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'तुमसे गोली वोली न चल्लई. मंतर फूंक के मार देओ साले'

एक पिच्चर देखी थी. इंजीनियरिंग के फर्स्ट इयर में. बहुत ही अनमने ढंग से देखनी शुरू की और ज्यों-ज्यों फ़िल्म आगे बढ़ती थी. एक बुखार सा चढ़ता जा रहा था. पिच्चर ख़तम होते होते तप रहा था. फिल्मों में ऐसा कुछ भी पहले नहीं देखा था. ऐसे किरदार जो यूं लगते थे कि घर से निकलो तो नुक्कड़ पे बैठे मिलेंगे. ऐसे किरदार जिनके साथ रोज़ का उठना बैठना था.

अब तक मल्होत्राओं और सक्सेनाओं और बजाजों की लत लग चुकी थी लेकिन उसमें अपनापन शून्य था. फ़िल्मों में मल्होत्रा साहब हेलीकॉप्टर से आते थे, हमने ऐसा कभी नहीं देखा था. लेकिन हां चार लड़के जब एक को मार रहे थे तो मार खाने वाले को कहते ज़रूर सुना था ‘लौंडिया के जैसा काहे मार रहा है बे?’ ये सारा ‘पारिवारिक मजा’ हासिल हुआ ‘हासिल’ में. बनाने वाला ठेठ इलाहाबादी जिसने लौंडों को सचमुच कर्नलगंज से यूनिवर्सिटी तक दौड़ाए जाने के पूरे कार्यक्रम को घोट कर पिया और फ़िल्म में उसे जिला दिया.
फ़िल्म कतई अंडर-रेटेड है, और मेरा हाल ये है कि जब तक दिन के बीस-पच्चीस डायलॉग ना मार लूं, चैन नहीं पड़ता.  इसके भौकाल को फ़ैलाने की सख्त ज़रुरत मालूम देती है. उसी के लिए बनाया गया है, फेसबुक पर ये पेज.

1.

1 (3)
“किससे मिलना है?”
“सीएम साब से”
“अभी मिलना मुश्किल है कल आना !”
“कल आना? आज आ गए हैं तो आज मिल लेते हैं !
सर ! जयहिन्द !”
“सीएम साब आपसे नहीं मिलना चाहते”
“क्यों? हम कोई गुंडे बदमाश हैं?
पता है भईया पार्टी-वार्टी चल्ल्यी है पर हम भी कोई ऐसे वैसे नहीं हैं ! छात्र नेता हैं, मारे साला सीटी दस हज़ार लौंडा इकठ्ठा हो जायेगा, घेर के बैठ जाएगा ! फ़िर खाओगे मंत्री जी से गाली तुम”

2.

2 (3)
“सुनो रणविजय सिंह, ये तुम अपनी नेतागिरी कौनो और क्षेत्र में जाके करो. हमारा आसिरबाद है. बहुत आगे जाओगे. लेकिन आज के बाद अगर एन्बर्सिटी में पिछड़ों का झंडा उठाया …”
“तो?”
“हैं?”
“तो का होई बाबू साहब?”
“तो कम कर दिए जाओगे. दो मिनट का मौन होगा तोहरी याद में. तुमरी पार्टी के दो चार लौंडे आगे गाना-माना गा देंगे. कि चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना. और का होगा बे? हैं? नैसनल हॉलिडे होगा का तोहरी याद में?”

3.

3 (2)
“पापा, एक दिन लेट हो गयी हूं. हमेशा थोड़ी न लेट होती हूं मैं.”
“और ये कौन है?”
“नमस्ते अंकल, नमस्ते आंटी!”
“ये मेरे साथ यूनिवर्सिटी में पढता है. दरअसल रात बहुत हो चुकी थी. मैंने इससे कहा कि रिक्शे के साथ साथ चलो.”
“और ये चल पड़ा?”
“हां…”
“बड़ी फुर्सत में रहते हो बेटा?”
“जी नहीं वो..मैं इधर ही रहता हूं. रेलवे कॉलोनी में. मेरा रास्ता यही है, तो मैंने कहा कि…”

4.

4 (2)
“एक बात सुन लेओ पण्डित, तुमसे गोली वोली न चल्लई. मंतर फूंक के मार देओ साले…”

5.

5 (2)
“यार ये लड़कियां हमेशा ही ऐसे क्यों नहीं रहती हैं यार? हैं?”
“हां…हां…”
“मैं बता रहा हूँ सारी दुनिया की प्रॉब्लम सॉल्व हो जाये. अमेरिका बम गिराना ही छोड़ दे.”
“हां…”

6.

6 (2)
“ऐसे लड़के तो नुकसान ही करेंगे. वो ना तो तुम्हारी क्लास में पढ़ते हैं और ना ही तुम्हारी उम्र के हैं. शकल से तो क्रिमिनल लगते हैं. वो तुम्हें फंसाएंगे ज़रूर ये बात मान लो.”
“क्या फंसा देंगे? ज़बरदस्ती? अरे वो मेरे कोई दोस्त वोस्त नहीं हैं. हेलो हाय है बस.”
“अरे वो तो तुम्हें छोटा भाई कह रहा था… अरे ठीक चला ना. इंजिन पे जोर पड़ेगा इंजिन फट जायेगा. देख तीस से ऊपर नहीं चलाना, मैंने कह दिया.”
.
.
“स्कूटर ले जाऊं क्या? थोड़ी देर के लिए?”
“स्कूटर से नहीं साइकिल से जाना. और हां, घर जल्दी वापस लौटना.”
“साइकल से जल्दी कैसे आऊंगा?”
“क्या?”
“ये तीस से ऊपर तो चलती नहीं है.”

7.

7 (2)
“इस्क्यूज़ मी…”
“हां?”
“माईसेल्फ, बद्रीशंकर. आएम यंगर ब्रदर ऑफ़ करेंट प्रेसिडेंट ऑफ़ युन्बस्टी. इफ यू प्लीज़ यू कैन गिव मी वोट…आई कैन गिब यू…”
“हां?”
“अ…अ…क्लास ऑन टाइम, इक्जामिनेशन ऑन टाइम, अ…नीट एंड क्लीन युन्बस्टी…”
“ओके. थैंक यू.”
“थैंक यू?”

8.

8 (1)
“यार ऐसा है किसी को ये…पता नहीं चले कि हम यहां रुके हुए हैं. हमारा एनकाउंटर हो जायेगा तो?”
“नहीं नहीं भाई, ये मेरे दोस्त हैं. मुझे भरोसा है इन पर.”
“जो लौंडा अपनी मां की रक्षा नहीं कर पाया उसकी दोस्ती पे भरोसा कर रहे हो तुम? हां?”

9.

9 (1)
“ब्राह्मणों, जनेऊ की कसम खाओ, बद्री पाण्डे को ही वोट दोगे…”

10.

10 (1)
“ऐसी जगह, तुम्हें कहां से मिली?”
“दोस्त के मामा का है. उसी ने…”
“रणविजय सिंह ने दिलवाई ना तुम्हें ये जगह?”
“रण…रण…रणविजय सिंह क्यों? इससे उसका…”
“ऐसी जगह वही तुम्हें दिला सकता है.”
“कैसी जगह यार? पिक्चर हॉल है. पिक्चरें दिखाई जाती थीं, अब बंद हो गया है. और तुम्हारी रणविजय सिंह के साथ प्रॉब्लम क्या है? नहीं, प्रॉब्लम नहीं है, तुम्हारी तो हर चिट्ठी में सिर्फ़ उसी का ज़िक्र होता है. मुझसे ज्यादा तुम उसके बारे में सोचती हो… इतनी मुश्किल से जगह मिली थी और…”
“देखो, मुझे सिर्फ़ डर लगा रहता है कि तुम रणविजय के…”
“डर लगता है ना तुम्हें? छोड़ दो मुझे. मेरी कंपनी ठीक नहीं है, मैं बिगड़ा हुआ हूं, छोड़ दो मुझे, फिर तुम्हें डर नहीं लगेगा. जाके किसी और को ढूंढ लो.”

11.

11
“लडकियां काहे छिटकती हैं हमसे? कुछ तो उनको बुरा लगता होगा हम में?”

12.

12
“परिवार बच्चे को जनम देता है. विद्यालय उसे इंसान बनाता है, ज्ञान से. लेकिन जब विद्यालय एक अखाड़ा बन जाये जहां ज्ञान से ज्यादा हिंसा और राजनीति पे जोर हो तो इंसान बनना बंद हो जाते हैं. मेरे इस देश में ऐसा कई सालों से हो रहा है.”

13.

13
“बेटा गांव चलो कल हमारे साथ बहुत मजा आएगा.”
“कल निहारिका से मिलना है भाई. बहुत मुश्किल से निकल पा रही है वो.”
“अरे यार तुम्हरा ये हमेशा का लौंडियाबाजी का चक्कर जो है…अरे प्रेम लीला में इतना टाइम वेस्ट ना करो. कुछ हासिल नहीं होगा.”

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