Submit your post

Follow Us

‘सिर्फ मदरसों में ही पढ़ कर अल्लाह से मुहब्बत की जा सकती है?'

फिल्म ‘अलिफ’ का एक सीन है. एक भाई और बहन बात कर रहे हैंः

“कुरआन में कौन सा लफ्ज़ बार-बार दोहराया गया है? .. इल्म.”

“लेकिन इल्म तो वो हासिल कर रहा है.”

“सिर्फ कुरआन रटने से इल्म थोड़े ही ना आ जाता है रज़ा! इल्म तो वो है जो एक इंसान को दूसरे इंसान को समझने की समझ दे. इस ख़ूबसूरत दुनिया को आगे बढ़ाने का क़ायदा समझाएं. इसको बेहतर बनाने का हमें सबक सिखलाएं. और फिर दीन का इल्म तो दुनिया के इल्म से ही गुज़रता है ना? रज़ा, दुनिया तो ख़ुदा ने खुद हमें दी है न, इसमें जीने के लिए? इसलिए बहुत ज़रूरी है हम दीन के इल्म के साथ-साथ दुनिया का इल्म भी सीखें. और अपने बच्चों को सिखलाएं.”

वैसे तो महज़ इस संवाद के लिए ही ‘अलिफ़’ देख आनी चाहिए. लेकिन इसके अलावा भी फ़िल्म में बहुत कुछ एेसा मस्ट वॉच है. जरूर देखिएगा. ख़ास तौर से मुसलमान भाई लोग.

फिल्म पर यहां जो बात कर रहे हैं उसे महज़ रिव्यू समझ के न पढ़ें. इस का कोई विचार, कोई सबक अपने साथ रख लेंगे तो बेहतर. ख़ुशी होगी हमें.

पहले मोटा-मोटा ये बता दें कि ‘अलिफ़’ नाम की ये फिल्म इस हफ्ते रिलीज़ हुई है. अफ़सोस कि ज़्यादातर लोगों को इसके बारे में पता भी नहीं है. छोटे बजट से बनी, ढंग के प्रमोशन को तरसती और बड़े सितारों की नामौजूदगी वाली ऐसी फ़िल्में अच्छी होने के बावजूद लगभग अदृश्य हालत में आती हैं और पलक झपकते गायब भी हो जाती हैं. ‘अलिफ़’ ज़ैग़म इमाम की फिल्म है. वो इसके प्रोड्यूसर भी हैं, डायरेक्टर भी और राइटर भी. मुसलमानों के लिए तालीम की अहमियत को रेखांकित करती ये छोटी सी फिल्म एक बड़े मकसद को हासिल करने में कामयाब है.

वो मकसद ये कि मज़हब की अंधाधुंध आलोचना किए बगैर, उसे गालियां दिए बगैर दीन और दुनिया के एडजस्टमेंट का रास्ता सुझाना.

कहानी में, बनारस के मुस्लिम-बहुल इलाके दोषीपुरा में रहते हकीम रज़ा हैं जो एक धार्मिक और दब्बू किस्म के व्यक्ति हैं. बिस्तर से लगे वालिद साहब, यतीम भतीजी, बीवी और 12 साल के बेटे के साथ काट रहे हैं ज़िंदगी. बेटा अली मदरसे में पढ़ रहा है. बहुत जल्द हाफ़िज़ बन जाने वाला है. हाफ़िज़ यानी वो जिसे पूरा कुरआन मुंह-ज़ुबानी याद हो. उनकी शांत ज़िंदगी में पत्थर तब आ लगता है जब पाकिस्तान से उनकी बहन आ धमकती है. ज़हरा रज़ा को उस वक़्त पाकिस्तान भेज दिया गया था जब यहां हिंदुस्तान में छिड़े सांप्रदायिक दंगों में उसकी जान और इज्ज़त दोनों को ख़तरा हो गया था. एक निरीह गाय की तरह उसे पहले से शादीशुदा और तीन बीवियों के इकलौते पति से निकाह करा के रवाना किया गया था. ये एक तरह से उसका देश-निकाला था. उसे पाकिस्तान भेजने के पीछे आइडिया ये था कि ‘अपने’ लोगों में खुश रहेगी. अपने लोगों की कलई जब तक खुलती है तब तक ज़हरा दो मुल्कों की आपसी नफ़रत के दुश्चक्र में फंस चुकी होती है. अब पराए मुल्क में फंसी ज़हरा लंबे-लंबे खतों में अपनी व्यथा अपने परिवार को लिखने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती.

मदरसे में कुरआन का सिपारा पढता अली
मदरसे में कुरआन का सिपारा पढ़ता अली.

असली फिल्म शुरू ही तब होती है जब ज़हरा का ख़त आता है.

हकीम साहब ख़त को बिना खोले, अपने वालिद साहब के पास घर ले आते हैं क्योंकि उन्हें उसे अकेले पढ़ने में डर लगता है. ख़त से पता चलता है कि बरसों की कोशिशों के बाद आख़िरकार ज़हरा को तीन महीने के लिए हिंदुस्तान आने का वीज़ा मिल गया है और वो आ रही है. ज़हरा के ख़त को छूते ही फ्लैशबैक में चलते दंगों के दृश्य सिहरन पैदा करते हैं. आप महसूस कर सकते हैं सरहदें बनाकर अलग कर दिए लोगों के दिलों की उथल-पुथल. बेटी के आने की सूचना पाने पर बोलने से लाचार बाप की ख़ुशी उसके झुर्रियों से भरे चेहरे की एक-एक रेखा से टपकती है. अपनी बहन के लिए अपने तमाम फ़राइज़ (कर्तव्य) निभाने में नाकाम रहा भाई जब फूट-फूट कर रोता है तब आपका दिल चाहने लगता है आप उसके बराबर खड़े होकर उसे तसल्ली दें. और कुछ नहीं तो उसके कंधे पर ही हाथ रख दें.

इसी तरह ज़हरा जब बरसों बाद अपने घर में दाखिल होती है, वो सीन भी उम्दा बन पड़ा है. वो एक-एक चीज़ को छू रही है. दीवारें टटोल रही हैं. पुरानी कुर्सियों के हत्थों पर हाथ फेर रही है. बैकग्राउंड में उसके बचपन से जुड़ी आवाजें गूंज रही है. आंखें तरबतर हैं और गला रुंधा हुआ. पूरा घर भावनाओं के ज्वार-भाटे में गोते लगा रहा है. कोई भी संवेदनशील मन उस सीन से जुड़ाव महसूस किए बगैर नहीं रह पाएगा.

neelima
फिल्म के एक दृश्य में ज़हरा और अली. इस तस्वीर में सबसे खूबसूरत क्या है आप अपने हिसाब से छांट लीजिए.

ज़हरा को जब पता चलता है कि 12 साल का होने के बावजूद अली स्कूल नहीं जाता तो वो ज़िद करती है कि उसे स्कूल में दाखिल किया जाए. वो अपने भाई से इसरार करती है कि वो उसे ख़ानदानी हकीम के पेशे में ना धकेल कर डॉक्टर बनाने का सपना पालें. अपनी बहन की दुर्दशा के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानते हकीम रज़ा उसकी बात पर अमल करते हैं और यहीं से शुरू होता है दीन बनाम दुनिया का कॉन्फ्लिक्ट. कुछ लोगों को ये हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आती. ख़ास तौर से जमाल को.

जमाल लोकल मदरसे का नया मुतवल्ली है. मुतवल्ली का मतलब सीईओ समझ लीजिये. मोहल्ले में नया-नया आया है और मज़हब को पहनता-ओढ़ता है. ये लिखने के लिए नहीं लिखा है. वाकई ओढ़ता है. कपड़ों से लेकर बाइक तक सबकुछ मज़हब के रंग में रंगा है उसका. शायरी में दिलचस्पी रखता है और आने के बाद लगभग तुरंत ही हकीम साहब की भतीजी के इश्क में मुब्तिला हो जाता है. शम्मी भी – जो कि खुद भी शायरी की शौक़ीन है – उसे पसंद करने लगती है.

alif2

उधर अली को स्कूल में दाखिल कराने वाली घटना कई-कई मुहाज़ पर हकीम रज़ा के लिए परेशानी खड़ी करती है. स्कूल में ऐसे टीचर्स हैं जो एक मदरसे से आए लड़के की मौजूदगी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे. एक तो ख़ास तौर से अली के पीछे पड़ा है. उसे निकलवाना चाहता है. जब 26 जनवरी के मौके पर सब तिरंगा ले के आते हैं तब अपनी मासूमियत में अली मदरसे का चांद-तारे वाला झंडा लिए पहुंचता है. ये हरकत पूरे स्कूल के सामने बेरहमी से उसकी पिटाई की भूमिका बनती है. छोटी सी, अनजाने में हुई ग़लती पर बच्चे को आतंकवादी का तमगा देने वाला टीचर ‘दूसरी तरफ की’ कट्टरता का प्रतीक है. 12 साल का बच्चा अपने सहपाठियों के मुकाबले पढ़ाई में बहुत पीछे है. लेकिन इसकी वजह उसकी अपनी कमज़ोरी नहीं है. जिस चैनल से वो आया है वहां उसे ये सब पढ़ाया ही नहीं गया. दूसरी दुनिया को संवारने की हिदायतों के बीच उसे किसी ने बताया ही नहीं कि दुनियावी तालीम की क्या अहमियत है.

‘अलिफ़’ भारत-पाकिस्तान के कटु संबंधों का खामियाज़ा भुगतते लोगों के एहसासों को पूरी संवेदनशीलता से छूती नज़र आती है. ज़हरा को – जो सिर्फ तीन महीनों के लिए भारत आ पाई है – हकीम रज़ा वापस पाकिस्तान नहीं भेजना चाहते. लेकिन टेक्निकली ये मुमकिन नहीं. हां, सरकारी विभाग में चढ़ावा चढ़ाने पर हल निकल सकता है.

जब इंस्पेक्टर हकीम साहब को अपनी बहन को भारत में रोके रखने का रास्ता सुझाने के एवज़ में पचास हज़ार रुपए मांगता है, उस वक़्त पीछे दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा ‘रिश्वत लेना अपराध है’ हमारा मुंह चिढ़ा रहा होता है. बहन को अपने पास रखने के लिए उसे कागज़ी तौर पर मार देने की तज़वीज़ पर हकीम साहब अमल तो करते हैं, लेकिन ये ख़तरा बरकरार रहता है कि ज़हरा को किसी भी शिकायत पर वापस भेजा जा सकेगा. जीने के लिए जहां मरना पड़े ऐसी दुनिया से विरक्ति का लम्हा है ये सीन. खैर.

‘सिर्फ मदरसों में ही पढ़ कर अल्लाह से मुहब्बत की जा सकती है’ – इस तरह की एक्स्ट्रीम बात कहने वाला और इस बात पर ईमान रखने वाला जमाल मज़हब के नाम पर मुहब्बत को भी कुर्बान करने में ज़रा नहीं हिचकता. अली की मदरसे में वापसी को अपनी आन का मसला बना बैठा जमाल, शम्मी से दामन छुड़ाने तक तैयार हो जाता है. अपनी मुहब्बत का सदका मांगने आई, रोती-बिलखती शम्मी को जमाल का जवाब होता है, ‘मुझे अल्लाह से मुहब्बत है’. ये बेहद अफसोसनाक मंज़र है जहां मुहब्बत के मुक़ाबिल मज़हब खड़ा दिखता है. आप में अगर संवेदनशीलता का ज़रा सा भी अंश है तो आप शम्मी के जवाब से पूरी तरह सहमत होंगे. वो कहती है, ‘जिसे मुकम्मल इंसान से मुहब्बत ना हुई वो अल्लाह से मुहब्बत क्या करेगा?’

alif 1

अली का डॉक्टर बनने का ख़्वाब पूरा होता है या नहीं? शम्मी अपनी मुहब्बत हासिल कर पाती है या नाकाम रहती है? ज़हरा को भारत में रहने दिया जाता है या वापस जबरन पाकिस्तान भेज दिया जाता है? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए फिल्म देखिए. और ज़रूर देखिए!

एक छोटे बजट की फिल्म होने की वजह से अलिफ़ में कुछ सिनेमाई फ्लॉज़ भी हैं. ढंग के संगीत की कमी खलती है. एकाध दृश्य में और बेहतरी की आप उम्मीद करते हैं लेकिन शायद कलाकारों की रेंज आड़े आ जाती है. वैसे तो सारे कलाकार अपनी जगह ठीक हैं लेकिन अली की मां की छोटी सी भूमिका में भावना पाणि आपको बेहद इम्प्रेस करती है. एक दृश्य में जब हकीम रज़ा का रोल करते दानिश हुसैन उन्हें बताते हैं कि मदरसे वाले खिलाफ़ हो रहे हैं तब वो बेहद मासूमियत से पूछती है, ‘लेकिन तालीम तो बहुत अच्छी चीज़ होती है ना?’. उस सवाल में फ्रस्ट्रेशन और हैरानी दोनों गुंथे हुए थे. अपने बच्चे के अच्छे मुस्तकबिल और पति की परेशानियों के भंवर में उलझी पत्नि का रोल बेहद अच्छे ढंग से निभाया है उन्होंने. ज़हरा रज़ा उर्फ़ नीलिमा अज़ीम के तो कहने ही क्या!

भावना एक भावनात्मक दृश्य में
भावना एक भावनात्मक दृश्य में.

ज़ैग़म अपनी निर्देशकीय ज़िम्मेदारी बाखूबी निभाते हैं लेकिन सीमित-संसाधनों के श्राप से जूझते नज़र आते हैं. बनारस को बेहद खूबसूरती से फिल्माने के लिए उनका शुक्रिया. क्लाइमेक्स का सीन कमज़ोर है. लेकिन ओवरऑल जिस मैसेज को देने के लिए ये फिल्म बनाई गई उसे पूरी तरह डिलीवर करने में फिल्म कामयाब है, किः

‘जीने के लिए लड़ना नहीं पढ़ना ज़रूरी है’.

तालीम ही वो चाबी है जो मुसलमानों की किस्मत का ताला खोलेगी. किसी मुस्लिम फिल्ममेकर की अपने हम-मज़हबों को ये बात समझाने की ईमानदाराना कोशिश की सराहना होनी ही चाहिए. फिल्म का सबसे प्लस पॉइंट ये है कि वो मज़हब पर हमलावर नहीं होती. बल्कि संतुलित ढंग से अपनी बात रखती है. मुस्लिम समाज मज़हबी शिक्षा के लिए बड़ा ही आग्रही रहा है. उससे दिक्कत नहीं है. दिक्कत है इस बात से कि उसको प्राथमिकता देने के चक्कर में अक्सर दुनियावी तालीम नज़रअंदाज़ हो जाती है.

इस इक्वेशन को ठीक करने की इस अच्छी कोशिश की तारीफ़ तो बनती है. बड़े अफ़सोस की बात है कि ऐसी फिल्मों को दर्शक नहीं मिलते. ये अन-नोटिस्ड गुज़र जाती हैं. अगर अच्छी फ़िल्में देखने की इच्छा है तो इन्हें बनाने की काबिलियत रखने वालों की हौसला-अफज़ाई ज़रूर-ज़रूर होनी चाहिए. वरना हम लोग ‘भारत में कूड़ा फ़िल्में बनती हैं बस’ कहते अच्छे नहीं लगेंगे. जाइए, ‘अलिफ़’ देख आइए. हमारी तरफ से पूरी तरह हां है.

‘अलिफ़’ का ट्रेलरः


More stories:

‘तुम तो मामूली हाफ़िज़ निकले मियां, जिसने कुरआन घोल कर पी तो लिया पर उसके मायने नहीं समझा’

मुसलमानों की सबसे खतरनाक सच्चाई, जिसे अनदेखा किया जा रहा है

भारत का मुसलमान क्यों दुनिया के मुसलमानों से ज्यादा समझदार है!

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

10 नंबरी

ऐपल एयरपॉड्स छोड़िए, 5000 रुपए के अंदर ट्राई कीजिए ये बिना तार वाले इयरफ़ोन

बेहतरीन आवाज, घंटों बैटरी बैकअप और वॉइस असिस्टेंट जैसे फीचर अब इस रेंज में भी मिलते हैं.

कभी IIT खड़गपुर से पढ़ने वाले आज क्या-क्या कमाल कर रहे हैं!

IIT खड़गपुर की शुरुआत उस भवन से हुई थी, जहां कई शहीदों का खून बहा था.

वो 10 बॉलीवुड सेलेब्रिटीज़, जिन्हें हमने बीते पांच महीनों में खो दिया

इस लिस्ट को बनाने से ज़्यादा डिप्रेसिंग कुछ नहीं हो सकता.

'बिग बॉस 14' में होस्ट सलमान खान के अलावा नज़र आएंगे ये 10 सेलेब्रिटीज़

'बिग बॉस 14' का प्रोमो आ चुका है, इस मौके पर जानिए शो के इस सीज़न से जुड़े हर सवाल का जवाब.

विदेश में रहने वाले भारतीयों को लल्लनटॉप का न्योता

देश के लिए कुछ करने का मौका.

सलमान खान अगले कुछ समय में इन 5 धांसू एक्शन फिल्मों में नज़र आने वाले हैं

लॉकडाउन के दौरान सलमान ने अपनी पूरी प्लानिंग बदलकर रख दी है.

बॉलीवुड का वो धाकड़ विलेन जिसका शरीर दो दिन तक सड़ता रहा!

जानिए महेश आनंद की लाइफ और उनकी फिल्मों से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से.

कोविड-19 महामारी के बाद बॉलीवुड बनाने जा रहा ये 10 जबरदस्त फिल्में

इस लिस्ट में बड़े बजट पर मेगा-स्टार्स के साथ बनने वाली फिल्में भी हैं नया कॉन्टेंट ड्रिवन सिनेमा भी.

'चक दे! इंडिया' की 12 मज़ेदार बातें: कैसे सलमान हॉकी कोच बनते-बनते रह गए

शाहरुख खान की इस यादगार फिल्म की रिलीज को 13 साल पूरे हो गए हैं.

देखिए सुषमा स्वराज की 25 दुर्लभ तस्वीरें, हर तस्वीर एक दास्तां है

सुषमा की ज़िंदगी एक खूबसूरत जर्नी थी, और ये तस्वीरें माइलस्टोंस.