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वो 16 मज़ेदार कहानियां जिन्हें इस बार नेशनल अवॉर्ड मिला है

#1. कासव
बेस्ट फीचर फिल्म

इस मराठी फिल्म के नाम कासव का मतलब होता है कछुआ. वो जीव जिसने सदियों तक कैसे सरवाइव किया है वो भी बिना किसी प्रयास के. ये फिलॉसफी न जाने कितनी फिलॉसफियों से मिलकर बन होगी जिनकी क्वेस्ट थी जीवन को जानने की. वो मूलभूत सवाल पूछने की जो हर पीढ़ी के अनेक-अनेक सेंसेटिव मनुष्यों के मन में दुखता रहता है – कि संसार में इतना दुख क्यों हैं? इंसान इतना खराब क्यों हैं? हमारे इस दुनिया में होने का मकसद क्या है? जिंदगी जीने का सबसे सही तरीका क्या है? प्राचीन काल में संत, साधु, अघोरी शायद इसी सवाल के जवाब में वो हो गए. इसी के जवाब में एक राजकुमार घर-बार, बीवी-बच्चे, राजपाट सब त्यागकर पेड़ के नीचे आंखें बंद करके बैठ गया. ‘कासव’ हर दौर की कहानी है और 2017 के वक्त की तो है ही. ये आज के सोशल मीडिया के दौर में युवाओं के स्टेट ऑफ माइंड को तलाशती है. वो रोहित वेमुला का रेफरेंस भी रखती है.

कहानी में कई पात्र हैं, सबकी कहानियां जुड़ी हैं. एक युवक बहुत परेशान है. आत्महत्या करने की कोशिश करता है. सड़क किनारे पड़ा होता है कि एक औरत उसे बचाती है और अपने घऱ ले आती है. वो औरत भी पति से तलाक की सन्निकट स्थिति का सामना करने के नाम पर बेचैन हो रही है. सब अपनी जिंदगियों की धुरी ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जहां संतुलन मिले.

‘कासव’ को डायरेक्ट किया है सुमित्रा भावे और सुनील सुखटनकर ने. ये दोनों मराठी सिनेमा के उन हीरों में से हैं जिन्हें लेकर मेनस्ट्रीम सिनेमा में ज्यादा चर्चा नहीं हुई है जबकि बीते बीस सालों में उनकी सारी फिल्में बहुत जोरदार रही हैं. बहुत सार्थक. जबरदस्त शांति देने वाली. संतुष्ट करने वाली हैं. पिछले साल आई ‘अस्तु’ भी इस जोड़ी ने ही डायरेक्ट की थी. ये भी जिंदगी और मानवता की थीम पर आधारित थी जिसे हमने 2016 की मस्ट वॉच रीजनल फिल्मों में शामिल किया था.

#2. सुरभि सी. एम
बेस्ट एक्ट्रेस

उन्हें अपनी मलयालम फिल्म ‘मिन्नामीनुगू – द फायरफ्लाई’ के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला है. फिल्म में जैसा उनका लुक है, असल में वे उसके बिलकुल उलट है. उन्होंने बहुत जोरदार अभिनय किया है. डिजर्विंग अवॉर्ड है. कहानी में वे एक सिंगल मदर बनी हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी में बचे रहने के लिए कड़ी मेहनत और संघर्ष करती है. वो गरीब भी है और महिला भी. ये दोतरफा शोषण वो झेलती है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो झेल ही लेती है. लेकिन परिस्थितियां उसे तोड़ने में भी कोई कसर भी नहीं छोड़तीं.

#3. पिंक
बेस्ट फिल्म ऑन सोशल इश्यूज़

2016 की सबसे डिजर्विंग फिल्मों में ‘पिंक’ सबसे ऊपर रखी जा सकती है. ये वही फिल्म थी जिसने महिलाओं के साथ यौन अपराधों के मामले में ऐसी समझदारी करोड़ों लोगों के बीच रखी जो किसी फिल्म ने पहले नहीं रखी थी. आमतौर पर पॉपुलर फिल्में दर्शकों की खुशी पर खेलती हैं. अगर चौराहे पर किसी को उल्टा लटकाकर हीरो डंडे मारेगा और लोग खुश होते हैं तो डायरेक्टर ऐसा ही मुहैया कराएगा. लेकिन राइटर रितेश शाह, प्रोड्यूसर सुजीत सरकार और डायरेक्टर अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने पिंक के जरिए उस डिबेट को बहुत मजबूत किया जिसमें हमेशा स्पष्ट किया जाता है कि लड़की के छोटे कपड़े पहनने, शराब पीने, देर रात पार्टी में जाने से किसी लड़के को उसे छूने और जबरदस्ती करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता. फिल्म ने सबसे खास बात ये स्थापित की कि अगर कोई सेक्स वर्कर भी पैसे के बाद, सेक्स करने से आखिरी वक्त में पलट जाए तो पुरुष को वहीं रुक जाना होगा. फिल्म में अमिताभ बच्चन के अंतिम संवाद के जरिए दर्शकों को समझ में आया कि ‘नो’ का मतलब ‘नो’ ही होता है और आपको वहीं ठहर जाना होगा.

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Read: फिल्म ‘पिंक’ से 12 सबसे धांसू डायलॉग.

#3. काडू पोक्कुना नीरम
बेस्ट साउंड डिजाइन

फिल्म का दृश्य.
एक दृश्य में फिल्म के लीड एक्टर रीमा कलिंगल और इंद्रजीत सुकुमारन.

मलयालम सिनेमा में अपनी हरेक फिल्म से बहुत ही शानदार और रेलेवेंट सामाजिक कहानियां कहने वाले डॉ. बीजू ने ‘काडू पोक्कुना नीरम’ को डायरेक्ट किया है जिसका अर्थ होता है ‘जब जंगल खिलते हैं.’ कहानी में माओवादी गतिविधियों वाले एक वन क्षेत्र के पास बने गांव में पुलिस की टुकड़ी डेरा डालती है. वहां आदिवासी बच्चों के लिए जो स्कूल बनी होती है उसके कमरों पर पुलिस का कब्जा हो जाता है. एक रात पुलिस नजर रख रही होती है कि एक पुलिसवाला किसी के पीछे-पीछे जंगल जाता है और उसे पकड़ लेता है. माओवादी होने के संदेह में वो जिसे पकड़ता है वो एक औरत निकलती है. वो पकड़कर उसे जंगल से बाहर लाने की कोशिश करता है लेकिन रास्ता भटक जाता है. अब सिर्फ उसी औरत को पता है कि बाहर कैसे निकल सकते हैं. ये परिस्थिति एक बहुत बड़ा कमेंट बनती है. फिर कहानी आगे बढ़ती है.

इससे पहले भी डॉ. बीजू की फिल्में चार नेशनल अवॉर्ड जीत चुकी हैं.

#4. दशक्रिया
तीन नेशनल अवॉर्ड

इस फिल्म को बेस्ट मराठी फीचर का अवॉर्ड मिला है. मनोज जोशी को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर और बेस्ट एडेप्टेड स्क्रीनप्ले के लिए संजय कृष्णाजी पटेल को भी नेशनल अवॉर्ड गए हैं. डायरेक्टर संदीप पाटिल की ‘दशक्रिया’ का ट्रेलर भी उपलब्ध नहीं हैं. पूरी फिल्म इस साल उपलब्ध हो सकती है. इसकी कहानी मराठी के फेमस राइटर बाबा भांड़ के उपन्यास ‘दशक्रिया’ से एडेप्ट की गई है. इसके केंद्र में भानुदास नाम का आदमी है. अन्य बहुत सारे पात्र हैं. बच्चों के केंद्रीय किरदार भी हैं. शवों का अंतिम संस्कार करने वाले समुदाय और उनके कठिन जीवन के जरिए ये कहानी ह्यूमन स्ट्रगल, गरीबी, जाति व्यवस्था और रूढ़िवादिता जैसे विषयों पर टिप्पणी करती है.

फिल्म का एक दृश्य.
दशक्रिया के एक दृश्य में बच्चों के किरदार.

#4. जोकर
दो नेशनल अवॉर्ड

इस पोलिटिकल सटायर को बेस्ट तमिल फीचर फिल्म और बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर के अवॉर्ड अनाउंस हुए हैं. 2016 की बेस्ट फिल्मों में ‘जोकर’ थी. इसे डायरेक्ट किया है राजू मुरुगन ने जो उम्दा फिल्ममेकर हैं. उनकी पहली ही फिल्म ‘कुकू’ एक सम्मोहक और पिघला देने वाली लव स्टोरी थी जिसके दोनों लीड कैरेक्टर, एक युवक और युवती देख नहीं सकते हैं. राजू की तीसरी फिल्म है ‘जोकर.’ ये ऐसे आदमी के बारे में है जो खुद को देश का राष्ट्रपति कहता है और गांव भर में ऐसे ही घूमता है. वो सरकार की नीतियों की खुली आलोचना करता है. दफ्तरों में इंस्पेक्शन करने पहुंच जाता है. लोग उसे पागल और जोकर कहते हैं. लेकिन वो ऐसा क्यों करता है इसके पीछे कहानी है. ऐसी पोलिटिकल सटायर काफी समय से नहीं आई थी.

#5. अक्षय कुमार
बेस्ट एक्टर

ऐसा नहीं है कि ‘रुस्तम’ में अक्षय की एक्टिंग पिछली फिल्मों से अच्छी हो गई है. इससे अच्छी एक्टिंग तो उन्होंने ‘पटियाला हाउस’ और ‘चांदनी चौक टु चाइना’ में की थी. इस बार उनके जीतने की बड़ी वजह प्रियदर्शन रहे जो 11 मेंबर वाली नेशनल अवॉर्ड ज्यूरी के अध्यक्ष थे. वे अक्षय के बहुत करीब हैं. प्रियदर्शन की बनाई ‘हेरा फेरी’, ‘गरम मसाला’, ‘भूल भुलैया’, ‘दे दना दन’ और ‘खट्टा मीठा’ जैसी फिल्मों में अक्षय हीरो रहे हैं, आगे भी दोनों साथ काम करेंगे. पिछले साल भी नेशनल अवॉर्ड में अमिताभ बच्चन को ‘पीकू’ के लिए बेस्ट एक्टर घोषित किया गया क्योंकि रमेश सिप्पी ज्यूरी के अध्यक्ष थे. वहीं जिन्होंने ‘शोले’ बनाई थी जिसमें बच्चन ने जय का रोल किया था. वो और सिप्पी फैमिली फ्रेंड हैं. दोनों के बेटे अभिषेक और रोहन बचपन के पक्के दोस्त हैं.

बेस्ट एक्टर का यही अवॉर्ड पूर्व में ‘शाहिद’ जैसी बहुत प्रशंसित फिल्म के लिए राजकुमार राव को मिला है, ‘देऊल’ जैसी बढ़िया मराठी फिल्म के लिए गिरीश कुलकर्णी (‘अग्ली’ का फनी पुलिस इंस्पेक्टर) को मिला है.

अक्षय के विकल्प तमिल फिल्म ‘जोकर’ में यादगार अभिनय करने वाले गुरु सोमासुंदरम हो सकते थे, असमी फिल्म ‘दिकचो बनत पलाक्ष’ के लिए कुमार भट्टाचार्जी हो सकते थे. और हिंदी में ही देना था तो ‘अलीगढ़’ के लिए मनोज बाजपेयी सबसे बेहतरीन विकल्प थे. ‘रमन राघव 2.0’ के लिए नवाजुद्दीन सिद्दीकी हो सकते थे. अगर अक्षय को इस लिहाज से अवॉर्ड दिया गया है कि अब क्षेत्रीय फिल्मों के बजाय बॉलीवुड के लोगों को ही प्रमुख अवॉर्ड देकर इन अवॉर्ड्स को लोकप्रिय बनाना है और समलैंगिक रिश्तों जैसे विषय के कारण मनोज उन्हें योग्य नहीं लगे तो ‘दंगल’ के लिए आमिर अच्छे विकल्प थे. अक्षय किसी भी लिहाज से बेस्ट एक्टर में फिट नहीं होते.

ज्यूरी प्रमुख प्रियदर्शन ने ये भी कहा कि ये अवॉर्ड अक्षय को ‘रुस्तम’ के अलावा ‘एयरलिफ्ट’ के लिए भी मिला है.

#6. सथामनम भवति
बेस्ट पॉपुलर फिल्म प्रोवाइडिंग होलसम एंटरटेनमेंट

यह तेलुगु फिल्म पारंपरिक मूल्यों और जॉइंट फैमिली की कद्र समझाती है. इसमें एक बड़ा परिवार है, हल्के-फुल्के मज़ाक है, इमोशंस हैं, ग्रामीण लोकेशंस है, फ्रेम चटख-रौशन रंगों से भरे हैं. कहीं कुछ ग्रे नहीं है. कहानी राघवराजू की है जो रोल प्रकाशराज ने निभाया है. वो बुजुर्ग आदमी है. गांव में अपनी पत्नी और पोते के साथ रहता है. उसकी बेटियां और बेटे विदेश में रहते हैं. उसे दुख है कि वो लोग अपने गांव नहीं आते. फिर वो उनको यहां बुलाने के लिए कुछ प्लान करता है. वे यहां आते हैं और उन्हें अपने पारंपरिक मूल्यों का अहसास होता है. पॉपुलर सिनेमा के सबसे बेसिक दर्शकों के लिहाज से ये एक स्वस्थ और एंटरटेनिंग फिल्म है जिसमें कोई बड़ी फाइट्स या आपत्तिजनक कंटेंट नहीं है. हालांकि ओवरऑल देखा जाए तो इससे बेहतर भी बहुत सारी फिल्में पिछले साल रही हैं.

#7. धनक
बच्चों की बेस्ट फिल्म

डायरेक्टर नागेश कुकुनूर की ये फिल्म सिनेमा को सबसे मासूम स्तर पर सेलिब्रेट करने की कोशिश है. राजस्थान के चुरू जिले में रहते हैं दो बच्चे, एक बहन और उसका छोटा भाई. जीवन को लेकर बहुत उत्साहित उसका नन्हा भाई देख नहीं सकता. बहन एक दिन शाहरुख खान का पोस्टर देखती है – नेत्रदान कीजिए. उसे लगता है शाहरुख खान उपाय है. फिर जब जैसलमेर में शाहरुख शूटिंग कर रहा होता तो वो बच्ची अपने भाई को लेकर उससे मिलने घर से निकल जाती है ताकि भाई की आंखें आ सकें. लेकिन रास्ता पता नहीं. ये उनके इस सफर की कहानी है. जो राजस्थान, म्यूजिक, जिंदगी, धोरों, ऊंटों, मेलों, मददगार लोगों और एडवेंचर से भरा है. बहुत ही अच्छी फिल्म.

#8. वेंटीलेटर
तीन अवॉर्ड

इस मराठी फिल्म को बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट एडिटिंग और बेस्ट साउंड मिक्सिंग के अवॉर्ड घोषित हुए हैं. प्रियंका चोपड़ा ने इसे प्रोड्यूस किया है. ‘लगान’ फेम डायरेक्टर आशुतोष गोवारिकर इसमें एक्टिंग करते दिखते हैं. डायरेक्ट किया है राजेश मापुस्कर ने जो राजकुमार हीरानी के असिस्टेंट रहे हैं. उन्होंने भी हीरानी और ऋषिकेश मुखर्जी वाले सिनेमा की घुट्टी पी हुई है. इससे पहले राजेश ने एक हिंदी फिल्म बनाई है – ‘फरारी की सवारी’ जो एक हेल्दी एंटरटेनिंग फिल्म थी. ह्यूमन वैल्यूज़ और लाइफ को सेलिब्रेट करने वाली. ‘वेंटीलेटर’ एक बुजुर्ग की कहानी है जो जब बीमार हो जाते हैं और वेंटीलेटर पर रखे जाते हैं तो उनके मुहल्ले और करीबी समुदाय के लोग चिंतित हो जाते हैं.

फिल्म एक तरह से महानगरों में लोगों के बीच आती आत्मीयता और स्पर्श की कमी का दूसरा रूप दिखाती है जो मुंबई से बाहर अभी भी और मुंबई के कुछ मुहल्लों में जिंदा है जहां लोग भौतिकता में पूरे नहीं धंसे हैं. फिल्म कम्युनिटीज का रेलेवेंस दिखाती है.

#9. दिकचो बनत पलाक्षा
नेशनल इंटीग्रेशन पर बनी बेस्ट फिल्म

ये एक असमी फिल्म है. कहानी है एक बुजुर्ग की और उसके अतीत की उन बातों को जो उसे तड़पा रही हैं. फिर कहानी एक स्वतंत्रता सेनानी और एक नागा औरत के प्यार की निकलती है. 1946 से ये यात्रा शुरू होती है जब एक असमी नौजवान को उसके ही जिले में घुसने पर ब्रिटिश सरकार रोक लगा देती है. फिर वो नगा पहाड़ियों पर भटकता है और वहां उसे एक नगा युवती से प्यार हो जाता है. वो जिंदा रहने के लिए उसे कुछ सिक्के देती है. बाद में दोनों बिछड़ जाते हैं. बुढ़ापे में उस बुजुर्ग को वो ही सिक्के याद आते रहते हैं. फिर कहानी वर्ष 2000 तक पहुंचती है जब वो बुजुर्ग उस जगह लौटने का मन बनाता है जहां की उसकी यादें होती हैं. फिल्म इस प्रेम और विरह की कहानी के जरिए ही ये बताती है कि अलग-अलग इंसानी पहचानों के बीच भी इंसान एक होकर साथ रह सकते हैं. फिल्म में बुजुर्ग का रोल करने व्यक्ति नॉन-एक्टर लगते हैं इतने अच्छे हैं लेकिन असल में वो जाने-माने एक्टर कुमार भट्टाचार्जी हैं.

#10. कड़वी हवा
स्पेशल मेंशन अवॉर्ड

इस फिल्म के बारे में हमने यहांपढ़ाया था. संजय मिश्रा अभिनीत ‘कड़वी हवा’ की कहानी बहुत उत्साह जगाने वाली है. बुंदेलखंड के एक गांव की बात है जहां 15 साल से बरसात नहीं हुई है. यहां हेडू नाम का अंधा बुजुर्ग रहता है. उसके किसान बेटे ने बैंक से लोन ले रखा है लेकिन चुका नहीं पा रहा. अब हेडू को भय सता रहा है कि कहीं बाकी किसानों की तरह उसका बेटा भी सुसाइड न कर ले. फिर कहानी में गुनू बाबू का पात्र भी है जो एक लोन रिकवरी एजेंट है जो उड़ीसा के तटीय इलाके का रहने वाला है और इतनी दूर लोन बरामद करने आया है. ऐसा कर पाया तो वो अपने परिवार को कहीं सुरक्षित जगह बसा सकता है क्योंकि समंदर किनारे तूफानों के खतरे बढ़ गए हैं. ये रोल रणवीर शौरी ने किया है. आगे कहानी में हेडू और गुनू का रिश्ता दिखता है और किसानी से लेकर ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे इश्यूज़ पर बातें होती हैं.

फिल्म में संजय मिश्रा. ये फर्स्ट लुक शुक्रवार को रिलीज किया गया.
फिल्म में संजय मिश्रा. ये फर्स्ट लुक शुक्रवार को रिलीज किया गया.

‘कड़वी हवा’ को डायरेक्ट किया है नील माधव पांडा ने जिन्होंने ‘आई एम कलाम’ और ‘जलपरी’ जैसी फिल्मों बनाई हैं.

#11. मुक्ति भवन
स्पेशल मेंशन अवॉर्ड

यंग डायरेक्टर सुभाशीष भुटियानी की ये फिल्म मृत्यु के बारे में है और उसे बहुत ही प्यारे व मजेदार ढंग से बताती है. कहानी एक अधेड़ आदमी और उसके पिता की है. उसके रिटायर्ड स्कूल टीचर पिता को एक दिन बुरा सपना आता है और उसे लगता है कि उसका आखिरी वक्त करीब आ गया है. वो अपने बेटे से कहता है कि उसे बनारस ले जाए जहां लोग मरने के लिए जाते हैं और वहां जो भी मरता है वो जन्म-जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है. बाद में वो लोग वहां जाते हैं और मुक्ति भवन नाम की जगह पर रहते हैं जहां जो भी मरने आता है उसके रुकने की व्यवस्था होती है. लेकिन जो 15 दिन में नहीं मरता उसे लौटना होता है. इस प्रवास के दौरान न सिर्फ मृत्यु के बल्कि जीवन के मायने भी सबको समझ आते हैं.

#12. आदिल हुसैन
स्पेशल मेंशन अवॉर्ड

‘लुटेरा’, ‘लाइफ ऑफ पाई’, ‘जेड प्लस’ और ‘द रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट’ जैसी फिल्मों के बेहतरीन अभिनेता आदिल को दो फिल्मों में काम के लिए ये अवॉर्ड दिया जाना है. पहली है ‘मुक्ति भवन’ जिसमें उन्होंने अपने बूढ़े पिता की मौत के ख़याल से रोज जूझने, उनसे इरीटेट होने और उनके मरने को लेकर अपनी पत्नी की बेसब्री को झेलने वाले आदमी का रोल मजेदार ढंग से किया है. दूसरी है असमिया फिल्म ‘मज राती केतेकी’ जो एक जाने-माने लेखक की कहानी है जो अपनी कहानियों में कड़वी सच्चाइयों को शामिल करने से घबराता है ताकि दर्शकों को खुश रख सके. लेकिन फिर वो उस जगह लौटता है जहां से उसने अपनी जर्नी शुरू की थी और वहां उसे जीवन के पुराने अनुभव याद आते हैं, लोग याद आते हैं. अंत में वो तय करता है कि अपनी कहानियों में अपने सच कहेगा न कि वो जो पाठक पढ़ना चाहते हैं.

फिल्म मज राती केतेकी में आदिल हुसैन.
फिल्म मज राती केतेकी में आदिल हुसैन.

उनकी इसी फिल्म ‘मज राती केतेकी’ को बेस्ट असमी फिल्म का नेशनल अवॉर्ड भी मिला है. इसे डायरेक्ट किया है सेंत्वाना बोरदोलोई ने.

#13. प्लेसीबो
बेस्ट इनवेस्टिगेटिव फिल्म

डायरेक्टर अभय कुमार की ये डॉक्यूमेंट्री चार-पांच साल तक अपने बनने के पड़ाव से गुजरती रही. अब ये नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है. ये कहानी है दिल्ली के मेडिकल इंस्टिट्यूट एम्स की जिसमें एक स्टूडेंट के साथ हिंसक वारदात होती है और अभय एक साल तक कैंपस में अंडरकवर रहते हैं. वो चार स्टूडेंट्स को एक साल तक फिल्माते हैं ताकि उन्हें ऑब्जर्व कर सकें. इस दौरान यहां की ऐसी दुनिया दिखाई देती है जो धारणा के उलट है. यहां वो ही बचा रह सकता है जो सबसे टफ हो.

#14. रॉन्ग साइड राजू
बेस्ट गुजराती फिल्म

ये एक सोशल थ्रिलर है जो अहमदाबाद में स्थित है. कहानी राजू अंबानी नाम के युवक के इर्द-गिर्द घूमती है. वह दिन में ड्राइवरी करता है और रात में शराब की तस्करी. उसे एक युवती से प्यार हो जाता है और उसी दौरान कहानी में एक हिट एंड रन केस होता है. आमतौर पर डांडिया, गरबा और विकास के आभासी इंद्रधनुष जैसी सकारात्मक चीजों में डूबे गुजरात में बसी ये फिल्म ऐसी है जो वहां के समाज पर कुछ तल्ख़ टिप्पणियां करती है लेकिन हंसी-ठिठोली के बीच. कहानी में राजू का केंद्रीय पात्र प्रतीक गांधी ने निभाया है जो गुजराती थियेटर में लोकप्रिय नाम हैं. ‘रॉन्ग साइड राजू’ का निर्देशन मिखिल मुसाले ने किया है. उनके साथ इस फिल्म को लिखा है निरेन भट्‌ट और करण व्यास ने. निरेन इससे पहले ‘ऑल इज़ वेल’ और ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की लेखन टीम में रह चुके हैं.

#15. महेशिंते प्रथीकारम
बेस्ट मलयालम फिल्म

डायरेक्टर दिलीश पोथन की ये फिल्म महेश नाम के युवक के बारे में है जो एक फोटोग्राफर है. मस्त और शांत आदमी है. एक बार गांव में उसके दोस्त का कुछ लड़कों से झगड़ा हो जाता है. वो बीच में आता है तो उस दौरान महेश के साथ कुछ ऐसा होता है कि वो प्रण लेता है जब तक बदला नहीं ले लेगा चप्पल नहीं पहनेगा. लेकिन ये रिवेंज थ्रिलर उसके बाद डराने के बजाय हर समय गुदगुदाती है. इसमें एक से एक रंगीन और ठिठोली भरे कैरेक्टर दिखते हैं जिनसे चेहरे पर स्माइल तैर जाती है. फिल्म में लीड रोल फहाद फासिल ने किया है जो मलयालम सिनेमा के अच्छे एक्टर्स में गिने जाते हैं.

#16. सोनम कपूर
स्पेशल मेंशन अवॉर्ड

फिल्म ‘नीरजा’ के लिए सोनम कपूर को स्पेशल मेंशन अवॉर्ड मिला है. 2016 में रिलीज हुई ‘नीरजा’ एयर होस्टेस नीरजा भनोत की असल जिंदगी पर आधारित है जो पैन एएम की उस ‘फ्लाइट 73’ में थीं जब उसे सितंबर 1986 में आतंकियों ने हाइजैक कर लिया था. चंडीगढ़ की रहने वाली नीरजा पैसेंजर्स की सुरक्षा की कोशिशों में निडरता से लगी रहीं और मारी गईं. उन्हें मरणोपरांत भारत में शांतिकाल का सबसे ऊंचा पुरस्कार अशोक चक्र दिया गया था. फिल्म में इस किरदार के चित्रण के बारे में यहां पढ़ सकते हैं.

डायरेक्टर राम माधवानी की ‘नीरजा’ को बेस्ट हिंदी फिल्म भी घोषित किया गया है.

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