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फिल्म रिव्यू: अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?

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1980 में एक फिल्म आई थी ‘अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?’. सईद मिर्ज़ा डायरेक्टेड इस फिल्म को कल्ट क्लासिक का दर्जा प्राप्त है. 2019 में उसी कॉन्सेप्ट के इर्द-गिर्द एक कहानी बुनी गई है. नाम वही रखे गए, कलाकार बदल दिए गए.  इस रीमेक को डायरेक्ट किया है सौमित्र रानाडे ने. कल्ट की रीमेक होने के प्रेशर के अलावा इस फिल्म में क्या-क्या है? किस बारे में है? और कैसी है? ये हम नीचे जानेंगे.

फिल्म की कहानी

एक ईमानदार और असल में देशभक्त आदमी है अलबर्ट पिंटो. भरा पूरा परिवार है. मां-बाप-भाई-गर्लफ्रेंड. अच्छी नौकरी करता है. लेकिन एक दिन सबकुछ छोड़-छाड़कर गायब हो जाता है. घरवाले गुमशुदगी का मामला दर्ज करवाते हैं. दूसरी ओर अलबर्ट की कहानी उसके बॉम्बे टू गोवा रोड ट्रिप पर पता चल रही है. फ्लैशबैक में. वो कहानी कुछ यूं है कि अलबर्ट के पापा के साथ कुछ गलत होता है, जिसकी वजह से उसका दिमाग फिर जाता है. हर दूसरी बात पर गुस्सा करने लगता है. वो अपने मिडल क्लास होने पर चिढ़ता है. अलबर्ट इस चीज़ को ऐसे समझाता है कि देश में तीन तरह के लोग होते हैं. पहले जो देश चलाते हैं. दारू पीकर. दूसरे हैं सड़क पर पड़े कुत्ते जिन्हें पहले वाले गाड़ी चढ़ाकर मार देते हैं. और तीसरे हैं कौव्वे, जो सब कुछ बस देखते रहते हैं. उसे अब तक कौव्वा बने रहने का गुस्सा है. जब सहन शक्ति खत्म हो जाती है, तो अपनी आराम की ज़िंदगी छोड़कर निकल जाता है अपने पहले असाइनमेंट पर. कुछ स्कोर सेटल करने.

फिल्म में मानव का किरदार एक हादसे के बाद डिस्टोपियन फील में चला जाता है, जहां उसे सबकुछ बुरा लगने लगता है.
फिल्म में मानव का किरदार एक हादसे के बाद डिस्टोपियन फील में चला जाता है, जहां उसे सबकुछ बुरा लगने लगता है.

एक्टर्स का काम

फिल्म में मानव कौल (अलबर्ट पिंटो), नंदिता दास (गर्लफ्रेंड स्टेला) और सौरभ शुक्ला (ड्राइवर नायर) ने लीड रोल्स किए हैं. अलबर्ट का कैरेक्टर फ्रस्ट्रेशन से भरे आम आदमी का है, जो सबसे ज़्यादा खुद पर गुस्सा है. वो गुस्सा मानव आपको भी महसूस करवाते हैं. जो उनके काम की वजह से रियल लगता है. ड्रमैटिक नहीं लगता. मतलब मानव कौल को देखना अच्छा लगता है. उन्हें कई और फिल्मों में देखने का मन करता है. साथ में हैं सौरभ शुक्ला, जिनका कैरेक्टर एक गुंडे का है. ‘सत्या’ वाले कल्लू मामा वाले जोन का. सौरभ शुक्ला अपने कैरेक्टर में बहुत कंफर्टेबल लगते हैं. क्योंकि वो ये वाला कई दफे कर चुके हैं. साथ में नंदिता दास हैं, जो एक ही फिल्म में तीन-चार किरदार में दिखाई दे रही हैं. और वो हर किरदार में फबती हैं. उन्हें देखकर नहीं लगता कि ये सब करने में उन्हें कोई मेहनत लग रही है. एफर्टलेस कहते हैं न वही. उनके सीन में होने भर से वजन आ जाता है. हालांकि कई बार उनकी आवाज़ सीन्स के साथ सिंक नहीं लगती.

फिल्म में नंदिता ने मानव की गर्लफ्रेंड का रोल किया है. दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. इसी का नतीजा है कि नंदिता फिल्म में तीन-चार किरदारों में नज़र आती हैं.
फिल्म में नंदिता ने मानव की गर्लफ्रेंड का रोल किया है. दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. इसी का नतीजा है कि नंदिता फिल्म में तीन-चार किरदारों में नज़र आती हैं.

फिल्म की अच्छी बातें

पूरी फिल्म नायर और अलबर्ट पिंटो के बीच हो रही बातचीत में निकलती है. इस केस में डायलॉग्स अहम हो जाते हैं. लेकिन फिल्म कुछ भारी-भरकम बात बोलकर स्मार्ट बन जाने की कोशिश नहीं करती. जिस तरह की बातचीत आप अपने किसी दोस्त के साथ करते हैं और जिस भाषा में करते हैं, फिल्म में ठीक वैसे ही होता है. भले माहौल हल्का हो लेकिन बातें गंभीर हो रही हैं. इसीलिए समझ भी आ रही हैं. जैसे फिल्म के एक सीन में जब नायर कुछ ज़्यादा ही टची होने लगता है, अलबर्ट बताता है कि उसे लड़कों में दिलचस्पी नहीं. नायर पूछता है- ‘ट्राय किया है कभी? अगर नहीं किया तो कैसे पता कि तेरा इंट्रेस्ट लड़कों में है या नहीं.’ यहां पर गे होने से लेकर बच्चों के हैरसमेंट, क्लास का अंतर, करप्शन, एक आदमी की फ्रस्ट्रेशन और साथ में स्वीट सी लव स्टोरी की बात चल रही है.

फिल्म में सौरभ शुक्ला का किरदार एक गुंडे के खास आदमी का है.
फिल्म में सौरभ शुक्ला का किरदार एक गुंडे के खास आदमी का है.

दिक्कत कहां आ रही है?

जब आप फिल्म को देख रहे होते हैं, तब विजुअल्स की मदद से कड़ियां जोड़कर अलबर्ट की बैकस्टोरी समझने की कोशिश कर रहे होते हैं कि उसी समय फिल्म आपको वो सारी बातें बोलकर समझाने लगती है. ये स्पूनफीडिंग जैसा लगता है. फिल्म में क्लोज़ अप सीन्स ज़्यादा हैं, इसलिए कुछ खास कैमरावर्क देखने को नहीं मिलता. कैमरा एक्टर्स की फेस पर गड़ा रहता है, ताकि कोई इमोशन मिस न हो जाए. डेढ़ घंटे की ये फिल्म रफ्तार के मामले में ठीक है लेकिन कहीं-कहीं इसका भटकना आपकी पकड़ में आ जाता है. फिल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती. बातचीत चलती रहती है, कहानी बढ़ती रहती है.

दुनियाभर का प्रेशर माथे पर लेकर अलबर्ट किसी का कत्ल करने निकला है. और जीवन में पहली बार गोली भी चलाने निकला है.
दुनियाभर का प्रेशर माथे पर लेकर अलबर्ट किसी का कत्ल करने निकला है.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

फिल्म को अगर टुकड़ों में तोड़ने के बदले एक साथ रखकर देखा जाए, तो ये सोशल-पॉलिटिकल माहौल में बेस्ड एक मसाला थ्रिलर जैसी लगती है. जो आपको बहुत इंप्रेस नहीं करती तो निराश भी नहीं होने देती. इब्बन और खालू जैसी केमिस्ट्री देखने को मिलती है. उन चुनिंदा फिल्मों से है, जिन्हें देखकर ये नहीं लगता कि इसमें कोई चीज़ जबरदस्ती ठूंसी गई. ये भी समझाती है कि देशभक्त बनने के लिए नाम के आगे चौकीदार लगाना जरूरी नहीं है. वो अंदर से आता है. ‘अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?’ अपने विषय का घमंड नहीं करती, लेकिन अपनी गंभीरता का अंदाजा है उसे. अगर बहुत दिनों से कोई पिक्चर नहीं देखी, तो इसे एक बार देख सकते हैं. मज़ा आएगा.

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