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फ़िल्म रिव्यू : बेग़म जान

फ़िल्म आनी थी. सो आ गई. बेग़म जान. फ़िल्म में है विद्या बालन. इन्हीं के आस पास सब कुछ घूम रहा होता है. और साथ में कुछ और भी लोग हैं. आशीष विद्यार्थी, रजित कपूर और कुछ मिनट के लिए नसीरुद्दीन शाह.

दुनिया में बहुत कुछ है. जानवर हैं. पहाड़ हैं. ज़मीन है. आसमान है. पेड़ हैं. पेड़ों पर पत्तियां हैं. लकड़ी है. कूलर है. पंखा है. बैग है. बीन बैग है. इंसान है. गलती करने वाला इंसान है. और ऐसे ही एक गलती करने वाले इंसान से एक गलती हो गई – बेग़म जान.

मुझे यकीन है कि हर फ़िल्म बनाने वाला एक सेकंड ओपिनियन लेता होगा. माने, अपन ने खुद कभी नहीं बनाई है इसलिए अपने को आईडिया कम है, लेकिन  लेता तो होगा ही. मैं इस फ़िल्म का असली दोषी उस सेकंड ओपिनियन में हां कहने वाले आदमी को मानता हूं. डायरेक्टर श्रीजीत मुखर्जी को चाहिए कि वो उस इंसान से सारे रिश्ते तोड़ लें. वो चाहे कोई भी हो. उसने आपके साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया है.

इस फ़िल्म को देखते हुए आप कई जगहों पर हो आते हैं. आप उन सभी बातों को याद कर लेते हैं जिन्हें अब याद करना आपके लिए पाप करने समान है, क्यूंकि वो आपको शर्म से भर देती हैं. वो आपको ये सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि उस वक़्त आप कितने बड़े बेवकूफ़ थे. आप खुद की पीठ थपथपाते हैं कि अब आप वैसे नहीं हैं और साथ ही चार्ल्स डार्विन को थैंक यू कहते हैं. ह्यूमेन एवोल्यूशन के लिए. हालांकि उन्हें थैंक्स कहने की कोई ज़रूरत नहीं होती, आदमी डार्विन के पहले भी इवॉल्व हो रहा था.

इंसानों ने जो बड़ी गलतियां की हैं वो हैं:

1. पिज़्ज़ा पर पाइन-ऐप्पल की टॉपिंग लगाई.

2. डोनाल्ड ट्रंप को अमरीका का प्रेसिडेंट बना दिया.

3. घरवालों को व्हाट्सैप्प पर फैमिली ग्रुप बनाना सिखा दिया.

4. टट्टी करने के बाद धोने की बजाय काग़ज़ इस्तेमाल किया.

5. बेग़म जान बनाई.

vidya hukkah

ये फ़िल्म असल में फ़िल्म नहीं, मॉरल साइंस की क्लास है. अडल्ट्स लोगों की मॉरल साइंस की क्लास. क्यूंकि इसमें गालियां हैं. सेक्स करती हुई रंडियां हैं. वो शब्द हैं जिनके फिल्मों में आने पर घरवालों के कां खड़े हो जाते हैं. और ऐसे सीन हैं जिनके आने की आशंका पर टीवी के सामने बैठे किसी बड़े आदमी को अचानक ही प्यास लग आती है और वो सबसे छोटे बच्चे को पानी लाने भेज देता है. सीन खतम होते ही कोई दूसरा इंसान कहता है, “आज थोड़ी गरमी ज़्यादा है या हमको ही लग रही है?” इसमें रंडियां हैं जो गालियां देती हैं. मादर** को मादर** कहती हैं. (सेंसरशिप है भाई. खुद समझो. यही तो सेंसरबोर्ड कहता है.) और इन सबके साथ फ़िल्म के डायरेक्टर हैं जिन्हें कुछ ज़्यादा ही ज्ञान बांटने का जूनून सवार था. ये फ़िल्म एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी से दबी हुई थी. ज़िम्मेदारी ये कि “ससुर तुम्हें कुछ नहीं मालूम, हम तुम्हें बतायेंगे औरतें कितनी बलवान होती हैं.”

ये बात सच है कि आज के वक़्त में औरतों से जुड़े इश्यूज़ के बारे में जितनी बात की जाए, कम मालूम पड़ रही है लेकिन अपने मकसद के साथ ये फ़िल्म जस्टिफ़ाई करने में उतनी ही समर्थ रही है जितना समर्थ पार्थिव पटेल इंडियन टीम में अपनी जगह पक्की करने में रहा है. बल्कि मैं तो कहता हूं कि अगर पार्थिव पटेल कीपिंग की बजाय शूटिंग करता तो बेहतर फ़िल्म बनाता. इश्यूज़ को अड्रेस पिंक में भी किया गया था. इंग्लिश विन्ग्लिश में भी. लेकिन “दिस इज़ समथिंग टोटली एल्स, मेट!”

chunky pandey

बेग़म जान को समझना है तो यूं समझिये जैसे 2007 का 50 ओवर वाला क्रिकेट वर्ल्ड कप. जैसे अमरीका का विएतनाम वॉर. जैसे पर्ल हार्बर. जैसे क्रिकेट वर्ल्ड कप में पाकिस्तान की इंडिया के खिलाफ़ परफॉरमेंस. जैसे 2014 चुनाव में अमेठी में कुमार विश्वास का प्रदर्शन. जैसे राहुल गांधी के भाषण. “जैसे मंदिर में हो इक जलता दिया..” आखिर में थोड़ा भटक गए न? बिलकुल ऐसा ही फ़िल्म में होता है. श्रीजीत मुखर्जी भटक जाते हैं. फ़िल्म की शुरुआत में ही. फ़िल्म खतम हो जाती है और वो ऐप्पल मैप पर लोकेशन ढूंढते रहते हैं. जिन्हें नहीं मालूम है उन्हें बता दें कि आधा साउथ मुंबई ऐप्पल मैप में समंदर के अन्दर दिखाता था. शायद ऐप्पल मैप देखकर ही गाना लिखा गया था, “जाते थे जापान, पहुंच गए चीन, समझ गए न?”


खैर, फ़िल्म में कुछ जगहें ऐसी हैं जहां आप नंगे हो जाते हैं. आपकी सारी असलियत सामने आ जाती है. उस वक़्त आप अपने अगल बगल देखने लगते हैं और सोचते हैं कि कहीं कोई आपको देख तो नहीं रहा है. आपकी वो बातें जिनसे आप इतने समय से लड़ते हुए आ रहे हैं, आपके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं. और आप खुद को एक बेहद घिनौना इंसान पाते हैं. ये सचमुच बहुत ही झकझोर देने वाले मोमेंट्स हैं. लेकिन वो गिनती के हैं. सिर्फ़ उनके लिए एक ‘न जाने कैसी’ फिल्म बना देना ठीक प्लान नहीं साउंड करता. हालांकि रोका किसी ने नहीं है. बस अपनी शाम खराब होती है तो बुरा लगता है.


 

ये फ़िल्म एक समय पर काग़ज़ों पर होगी. उसे वहीं रोक दिया जाता तो मज़ा आ जाता. कहानी के लिहाज़ से बेहतरीन है. प्लॉट और  आइडिया वगैरह मस्त हैं. लेकिन स्क्रीन पर सब कुछ मज़ाक लगता है. भारी शरीर के साथ तेज़ चलती विद्या बालन जहां ‘कहानी’ में बांध लेती हैं वहीं इसमें बनावटी लगती हैं. मन करता है कह दें, “जाओ न यार. किसको सल्फ़ेट बना रही हो?” फ़िल्म प्रीची है. इतनी कि उबकाई आती है. ये एक स्कूल प्रोजेक्ट जैसा है. उस लेवल पर टीचर वाह-वाह कहता है. लेकिन असल में वो उतना इम्पैक्टफुल नहीं होता. ये जेएनयू के एक स्टूडेंट की उस थीसिस की तरह है जिसका आइडिया तो कमाल का है लेकिन उसकी थीसिस में मसाला इतना कम है कि वो रिजेक्ट ही हुआ करती है.


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