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पड़ताल: क्या महात्मा गांधी ने भगत सिंह को फांसी से बचाने की कोशिश तक नहीं की?

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दावा

सोशल मीडिया पर गांधी जंयती के दिन से ही एक दावा वायरल हो रहा है. गांधी को भगत सिंह का क़ातिल बताया जा रहा है. कई ग्रुप्स में यही दावा दोहराया जा रहा है.  ‘आई एम विद इंडियन आर्मी’ नाम के ग्रुप में उज्जवल हिंदू नाम के यूज़र ने ये दावा पोस्ट किया है.(आर्काइव लिंक) हम दावे की भाषा में बिन बदलाव किए, ज्यों का त्यों लिख रहे हैं.

बेशक तेरी फ़ोटो नोटों पर है , मगर तू कातिल है
हमारे भगत सिंह का,

#fan भगत सिंह Da

वायरल दावा.
वायरल दावा.

पड़ताल

हमने सोशल मीडिया पर वायरल इस दावे की पड़ताल की. इस दावे में कई तथ्य आपस में गुंथे हुए हैं. आज़ादी के क़रीब 72 साल बाद ये मामला वैचारिक समझ का ज्यादा बन गया है. एक धारा मानती है कि गांधी प्रयास कर सकते थे, लेकिन उन्होंने नहीं किए. दूसरी धारा का मानना है कि गांधी ने पुरज़ोर कोशिश की लेकिन वायसराय ने उनकी बात नहीं मानी. और भगत सिंह की फांसी नहीं टाली जा सकी. हम आपके सामने दोनों ओर के तथ्य रख रहे हैं.

गांधी के आलोचक अक्सर इल्जाम लगाते हैं कि वो चाहते तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी रुकवा सकते थे. मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. ये इल्जाम सही नहीं हैं.
गांधी के आलोचक अक्सर इल्जाम लगाते हैं कि वो चाहते तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी रुकवा सकते थे. मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया.

ऊपर लिखा दावा ग़लत है. ये कल्पना आधारित और ख़ास तरीके से फैलाया जा रहा झूठ है. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को नेशनल असेंबली लाहौर में दो बम फोड़े थे. इसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया और फिर मुकदमा चला.

भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी थे. वो हिंसा के रास्ते ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दे रहे थे.
भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी थे. वो हिंसा के रास्ते ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दे रहे थे.

गांधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश की थी. 4 मई, 1930 को गांधी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को एक लेटर लिखा था. लेटर भगत सिंह और साथियों के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल बनाने के ख़िलाफ था. उसमें गांधी ने लिखा,

आपने सामान्य प्रक्रिया को हटाकर भगत सिंह और साथियों पर मुकदमे के मामले में कानून की देरी को कम करने का शॉर्टकट खोज लिया है. क्या यह कोई आश्चर्य है कि अगर मैं इन सभी आधिकारिक गतिविधियों को मार्शल लॉ का छुपा हुआ रूप कहूं?

इस दौरान भगत सिंह और साथियों पर कार्रवाई चलती रही. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सज़ा देने का ऐलान हुआ. तारीख़ मुकर्रर हुई 24 मार्च, 1931.

इससे पहले 31 जनवरी, 1931 को इलाहाबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा था कि जिन कैदियों को फांसी की सजा मिली है, उन कैदियों को फांसी नहीं मिलनी चाहिए. पर यह तो मेरी निजी राय है. इसे समझौते की शर्त नहीं बना सकते.

गांधी जिस समझौते की बात कर रहे थे, वो था लॉर्ड इरविन और कांग्रेस के बीच हुआ गांधी-इरविन पैक्ट. 17 फरवरी, 1931. गांधी और वायसराय इरविन के बीच इस समझौते पर बातचीत शुरू हुई. लोग चाहते थे कि गांधी तीनों की फांसी रुकवाने के लिए इरविन पर जोर डालें. शर्त रखें कि अगर ब्रिटिश सरकार सजा कम नहीं करेगी, तो बातचीत नहीं होगी. मगर गांधी ने ऐसा नहीं किया. ‘यंग इंडिया’ में लिखते हुए उन्होंने अपना पक्ष रखा –

कांग्रेस वर्किंग कमिटी भी मुझसे सहमत थी. हम समझौते के लिए इस बात की शर्त नहीं रख सकते थे कि अंग्रेजी हुकूमत भगत, राजगुरु और सुखदेव की सजा कम करे. मैं वायसराय के साथ अलग से इस पर बात कर सकता था.

ये दूसरे गोलमेज सम्मेलन की तस्वीर है. गांधी-इरविन पैक्ट में कांग्रेस ने इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने की रजामंदी दी थी. गांधी को कांग्रेस का इकलौता प्रतिनिधि चुना गया था (फोटो: यूनिवर्सल हिस्ट्री आर्काइव/ Getty)
ये दूसरे गोलमेज सम्मेलन की तस्वीर है. गांधी-इरविन पैक्ट में कांग्रेस ने इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने की रजामंदी दी थी. गांधी को कांग्रेस का इकलौता प्रतिनिधि चुना गया था (फोटो: यूनिवर्सल हिस्ट्री आर्काइव/ Getty)

ब्रिटिश हुकूमत तक वायसराय के ज़रिए बात पहुंचाना ही आख़िरी रास्ता बचा था. क्योंकि 11 फरवरी, 1931 को प्रिवी काउंसिल में अपील करने के लिए दायर खास याचिका ख़ारिज हो चुकी थी. इससे तीनों को फांसी से बचाने की उम्मीदें कम हो गई थीं.

गांधी-इरविन के बीच 5 मार्च तक गांधी इरविन पैक्ट के लिए बातचीत हुई. लेकिन गांधी ने पैक्ट की बातचीत में भगत सिंह को रिहा करने की शर्त नहीं रखी. उन्होंने कहा था कि मैं निजी तौर पर वायसराय से बातचीत करूंगा. 18 फरवरी की इस बातचीत के बारे में बताते हुए उन्होंने लिखा है –

इस मुद्दे का हमारी बातचीत से संबंध नहीं है. मेरेद्वारा इसका जिक्र किया जाना शायद अनुचित भी लगे. लेकिन अगर आप मौजूदा माहौल को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो आपको भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी की सजा खत्म कर देनी चाहिए. वायसराय को मेरी बात पसंद आई. उन्होंने कहा – मुझे खुशी है कि आपने इस तरीके से मेरे सामने इस बात को उठाया है. सजा कम करना मुश्किल होगा, लेकिन उसे फिलहाल रोकने पर विचार किया जा सकता है. 

गांधी से बातचीत के बाद वायसराय लॉर्ड इरविन ने सेक्रटरी ऑफ स्टेट को रिपोर्ट भेजी. इरविन ने लिखा,

गांधी चूंकि अहिंसा में यकीन करते हैं इसीलिए वो किसी की भी जान लिए जाने के खिलाफ हैं. मगर उन्हें लगता है कि मौजूदा हालात में बेहतर माहौल बनाने के लिए ये सजा फिलहाल मुलतवी कर देनी चाहिए.

गांधी का कहना था कि भगत सिंह और साथियों की सज़ा कम से कम कराची अधिवेशन (26-31 मार्च, 1931) तक टाल देनी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

कराची कांग्रेस अधिवेशन के शुरुआती सत्र के दौरान गांधी, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चंद्र बोस और जमनालाल बजाज (फोटो: malaviyamission.org)कराची कांग्रेस अधिवेशन के शुरुआती सत्र के दौरान गांधी, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चंद्र बोस और जमनालाल बजाज (फोटो: malaviyamission.org)
कराची कांग्रेस अधिवेशन के शुरुआती सत्र के दौरान गांधी, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चंद्र बोस और जमनालाल बजाज (फोटो: malaviyamission.org)

गांधी ने भगत सिंह की फांसी रोकने की आख़िरी दिनों तक कोशिश की. गांधी अपनी कोशिशों में जुटे थे. उन्हें लग रहा था कि शायद वो वायसराय को मना लेंगे. इसीलिए वो कराची अधिवेशन के लिए रवाना होने में भी देर कर रहे थे. 20 मार्च, 1931 को उन्होंने होम सेक्रेटरी हर्बर्ट एमर्सन से इस बारे में बात की थी. 21 मार्च, 1931 को रॉबर्ट बर्नेज़ ने न्यूज क्रॉनिकल में लिखा-

गांधी कराची अधिवेशन के लिए रवाना होने में देर कर रहे हैं, ताकि वो भगत सिंह की सजा पर वायसराय से बात कर सकें.

21 मार्च को गांधी ने इरविन से मुलाकात भी की. फिर से उन्होंने इरविन से अपील की. 22 मार्च को भी वो इरविन से मिले. वायसराय ने वादा किया कि वो इस पर विचार करेंगे. गांधी को उम्मीद दिखी. 23 मार्च, 1931. यानी मुकर्रर तारीख़ से 1 दिन पहले, उन्होंने वायसराय को एक लेटर लिखा.  उसमें फांसी होने की स्थिति में शांति और हालात बिगड़ने की बातें लिखी थीं. फांसी पर एक बार और विचार करने की बात लिखी थी.

गांधी का तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन को लिखा लेटर. (सौजन्य- गांधी रिसर्च फाउंडेशन).
गांधी का तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन को लिखा लेटर. (सौजन्य- गांधी रिसर्च फाउंडेशन).

लेकिन उसी शाम, यानी 23 मार्च, 1931 को तय तारीख़ से एक दिन पहले शाम के वक्त भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सज़ा दे दी गई.

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के फांसी की तारीख 24 मार्च, 1931 तय हुई थी. लेकिन उन्हें एक दिन पहले 23 मार्च की शाम सात बजे ही गुपचुप तरीके से फांसी चढ़ा दिया गया. ये 'द ट्रिब्यून' अखबार का फ्रंट पेज, जहां इस फांसी की खबर लीड न्यूज है.
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के फांसी की तारीख 24 मार्च, 1931 तय हुई थी. लेकिन उन्हें एक दिन पहले 23 मार्च की शाम सात बजे ही गुपचुप तरीके से फांसी चढ़ा दिया गया. ये ‘द ट्रिब्यून’ अखबार का फ्रंट पेज, जहां इस फांसी की खबर लीड न्यूज है.

गांधी के आलोचक कहते हैं…

गांधी के आलोचक कहते हैं कि उन्होंने गांधी-इरविन पैक्ट में भगत सिंह को छोड़ने की मांग नहीं रखी. अगर रखी होती तो हालात कुछ और होते. इसी बात से वो सवाल निकालते हैं कि अगर सुभाष चंद्र बोस ने 20 मार्च, 1931 को दिल्ली में बड़ी रैली निकालकर सज़ा का विरोध किया था तो गांधी ने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया?

गांधीवादी बचाव करते हैं
वहीं गांधीवादी कहते हैं कि गांधी-इरविन पैक्ट में भगत सिंह की रिहाई शामिल कर पाना संभव नहीं था. ये पहला कोई समझौता था ब्रिटिश राज और देश के किसी राजनीतिक दल के बीच. इसमें देश के बड़े तबके का हित था. इसलिए किसी एक मांग की वजह से पूरे समझौते को दरकिनार नहीं किया जा सकता था.

नतीजा

ऐतिहासिक दस्तावेज़ और संस्मरण बताते हैं कि गांधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश की थी. कई जगहों पर, कई बार. लेकिन क्या वो पर्याप्त थीं या नहीं ये विचार के स्तर की बात है, इस पर लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है. लेकिन गांधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश की. ये फैक्ट है.

अगर आप भी किसी दावे की सच्चाई जानना चाहते हैं तो हमें लिखें- padtaalmail@gmail.com पर. हम दावे की पड़ताल करेंगे और आप तक सच पहुंचाएंगे.


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