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फिल्म रिव्यू- कार्गो

कभी भी कुछ भी हमेशा के लिए नहीं खत्म होता है
कहीं न कहीं, कुछ न कुछ तो बच ही जाता है, हमेशा.

फिल्म ‘कार्गो’ अपने इस कहे को सिनेमाई तरीके से साकार करती है. साल है 2027. मनुष्यों और राक्षसों की आपसी रंज़िश को कम करने के लिए एक समझौता हुआ है. अब ये लोग लड़ने की बजाय एक साथ मिलकर साइंस से जुड़ी चीज़ें कर रहे हैं. इसमें पृथ्वी पर मर चुके लोगों को पुनर्जन्म दिलवाना इनका सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है. पोस्ट डेथ ट्रांजिशन सर्विसेज़. इस काम के लिए स्पेस में बहुत सारे विमान छोड़े गए हैं. इन स्पेसक्राफ्ट्स के नाम हैं पुष्पक. हमें ऐसे ही एक- पुष्पक 634A की कहानी दिखाई जाती है, जिस पर प्रहस्थ नाम का एक राक्षस लंबे समय से काम कर रहा है. धरती पर मर चुके जिन लोगों को पुष्पक भेजा जाता है, उन्हें फिल्म में ‘कार्गो’ बुलाया गया है. प्रहस्थ इन कार्गो लोगों के दुख-दर्द दूर करता है, उनकी याद्दाश्त मिटाता है और उन्हें वापस पृथ्वी पर भेज देता है. पृथ्वी पर बैठा प्रहस्थ का हैंडलर नीतिज्ञ उसकी मदद के लिए युविष्का नाम की असिस्टेंट भेजता है. ज़ाहिर तौर पर एक लंबा समय अकेले गुज़ार चुका प्रहस्थ एकाकीपन का आदी हो चुका है. उसे युविष्का का आना नहीं भाता है. मगर आगे दोनों के संबंध सामान्य होने के साथ कई और चीज़ें घटती हैं, जिसके बारे में विस्तार से जानने के लिए नेटफ्लिक्स पर आपको ‘कार्गो’ देखनी पड़ेगी.

पुष्पक 634A में रोज सुबह धरती से भेजे गए लोग पहुंचते हैं, वहां उन्हें ठीक-ठाक कर वापस धरती पर भेज दिया जाता है.
पुष्पक 634A में रोज सुबह धरती से भेजे गए लोग पहुंचते हैं, वहां उन्हें ठीक-ठाक कर वापस धरती पर भेज दिया जाता है.

फिल्म में प्रहस्थ का रोल किया है विक्रांत मेसी ने. ये किरदार 75 साल से पुष्पक में काम कर रहा है. वो रोज सुबह उठता है, मरे हुए लोगों को पुनर्जन्म दिलाता है और सो जाता है. वो राक्षस है, इसलिए उसके पास एक सुपरपावर भी है. वो किसी भी चीज़ को बिना छूए उठाकर फेंक सकता है. विक्रांत में अंडरप्ले वाली चीज़ दिखती है. प्रहस्थ भी हर तरह के भाव महसूस करता है. वो गुस्सा होता है, चिढ़ता है, खुश होता है, निराश होता है. ये सारे भाव आपको विक्रांत के चेहरे पर खुलकर नहीं दिखते. लेकिन आप महसूस कर लेते हैं. श्वेता त्रिपाठी ने प्रहस्थ की असिस्टेंट युविष्का का रोल किया है. श्वेता के साथ वो हीरोइन वाला टैग चस्पा होकर नहीं आता. वो एक आम लड़की जैसी लगती हैं. इसलिए उन्हें किसी भी रोल में देखना नया और विश्वासजनक लगता है. मगर ‘कार्गो’ में ठीक-ठाक स्क्रीनटाइम होने के बावजूद, उनका कैरेक्टर थोड़ा अधपका सा लगता है. नीतिज्ञ का रोल किया है मराठी एक्टर नंदु माधव ने.

प्रहस्थ. लंबा समय स्पेस में अकेले गुज़ार चुका एक शख्स, जिसकी रोजमर्रा की ज़िंदगी में अचानक एक दिन खलल पड़ जाती है.
प्रहस्थ. लंबा समय स्पेस में अकेले गुज़ार चुका एक शख्स, जिसकी रोजमर्रा की ज़िंदगी में अचानक एक दिन खलल पड़ जाती है.

‘कार्गो’ की खास बात ये है कि ये समय में पीछे जाकर मायथोलॉजी से चीज़ें उठाकर लाती है. और इसे भविष्य के साथ जोड़कर एक दिलचस्प और प्रयोगधर्मी सिनेमा बनाती है. फिल्म में स्पेसक्राफ्ट का नाम पुष्पक है, जो कि रावण के पुष्पक विमान से प्रेरित है. पुष्पक में काम करने वाले शख्स का नाम प्रहस्थ है, जो कि रावण के सेनापति का नाम था. और भी बहुत सारे रेफरेंस होंगे, शायद मैं पिक नहीं कर पाया. मरने के बाद लोग कहां जाते हैं या लोगों को क्या होता है, ये फिल्म उसका जवाब नहीं देती. क्योंकि ज़ाहिर तौर पर वो किसी को पता नहीं. मगर एक ऐसी बात बताती है, जो बहुत रियलिस्टिक नहीं होते हुए भी, भरोसा कर लिए जाने लायक लगता है. आरती कदव की ये फिल्म जिस माहौल में घटती है, वो आउट ऑफ द वर्ल्ड (स्पेस) होते हुए भी बहुत बेसिक और जमीनी है. जितनी भी मशीन आपको फिल्म में दिखेगी, वो इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि खराब होने लगी हैं. इसलिए ये फिल्म दिखने में मॉडर्न नहीं मगर थॉट और कॉन्सेप्ट के लेवल पर ये काफी हटके हो जाती है.

युविष्का. कॉलेज टॉपर राक्षसी, जो एग्जिस्टेंशियल क्राइसिस से जूझती रहती है.
युविष्का. कॉलेज टॉपर राक्षसी, जो एग्जिस्टेंशियल क्राइसिस से जूझती रहती है.

फिल्म में एक सीन है, जहां पुनर्जन्म पा चुके लोगों की पर्सनल चीज़ें प्रहस्थ फेंक रहा है. ये बड़ा सिंपल सीन है कि लोगों के कपड़े, पैसे, गहने या जो कुछ भी मरने के बाद अपने साथ लेकर आए थे वो फेंका जा रहा है. उसे फेंकते समय प्रहस्थ कहता है- ‘डिस्कार्डिंग वेस्ट’. इसके बाद स्क्रीन पर एक अजीब सा सन्नाटा पसर जाता है. मानों कह रहा हो कि तुमने जो कमाने-बनाने में जीवन निकाल दिया, वो किसी काम का नहीं हैं. ‘कचरा’ है. फिल्म का एक सिरा लोगों के अकेलेपन पर भी पहुंचता है. चाहे वो टीवी पर रामचंद्र का ऐड हो या स्पेस में प्रहस्थ के एकाकीपन का भंग होना. ऐसी और भी बहुत सी बातें हमारे सामने उठाई जाती हैं, जिन्हें हम आम जीवन में बहुत गंभीरता से नहीं लेते. मगर हर वो बात जो सुनाई दे, वो समझ आ जाए, ये ज़रूरी नहीं होता. फिल्म शायद अन्य शब्दों में, मेटाफर्स में कुछ और भी कहना चाहती थी, मगर वो बहुत स्पष्ट नहीं हो पाया.

पुरानी पड़ चुकीं मशीनें और छोटी टीवी पर नज़र आ रहे प्रहस्थ और युविष्का के हैंडलर नीतिज्ञ.
पुरानी पड़ चुकीं मशीनें और छोटी टीवी पर नज़र आ रहे प्रहस्थ और युविष्का के हैंडलर नीतिज्ञ.

‘कार्गो’ देखने के मेरा अनुभव काफी फ्रेश और नया रहा. ये एक ऐसा एक्सपेरिमेंट था, जिसे सफल मान लेना चाहिए. ये परफेक्ट फिल्म नहीं है. इसकी भी अपनी खामियां हैं. इससे सबसे बड़ी शिकायत ये रहती है कि इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी है. मगर धीरे-धीरे ही सही पर ये हिंदी सिनेमा को आगे लेकर जाती है. ये फिल्म हमें देखनी चाहिए. लोगों को दिखानी चाहिए. ताकि कुछ नया करने की चाह रखने वाले फिल्ममेकर्स तक हमारी बात पहुंचे. जिससे हमें नया कॉन्टेंट मिले और फिल्ममेकर्स को हिम्मत.


वीडियो रिव्यू- 

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