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फिल्म रिव्यू: अंधाधुन

कहानी नहीं बताएंगे

एक लड़का है. बहुत सुंदर पियानो बजाता है. बदकिस्मती से अंधा है.

एक लड़की है जो इस अंधे कलाकार की मुरीद है.

एक और संभ्रांत महिला है, जो गुज़रे ज़माने के मशहूर एक्टर की बीवी है. हरकतों से कतई संभ्रांत नहीं लगती.

एक पुलिसवाला है जो अपनी बीवी से बहुत डरता है. लेकिन अफेयर चलाने से बाज़ नहीं आता.

एक बूढी पड़ोसन है जो हमेशा तांक-झांक करती है और सब याद रखती है.

एक डॉक्टर है जिसका ‘ईश्वर का रूप’ होने में कोई इंटरेस्ट नहीं है.

दो चलते पुर्ज़े हैं जो इतने ज़मीरफरोश हैं कि इंसान बेचकर पैसे कमा लें.

फिर मर्डर है. बल्कि दो मर्डर हैं. दो-तीन अटेम्प्ट टू मर्डर हैं. अपहरण है. फिरौती है. ऑर्गन चोरी का स्कैम है. वार-पलटवार का ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच है. और है… एक शानदार फिल्म.

यकीन जानिए इससे ज़्यादा कहानी हम आपको बता भी नहीं सकते. थोड़ा सा आगे बढ़ते ही स्पॉइलर्स की बाढ़ आ जाएगी और आपका फिल्म देखने का मज़ा खराब हो जाएगा. बेहतर यही होगा कि आप बिना किसी जानकारी के सिनेमा हॉल जाएं और फिल्म के एक-एक सीन का भरपूर आनंद लें. हम भी कहानी को टच किए बगैर आपको फिल्म के बारे में बताने की कोशिश करेंगे.

आयुष्मान के सीवी पर चढ़ा एक और शानदार रोल.
आयुष्मान के सीवी पर चढ़ा एक और शानदार रोल.

डायरेक्टर या पीपल का भूत

2004 में एक फिल्म आई थी. ‘एक हसीना थी. एक नए तेवर की थ्रिलर मूवी जिसने इस जॉनर के दीवानों को तृप्त कर दिया. इसके क्लाइमेक्स में उर्मिला का वो क्लासिक रिवेंज आज भी सिहरन पैदा कर देता है.

तीन साल बाद एक और फिल्म आई. ‘जॉनी गद्दार’. एक और शानदार थ्रिलर. पांच दोस्त, कुछ करोड़ रुपए और धोखेबाज़ी का कॉकटेल. सस्पेंस की मात्रा वो कि लोग सीट से हिलने से इंकार कर दें. फिल्म ने क्रिटिक्स और दर्शक दोनों से प्यार पाया.

थ्रिल और सस्पेंस के रसिया दर्शकों को ऐसी आइकॉनिक फ़िल्में देनेवाले शख्स का नाम है श्रीराम राघवन. यही श्रीराम राघवन इस बार ‘अंधाधुन’ लेकर आए हैं. और यकीन जानिए सस्पेंस और रोमांच का डोज़ इस बार कई गुना तगड़ा है. ऐसा लगता है कि ये शख्स फिल्म डायरेक्टर नहीं पीपल का भूत है, जो आपके दिमाग पर कब्ज़ा कर लेता है.

आज की तारीख में इनसे अच्छी थ्रिलर फ़िल्में भारत में शायद ही कोई और बनाता हो.
आज की तारीख में इनसे अच्छी थ्रिलर फ़िल्में भारत में शायद ही कोई और बनाता हो.

रोलर कोस्टर राइड 

फिल्म के शुरू के 15-20 मिनट ही ऐसे हैं जिनमें आप इधर-उधर देखने की गुंजाइश निकाल सकते हैं. उसके बाद तो आपकी नज़र परदे से एक सेकण्ड के लिए भी नहीं हटती. हर पांच मिनट में नया कुछ हो रहा होता है और आप एक फ्रेम भी मिस नहीं करना चाहते. थ्रिलर फिल्मों की कामयाबी सिर्फ दर्शकों को चौंकाने में नहीं है. उस चौंकने में उसे ख़ुशी की अनुभूति होनी चाहिए. साथ ही उसमें अतार्किकता का कोई अंश नहीं होना चाहिए. ‘अंधाधुन’ में ऐसा लगभग पूरी फिल्म होता रहता है. यही पर फिल्म इतने नंबर ले जाती है कि बोर्ड का एग्जाम हो तो मेरिट लिस्ट में आए.

आयुष्मान काइयां तो तब्बू लेडी मैकबेथ

आयुष्मान खुराना की एक बात के लिए तारीफ़ तो बनती है. अब तक के अपने करियर में उन्होंने जितनी भी फ़िल्में चुनीं लगभग सभी में कुछ न कुछ नया हासिल होता रहा दर्शकों को. ‘अंधाधुन’ भी उसी कड़ी का चुनाव है. एक अंधे शख्स का मैनरिज़्म उन्होंने बारीकी से पकड़ा है. साथ ही किरदार का पल-पल बदलता मिज़ाज भी वो अच्छे ढंग से अभिनय में उतारते हैं. यानी जहां भला मानस लगना है वहां भला मानस लगते हैं और जहां डार्क साइड दिखानी हो वहां फुल काइयां नज़र आते हैं. एक और अच्छा रोल उनके सीवी पर दर्ज हो गया है.

आयुष्मान आसानी से मिज़ाज स्विच कर लेते हैं.
आयुष्मान आसानी से मिज़ाज स्विच कर लेते हैं.

आयुष्मान अगर प्रभावित करते हैं तो तब्बू महफ़िल ही लूट ले जाती हैं. वो क्रूर विलेन, बेबस विक्टिम, फ्रस्ट्रेटेड बीवी, डॉमिनेटिंग प्रेमिका सब लगती हैं. और एफर्टलेसली लगती हैं. बहुत कम अभिनेत्रियां हैं हिंदी सिनेमा में जो इतना कुछ एक ही रोल में निभा ले जाए. तब्बू को इस फिल्म में एक्टिंग करते देखना विजुअल ट्रीट है.

मराठी मुलगी राधिका आपटे के हिस्से कम स्क्रीन प्रेजेंस आया है लेकिन जितना भी आया है, उसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया है. अनिल धवन, ज़ाकिर हुसैन, छाया कदम, मानव विज जैसे सीज़न्ड कलाकारों के बारे में अलग से क्या ही कहना! ये हमेशा अच्छा ही करते हैं इसमें अच्छे से थोड़ा ज़्यादा ही किया है.

तब्बू हमेशा दो ही तरह का काम करती हैं. अच्छा और बहुत अच्छा. ये दूसरी कैटेगरी का है.
तब्बू हमेशा दो ही तरह का काम करती हैं. अच्छा और बहुत अच्छा. ये दूसरी कैटेगरी का है.

आपसे मिलकर अच्छा लगा

यूं तो थ्रिलर फिल्मों में गीत-संगीत की ज़्यादा गुंजाइश नहीं होती लेकिन शुरू में आने वाले एक-दो गीत सुनकर आत्मा तृप्त हो जाती है. ख़ास तौर से ‘नैना दा कसूर’. अमित त्रिवेदी का म्यूजिक है और इतना ही बताना काफी होना चाहिए. म्यूजिक उम्दा होने की गारंटी नाम में ही जुड़ी है.

डायरेक्टर श्रीराम राघवन की एक और बात के लिए तारीफ़ बनती है. पुणे शहर को उन्होंने बेहद खूबसूरती से कहानी में पिरोया है. लोकल लहजा और छोटे-छोटे रेफरेन्सेस कहानी को और भी विश्वसनीय बनाते हैं. जैसे प्रभात रोड, अलंकार थिएटर, सकाळ अखबार, मिसळ पाव वगैरह का ज़िक्र. या फिर ‘गली क्रमांक चार’ या ‘मूर्ख आहेस का’ जैसे मराठी जुमले.

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इंटेलीजेंट थ्रिलर + डार्क ह्यूमर

हमारे यहां सस्पेंस-थ्रिलर पसंद करनेवाले जितने दर्शक हैं उनके साथ बॉलीवुड ने अक्सर धोखा ही किया है. थ्रिल के नाम पर धुएं में से निकल कर आती लड़की, मास्क लगाकर घूमते विलेन और डबल-ट्रिपल क्रॉस करते परिवार वाले ही पल्ले पड़ते हैं अक्सर. ‘अंधाधुन’ सही मायने में एज ऑफ़ दी सीट थ्रिलर है. ऐसी फिल्म जो आपको हॉल में ही चीखने पर मजबूर कर दे. (ऐसा हुआ कई बार फिल्म के दौरान). इसकी शॉक वैल्यू का लेवल ही अलग है. साथ ही डार्क ह्यूमर भी है जो टेन्स सिचुएशन में भी हंसी का फव्वारा छुड़वा दे. प्लस एक्टर्स की उम्दा अदाकारी. ऐसा कॉम्बिनेशन रेयर ही बनता है.

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बहुत मुश्किल से भारत में ऐसी इंटेलीजेंट थ्रिलर फ़िल्में बनती है. इन्हें देखा जाना चाहिए. बड़े-बड़े क्रिटिक्स और फ़िल्मी हस्तियां कह रही हैं कि ये इस साल की सबसे बेहतरीन फिल्म है. हमें नहीं लगता कि उनमें से कोई अतिशयोक्ति कर रहा है. बाकी आप खुद देखकर फैसला कर लीजिएगा.


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