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EMS नंबूदिरीपाद, वो शख्स जिसने भारत में लेफ्ट की पहली चुनी हुई सरकार बनाई

हिंदुस्तान में लेफ्ट कहां-कहां बचा है? या इस सवाल को ऐसे पूछ लीजिए कि हिंदुस्तान में लेफ्ट कहां-कहां रहा है? दोनों सवालों के जवाब में आपको बिला नागा केरल का नाम सुनने को मिलेगा. केरल हिंदुस्तान में कम्युनिज़म (साम्यवाद) का गढ़ रहा है. लेकिन यहां का कम्युनिज़म उस कम्युनिज़म से अलग है जो हिंसा के ज़रिए सत्ता हासिल करने की बात करता है. केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन राजनीति की मुख्यधारा में शामिल रहा है. उसने चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया है और हिंदुस्तान के लोकतंत्र को अपनाया है.

इस तरह के बिरले कम्युनिज़म को केरल की ज़मीन में रोपने वालों में सबसे आगे नाम लिखा जाता है केरल के पहले मुख्यमंत्री एलामकुलम मणक्कल संकरन नंबूदिरीपाद का. ज़्यादातर लोगों को इनका आसान नाम ईएमएस नंबूदिरीपाद पता है. कुछ लोग सिर्फ ईएमएस कहते हैं.

ईएमएस नंबूदिरीपाद
ईएमएस नंबूदिरीपाद

सात दशक तक राजनीति करने वाले नंबूदिरीपाद का आज ही के दिन 1998 में देहांत हुआ था. तो आज नंबूदिरीपाद की बरसी पर हम उनके बारे में वो बातें ले आए हैं जो आपके जानने लायक हैं :

#1. अपने समाज सुधार के कामों के लिए याद किए जाने वाले नंबूदिरीपाद की पैदाइश 13 जून 1909 को मलप्पुरम के एक कट्टर ब्राह्मण परिवार में हुई थी. बचपन में उन्हें कुंजू (हिंदी में इसका तर्जुमा ‘छोटू’ होगा) बुलाते थे. मां इन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं, इसलिए नंबूदिरीपाद की शुरुआती पढ़ाई घर पर मां की देखरेख में हुई. लेकिन नंबूदिरीपाद को इसमें मज़ा नहीं आता था. कहते थे वेदों को मतलब समझे बिना रटने में क्या फायदा. नंबूदिरीपाद को रस आया स्कूल जाकर, जहां हर वर्ग के बच्चे साथ में पढ़ते थे.

#2. अपने आस-पास की सच्चाई को नंबूदिरीपाद ने बड़ी जल्दी समझा. समाज-सुधार में उनकी पहली कोशिशें नंबूदिरी  समाज (जिस समाज से वे आते थे) के लिए ही थीं. इसके लिए उन्होंने अपने दो साथियों वीटी भत्ताथिरिपाद और एमबी भत्ताथिरिपाद के साथ मिलकर उन्नीनंबूथिरी  नाम से एक मैगज़ीन निकाली, जिसमें वे अपने विचार लिखते थे. नंबूदिरी समाज में किसी विधवा की दोबारा शादी करने की कोशिश 1931 में नंबूदिरीपाद ने ही की थी. तब उनकी उम्र महज़ 16 साल थी. इसके लिए समाज में उनका बॉयकॉट कर दिया गया था. एक कट्टर ब्राह्मण परिवार से आने वाले नंबूदिरीपाद ने अपनी पूरी ज़िंदगी सभी समाज के लोगों के बीच बिताई और छुआछूत के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की.

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नंबूदिरीपाद (बाएं) के साथ प्रकाश करात.

#3. आज़ादी के आंदोलन में शामिल होने के लिए नंबूदिरीपाद ने अपनी डिग्री की पढ़ाई छोड़ दी थी. सविनय अवज्ञा आंदोलन (सिविल डिसओबीडियंस मूवमेंट) में सालभर के लिए जेल भी गए. बाद में अंग्रेज़ सरकार इनसे इतनी तंग हुई कि ये या तो जेल में रहते थे, या तो अंडरग्राउंड. जेल में रहते हुए ही कांग्रेस के उन नेताओं के करीब आए जिनका झुकाव समाजवाद की तरफ था. 1934 में नंबूदिरीपाद ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी जाइन की. उन दिनों कांग्रेस के अंदर छोटी-छोटी पार्टियां होती थीं और इस पर कोई ऐतराज़ नहीं जताता था.

#4.  कांग्रेस से मोहभंग होने पर नंबूदिरीपाद का झुकाव लेफ्ट की तरफ हुआ. उनका केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन खड़ा करने में बड़ा हाथ था. आज़ादी के बाद उन्होंने अपनी जायदाद बेच दी. इससे जो पैसा आया, वो उन्होंने केरल में कम्युनिस्ट पार्टी को खड़ा करने के लिए दान कर दिया. इस पैसे से पार्टी के अखबार ‘देसभिमानी’ को दोबारा शुरू किया गया, जिसे 1942 में अंग्रेज़ों ने बैन कर दिया था.

#5. आज़ादी के बाद भारत में लेफ्ट पार्टियों पर फिर बैन लगा. नंबूदिरीपाद दोबारा तीन साल तक अंडरग्राउंड हो गए. तब उनके सिर पर 1000 रुपए का इनाम रख दिया गया था. उन दिनों में ये रकम आज के लाखों रुपए के बराबर थी.

स्रोतः गूगल मैप्स
स्रोतः गूगल मैप्स

#5. केरल का जो नक्शा आज हम देखते हैं, उसे बनाने में भी नंबूदिरीपाद का हाथ था. उन्होंने ऐक्य केरलम  की मुहिम चलाई थी. उनका मानना था कि देश में राज्यों का पुनर्गठन सिर्फ भाषा के आधार पर होना चाहिए. इसलिए इनकी मांग थी कि त्रावणकोर, कोचीन और ब्रिटिश मालाबार के इलाके एक राज्य में रहें.

#6. नंबूदिरीपाद 1957 में जब केरल के पहले मुख्यमंत्री बने, तो उनकी सरकार भारत में पहली चुनी हुई लेफ्ट सरकार थी. माने ऐसी सरकार जो वामपंथ के सिद्धांतों को मानती हो, लेकिन खुले चुनावों में लड़कर सत्ता तक पहुंची हो. वर्ना आमतौर पर लेफ्ट की सरकारें वहां सत्ता में आती रही हैं, जहां सिर्फ एक पार्टी चुनाव लड़ती है. ये हिंदुस्तान में लोकतंत्र की विविधता बताता था. पूरे देश में कांग्रेस और केरल में लेफ्ट. लेकिन नेहरू सरकार नंबूदिरीपाद सरकार को एक चुनौती की तरह देखती थी.

वी.वी. गिरी
वी.वी. गिरी

#7. इसी के चलते 1959 में केंद्र की नेहरू सरकार ने केरल के तब के राज्यपाल वीवी गिरी के ज़रिए नंबूदिरीपाद की सरकार गिरा दी थी. इसके लिए केंद्र सरकार ने संविधान के आर्टिकल 356 का सहारा लिया. भारत में किसी चुनी हुई सरकार को इस तरह गिराए जाने का ये पहला मामला था. कहते हैं कि ये सब इंदिरा गांधी के कहने पर हुआ. नेहरू के इस कदम की खूब आलोचना हुई थी. खुद उनके दामाद फिरोज़ गांधी इस कदम के खिलाफ थे.

#8. नंबूदिरीपाद में ज़िद भी गज़ब की थी. पहली सरकार बनाने के बाद उन्होंने भूमि सुधार के कई फैसले लागू किए. लेकिन सरकार गिर गई. तो दोबारा सत्ता में आने का इंतज़ार किया और वही फैसले लागू किए.

#9. राजनेता लाख बार तोलकर कोई बात कहते हैं. कई बार ‘मजबूरी’ में चुप भी रह जाते हैं. लेकिन नंबूदिरीपाद अपनी राय रखने में कभी पीछे नहीं हटे. वे मुस्लिम समाज के विरोध की परवाह किए बगैर कहते थे कि शरिया कानून में सुधार की ज़रूरत है. ये भी कहा जाता है कि वे महात्मा गांधी को एक फंडामेंटलिस्ट (कट्टरपंथी) मानते थे. इसके पीछे उनकी अपनी वजहें थीं. उनकी छवि हमेशा एक फायरब्रांड नेता की रही.

#10.  एक पक्के लेफ्टिस्ट की तरह नंबूदिरीपाद अपने आखिरी दिन तक काम करते रहे. अपनी मौत के कुछ घंटे पहले उन्होंने अपने असिस्टेंट्स को दो आर्टिकल डिक्टेट किए थे. उनका देहांत 19 मार्च 1998 को तिरुवनंतपुरम में हुआ.


वीडियो: केरल में ‘मेट्रो मैन’ श्रीधरन पर क्यों पलटी बीजेपी?

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