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कोड एम: वेब सीरीज़ रिव्यू

हाउ इज़ दी होश? ठिकाने पर.

‘कोड M’ के पहले एपिसोड में आए इस डायलॉग को सुनकर आप मुस्कुराए बिना नहीं रहते.

‘ऑल्ट बालाजी’ और ‘ज़ी 5’. दो देशी स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्मस. दोनों के बीच न जाने क्या डील है कि कई वेब सीरीज़ अब दोनों पर एक साथ स्ट्रीम होती हैं. ‘कोड M’ भी दोनों जगह एक ही दिन रिलीज़ हुई. 15 जनवरी, 2020 को रिलीज़ हुई इस वेब सीरीज़ में टोटल 8 एपिसोड्स हैं. हर एपिसोड औसतन 25 मिनट का है. लेकिन इसमें से पिछले एपिसोड के रिकैप और क्रेडिट रोल हटा दिए जाएं तो हर एपिसोड 20 मिनट के लगभग का बैठता है.

‘कोड एम’ दरअसल ‘कोर्ट मार्शल’ का ही पर्यायवाची शब्द है. और ‘सच्ची घटनाओं से प्रेरित’ कहकर प्रमोट की जा रही इस सीरीज़ का नाम ‘कोड एम’ क्यूं है, ये सीरीज़ की कहानी जानकर पता चल जाता है.

# कहानी-

आतंकवादियों के साथ सीधी लड़ाई में दो आतंकवादी मारे जाते हैं और इंडियन आर्मी का एक सैनिक, अजय पासवान भी शहीद हो जाता है. दिक्कत ये है कि ये पूरी घटना का ऑफिशियल वर्ज़न है. लेकिन वास्तविकता इतनी पारदर्शी नहीं है.

जो मारे गए थे, गांव वालों की नज़र में आतंकवादी नहीं थे. और उनकी इस बात, इस दलील की सुनवाई नहीं हो रही है. सुनवाई हो, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए आतंकवादियों में से एक की मां अपने को आग लगा लेती है. मामला हाई प्रोफाइल बनते ही, आर्मी एक आंतरिक जांच करवाती है. इसके लिए जोधपुर में बैठे कर्नल सूर्यवीर चौहान, पुणे से मोनिका मेहरा को बुलाते हैं.

मोनिका मेहरा की कुछ ही दिनों में शादी होने वाली है, लेकिन ‘कॉल ऑफ़ ड्यूटी’ वो नकार नहीं सकतीं. वो भी तब जब वो कॉल कर्नल चौहान का हो. कर्नल चौहान, जिनसे मोनिका भक्ति की हद तक इंस्पायर्ड है. इनकाउंटर में जो शहीद हुआ है वो अजय पासवान, कर्नल चौहान का होने वाला दामाद था. यूं इसमें एक पर्सनल एंगल भी है. दूसरा पर्सनल एंगल ये है कि जहां मोनिका मेहरा, इनकाउंटर में बच गए सैनिकों को इंटरोगेट कर रही होती है, वहीं उसका पूर्व प्रेमी इन सैनिकों का लीगल एडवाईज़र बनकर एंट्री लेता है.

तनुज वीरवानी इससे पहले 'इनसाइड एज' में दिखे थे.
तनुज वीरवानी इससे पहले ‘इनसाइड एज’ में दिखे थे.

ये, और इससे भी कहीं ज़्यादा चीज़ें पहले एपिसोड में ही घट जाती हैं. आगे के 7 एपिसोड्स में ये सारे प्लॉट्स-सब प्लॉट्स एक जगह मिल जाते हैं. पहले एपिसोड में खड़े हुए सारे सवालों के उत्तर भी अंत तक मिल जाते हैं.

# सीरीज़ की अच्छी बुरी बातें, पॉइंटर्स में-

# ‘कोड एम’ का कॉन्सेप्ट बेशक बहुत घिसा पिटा नहीं है, लेकिन अगर ‘शौर्य’ मूवी में से ‘मुसलमान’ वाला एंगल हटा कर उसमें ‘दलित’ वाला एंगल डाल दिया जाए, तो इस सीरीज़ का बेसिक कॉन्सेप्ट बन जाता है.

# ये वेब सीरीज़ जातिवाद, समलैंगिकता, पितृसत्तात्मकता जैसे मुद्दों को उठाती तो है, लेकिन बहुत सतही तौर पर. बावज़ूद इसके, कि ये सारे मुद्दे कहानी के मेन प्लॉट का हिस्सा हैं, न कि साइड स्टोरीज़.

जो भी हो, चाहे कम या ज़्यादा, चाहे सतही या डीप, चाहे समाज के लिए या कमर्शियल सक्सेस के लिए, किसी भी समाजिक मुद्दे पर बात करने वाले किसी भी कंटेंट की तारीफ़ की ही जानी चाहिए. टिटिहरी प्रयास भी राम सेतु बनाने के दौरान किए गए बड़े प्रयासों के बीच एप्रिशिएट होने चाहिए.

# ‘कोड एम’ की लीड एक्ट्रेस जेनिफर विंगेट टीवी का जाना माना नाम हैं. उनके ‘बेहद’ और ’बेपनाह’ जैसे सीरियल्स काफी चर्चित रहे थे. ‘बेहद’ में वो एक ऑबसेस्ड लड़की का किरदार निभाती हुई नज़र आईं थीं. निगेटिव रोल होने के बावजूद उनका ये किरदार बहुत फेमस हुआ था. इसी के चलते ‘बेहद’ लौटा. ‘बेहद 2’ नाम से. ‘कोड एम नाम के अपने ‘डिजिटल डेब्यू’ में वो एक अलग ही अवतार में नज़र आती हैं. बोल्ड और प्रफेशनल. उन्होंने अच्छा काम किया है. अपनी पिछली इमेज से बिलकुल अलग. लेकिन दिक्कत भी यहीं पर पैदा हो जाती है. कि जिन्होंने उन्हें टीवी पर देखा है, उन्हें जेनिफर के इस रोल को पचाने में दिक्कत हो सकती है.

अगर आपने 'शौर्य' और ‘रेक्विएम फॉर अ ड्रीम’ मूवीज़ देखी हैं, तो आपको सीरीज़ के दौरान दोनों ही 'बेह्द्र' और 'बेपनाह' याद आएंगी.
अगर आपने ‘शौर्य’ और ‘रेक्विएम फॉर अ ड्रीम’ मूवीज़ देखी हैं, तो आपको सीरीज़ के दौरान दोनों ही ‘बेह्द्र’ और ‘बेपनाह’ याद आएंगी.

# सीरीज़ के बाकी एक्टर्स में आप आरोपियों के लीगल एडवाईज़र अंगद को आसानी से पहचान लेते हो. ये वही तनुज वीरवानी हैं, जो इनसाइड एज में भी दिखे थे. तनुज अपनी एक्टिंग से ज्याद अपने ‘केयर-फ्री’ एटीट्यूड से प्रभावित करते हैं. ‘कोड एम’ में भी और अपने पिछले प्रोजेक्ट्स में भी.

# रजत कपूर एक सीज़न्ड एक्टर हैं, लेकिन जो रोल उन्होंने किया है, उससे उनकी तुलना केके मेनन से होना लाज़मी है. तुलना न करें, तो उन्होंने अच्छी एक्टिंग की है. आर्मी का मैनरिज्म सबसे अच्छे से उन्होंने ही पकड़ा है.

# ओवर ऑल सीरीज़ इंट्रेस्ट बनाए रखती है. ‘कोड एम’ में जिस तरह से चीज़ें खुलती और जुड़ती चली जाती हैं वो सारे सवालों के उत्तर दे जाती हैं. लेकिन इसके बावज़ूद एक असंतुष्टि का एहसास रह जाता है. किरदारों से ज़्यादा, कहानी में इंवेस्ट किया गया है. इसलिए कर्नल सूर्यवीर चौहान जैसे किरदार अपने उस कद तक नहीं पहुंच पाते जहां ‘कोड एम’ उन्हें पहुंचाना चाहती है. साथ ही बाकी किरदार भी काफी सपाट लगते हैं.

# डायलॉग्स ऑर्गेनिक तरीके से लिखे गए हैं, इसलिए प्रीच करते हुए या अनावश्यक जोशीले नहीं लगते. ये कुछेक जगह पर क्रिएटिव लिबर्टी लेते हैं, लेकिन फिर भी कहानी के फ्लो में हस्तक्षेप नहीं करते.

# सिनेमैटोग्राफी बहुत ही औसत है, कई चीज़ें जो नकली हैं, वो नकली लगती हैं. फिर चाहे वो मज़ार का सीन हो, या मोनिका मेहरा का एक चेज़ सीन.

# जोधपुर से पाकिस्तान बॉर्डर बहुत दूर है. लेकिन सीरीज़ में बार-बार बॉर्डर का सन्दर्भ यूं आता है गोया कुछ ही फर्लांग दूर हो.

जेनिफर विंगेट के पिछले प्रोजेक्ट्स सुपरहिट रहे थे.
जेनिफर विंगेट के पिछले प्रोजेक्ट्स सुपरहिट रहे थे.

# एडिटिंग के बारे में बात किए बिना ‘कोड एम’ का रिव्यू पूरा नहीं हो सकता. अगर आपने ‘रेक्विएम फॉर अ ड्रीम’ देखी है तो इसकी जंप कट एडिटिंग से आपको उस मूवी की याद ज़रूर आएगी. ये जंप कट सीरीज़ के ‘थ्रिलर’ फील को बढ़ाने में बड़ा योगदान करते हैं. इंट्रोगेशन के दौरान की मेन डिटेल्स स्क्रीन पर टेक्स्ट फ़ॉर्मेट में लिखकर भी दिखाई जाती हैं. ये आईडिया भी रोचकता को बढ़ाने में मदद करता है. और बताता है कि क्या इंपोर्टेंट है. ये ऐसा ही है जैसे किसी आर्टिकल में कोई टेक्स्ट बोल्ड कर दिया गया हो.

# बैकग्राउंड म्यूज़िक औसत ही है, और एडिटिंग की तरह सीरीज़ के रोमांच को बढ़ाने में कोई सहायता नहीं करता.

# ‘ऑल्ट बालाजी’ और ‘ज़ी 5’ के फ़ॉर्मेट आपके व्यूइंग एक्सपीरिएंस को कमतर कर देते हैं. हर एपिसोड में क्रेडिट रोल और पिछले एपिसोड का रिकैप तब ठीक है जब तक आप टीवी सीरियल बना रहे हों, जो हफ्ते में एक दिन आता है. लेकिन जब आपने सारे एपिसोड्स एक साथ ही अपलोड किए हैं तो इस सब की कतई ज़रूरत नहीं. ज़ी 5 जितनी ज़ल्दी ये समझ जाए उतना बेहतर.

के के मेनन के साथ रजत कपूर की तुलना होना लाज़मी क्यूं है, ये जानने के लिए 'कोड एम' देखना ज़रूरी है.
के के मेनन के साथ रजत कपूर की तुलना होना लाज़मी क्यूं है, ये जानने के लिए ‘कोड एम’ देखना ज़रूरी है.

# फाइनल वर्डिक्ट-

‘कोड एम’ की सबसे अच्छी बात इसका छोटा और क्रिस्प होना है. इसलिए ढाई तीन घंटे के लगभग का समय इंवेस्ट करना बुरा नहीं है. बुरा है, इससे ज़्यादा उम्मीद लगाना.


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