिल्म ‘क्लास ऑफ 83’ नेटफ्लिक्स पर देखी जा सकती है.

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