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फिल्म रिव्यू: अमावस

हॉरर फिल्म की इंडियन रेसिपी

एक बर्तन लीजिए. ओह सॉरी.. हम खिचड़ी थोड़े ही बना रहे हैं. फिल्म बनानी है. हां, तो एक चश्मे वाला हीरो लीजिए. (जो स्वेटर ज़रूर पहनता हो.) फिर एक-दो सुंदर सी लगने वाली कन्याएं लें. कहानी का प्लॉट किसी हिल स्टेशन पर रखिए. वहां वो जो धुंध वगैरह होती है, न वो भूतों को सूट करती है. हीरो-हीरोइन के रहने का घर कुछ ऐसा चुनिए जिसे देखकर लगे कि हड़प्पा संस्कृति के बाद से वहां किसी ने कदम नहीं रखा. फिर इस मिक्सचर में एक अजीब सा नौकर डालिए. एक डॉक्टर, या तांत्रिक या डॉक्टर कम तांत्रिक भी ज़रूर हो.

ये तो हुआ किरदार और कहानी का सेटअप. उसके बाद पहले हाफ में भूत के अजीबो-गरीब स्टंट दिखाइए.

  • सोते हुए लोगों के सिरहाने खड़ा भूत…
  • महल की खिड़की से झांकते लोगों के पीछे खड़ा भूत…
  • कार के आगे अचानक से आ खड़े होने वाला भूत…
  • बिस्तर में आपके साथ सोने वाला भूत…
  • अपने आप झूलता झूला वगैरह-वगैरह…
कार के आगे भूत.
कार के आगे भूत.

दूसरे हाफ में हीरो या हीरोइन के अतीत की कब्र खोदिए. कनेक्ट करके दिखाइए कि ये भूत या भूतनी जो इत्ती ओवर ड्रामेटिक हो रही है, वो काहे वास्ते हो रही है? फिर अंत में सच्चा प्यार वर्सेस बुरी आत्मा की जंग टाइप कुछ दिखा डालिए. अल्लाह अल्लाह खैर सल्ला. इस तयशुदा पैटर्न के अलावा राइटर या डायरेक्टर कोई अपनी मर्ज़ी का तड़का भी लगा सकें तो उनकी श्रद्धा. वरना खिचड़ी तो बन ही गई है. कुल मिलाकर यही है नरगिस फाखरी और सचिन जोशी की फिल्म ‘अमावस’. डायरेक्टर हैं भूषण पटेल.

पुरानी बोतल में पुरानी ही शराब

‘अमावस’ की कहानी में कुछ नया नहीं है. ये इतनी प्रेडिक्टेबल फिल्म है कि इसे देखने के बाद आपका अपने आप पर विश्वास बढ़ जाता है. क्योंकि आप इसके हर सीन में बता सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है. करन अजमेरा अपनी प्रेमिका अहाना के साथ अपने समर हाउस रहने आया है. वो कई साल से मेंटल इलनेस से जूझ रहा है. उसे हर वक़्त लगता है कि कोई उसे देख रहा है. डॉक्टर शिवानी से इलाज भी करवा रहा है. जिस घर में ये लोग रहने आए हैं वो एक किलेनुमा इमारत है जो अपने आप में डरावनी है. घर में उनका जोड़ीदार है अजीब सी अंग्रेज़ी बोलने वाला नौकर गोटी. इस घर में पहले दिन से ही विचित्र घटनाएं घटनी शुरू हो जाती हैं. एक लड़की का भूत यहां-वहां विचरता दिखाई देता है. कौन है ये लड़की? करना क्या चाहती है? किसके अतीत की कब्र से ये मुर्दा उठ खड़ा हुआ है? ये सब फिल्म देखकर जानिएगा.

भुतहा फिल्मों में गुडिया इतनी ज़रूरी क्यों होती है?
भुतहा फिल्मों में गुडिया इतनी ज़रूरी क्यों होती है?

तुम्बाड ने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा

भारत की हॉरर फिल्मों में ना भूत बड़े विचित्र होते हैं. बर्तन गिरा देंगे, कुर्सियां खिसकाएंगे, बल्ब जलाने-बुझाने का खेल खेलेंगे. और कुछ नहीं तो हीरो-हीरोइन का नाम लेकर फुसफुसाने लगेंगे. ऐसा लगेगा जैसे अकेले बोर हो गए हैं और टाइमपास करने निकले हैं. ‘तुम्बाड’ जैसी फिल्म के बाद उम्मीद थी कि इस जॉनर में कुछ तो सुधार होगा. ‘अमावस’ में फिर से वही कुछ देखकर दुःख होता है. एक्टिंग के फ्रंट पर भी कुछ ख़ास हाथ नहीं लगता. नरगिस फाखरी इकलौता बड़ा नाम है और वो हर फ्रेम में निराश करती हैं. अली असगर ने ये फिल्म क्यों की, पता नहीं.

सिर्फ मोना सिंह ने थोड़ी बहुत एक्टिंग की है फिल्म में.
सिर्फ मोना सिंह ने थोड़ी बहुत एक्टिंग की है फिल्म में.

साइकियाट्रिस्ट शिवानी के रोल में मोना सिंह ने एक्टिंग तो ठीक-ठाक की है लेकिन उनका किरदार ही इतना अजीब है कि वो पल्ले नहीं पड़तीं. आखिर कितने साइकियाट्रिस्ट देखे हैं आपने, जो मेडिकल साइंस और सुपरनेचुरल दोनों को मानते हैं? डॉक्टर साहिबा न सिर्फ भूतों को मानती है बल्कि उन्हें ये भी पता है कि बुरी आत्मा डेंजरस होती है. ऐसे डॉक्टरों के पास जानेवाले स्किज़ोफ्रेनिक, पैरानॉयड मरीज़ों का तो भगवान ही मालिक है. सचिन जोशी, नवनीत कौर, विवेक भटेना फिल्म में बस हैं.

वीएफएक्स के नाम पर भी कंगाली ही छाई है. अजीबो-गरीब मास्क लगाए चेहरों से डरना इंडियन ऑडियंस ने कबका छोड़ दिया है, ये न जाने इन फिल्मकारों को कब समझ आएगा. खैर.

देखें या न देखें?

झिलाऊ फर्स्ट हाफ के बाद महज़ इतनी उत्सुकता रहती है कि फिल्म के भूत को दिक्कत क्या है? जैसे ‘राज़’ की मालिनी ने प्यार में खता खाकर ग़दर मचाया था, इन मोहतरमा को क्या समस्या हुई थी? इसके अलावा कुछ ऐसा नहीं जो आपको सिनेमा घर तक ले जा सके. अमूमन हॉरर फिल्मों में म्यूज़िक ठीक-ठाक होता है. इसमें तो वो भी नहीं है. एक गाना भूत बनी लड़की गाती रहती है जिसके शब्द तो याद नहीं रहते लेकिन जिसे देखकर कुछ पुराने गीत याद आ जाते हैं. जैसे ‘मेरे नैना सावन भादो’ या ‘कृष्णा कॉटेज का ‘बेपनाह प्यार है आ जा.’ अगर आप हॉरर फिल्मों के बहुत ही बड़े शौक़ीन हैं तो भी टीवी पर आने का वेट कर सकते हैं. जल्दबाज़ी लायक मामला नहीं है.

फिल्म में वीएफएक्स भी कुछ ख़ास नहीं हैं.
फिल्म में वीएफएक्स भी कुछ ख़ास नहीं हैं.

फिल्म में एक जगह नरगिस कहती हैं, “यहां क्या चल रहा है कुछ समझ ही नहीं आ रहा.”

आप के दिल से आवाज़ निकलती है, “सहमत दी, शेयर करना चाहूंगा.”


वीडियो:

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