Submit your post

Follow Us

दलित विमर्श पर बनी 10 फिल्में, जो आपकी संवेदनाओं को झिंझोड़कर रख देंगी

सूर्या. दिग्गज तमिल एक्टर. 23 जुलाई को उनका जन्मदिन होता है. आम तौर पर स्टार्स अपने जन्मदिन पर अपनी किसी आने वाली फिल्म का पोस्टर या टीज़र रिलीज़ करते हैं. सूर्या ने भी पोस्टर रिलीज़ किया. जहां वो वकील के काले कोट में दिखाई दे रहे हैं. चेहरे पर सीरियस लुक और आंखें एक जगह गड़ी हुई. पोस्टर में कुछ आदिवासी समाज के लोग भी दिख रहे हैं. और टाइटल वाले स्पेस में लिखा है ‘जय भीम’.

Jai Bhim
‘जय भीम’ का पहला पोस्टर.

फिल्म के टाइटल और मैसेजिंग ने लोगों को प्रभावित किया. लोग सोशल मीडिया पर लिखने लगे कि जातीय भेदभाव जैसे मुद्दों पर अच्छी फिल्में देखनी हैं तो रीजनल सिनेमा का रुख कीजिए. कहां आप मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा से उम्मीद लगाए बैठे हैं. 2019 में आई ‘आर्टिकल 15’ को याद करें तो ये बात सही भी बैठती है. जहां फिल्म के दलित किरदारों को बैकसीट पर बिठाकर ऊंची जाति वाला पुलिस इंस्पेक्टर तारणहार बनकर उभरता है. रही बात रीजनल सिनेमा की, तो वहां दलित या समाज के पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोग अब सिर्फ बेचारे बनकर नहीं बैठे. वो किसी मसीहा के आने की बाट नहीं देख रहे. सूर्या की फिल्म ‘जय भीम’ के पोस्टर रिलीज़ से एक दिन पहले चलते हैं. जब अमेज़न प्राइम वीडियो पर तमिल फिल्म ‘सारपट्टा परंबरै’ रिलीज़ हुई. फिल्म ऊपर से नॉर्थ चेन्नई में पनपने वाले बॉक्सिंग कल्चर की कहानी लगती है. लेकिन सिर्फ सतही तौर पर. कहानी के थोड़ा अंदर उतरने पर हमें मिलता है एक बहुजन समाज का लड़का. जो गौतम बुद्ध की मूर्ति के बगल में अपनी पूजा करता है. उसकी पूजा यानी बॉक्सिंग. फिल्म का ये लीड किरदार खुद को उठाने के लिए किसी का इंतज़ार नहीं करता. बल्कि खुद मजबूत बनकर खड़ा होता है. अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए.

Sarpatta Parambarai
2021 की बेस्ट फिल्मों में गिनी जाएगी ‘सारपट्टा परंबरै’.

सिनेमा का इम्पैक्ट समझने के लिए हमने रीजनल सिनेमा की फिल्में खंगाली. जो जातीय भेदभाव जैसे सब्जेक्ट को सोशल ड्रामा और उससे प्रभावित होने वाले लोगों को सिर्फ ‘विक्टिम’ में तब्दील नहीं होने देतीं. उनपर खुलकर बात करती हैं. दुनिया बदलने के लिए नहीं. बल्कि सही दिशा में कॉनवर्सेशन शुरू करने के मकसद से. लिस्ट में मौजूद हर फिल्म खोजकर देखने लायक है. ये फिल्में लंच के समय आपका टाइमपास नहीं करेंगी. हां, इतनी गारंटी है कि आपको एक कदम बेहतर ही बनाएंगी. खुद से बाहर झांकने पर मजबूर करेंगी.

Bharat Talkies


#1. परियेरम पेरुमल
भाषा – तमिल
डायरेक्टर: मारी सेल्वराज

मैंने जितनी भी थोड़ी-बहुत फिल्मों देखी हैं, उनमे से दो फिल्मों ने मुझे सबसे ज्यादा बेचैन किया. असहज किया. पहली थी ‘नो कन्ट्री फॉर ओल्ड मैन’. इस हॉलीवुड फिल्म के विलन ने खौफजदा कर दिया था. कोई आदमी बिना चीखे, चिल्लाए या भयावह हरकत किए बिना कैसे किसी को डरा सकता है, उसका नमूना यहां विलन बने हावियर बार्डेम ने दिया. दूसरी फिल्म थी मारी सेल्वराज की डेब्यू फिल्म, ‘परियेरम पेरुमल’. कोई भी किस हद तक शोषण झेल सकता है. दब सकता है. बेइज्जत हो सकता है. फिल्म की इसी बात ने उन्हें बेचैन किया. जब फिल्म के लीड किरदार परियेरम को हर मुमकिन तरीके से नुकसान पहुंचाया जाता है. क्या शारीरिक और क्या मानसिक. लेकिन फिल्म की सबसे अच्छी बात है कि परियेरम खुद को ऊंची जाति का प्रतिनिधि समझने वालों से ऊंचा उठकर दिखाता है.

Pariyerum Perumal
असहज कर देने वाली ये डार्क फिल्म एक उम्मीद छोड़ जाती है. उम्मीद एक बेहतर कल की.

अपनी लड़ाई खुद लड़ता है. किसी के आगे हाथ जोड़कर गर्दन नहीं झुकाता. उम्मीद जगाता है कि बदलाव हाथ उठाने से नहीं. बल्कि कलम उठाने से आएगा. फिल्म बेहद डार्क है. लेकिन इसके खत्म होने पर आपका मन खराब नहीं होगा. यही है मारी सेल्वराज का कमाल.


#2. असुरन
भाषा – तमिल
डायरेक्टर: वेट्रीमारन

“अगर हम खेत रखेंगे, तो वो उन्हें हड़प लेंगे. अगर हमारे पास पैसा होगा, तो वो उसे छीन लेंगे. लेकिन अगर हमारे पास शिक्षा है, तो उसे हमसे कोई नहीं छीन सकता.”

जो ‘असुरन’ के प्लॉट से परिचित न भी हो, उसे भी ये एक डाइलॉग सुनकर कहानी क्लियर हो जाती है. ‘असुरन’ को बड़ी आसानी से एक रिवेन्ज ड्रामा में तब्दील किया जा सकता था. ऐसा करने पर फिल्म की कमर्शियल वैल्यू भी कई गुना बढ़ जाती. लेकिन वेट्रीमारन ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने अपने सब्जेक्ट को समझा. उसके प्रति सजग रहे और कहानी को दो परिवारों के बीच की हिंसा से ऊपर ले गए. किसी ने फिल्म को तमिल में देखा हो या यूट्यूब पर मौजूद हिंदी डब में, सबपर बराबर असर पड़ा. फिल्म में धनुष के परिवार का दुश्मन गांव का ज़मींदार नहीं. बल्कि उनकी अपनी जाति है. जिसका बोझ वो उठाते भी हैं और उसके तले लगातार पिसते भी हैं.

Asuran
वो हीरो जो हमारे मेनस्ट्रीम सिनेमा से गायब रहा है. या हमने ही उसपर से नज़र फेर रखी थी?

फिल्म के गहरे इम्पैक्ट की एक वजह है उसका दलित हीरो. जो दशकों से हमारे सिनेमा से गायब रहा है. और अब जिसने खुद अपनी किस्मत बदलने का फैसला लिया है.


#3. फैन्ड्री
भाषा – मराठी
डायरेक्टर: नागराज मंजुळे

सारी दुनिया में कमोबेश पाए जानेवाले रेसिज्म का सबसे घृणित रूप अगर कहीं है, तो इस पावन (!) भारतभूमि पर ही है. जातिवाद. ये अलग बात है कि इसको बड़ी सहूलियत नज़रअंदाज़ करना हम सबने सीख लिया है. ये इतना सामान्य है हमारे लिए कि आहत होना तो दूर नोटिस तक नहीं किया जाता.

इसी नाइंसाफी को कैनवास पर उकेरती है ‘फैन्ड्री’. बहुत बड़ी बात करती छोटी सी फिल्म. कोई हैरानी नहीं थी कि उस साल के नेशनल अवॉर्ड्स में इसकी धमक सुनाई दी. ‘फैन्ड्री’ बिना किसी कृत्रिम संवादों के, अतिनाटकीयता से परहेज़ करते हुए वो सब दिखा जाती है जिससे मुंह चुराना हमारा राष्ट्रीय चरित्र है. फिल्म में दो तरह के लोग हैं. सूअर के छू लेने भर से नहाने के लिए भागते लोग और वो सूअर किसी को छू न पाए इसके बंदोबस्त में लगे लोग. इन दो तरह के लोगों में ही असली संघर्ष है. कहने की ज़रूरत नहीं कि जीत किसके हिस्से आएगी और हार किसका मुकद्दर है.

Fandry
फिल्म के इस एक शॉट से उसकी जागरूकता का पता चल जाता है.

कचरू माने और उसका परिवार उस कैकाडी समाज से आता है जिनका आदर पर दावा जन्मतः खारिज है. अगर कोई चीज़ उनकी किस्मत में अमिट स्याही से लिखी गई है तो वो है अपमान का दंश. कदम दर कदम दर कदम अपमान. कचरू का एक किशोर उम्र का लड़का है जब्या (जाम्बुवंत कचरू माने), जो अपनी सहपाठी शालू से एकतरफा प्यार करता है. शालू को उसके अस्तित्व की भी ख़बर होगी ऐसा नहीं प्रतीत होता. बावजूद इसके जब्या एक अविश्वसनीय संभावना के पीछे लगातार भागे जा रहा है.

फिल्म का क्लाइमेक्स किसी थ्रिलर से कम नहीं. फर्क सिर्फ इतना है कि ये थ्रिल किसी मानवीय भावनाओं से भरपूर शख्स़ को शर्म से भर देगा. जब्या को पूरे स्कूल और ख़ास तौर से शालू के सामने सूअर को पकड़ने का काम करना पड़ता है. अपने प्यार के सामने ज़लील होना जब्या के लिए शायद अपमान की सर्वोच्च चोटी को छूने जैसा है. उस पर एक दीवानगी सी तारी हो जाती है. उसी की परिणिति है वो पत्थर, जो वो तंग आकर पूरी ताकत से अपना मज़ाक उड़ाते गांव वालों की तरफ दे मारता है. वो पत्थर दर्शकों को मारा गया है. उस बेशर्म समाज को मारा गया है, जहां से तमाम सुधारों के बावजूद जातिवाद गायब नहीं हो पाया है.


#4. सैराट
भाषा – मराठी
डायरेक्टर: नागराज मंजुळे

‘सैराट’ कहानी है आर्ची और परश्या के प्रेम की. आर्ची यानी अर्चना पाटिल. परश्या यानी प्रशांत काळे. आर्ची के सरनेम से ही ज़ाहिर है वो गांव के पाटिल की लड़की है. सो कॉल्ड अपर कास्ट. समृद्ध, संपन्न परिवार की कन्या. वहीं परश्या एक मछुआरे का बेटा है. कथित तौर पर लोअर कास्ट. ज़ाहिर सी बात है ये मेल, मुश्किल ही है.

बावजूद इसके प्रेम पनपता है. पूरी शिद्दत से. न सिर्फ पनपता है बल्कि इस नामुराद सिस्टम से पंगा भी लेता है. इसका अंजाम क्या होता है ये फिल्म देखकर जानिएगा.

Sairat
ऐसी कहानी पहले भी कई बार कही जा चुकी है, लेकिन ‘सैराट’ वाले ढंग से नहीं.

यूं देखा जाए तो ‘सैराट’ एक आम प्रेमकथा है. जो सिनेमा के परदे पर हज़ारों बार देखी-दिखाई जा चुकी है. गरीब लड़का, अमीर लड़की, लड़की के घरवाले विलेन, भाग कर शादी वगैरह-वगैरह. लेकिन ‘सैराट’ को ख़ास बनाता है कहानी को दिया गया ट्रीटमेंट. और इसके वो रेफरेन्सेस जो हमारी सोसाइटी पर तीखी कमेंट्री करते नज़र आते हैं. ‘सैराट’ सिर्फ प्रेम कहानी नहीं है. ये हमारे सोशियो-इकनोमिक सिस्टम को बड़ी खूबसूरती से निर्वस्त्र करती है.

फिल्म का क्लाइमैक्स आपको हिलाकर रख देगा. अगर ‘फैन्ड्री’ के क्लाइमैक्स में जब्या का पत्थर दर्शकों के माथे पर लगता है, तो ‘सैराट’ का क्लाइमैक्स आपके संवेदनाओं को सुन्न करके रख देता है. इससे ज़्यादा उसके बारे में बताना ठीक नही होगा. फिल्म में ही देख लीजिएगा.


#5. कर्णन
भाषा – तमिल
डायरेक्टर: मारी सेल्वराज

‘नाम में क्या रखा है?’ अच्छा हुआ ये बात कहने वाले शेक्सपियर इंडिया में पैदा नहीं हुए. वरना ऐसी बेतुकी बात नहीं करते. कोई बुद्धिजीवी इस बात को कितना भी नकारे, लेकिन नाम बहुत बड़ी चीज़ है बाबू. अपना पूरा नाम बताकर देखिए. ताकि सामने वाला डिसाइड कर सके कि आपकी इज़्ज़त करनी है या नीची नज़रों से देखना है. हालांकि स्मार्ट सिटीज़ में ऐसा नहीं होता. लेकिन पूरा इंडिया तो अभी स्मार्ट नहीं.

खैर, ‘कर्णन’ पर बात की शुरुआत नामों से करने के पीछे एक वजह है. फिल्म का एक सीन. जहां पुलिसवाला कर्णन के गांववालों को बुरी तरह पीट रहा होता है. सिर्फ उनके शरीर पर चोट देने के लिए नहीं. बल्कि उनके आत्मसम्मान पर हमला करने के लिए. पूरे सीन में बेबस गांववालों और पुलिसवाले की दंभ भरी आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनाई देता. उसी दंभ भरी आवाज़ में वो कहता है,

“तुम लोग क्या समझते हो. अपना नाम दुर्योधन, द्रौपदी रखने से क्या वैसे हो जाओगे”.

Karnan
मारी सेल्वराज की दूसरी फिल्म.

वैसे हो जाओगे. कैसे हो जाओगे? दुर्योधन, द्रौपदी जैसे ऊंचे कुल के. फिल्म ने जाति श्रेष्ठता से पैदा हुए भेद को हर मुमकिन तरीके से दर्शाया है. फिर चाहे वो प्रतीकात्मक तौर पर हो. जैसे वो बोझ ढोता गधा, जिसके पैर बंधे हैं. या फिर पीले रंग की चमकती तितली जो मुक्त होने के लिए फड़फड़ा रही है. ऊपर बताए सीन में पुलिसवाले की आंखों में हैवान नज़र आता है. जैसे हमारे समाज की सारी गंदगी को समेटकर उसके पूर्वाग्रहों की शक्ल दे दी हो. वो गंदगी जिसे हम कब का नॉर्मलाइज़ कर चुके हैं.

‘परियेरम पेरुमल’ के बाद आई मारी सेल्वराज की ये दूसरी फिल्म अवास्तविक नहीं. न ही यहां रात गई, बात गई की तरह सब सही हो जाता है. लेकिन फिल्म जिस नोट पर खत्म होती है, उसे देखकर यही उम्मीद बंधती है कि आने वाला कल आज से बेहतर होगा.


#6. पलासा 1978
भाषा – तेलुगु
डायरेक्टर: करुणा कुमार

क्या कोई हिंसा को नाप सकता है? कि इतनी मात्रा में की गई हिंसा सही. और अगर उस इंसान ने हिंसा की, तो ही सही. ऐसे ही सवाल उठते आए हैं विरोधाभास में उठी हिंसा पर. ‘पलासा 1978’ भी विरोधाभास में उठी हिंसा को दर्शाती है. लेकिन किसी हल की तरह नहीं. ये न्यूटन के ‘एक्शन-रिएक्शन’ सिद्धांत जैसा ही है. बस रिएक्शन आने में लंबा वक्त लग गया.

Palasa 1978
फिल्म की मैसेजिंग उसकी हिंसा से बढ़कर है.

दो भाई है. मोहन और रंगा. पलासा गांव के एक दलित परिवार से ताल्लुक रखते हैं. मोहन को संगीत से बहुत लगाव है. उसी के चलते सिंगिंग कंपटीशन में पार्टिसिपेट करता है. अच्छा गाता है. लेकिन जीतता नहीं. ट्रॉफी थमा दी जाती है किसी ऊंची जाति वाले लड़के को. ये मोहन का पहला साक्षात्कार होता है, अपनी जाति और उसके प्रति समाज के विषैले रवैये से. वास्तविकता से परिचित होने पर वो निराशा में नहीं डूबता. खुद को दोषी या मजबूर नहीं समझता. बल्कि और मजबूती से आवाज़ उठाता है. जरुरत पड़ने पर अपने हाथ भी उठाता है. सिर्फ उसके आंख उठाने भर से अहंकारों पर चोट लगती है. परिणामवश और हिंसा होती है. फिल्म की सबसे अच्छी बात है कि उसने अपनी हिंसा को बदलाव का आधार नहीं बनाया. अपनी सारी उम्मीद शिक्षा के महत्व में ही झोंकी है.


#7. काला
भाषा – तमिल
डायरेक्टर: पा रंजीत

पा रंजीत के डायरेक्शन में बनी फिल्म के मुख्य नायक काला बने रजनीकान्त नहीं. बल्कि यहां सेंट्रल कैरक्टर है ज़मीन. नैरेटिव भी उस वक्त से शुरू होता है जब ज़मीन पर सब का अधिकार था. आगे कहानी खुलती है उस वक्त में जब ज़मीन का टुकड़ा लोगों के लिए ताकत और हक की लड़ाई में तब्दील हो जाता है. यहां लड़ाई है धारावी की ज़मीन के लिए. हरी दादा इसे हर मुमकिन कोशिश कर हथियाना चाहता है. बस उसके सामने एक ही मुश्किल है. काला. वहां रहने वाला एक तमिल दलित. जो अपने लोगों के लिए किसी गॉडफादर से कम नहीं. जो कानून और न्याय जैसी बातों को किताबी मानता है. इसलिए खुद से मजबूत ताकतों से लड़ने के लिए दूसरे तरीके भी अपनाता है.

Kaala
पा रंजीत के डायरेक्शन में बनी ये फिल्म टिपिकल रजनीकान्त फ्लिक नहीं.

कहानी का मेन प्लॉट भले ही ज़मीन पर हक के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई के रुप में नज़र आता है. लेकिन परत दर परत खुलने पर समझ आता है कि ये फर्क की कहानी है. ऊंचे और नीचे के फर्क की कहानी. फिल्म के कुछ उदाहरणों के जरिए पा रंजीत का ये पॉइंट एस्टैब्लिश भी होता है. जैसे बैकग्राउंड में पेरियार, गौतम बुद्ध और बाबासाहेब आंबेडकर की फोटोज़ और आइकॉन नज़र आना.


#8. जैत रे जैत
भाषा – मराठी
डायरेक्टर: जब्बार पटेल

‘ये फिल्म तब तक आपका पीछा नहीं छोड़ेगी, जब तक आप इससे भी पावरफुल फिल्म नहीं देख लेते.’

एक दर्शक ने अपने रिव्यू में ऐसा लिखा था. कहानी खुलती है नाग्या से. एक आदिवासी जो शहद इकट्ठा करने का काम करता है. हर इंसान अपनी ज़िंदगी में एक खास मकसद तलाशता है. नाग्या ने भी खुद से ऊंचा मकसद तलाश लिया है. बस उसे हासिल करने की देर है. नाग्या कुछ भी कर के बस शुद्ध होना चाहता है. वो खुद शुद्ध क्यों नहीं है? क्योंकि शुद्धता का तमगा बांटने वाले ब्राह्मण ऐसा नहीं मानते. दूसरी ओर है शिंदी. जो अपने शराबी पति को छोड़कर घर से भाग जाती है.

Jait Re Jait
नाग्या कुछ भी कर के शुद्ध होना चाहता है. लेकिन उसकी क्या कीमत चुकाता है, वो फिल्म देखकर पता चलेगा.

संजोग से नाग्या और शिंदी की मुलाकात होती है. दोनों साथ रहने लगते हैं. कसम खाते हैं कि कभी अलग नहीं होंगे. नाग्या और शिंदी, दोनों अपनी ज़िंदगी में कुछ पाने निकले हैं. सामान्य जीवन जीने की अपनी महत्वाकांक्षाओं का क्या मोल चुकाते हैं, ये आपको फिल्म देखकर पता चलेगा.


#9. अन्ने घोड़े दा दान
भाषा – पंजाबी
डायरेक्टर: गुरविंदर सिंह

पंजाब. सुनकर दिमाग में क्या आया. पीली सरसों से लहलहाते खेत. जो मानो हवा के तेज़ टेले से एक सुर में झूम रहे हों. ‘अन्ने घोड़े दा दान’ में भी सरसों के खेत हैं. लेकिन सुंदर नहीं. हां, वास्तविक जरुर हैं. ये उस पंजाब की कहानी है जिसके सामान्य किसानों को ग्रीन रिवॉल्यूशन ने उद्योगपति बना दिया. हालत ऐसी हुई कि उद्योगपति बने किसानों ने अब अपने खेत पर काम करने के लिए किसान रखना शुरु कर दिए. सबकी दुनिया बदली. सिवाय सबसे नीचे तबके पर काम करने वाले किसानों की. ऐसे ही कुछ किसानों के शोषण की कहानी बताती है ये नैशनल अवॉर्ड विनिंग फिल्म. सिर्फ पूंजीवाद को शोषण की वजह समझना नादानी होगी. गांव का ज़मींदार नाइंसाफी क्यों कर रहा है. क्योंकि वो मानता है कि वो ऐसा कर सकता है. उसका स्वघोषित अधिकार हो जैसे. ये अधिकार उपजा उसकी जाति के घमंड से. वो ऊंची जाति का है. इसलिए मानता है कि ऐसा कर सकता है. और उसके लिए ये नाइंसाफी कहां, ये तो नॉर्मल है. ऐसा ही तो होता आया है.

Anhey Ghore Da Daan
फिल्म ने तीन नैशनल अवॉर्ड अपने नाम किए.

#10. पेरारियातवर
भाषा – मलयालम
डायरेक्टर: बीजूकुमार दामोदरन

ये मलयालम फिल्म अपनी मैसेजिंग को लेकर कितना सीरियस थी. इसका अंदाजा शुरुआत में ही लग जाता है. जब फिल्म का डिसक्लेमर आता है. जिसे हम आम तौर पर स्किप कर देते हैं. सोचते हैं कि वही सब लिखा होगा, कि ये काल्पनिक कहानी है. इसका किसी जीवित व्यक्ति से कोई संबंध नहीं. यहां ये केस नहीं था. लिखा आया,

“कहानी में जो भी घटनाएं दर्शाई गई हैं, वैसा केरल में पिछले 10 सालों से घट रहा है.”

Perariyathavar
जरुरी नहीं कि लार्जर दैन लाइफ फिल्म की मैसेजिंग ही आपको हिट करे. इस बात का नमूना है ये फिल्म.

फिल्म के किरदार हमें किसी दूसरी दुनिया के लगते हैं. ऐसी दुनिया जिससे हम कब की आंखें फेर चुके हैं. फिल्म उसी दुनिया की गहराई में उतरती है. हम एक सफाईकर्मी और उसके बेटे की आंखों से ये दुनिया देखते हैं. उनकी रोजमर्रा की ज़िंदगी में जो कुछ घटता है, वो पहले भी कई बार कहा जा चुका है. अनेक भाषाओं में. बावजूद इसके, फिल्म की आवाज़ उसकी अपनी है. ऐसी आवाज़ जिसे आप सुनकर अनसुना नहीं कर सकते.


वीडियो: तमिल बॉक्सिंग ड्रामा ‘सारपट्टा परंबरै’ में कितना दम है?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पोस्टमॉर्टम हाउस

फिल्म रिव्यू- भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया

फिल्म रिव्यू- भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया

ये फिल्म ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को देखनी चाहिए.

फ़िल्म रिव्यू: नेत्रिकन

फ़िल्म रिव्यू: नेत्रिकन

कोरियाई थ्रिलर फिल्म का रीमेक है 'नेत्रिकन'.

मूवी रिव्यू: शेरशाह

मूवी रिव्यू: शेरशाह

क्या कैप्टन विक्रम बत्रा की कमाल कहानी के साथ करन जौहर एंड कंपनी ने न्याय किया है?

फ़िल्म रिव्यू : कुरुति

फ़िल्म रिव्यू : कुरुति

कैसी है ये सस्पेंस थ्रिलर फिल्म?

वेब सीरीज़ रिव्यू- नवरस

वेब सीरीज़ रिव्यू- नवरस

'नवरस' पैंडेमिक के दौरान फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे तमाम लोगों की मदद करने की मक़सद से बनाई गई है.

मूवी रिव्यू: डायल 100

मूवी रिव्यू: डायल 100

मनोज बाजपेयी, नीना गुप्ता और साक्षी तंवर जैसे जबर एक्टर्स वाली इस फ़िल्म में कितना दम है?

‘Money heist-5’  के ट्रेलर से तो लग रहा है कि इस बार प्रोफेसर की शामत आई है

‘Money heist-5’ के ट्रेलर से तो लग रहा है कि इस बार प्रोफेसर की शामत आई है

नैरोबी का, बर्लिन का सब का बदला ले पाएगा प्रोफेसर ?

सीरीज़ रिव्यू: छत्रसाल

सीरीज़ रिव्यू: छत्रसाल

कहानी उस राजा की, जिसने औरंगज़ेब को पस्त कर दिया.

फिल्म रिव्यू- मिमी

फिल्म रिव्यू- मिमी

'मिमी' एक ऐसी फिल्म है, जो चिल्ला-चिल्लाकर अपना स्कीम सबको नहीं बताती. वो सिर्फ बात करती है, आप क्या सुनना चाहते हैं वो आपके ऊपर है.

फिल्म रिव्यू- 14 फेरे

फिल्म रिव्यू- 14 फेरे

'14 फेरे' अपने पौने दो घंटे के रनिंग टाइम में कभी भी वो फिल्म नहीं बन पाती, जो ये बनना चाहती थी.