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पीएम मोदी ने कोरोना संक्रमित मरीज़ों की देखभाल कर रहीं सिस्टर छाया से क्या कहा?

देश संकट में है और हम घर पर. क्योंकि कोरोना संक्रमण को पसरने से बचाने के लिए ये बहुत ज़रूरी है. लेकिन सभी घर पर नहीं हैं. अनिवार्य सेवाओं से जुड़े लोग संक्रमण के खतरे के बावजूद काम पर जा रहे हैं. सबसे अग्रिम मोर्चे पर हैं स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोग – डॉक्टर, नर्स, लैब टेक्नीशियन और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े दीगर लोग. मकान मालिक घर से निकालने की धमकी दे रहा है, लोग छूना नहीं चाह रहे, लेकिन ये लोग अपने काम पर पहुंच रहे हैं. इन कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुणे के डॉ. नायडू सांसर्गिक रोगांचे रुग्णालय (नायडू हॉस्पिटल) में ड्यूटी कर रहीं नर्स छाया से बात की.

तकरीबन पांच मिनिट की इस बातचीत का मोटामाटी ब्योरा हम आपको यहां दे रहे हैं. फोन पर पहले प्रधानमंत्री कार्यालय की एक कर्मचारी सिस्टर छाया को बताती हैं कि पीएम उनसे बात करेंगे. इसके बाद कॉल पीएम को ट्रांसफर हो जाता है.

पीएम – हेलो.

सिस्टर छाया – हेलो. नमस्ते सर.

(मराठी में)

पीएम – नमस्ते सिस्टर छाया. आप कैसी हैं?

सिस्टर छाया – मैं ठीक हूं सर.

पीएम – आप अपना ध्यान अच्छे से रख रही हैं न?

सिस्टर छाया – जी सर.

(इससे आगे की बात हिंदी में होती है)

पीएम – आप अपने परिवार को अपने सेवाभाव के प्रति कैसे आश्वस्त कर पाईं? आपके परिवार को चिंता होती होगी?

सिस्टर छाया – जी सर. होती है चिंता. लेकिन काम तो करना पड़ता है. सेवा (ड्यूटी) देनी ही है. तो… हो जाता है थोड़ा सा. ऐसा कुछ नहीं है.

पीएम – जब पेशंट आते हैं तो बड़े डरे हुए आते होंगे?

सिस्टर छाया – हां. बहुत डरे होते हैं. एडमिट किया तो डरते हैं. लेकिन हम क्या करते हैं सर…जाकर उनसे बात करते हैं. कि डरने की कोई बात नहीं है. कुछ नहीं होगा. आपकी रिपोर्ट अच्छी आएगी. पॉज़िटिव आए तो भी डरने की कोई बात नहीं है. इस हॉस्पिटल से सात मरीज़ अच्छे होकर जा चुके हैं. अभी नौ मरीज़ हैं उनकी तबीयत भी अच्छी है. तो डरने की बात नहीं है. हम जाकर उन्हें दवाई देते हैं. बात करते हैं. तो उन्हें अच्छा लगता है. उनके मन में डर होता है, लेकिन हम वो डर निकालने की कोशिश करते हैं.

पीएम – मरीज़ के परिवार वाले नाराज़गी व्यक्त करते होंगे…क्योंकि सबको चिंता रहती है…

सिस्टर छाया – मरीज़ के परिवार को तो अंदर नहीं आने देते हैं सर. क्योंकि क्वारिंटीन है. तो उनसे तो हमारी बात नहीं होती.

पीएम – मरीज़ के परिवार को मत आने दो…

सिस्टर छाया – नहीं नहीं. किसी को अंदर नहीं आने देते. हमारा स्टाफ और मरीज़ ही अंदर आते हैं. पूरा हॉस्पिटल क्वारिंटीन में है.

पीएम – आप इतने दिनों से लगी हुई हैं और कोरोना वायरस के लिए आपने पूरा अस्पताल समर्पित कर दिया है. देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों के लिए सिस्टर छाया का क्या संदेश है.

सिस्टर छाया – डरिए मत. डरना नहीं है और काम करना है. और कोरोना की बीमारी को भगाना है और देश को जिताना है. यही हमारा ध्येय वाक्य होना चाहिए.

पीएम – सिस्टर, मेरी आपको बहुत शुभकामनाएं. आप जिस हिम्मत से जुटी हुई हैं. और आपकी तरह देश के लाखों स्वास्थ्य कर्मचारियी जो लोगों की सेवा कर रहे हैं, मैं आपका अभिनंदन करता हूं. मुझे अच्छा लगा आपसे बात करके. धन्यवाद जी.

सिस्टर छाया – सर…हमारे पूरे अस्पताल के स्टाफ की तरफ से एक संदेश है. हमारे छोटे से अस्पताल का आपने हाल लिया, इसके लिए हम आपके आभारी हैं.

पूरी बातचीत आप इस लिंक पर सुन सकते हैं –

प्रधानमंत्री मोदी की डॉ नायडू अस्पताल में कार्यरत सिस्टर छाया से बातचीत

***

पुनश्चः 

सिस्टर छाया के सवा सौ साल पुराने अस्पताल की कहानी –

सिस्टर छाया के अस्पताल का नाम आपको थोड़ा नया सा लगा होगा – डॉ. नायडू सांसर्गिक रोगांचे रुग्णालय. ये मराठी नाम है. अंग्रेज़ी नाम है डॉ नायडू इंफेक्शियस डिसीज़ हॉस्पिटल. माने संक्रामक बीमारियों का अस्पताल. इसे पुणे महानगरपालिका चलाती है. बड़ा पुराना अस्पताल है. महाराष्ट्र टाइम्स की एक खबर में डॉ. मंगुडकर की किताब ‘पुणे नगरसंस्था शताब्दी ग्रंथ’ के हवाले से लिखा है,

”बंबई में शुरू हुआ प्लेग दिसंबर 1896 में पुणे पहुंचा. फरवरी 1897 से प्लेग ने शहर में ज़ोर पकड़ लिया. प्लेग के सभी मरीज़ों का एक जगह इलाज करने के लिए पुणे में आबादी से दूर मुला और मुठा नदी के संगम के पास एक प्लेग अस्पताल शुरू किया गया. यहीं आगे चलकर तमाम संक्रामक रोगों का इलाज किया जाने लगा.

डॉक्टर नायडू कौन थे, ठीक-ठीक जानकारी नहीं है. लेकिन डॉ मंगुडकर की किताब में उल्लेख है कि 1933 में बनी ‘प्लेग प्रतिबंधक समिती’ के वो अध्यक्ष थे. पुराने लोग बताते हैं कि इन्हीं डॉक्टर नायडू की स्मृति में अस्पताल का नाम डॉ नायडू के नाम पर रख दिया गया.”

डॉ नायडु अस्पताल एक वक्त शहर की आबादी से दूर था. अब बीच शहर में पड़ता है.
डॉ नायडू अस्पताल एक वक्त शहर की आबादी से दूर था. अब बीच शहर में पड़ता है.

इसी खबर में ज़िक्र है कि जब अस्पताल बना, तब शहर की नगरपालिका इसका आधा खर्च उठाती थी. बाकी खर्च बॉम्बे प्रेसिडेंसी और स्थानीय प्रशासन से जुड़ी दूसरी संस्थाएं उठाती थीं. आज़ादी के बाद पुणे और बड़ा हुआ और नगरपालिका को बना दिया गया महानगरपालिका. माने नगर निगम. तो 1951 से अस्पताल शहर की निगम ही चलाने लगी. सवा सौ साल के इतिहास में यहां प्लेग से लेकर कोरोना तक के तमाम संक्रामक रोगों का इलाज हुआ है.

इति.

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