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मूवी रिव्यू: दे दे प्यार दे

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जगजीत सिंह ने कभी गाया था, ‘न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन’. कितनी वाजिब बात! कहावतें भी कहती हैं कि Age is only a number. प्यार कभी भी, किसी से भी हो सकता है. और कई बार प्यार करने वालों के बीच का एज गैप, जनरेशन गैप जितना बड़ा भी हो सकता है. इसी थीम को सेंटर में रखकर ‘प्यार का पंचनामा’ वाले लव रंजन ने फिल्म बनाई है ‘दे दे प्यार दे’, जिसे आकिव अली ने डायरेक्ट किया है. कैसी बनी है, आइए जानते हैं.

प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया

एक पचास साल का आदमी है. आशीष. लंदन में रहता है. बाल-बच्चेदार लेकिन सेपरेटेड. उसे आयशा से प्यार हो गया है. आयशा की उम्र 26 साल है. लगभग इतनी ही बड़ी आशीष की बेटी है. आशीष आयशा को लेकर इंडिया आया है. अपने परिवार से अप्रूवल लेने. यहां हैं फ्रस्ट्रेटेड बेटी, नॉन-सीरियस बेटा, अजीब बिहेव करने वाले माता-पिता और चार्मिंग एक्स-वाइफ. आशीष सोच कर आया था कि आयशा को सबसे मिलाऊंगा, सब पसंद कर लेंगे, फिर शादी कर लूंगा. लेकिन जीवन इतना सिंपल कहां! शुरुआत से ही आशीष का सिचुएशन पर से कंट्रोल छूट जाता है और फिर गड़बड़ होती ही रहती है. अंत क्या होता है ये तो खैर आप भी प्रेडिक्ट कर लेंगे लेकिन उस ऑब्वियस अंत तक की जर्नी क्या सुहानी है? नहीं. फनी है? नहीं.

तीनों में तब्बू सबसे ज़्यादा इम्प्रेस करती हैं.
तीनों में तब्बू सबसे ज़्यादा इम्प्रेस करती हैं.

एज गैप वाली लव स्टोरीज़ में हिंदी सिनेमा ने पहले भी हाथ आजमाए हैं. चाहे ‘चीनी कम’ जैसी लाइट हार्टेड फिल्म हो, या ‘दिल चाहता है’ में अक्षय-डिम्पल का संजीदा ट्रैक. ये विषय नया नहीं है बॉलीवुड के लिए. ‘दे दे प्यार दे’ इस सब्जेक्ट को एक ही वक्त में फनी और संजीदा ट्रीटमेंट देने की कोशिश करती है और ढंग से कुछ भी नहीं कर पाती. बुरी एडिटिंग समेत कई खामियां हैं जिन्हें शानदार स्टारकास्ट भी नहीं छुपा पाई है.

नॉन-एडिटेड स्क्रिप्ट

कहते हैं कि फ़िल्में एडिटिंग टेबल पर बनती हैं. हम इसमें जोड़ेंगे कि बनने का तो पता नहीं लेकिन एडिटिंग टेबल पर बिगड़ती ज़रूर हैं. ये फिल्म भी अपनी गैरज़रूरी लंबाई के चलते खुद की दुश्मन बन जाती है. आयरनी ये कि डायरेक्टर आकिव अली जाने-माने एडिटर रह चुके हैं. लेकिन अपनी फिल्म के वक्त उन्होंने अपनी मूल प्रतिभा को शायद छुट्टी पर भेज दिया. फिल्म से कम से कम 45 मिनट उडाए जा सकते हैं और फिल्म फिर भी उतनी ही रहेगी.

कॉमेडी के नाम पर फिल्म में उतने ही अच्छे पंचेस हैं, जितने ट्रेलर में दिखाए गए हैं. एकाध जगह हंसने की सिचुएशन बनती भी है तो उस वक्त फिल्म वल्गर होने की बॉर्डर लाइन पर टहलने लगती है. माना कि रिश्ते कॉम्प्लीकेटेड होते हैं लेकिन इतने सतही नहीं होते जितना फिल्म दिखाती है. कुछेक सीन्स तो बेहद अजीब लगते हैं. कौन सी पत्नी अपने पति को राखी बांधती है और भाई बनाकर पेश करती है? स्क्रिप्ट में और भी चीज़ें खटकती हैं. शुरूआती सीन में मिसोजिनी को लताड़ने वाली फिल्म आगे कई सीन्स में मिसोजिनी को एंडोर्स करती दिखाई देती है. अंत में आलोक नाथ द्वारा बोला गया एक डायलॉग तो घिनहा है.

आलोकनाथ का किरदार समझ से बाहर है.
आलोकनाथ का किरदार समझ से बाहर है.

अच्छा क्या है फिर!

तो सवाल ये कि फिर फिल्म में अच्छा क्या है? एक तो क्लाइमैक्स से आधे घंटे पहले का तब्बू वाला सीन अच्छा है. ऐसा लगता है उस वक्त राइटर सबसे ज़्यादा सीरियस था अपने काम को लेकर. तब्बू की एक्टिंग में अब भी वो तेज़ाब है कि स्क्रीन पर बाकियों को नज़रअंदाज़ करना पड़ता है. अजय थोड़े से मिसफिट लगते हैं. ख़ास तौर से इमोशनल सीन्स में. रकुल प्रीत सिंह का अपीयरेंस इम्प्रेसिव है. वो ताज़गी से भरी लगती हैं, लेकिन उनका किरदार हाफ बेक्ड है. जो रकुल वन नाईट स्टैंड को लेकर कम्फर्टेबल है वही अंत में अपने मिज़ाज से ऐन उलट बिहेव करती है. ये उनकी नहीं राइटिंग की खामी है. जिमी शेरगिल ऐसे कलाकार हैं जिन्हें पांच मिनट स्क्रीन टाइम मिले तो उतने में परदे को फायर पर धर दें. इस आदमी को हर दूसरी फिल्म में होना चाहिए.

म्युज़िक डिपार्टमेंट में एक दो गाने कैची हैं. कॉमेडी वाले दो-तीन सीन अच्छे हैं. और शूटिंग लोकेशंस शानदार हैं. इसके अलावा ऐसा कुछ नहीं है फिल्म में जो टीवी या ऑनलाइन रिलीज़ होने का इंतज़ार न किया जा सके. बाकी अजय के डाय हार्ड फैन हैं तो जा सकते हैं.


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