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पत्नियों से अपने जांघिये धुलवाने वाले पुरुषों के लिए बड़े काम का ऐड आया है

हर हफ्ते जब भी मैं मैले कपड़ों का पहाड़ लेकर बैठती हूं, एक गहरी सांस लेती हूं. सोचती हूं बाहर से धुलवा लूं क्या. ऐसे मौके पर डिटर्जेंट पाउडर के ऐड खूब याद आते हैं. सबसे फेमस ‘वॉशिंग पाउडर निरमा’ से लेकर  ‘दाग अच्छे हैं’ तक.

The iconic Nirma girl was synonymous with the word detergent
‘निरमा गर्ल’, जो डिटर्जेंट की पहचान थी.

मगर आजकल डिटर्जेंट के विज्ञापन बदले हैं. एरियल के #Sharetheload कैंपेन को ही देख लीजिए, जो ये बताता है कि पुरुषों और औरतों को मिलकर काम करना चाहिए. कपड़े धोना महज़ औरत की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए.

44 सेकंड का वक़्त इतना कम होता है कि कोई आपका फ़ोन न उठाए, तो कॉल ख़त्म होते-होते ख़त्म हो जाता है. लेकिन कंफर्ट डिटर्जेंट को एक बड़ी बात कहने में, समाज के ऊपर एक बड़ी टिप्पणी करने में महज 44 सेकंड लगे. ये बात बताने में कि समाज में तभी बदलाव आएगा, जब हम अपने नन्हे बेटों को पुरुष और औरत की बराबरी के बारे में बताएंगे.

क्या है इस ऐड में?

ऐड की सबसे अच्छी बात है कि इसमें सीधे-सपाट शब्दों के साथ बड़े शॉर्ट में बड़ी भारी बात कही है. बच्ची मां से पूछती है कि उसके कपड़े साफ़ हैं या नहीं. मां कहती है कि वो कम्फर्ट फैब्रिक कंडीशनर में उन्हें भिगो रही है. तभी बच्ची का भाई अपनी बहन से कहता है कि वो भी कपड़े धोना सीख ले, क्योंकि ये भविष्य में उसके काम आएगा. ज़ाहिर सी बात है, बच्चे ने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि उसने अपनी मां को कपड़े धोते हुए देखा है. उसे पता है ये काम लड़कियों को ही करना होता है. मगर मां का जवाब कमाल का है.

वो बड़े प्यार से लड़के को बुलाती है और उसे प्यार से समझाती है कि प्रोडक्ट को कैसे इस्तेमाल करना है. वो लड़के को बताती है कि बहन और भाई, दोनों को ये सीखना ज़रूरी है कि कपड़े कैसे धोए जाते हैं.

A woman washes clothes in a sugarcane field in Junnar, 165 km (104 miles) southeast of Mumbai, August 18, 2009. Millions of Indians from rice-dependent families in the poverty-stricken plains of northern Bihar state to the sugarcane farmers of western India are struggling for survival as India stares at a drought. India's monsoon rains have been 26 percent below normal since the start of the June-September season, hurting crops like cane, paddy, soyabean and triggering a sharp rise in food prices. Picture taken August 18, 2009. REUTERS/Punit Paranjpe (INDIA AGRICULTURE ENVIRONMENT)
मुंबई के करीब जुन्नर में गन्ने के खेत में कपड़े धोती औरत. सोर्स: रॉयटर्स

बीते दिनों एरियल का ऐड देखा था, जिसमें पिता अपनी बेटी से माफ़ी मांगते हुए एक ख़त लिखता है. वो उससे कहता है कि वो शर्मिंदा है कि उसने कभी उसकी मां यानी अपनी पत्नी की घर के कामों में मदद नहीं की. ऐसा करके उसने अपने बच्चों के लिए एक बुरा उदाहरण तय किया. अब वो अपनी पत्नी की मदद कर बदलना चाहता है.

ऐसा लगता है कम्फर्ट का ये ऐड उसी ऐड का सीक्वल है कि अगर बचपन में ही बेटों और बेटियों को न सिखाया गया कि उनकी भूमिकाओं, उनके काम में कोई फर्क नहीं है, तो वो दुनिया के एक बड़े सच से दूर रह जाएंगे. वो कभी अपनी बहनों, पत्नियों और मांओं की मदद नहीं करेंगे. एक बार आपकी सोच निर्धारित हो गई, तो उसे बदलने में पूरा जीवन लग सकता है. मगर बच्चों को छोटी उम्र में ही सिखाया गया कि उनकी सोच कैसी होनी चाहिए, तो ये समाज औरतें के लिए एक बेहतर जगह होगी.

The campaign taken out by ariel to share domestic chores like laundary
एरियल का कैंपेन #Sharetheload

एरियल का ही पिछला ऐड देखकर पता चलता है कि एक समाज के तौर पर हम किस तरह की सोच रखते हैं. दो बूढ़ी औरतें बैठकर बात कर रही हैं कि ज़माना कितना बदल गया है. एक औरत कहती है कि उसकी बहू बेटे से आगे निकल गई है. तभी बेटा आकर अपनी पत्नी से पूछता है कि उसकी शर्ट क्यों नहीं धोई.

‘औरतें तो पूरे  घर के कपड़े धोती ही हैं’

पुराने दिनों के विज्ञापनों में एक मां या पत्नी होती थी, जो अपने डिटर्जेंट पाउडर से दुखी होती थी. फिर नया पाउडर आकर उसका जीवन बदल देता है. फिर यूं हुआ कि नए पाउडर के साथ औरत को पति के लिए सजने और हाथ कोमल रखने का समय मिलने लगा. पति पत्नी की इस तरह घर का काम करने और सुंदर लगने पर रीझ जाता था या इस बात पर खुश होता था कि अब उसकी बेचारी पत्नी को कपड़े नहीं घिसने पड़ते.

पुरुष कभी कपड़े नहीं धोते. औरत, खासकर अगर शादीशुदा है, तो पति के पूरे परिवार के कपड़े धोती है और ये बड़ा ही नॉर्मल है. हां, इस काम में अगर कभी पति मदद कर दे, तो उसे एक नॉर्मल पुरुष नहीं, बल्कि देवता की तरह देखा जाने लगता है. वहीं औरतों का पुरुषों के लंगोट और जांघिये धोना भी उनका फ़र्ज़ माना जाता  है.

Helping his wife with laundry
पुरुष एक बार फिर यही कहेंगे, ये उनका काम नहीं है. 

अब मिडिल क्लास में कपड़े हाथ से नहीं धुले जाते. मगर कौन से कपड़े मशीन में जाएंगे, कौन से बाल्टी में, कौन से धूप में सूखेंगे, कौन से छाया में, कौन से रंग छोड़ेंगे, यहां तक कि कपड़े कितने और कब धुले जाएंगे, ये तक घर की औरत तय करती है. यानी आज भी उसकी भूमिका नहीं बदली, बस शारीरिक मेहनत कम हो गई है.

आज भी सिंगल, नौकरीपेशा लड़कों को एक ही सलाह दी जाती है, शादी कर लो, कम से कम कपड़े साफ़ मिलेंगे, खाना टाइम पर मिलेगा. क्यों?

सलमान खान भी कुछ न बदल सके

सलमान खान ने ‘व्हील’ डिटर्जेंट के विज्ञापन किए. टीवी की 3 अलग-अलग स्टार एक्ट्रेसेज के साथ. तीनों विज्ञापनों में लड़कियां कपड़े धोकर सुखाती हैं और सलमान खड़े होकर मुस्कराते हैं, रोमैंस करते हैं.

सलमान एक स्टार हैं. शायद इंडिया के सबसे पॉपुलर स्टार. अगर विज्ञापन पति के रूप में सलमान की भूमिका बदल सकता, तो लोग शायद उससे जुड़ाव महसूस कर पाते. मगर ये कैंपेन भी किसी एवरेज डेली सोप सा रह गया.

The ad featuring Salman Khan and Prachi Desai
एरियल के ऐड में प्राची देसाई के साथ सलमान खान.

मगर सुकून है कि अब विज्ञापन बदल रहे हैं. टीवी और जनता एक-दूसरे का आइना हैं. एक-दूसरे को देखकर दोनों बदलते हैं. कंफर्ट का ये ऐड भी कुछ तो बदलेगा.


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