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फिल्म रिव्यूः अंग्रेजी में कहते हैं...

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सिनेमा का नाम है ‘अंग्रेज़ी में कहते हैं…’. और अंग्रेज़ी में जो कहना है, वो है ‘आई लव यू.’ लेकिन दिक्कत ये है कि कहना अपनी मिसेज को है. अब आपको लग रहा होगा कि जब मिसेज बन ही चुकी हैं, तो ये बात कहनी क्यों है? तो ये फिल्म इसी के बारे में है.

ये फिल्म है एक मैरिड कपल के बारे में. माफ करियेगा एक नहीं, उनके जैसे हज़ारों-लाखों कपल्स के बारे में, जो शादी के बाद इस कहे का मतलब भूल जाते हैं. और शादी को नाम दे दिया जाता है ‘निभाना’. ये जोड़ा – यानी यशवंत और किरण (संजय मिश्रा और एकावली खन्ना) – पिछले 24 साल से निभाओ-निभाओ वाला गेम खेल रहा है. फिल्म के एक सीन में पतिदेव अपनी धर्मपत्नी से कहते हैं “तुम घर संभालती हो, मैं ऑफिस जाता हूं. इसी को कहते हैं शादी”. लेकिन पत्नी को शादी की इस वाली परिभाषा से दिक्कत है. FYI माने फ़ॉर योर इन्फॉर्मेशन – प्यार का मतलब सिर्फ सेक्स ही नहीं होता है. नियमित अंतराल पर एक-दूसरे से अंग्रेज़ी में ‘आई लव यू’ कहना और महसूस करवाना भी होता है.

फिल्म में सिनेमाटोग्राफी बहुत कमाल की है, इसके कर्ता-धर्ता माने सिनेमैटोग्राफर हैं फारुख मिस्त्री.
फिल्म में सिनेमाटोग्राफी बहुत कमाल की है और इसके कर्ता-धर्ता माने सिनेमैटोग्राफर हैं फारुख मिस्त्री.

यशवंत एक पति है, ठीक वैसा ही, जैसा ‘तुन वेड्स मनु रिटर्न्स’ में तनुजा त्रिवेदी ने बताया था. मतलब नीरस और अकड़ू. पत्नी उनके लिए सिर्फ खाने का डिब्बा तैयार करने, शराब के लिए बर्फ जमाने और घर संभालने वाली एक महिला हैं. वो जिसके पास रहते हैं, साथ नहीं. दोनों की एक बच्ची है. अब वो बड़ी हो गई है. प्यार में भी पड़ गई है. इसलिए चीज़ें समझती है. मम्मी को समझती है, पापा को समझाती है. लेकिन सुनता कोई नहीं है. फिर वो एक बम फोड़ती है और पापा को प्यार का मतलब समझाती है. थोड़ा-बहुत हो हल्ला होता है और मामला बढ़ जाता है. पति-पत्नी अलग हो जाते हैं. असली फिल्म इसके बाद शुरू होती है.

शिवानी हाल ही में 'जुत्ती' नाम की एक शॉर्ट फिल्म में दिखाई दी थीं.
शिवानी हाल ही में ‘जुत्ती’ नाम की एक शॉर्ट फिल्म में दिखाई दी थीं.

पत्नी के जाने के बाद यशवंत को उसकी कद्र समझ आती है. इसमें उसकी मदद करते हैं पंकज त्रिपाठी उर्फ फिरोज़. पंकज का किरदार छोटा सा है लेकिन फिल्म का क्रक्स वही है. वो आदमी जो कहता है, इतनी ईमानदारी से कहता है कि आप मानने को मजबूर हो जाते हैं. एकदम शांत आंखों से. फिरोज़ के साथ एक घटना होती है और यशवंत बत्रा में सुधार के लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं. अब वो भी प्रेम को उसी तरह समझना चाहते हैं, जैसे फिरोज ने समझा है. जतन होने लगता है पत्नी को वापस लाने के लिए. इस दौरान एक अधेड़ उम्र के आदमी को बहुत कुछ करते देखते हैं. मुंह दबाके हंसते हुए. बेटी-दामाद सब उनके इस मिशन में साथ हैं. अब पत्नी को वापस ला पाते हैं या नहीं, ये हम नहीं बताएंगे. क्या पता इसी सवाल से उस छोटी और जरूरी फिल्म को एक दर्शक मिल जाए.

पंकज त्रिपाठी उनके अभिनय के लिए इसी साल नेशनल अवॉर्ड से नवाज़ा गया है.
पंकज त्रिपाठी को फिल्म ‘न्यूटन’ के लिए इसी साल नेशनल अवॉर्ड से नवाज़ा गया है.

‘अंग्रेज़ी में कहते हैं…’ का आईडिया बहुत मिडिल क्लास लग सकता है लेकिन ये दिक्कत हर क्लास में है. ऊंची सोसाइटीज़ में उसे ट्रॉफी वाइफ कॉन्सेप्ट के नाम से जाना जाता है. फिल्म ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ में भी ये दिखाई देती है. खैर, ये एक बेहद जरूरी फिल्म है, जिसे अधिक से अधिक देखा जाना चाहिए. कहानी के मामले में एक दम फ्रैश और रेलेवेंट. लेकिन मेकिंग के मामले में इसकी कुछ खामियां भी है. कई डायरेक्टर्स इसे सिनेमाई छूट के नाम से जस्टिफाई करने की कोशिश करते हैं. लेकिन इस तरह की फिल्मों में उसे आप जस्टिफाई कर ही नहीं सकते. जब आप एक रियलिस्टिक स्टोरी लेकर चलते हैं, तो आपके साथ ये पेच रहता है. इसमें डायरेक्टर हरीश व्यास के भीतर का यश चोपड़ा कई जगहों पर जाग गया है, और ये चीज़ फिल्म को कमजोर बनाती है.

इस तरह की रियलिस्टिक फिल्मों में इन उड़ते दुपट्टों और बाह फैलाऊ रोमांस के लिए कतई कोई जगह नहीं है.
इन रियलिस्टिक फिल्मों में  उड़ते दुपट्टों और बाह फैलाऊ रोमांस के लिए कतई कोई जगह नहीं होती.

जहां तक इसकी रफ्तार का सवाल है, इसे थोड़ा और कसा जा सकता था. इसका मतलब ये कतई नहीं है कि फिल्म बहुत बोझिल बन गई है. अगर डेढ़-दो घंटे का लोड न लेकर बनाई जाती, तो मजा दोगुना हो जाता. जब आपके पास संजय मिश्रा जैसा कलाकार है, जिसके फ्रेम में आने भर से सीन चमकने और देखने वाले चहकने लगते हैं, तब आपको समय नही खलता. उनके इस किरदार में बहुतों को अपना अक्स दिखा होगा, क्योंकि उन्होंने यशवंत बत्रा का किरदार निभाया ही इतने दिल से हैं. एक तो उनके बात करने का लहज़ा इतना फनी है और सुर में रहता है कि आप सीन के गंभीरता होते हुए भी थोड़ा-थोड़ा मुस्कुरा लेते हैं. अंशुमन झा का कैरेक्टर थोड़ा झोल लिए हुए है. क्योंकि वो शादी के बाद भी उसी खिलंदड़पन में रहता है, जैसे शादी के पहले था. मतलब यहां लॉजिक बताना चाहिए था कि वो ऐसा क्यों है. सिर्फ ये दिखा देने से कि उसके पापा भी वैसे ही हैं, कुछ साफ नहीं होता. पापा से याद आया ये कैरेक्टर है बृजेंद्र काला के हिस्से. वो अपने ही जोन में रहते हैं. उनके सामने आप चाहे कैसी भी एक्टिंग करें, वो अपना काम कर देते हैं. इस फिल्म में उनकी आदत है कि जिस किसी को उनकी कोई भी चीज़ पसंद आ जाती है, वो तत्काल प्रभाव से उसे सामने वाले के हवाले कर देते हैं. छोटा सा ही रोल है लेकिन कायदे का है.

अंशुमन एक्टिंग के साथ ही डायरेक्शन में भी खासी रुची रखते हैं. वो 2014 में आई फिल्म 'कांची' में सुभाष घई को असिस्ट कर चुके हैं.
अंशुमन एक्टिंग के साथ ही डायरेक्शन में भी खासी रुची रखते हैं. वो 2014 में आई फिल्म ‘कांची’ में सुभाष घई को असिस्ट कर चुके हैं.

ये फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए. सब कुछ कहने-बताने के बावजूद और इसके दौरान वो अपनी ज़मीन बचाकर रखती है, जिसपर आपको लगता है और भी कुछ उगाया जा सकता था. जो उगाया गया है वो पकने में भले ही थोड़ा समय लेता है, लेकिन उसका स्वाद अच्छा है. फिल्म में ये दिखाने की कोशिश की गई है कि आजकल वाली जेनरेशन प्यार को बड़े अच्छे से समझती है. वो अभी जवान हैं, पचास तक पहुंचते-पहुंचते उनके बीच इतनी ही गर्मजोशी बची रहेगी, देखने वाली बात होगी.

तब तक आप ये फिल्म देख आइए. और अपने मम्मी-पापा के लिए प्लीज़ वीकेंड पर टिकट जरूर बुक कर दीजिए.


पिछले फिल्म रिव्यूज़ पढ़ें:

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Film Review: Angrezi Mein Kehte Hain… starring Sanjay Mishra, Ekavali Khanna, Shivani Raghuvanshi and Anshuman Jha directed by Harish Vyas

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