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रोहिंग्या मुसलमानों की आदमखोरी का सच ये है

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*इस खबर की तस्वीरें कुछ पाठकों को वीभत्स लग सकती हैं. पाठक विवेक से काम लें.*

रोहिंग्या शरणार्थी भारत में रहें कि नहीं, इस बात पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सरकार में ठनी हुई है. और बात अब खिंचकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है, जो भारत के संविधान के मुताबिक इस मामले पर अपनी राय रखेगा. लेकिन सोशल मीडिया पर कुकुरमुत्ते की तरह उग आए राष्ट्रवाद के चीयरलीडरों ने फैसला सुना दिया है –

‘रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेज दिया जाए, क्योंकि आतंकवादी होने के साथ-साथ वो नरभक्षी हैं.’

माने वो इंसानों का मांस खाते हैं. तो अगर पहले से ही आतंकी घोषित कर दिए गए रोहिंग्या हम भारतीयों को बम मार-मार कर खत्म न कर पाए, तो टुकड़े-टुकड़े कर के खा जाएंगे. फेसबुक या ट्विटर पर ‘रोहिंग्या इंसान का मांस…’ टाइप कर के देखिए. सैकड़ों पोस्ट मिलेंगी जिनमें भारतीयों को रोहिंग्या मुसलमान नाम के खतरे के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए कहा जा रहा है.

ऐसी ज़्यादातर पोस्ट्स बेहद वीभत्स हैं. एक वीडियो में एक आदमी एक चाकू लेकर कुछ लाशों पर से मांस उतार रहा है. कहा जा रहा है कि ये आदमी एक नरभक्षी रोहिंग्या है.

इस वीडियो को रोहिंग्या की आदमखोरी का सबूत बताया जा रहा है
इस वीडियो को रोहिंग्या की आदमखोरी का सबूत बताया जा रहा है

कुछ पोस्ट और हैं, जिनमें कुछ बहुत वीभत्स तस्वीरें हैं. इन तस्वीरों में कुछ लोग लाशों के टुकड़े करते नज़र आ रहे हैं. और ऐसा करते वक्त उनके चहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं होती. दी लल्लनटॉप के पाठकों ने हमें मेल कर के पूछा कि क्या ये रोहिंग्या मुस्लिमों का है?

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और जवाब है – नहीं.

ये मामला हमें इसलिए गंभीर लगा क्योंकि ये तस्वीरें और वीडियो बिलकुल असली हैं. लेकिन इनके साथ सुनाई जा रही कहानी फर्ज़ी है. तो फिर असली कहानी क्या है? वीडियो में नज़र आ रही बर्बरता की वजह क्या है और उसे करने वाला कौन है?

हमारी पड़ताल के मुताबिक ये वीडियो रोहिंग्या मुसलमानों की आदमखोरी का नहीं, बल्कि अंतिम संस्कार की एक बौद्ध रस्म का है, जिसे ‘स्काय बरियल’ कहते हैं.

क्या होता है स्काय बरियल?

स्काय माने आकाश होता है. बरियल माने दफनाना. तो यहां आसमान के रास्ते अंतिम संस्कार की बात हो रही है. ये बौद्ध धर्म की वज्रायन परंपरा का हिस्सा है. इसमें माना जाता है कि शरीर आत्मा के लिए एक पात्र बस है. मौत होने पर आत्मा शरीर छोड़ देती है. तब शरीर किसी काम का नहीं. इसलिए उसे कुदरत को लौटा देना चाहिए. इसे मानने वाले ज़्यादातर बौद्ध लोग तिब्बत और चीन में हिमालय की ऊंची पहाड़ियों पर रहते हैं.

स्काय बरियल या झटोर अंतिम संस्कार की बौद्ध परंपरा है
स्काय बरियल या ‘झटोर’ अंतिम संस्कार की बौद्ध परंपरा है (फोटोःरॉयटर्स)

आमतौर पर बौद्ध दफनाने और दाह संस्कार दोनों में विश्वास करते हैं. लेकिन इन ऊंची पहाड़ियों पर ज़मीन काफी सख्त और पथरीली होती है. किसी तरह खोद भी लें तो ज़मीन के अंदर एक परत बर्फ की मिलने लगती है, जिसे ‘पर्माफ्रॉस्ट’ कहते हैं. एक दूसरी समस्या भी है. ये जगहें ‘ट्री लाइन’ के ऊपर हैं. माने इतनी ऊंचाई पर कि कुदरती तौर पर पेड़ उग नहीं सकते. तो जो भी लकड़ी मिलती है, वो काफी कीमती होती है. उसे चिता के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

इसलिए यहां की स्थितियों के मुताबिक अंतिम संस्कार की एक नायाब परंपरा ने जन्म लिया, जिसमें लाश को किसी सुदूर जगह खुले आसमान के नीचे छोड़ दिया जाता है ताकि गिद्ध उसे खा लें. वैसे ही जैसे पारसी समुदाय में होता है. बौद्ध इसे ‘झटोर’ भी कहते हैं. इसका मतलब होता है गिद्धों को बख्शीश देना. बौद्ध मानते हैं कि गिद्ध आत्मा को इस लोक से परलोक ले जाते हैं. इसलिए बौद्ध लोगों के लिए गिद्ध बहुत पवित्र होते हैं.

स्काय बरियल के लिए अपने परिजन को ले जाते तिब्बती फोटोःरॉयटर्स
स्काय बरियल के लिए अपने परिजन को ले जाते तिब्बती (फोटोःरॉयटर्स)

कैसे होता है झटोर?

झटोर एक मुश्किल प्रक्रिया है. किसी के मरने के बाद 24 से 72 घंटे तक आत्मा के शरीर छोड़ने का इंतज़ार किया जाता है. फिर मुर्दा शरीर की रीढ़ तोड़कर उसके घुटने समेट पेट से सटा दिए जाते हैं. सिर को घुटनों के करीब लाया जाता है. फिर पौ फटने पर शरीर को ‘दुरत्रो’ (श्मशान) ले जाया जाता है. परिवार के लोग ढोल पीटते और मंत्र जपते साथ चलते हैं. किसी बाहरी को इस प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है, ताकि आत्मा के स्वर्ग जाने में किसी प्रकार की तकलीफ न हो.

दुरत्रो पहुंचने के बाद कुछ जड़ियां जलाकर गिद्धों को बुलाया जाता है. फिर ‘रोग्यापा’ का काम शुरू होता है. ये लोग शरीर से मांस निकालकर अलग करते हैं ताकि गिद्धों को उन्हें खाने में आसानी हो. कभी-कभी बौद्ध लामा भी ये काम करते हैं. गिद्धों के मांस खा लेने के बाद बची हड्डियों को पीसकर ‘साम्पा’ में मिलाकर एक पेस्ट-सा बना लिया जाता है. साम्पा एक तिब्बती डिश है. ये पेस्ट गिद्धों को खिला दिया जाता है. शरीर का कोई भी हिस्सा बचा रहना अपशकुन माना जाता है.

बौद्ध लोगों के लिए गिद्ध बड़े पवित्र होते हैं. इन्हीं के सहारे झटोर हो पाता है. फोटोःरॉयटर्स
बौद्ध लोगों के लिए गिद्ध बड़े पवित्र होते हैं. इन्हीं के सहारे झटोर हो पाता है. (फोटोःरॉयटर्स)

बौद्ध ‘बारदो’ में भरोसा रखते हैं. ये मौत के बाद और पुनर्जन्म से पहले की स्थिति मानी जाती है, जिसे सब पार करना चाहते हैं. इसलिए बैद्ध धर्म में अंतिम संस्कार का बहुत महत्व है और इतनी मुश्किल लगने वाली झटोर परंपरा वो अब तक ज़िंदा रखे हुए हैं.

वायरल हो रहा वीडियो झटोर का क्यों लगता है?

वीडियो में शरीर पर से मांस उतार रहे इंसान का पहनावा तिब्बतियों से मिलता-जुलता है. वीडियो में नज़र आ रहे दूसरे आदमी का पहनावा तो ठीक वैसा है, जैसे बौद्ध भिक्षुओं का होता है.

(बाएं) वीडियो में नज़र आ रहा शख्स, (दाएं) तिब्बत में झटोर के दौरान मौजूद लोग. पहनावे में समानता देखी जा सकती है
(बाएं) वीडियो में नज़र आ रहा शख्स, (दाएं) तिब्बत में झटोर के दौरान मौजूद लोग. पहनावे में समानता देखी जा सकती है

इसके अलावा शरीर से मांस उतारने की प्रक्रिया बिलकुल वैसी है, जैसी झटोर में होती है. इसलिए हो न हो, ये वीडियो किसी ऐसी जगह का है, जहां मर चुके वज्रायन बौद्ध लोगों का अंतिम संस्कार हो रहा था, न कि आदमखोरों के बूचड़खाने का.

झटोर में शामिल एक तिब्बती बौद्ध फोटोःरॉयटर्स
झटोर में शामिल एक तिब्बती बौद्ध (फोटोःरॉयटर्स)

इसी तरह के दूसरे मैसेज भी फर्ज़ी हैं

सोशल मीडिया पर रोहिंग्या मुसलमानों की आदमखोरी की तस्वीरों के कोलाज भी शेयर किए जा रहे हैं. इनमें से एक तस्वीर में सफेद टोपी पहने एक आदमी को एक इंसानी हाथ के टुकड़े करते देखा जा सकता है. ये तस्वीर भी असली है. इसे 13 मार्च, 2009 को थाइलैंड में क्लिक किया गया था. ये भी एक बौद्ध रस्म है, जिसे थाइलैंड में ‘लांग पा चा’ कहा जाता है.

थाइलैंड की लांग पा चा परंपरा की तस्वीरों को रोहिंग्या मुसलमानों की करतूत की तरह पेश किया जा रहा है
थाइलैंड की ‘लांग पा चा’ परंपरा की तस्वीरों को रोहिंग्या मुसलमानों की करतूत की तरह पेश किया जा रहा है

थाइलैंड में जो बौद्ध चिता के लिए लकड़ियों लायक पैसे जमा नहीं कर पाते, वो अपने चहेतों के मरने पर उन्हें दफनाते हैं. जब कब्रिस्तान पूरी तरह भर जाते हैं, तब उसे साफ किया जाता है. पुराने शरीरों को निकाल कर उनके टुकड़े कर के जला दिया जाता है. लांग पा चा में आस-पास मिले शव भी शामिल कर लिए जाते हैं. तस्वीर में दिख रहा हाथ ऐसे ही एक शव का है.

तस्वीर में दिखाई दे रहे लोग मेडिकल स्टाफ का हिस्सा हैं, इसलिए सफेद कपड़ों में हैं और अपना काम करते हुए कुछ सहज नज़र आ रहे हैं. थाई बौद्ध परंपरा के मुताबिक लांग पा चा में हिस्सा लेने वालों को लांग पा चा से पहले और बाद में कई दिन तक मांसाहार से दूर रहना होता है. ये सारी जानकारी फैक्ट चेकिंग साइट स्नोप्स ने थाईलैंड के दूतावास हासिल कर जुलाई 2013 में अपनी वेबसाइट पर छापी थी.

इस तरह रोहिंग्या मुसमलानों की आदमखोरी की तस्वीरों का कोलाज भी फर्ज़ी साबित होता है.

स्नोप्स में इन तस्वीरों का सच बताता लेख
स्नोप्स में इन तस्वीरों का सच बताता लेख

स्काय बरियल एक ऐसी रस्म है, जिसे दुनिया के कई समाज टैबू की श्रेणी में रखेंगे. चीन की सरकार ने 1960 से 1980 के बीच इसे बैन कर दिया था. ऐसा ही लांग पा चा के साथ ही है. इन्हें रोहिंग्या की आदमखोरी का नमूना बनाकर पेश करना बेवकूफाना होने के साथ-साथ त्रासद भी है. क्योंकि ये दोनों अहिंसक माने जाने वाले बौद्ध धर्म की परंपराएं हैं. इसी धर्म के कुछ लोग रोहिंग्या लोगों की जान के दुश्मन बने हुए हैं.

भारत सरकार रोहिंग्या शरणार्थियों को देश से भगाने के लिए जो तर्क दे रही है, वो बेवकूफी के नया रिकॉर्ड स्थापित कर ही रहा है. ऐसे में आप प्रोफाइल पर फैली बेवकूफी समेट लीजिए. ये देश इतनी बेवकूफी सहन नहीं कर सकता. और तंज़ को एक तरफ रख भी दें तो हिंदुस्तान में किसी धर्म या समूह के खिलाफ भावनाएं भड़काना कानूनन अपराध है. बाकी आप समझदार हैं.


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