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कान में स्क्रीन हुई वो बेहतरीन इंडियन फिल्में, जिन्होंने तहलका मचा दिया

सिनेप्रेमियों का तीर्थ यानी कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) शुरू हो चुका है. और उसी के साथ शुरू हुई है हमारी कान स्पेशल सीरीज़. जहां हम पहले कान फिल्म फेस्टिवल 2021 की मोस्ट एंटीसिपेटिड फिल्मों के बारे में बता चुके हैं. कान की हिस्ट्री के यादगार किस्से बता चुके हैं. आज बताएंगे कान के इंडियन कनेक्शन के बारे में. यानी उन कमाल की इंडियन फिल्मों के बारे में बात करेंगे, जो कान में स्क्रीन की जा चुकी हैं.

कान की रिच फिल्म हिस्ट्री में उतरने से पहले ज़रूरत है इस साल प्रीमियर होने वाली इंडियन फिल्म्स के बारे में थोड़ा जानने की. 2016 में एक डाक्यूमेंट्री आई थी. टाइटल था ‘मशीन्स’. बनाया था फर्स्ट टाइम डायरेक्टर राहुल जैन ने. बचपन में राहुल अपने दादा की टेक्सटाइल फैक्ट्री में काफी वक्त बिताते थे. फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों को देखते. उनकी हालत देखकर मन में अनगिनत सवाल उमड़ते. बड़े हुए तो खुद से एक और सवाल किया. कि मेरे घर पर मुझे वाइन सर्व करने वाला महीने भर में उस बॉटल की आधी कीमत जितना भी नहीं कमा पाता. ऐसा क्यों? ये सवाल लेकर वो किसी अर्थशास्त्री के पास नहीं गए. बल्कि खुद के पर्सनल अनुभवों को खंगाला. और बना डाली ‘मशीन्स’ नाम की डाक्यूमेंट्री. कहानी थी टेक्सटाइल फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों की. जो दिन भर काम कर अपनी ज़िंदगी को बेरंग कर, रंगीन और चमकदार कपड़े बनाते हैं. फिल्म सनडांस फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर की गई. जहां उसके हिस्से तारीफ़ें ही आईं.

Machines 3
राहुल की डाक्यूमेंट्री ‘मशीन्स’ का शॉट.

अब राहुल एक और डाक्यूमेंट्री लेकर रहे हैं. नाम है ‘इनविज़िबल डीमन्स’. चाहे देश-दुनिया के कितने ही लीडर्स क्लाइमेट चेंज को नकार दें. या कहें कि क्लाइमेट चेंज कुछ नहीं है, बस हमारे शरीर की क्षमता बदल गई है. फिर भी‘क्लाइमेट चेंज इज़ रियल’. इसके परिणाम हम अपने आसपास भी देख रहे हैं. सबसे बड़ा उदाहरण है दिल्ली की दूषित जलवायु और उसके परिणाम. दिल्ली प्रदूषण को थीम बनाकर राहुल ने अपनी इस नई डाक्यूमेंट्री में क्लाइमेट चेंज पर बात करने की कोशिश की है. ये फिल्म इस बार के कान फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर होगी.

‘इनविज़िबल डीमन्स’ के अलावा इस साल कान में पायल कपाड़िया की फिल्म ‘अ नाइट ऑफ नोइंग नथिंग’ भी प्रीमियर की जाएगी. पायल ने 2017 में अपने दोस्तों को शूट करना शुरू किया. ऐसे ही रैंडम तरीके से. बिना कोई प्लानिंग किए. जो फुटेज शूट हुई उसे 2019 में फ्रेंच प्रड्यूसर्स को दिखाया. उन्हें फिल्म की इमेजेस अच्छी लगीं. पायल ने शूट की गई फुटेज के इर्द-गिर्द एक कहानी बनाने का फैसला लिया. एक लड़की की कहानी जो अपने चाहनेवाले से दूर हो गई. वो उसे चिट्ठियां लिखती है. और उन्हीं चिट्ठियों के जरिए हमें उसकी दुनिया की झलक मिलती है. पायल इससे पहले भी कान जा चुकी हैं. 2017 में आई अपनी शॉर्ट फिल्म ‘आफ्टरनून क्लाउड्स’ के लिए.

A Night Of Knowing Nothing
पायल ने अपने FTII के दिनों में दोस्तों के वीडियोज़ शूट किए और फिल्म बना डाली.

ये तो हुई इस साल कान में प्रीमियर होने वाली इंडियन फिल्मों की बात. अब बात उन इंडियन फिल्मों की जो सिर्फ कान में स्क्रीन ही नहीं हुई. बल्कि अपना लोहा भी मनवाया.


#1. नीचा नगर (1946)

डायरेक्टर: चेतन आनंद

भाषा: हिंदी

कान फिल्म फेस्टिवल का पहला आयोजन 1946 में हुआ. हालांकि, ये फेस्टिवल पहली बार 1939 में होने वाला था. 1 सितंबर से लेकर 20 सितंबर तक. लेकिन 01 सितंबर को जर्मन आर्मी ने पोलैंड पर हमला कर दिया. जिसके बाद फेस्टिवल को 10 सितंबर तक पोस्टपोन कर दिया गया. लेकिन 10 दिन बाद भी फेस्टिवल का आयोजन नहीं किया जा सका. क्योंकि 03 सितंबर को फ़्रांस और यूनाइटेड किंगडम ने मिलकर जर्मनी के खिलाफ जंग घोषित कर दी.

20 सितंबर, 1946 को कान फिल्म फेस्टिवल पहली बार ऑर्गनाइज़ किया गया. इंडिया की तरफ से फर्स्ट टाइम डायरेक्टर चेतन आनंद की फिल्म ‘नीचा नगर’ कान में नॉमिनेट हुई. वो भी ग्रांड प्रिक्स के लिए. कान का सबसे बड़ा अवॉर्ड. आगे जाकर जिसकी जगह पाम दॉर ने ली. ‘नीचा नगर’ बिली वाइल्डर की ‘द लॉस्ट वीकेंड’ और डेविड लीन की ‘ब्रीफ एनकाउंटर’ जैसी फिल्मों के साथ कम्पीट कर रही थी. बावजूद इसके, फिल्म अपना मार्क छोड़ने में सफल रही. उस साल 11 फिल्मों को ग्रांड प्रिक्स अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. ‘नीचा नगर’ भी उनमें से एक थी.

Neecha Nagar 1
‘नीचा नगर’, जो आज भी उतनी ही रेलवेंट है.

चेतन आनंद की फिल्म रशियन राइटर मैक्सिम गोर्की के प्ले ‘द लोवर डेप्थ्स’ पर बेस्ड थी. वो मैक्सिम गोर्की, जिनका नॉवल ‘मदर’ भारतीय क्रांतिकारी भगत सिंह को बहुत पसंद था. खैर, रशियन प्ले से प्रेरणा लेकर उसे इंडिया के कॉनटेक्स्ट में सेट किया गया. जिसकी अपील यूनिवर्सल साबित हुई. फिल्म का सब्जेक्ट ही कुछ ऐसा था. कहानी थी फर्क की. अमीरी और गरीबी के फर्क की. ऊंचे और नीचे के फर्क की. कुछ पूंजीवादी गांववालों की ज़मीन हथियाने की कोशिश करते हैं. संसाधन रहित गांववाले अपने हक के लिए कैसे लड़ते हैं. ये फिल्म उसी स्ट्रगल की कहानी बताती है. 1946 में रिलीज़ होने के बाद भी फिल्म आज भी उतनी ही रेलेवेंट है. साथ ही प्रोग्रेसिव भी लगती है. पहली वजह तो अमीर-गरीब का फर्क जो आज भी जस का तस है. दूसरी वजह है कि फिल्म में महिलायें सिर्फ हीरो के पीछे नहीं खड़ी रहीं. बल्कि, वो भी हक के लिए पूंजीवादियों के खिलाफ खड़ी होती दिखीं.


#2. पाथेर पांचाली (1955)

डायरेक्टर: सत्यजीत रे

भाषा: बांग्ला

सत्यजीत रे के सिनेमा के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता, जो पहले न कहा गया हो. महान जापानी डायरेक्टर अकीरा कुरोसावा मानते थे कि रे के सिनेमा को न देखना ठीक वैसा ही है जैसे चांद या सूरज को न देखना हो. एडवरटाइज़िंग एजेंसी में काम करने वाले रे 1950 में लंदन गए. एक बिज़नेस ट्रिप पर. उस समय तक ‘पाथेर पांचाली’ बनाने का आइडिया उनके दिमाग में घर कर चुका था. रे ने अपनी उस ट्रिप के दौरान 100 से भी ज्यादा फिल्में देखी. लेकिन एक फिल्म थी जिसने उनपर सबसे ज्यादा प्रभाव डाला. जिसने क्लियर कर दिया कि वो ‘पाथेर पांचाली’ को किस तरह बनाने वाले हैं. वो फिल्म थी विटोरियो डि सिका की ‘बाइसिकल थीव्स’. वो फिल्म जिसे दुनिया की सबसे महान फिल्मों में से एक माना जाता है. वो फिल्म जिसने अनुराग कश्यप, राज कपूर और केन लोच जैसे फिल्ममेकर्स को प्रभावित किया.

Pather Panchali 3
सत्यजीत रे के सिनेमा के चित्रों को महसूस किया जा सकता है, खुद से जोड़कर समझा जा सकता है.

‘बाइसिकल थीव्स’ की ही तरह रे भी अपनी फिल्म को लोकेशन पर शूट करना चाहते थे. वो भी नॉन-एक्टर्स के साथ. इंडिया आकर फिल्म पर काम शुरू किया. 1955 में रिलीज़ हुई ‘पाथेर पांचाली’ को बेस्ट फीचर फिल्म के नैशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. वहीं, 1956 के कान फिल्म फेस्टिवल में फिल्म ने बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट अवॉर्ड अपने नाम किया. कुछ लोग मानते थे कि रे भारत की गरीबी दिखाकर अंग्रेजों से वाहवाही लूट रहे हैं. 1980 में नरगिस दत्त ने भी उन पर भारत की गरीबी को ‘एक्सपोज़’ करने का आरोप लगाया था. लेकिन रे का सिनेमा गरीबी-अमीरी जैसी बातों से काफी ऊपर था. उनके सिनेमा को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है. अपनी ज़िंदगी से जोड़कर देखा जा सकता है.


#3. खारिज (1982)

डायरेक्टर: मृणाल सेन

भाषा: बांग्ला

मृणाल सेन. बांग्ला सिनेमा में नया मूवमेंट लाने वाले फिल्ममेकर. उनका सिनेमा इतना रॉ है कि निचोड़ कर रख दे. सम्मोहित कर के रख दे. हालांकि, अपने डार्क पोट्रेयल के लिए उनपर ‘निराशावादी’ डायरेक्टर होने के इल्ज़ाम भी लगे. लेकिन फिर भी मृणाल दा ने सामाजिक वास्तविकता को परदे पर उतारने में कोई झिझक नहीं दिखाई. बेबाकी से अपना सिनेमा पेश किया. उनकी ऐसी ही बेबाक फिल्म थी ‘खारिज’. जिसने 1983 के कान फिल्म फेस्टिवल में पाम दॉर के लिए कम्पीट किया. लेकिन उस कैटेगरी में जीत नहीं पाई. हालांकि, ‘खारिज’ को कान के जूरी प्राइज़ से जरुर सम्मानित किया गया था.

Kharij Boy Death
मृणाल सेन सच्चाई को उसकी पूरी रॉनेस के साथ पेश करते थे.

कहानी थी एक मिडल क्लास फैमिली की. एक सुबह उनके घर पर काम करने वाला नाबालिग नौकर मृत पाया जाता है. घरवालों को अब पुलिस केस होने का डर है. साथ ही बच्चे की मौत का गिल्ट भी उन्हें अंदर-ही-अंदर खाए जा रही है. इसके बाद वो जो कुछ भी करते हैं, वो इस बात का उदाहरण है कि इंसान अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए किस हद तक गिर सकता है. इतना कि उससे घिन आने लगे.


#4. सलाम बॉम्बे (1988)

डायरेक्टर: मीरा नायर

भाषा: हिंदी

दिग्गज फिल्म क्रिटिक रॉजर एबर्ट ने फिल्म को लेकर कहा था कि इसकी मेकिंग की कहानी फिल्म की कहानी जितनी ही इंटरेस्टिंग है. सच ही है. मीरा नायर और उनकी टीम ने बॉम्बे की सड़कों पर पलने वाले बच्चों को इकट्ठा किया. उनके साथ सड़कों पर घूमे. ट्रेन स्टेशन्स पर गए. वो बच्चे जिन रेड लाइट इलाकों में रहते थे, वहां गए. बच्चों के अनुभवों पर उनसे सवाल किए. उन बच्चों के जवाबों की बदौलत एक स्क्रीनप्ले तैयार किया. लेकिन मीरा को उन बच्चों की जरुरत इसके आगे भी थी. उनमें से कुछ को बुलाया गया. उनकी डेली वर्कशॉप शुरू की गई. उन्हें एक्टिंग सिखाने के मकसद से नहीं. बल्कि कैमरे के सामने नैचुरल कैसे रहना है, ये सिखाने के लिए.

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वो फिल्म जहां इरफान खान का रोल काटकर कैमिओ तक सीमित कर दिया गया था.

‘सलाम बॉम्बे’ एक फीचर फिल्म है. जिसे स्क्रीन पर नज़र आने वाली सच्चाई के वास्ते एक डाक्यूमेंट्री की तरह देखा जाना चाहिए. सड़कों पर पल रहे बच्चों को कैसा माहौल मिल रहा है, उसकी सच्चाई. बाल सुधार गृह में उनकी क्या दशा होती है, उसकी सच्चाई. या एक बड़ी उम्र का आदमी जो रेड लाइट एरिया में रहने वाली नाबालिग लड़की को बहला फुसला कर प्यार का नाटक कर रहा है. कहानी में दिखाए गए ये अलग-अलग सच किसी को भी विचलित कर सकते हैं. असहज कर सकते हैं. उसके प्रिविलेज पर रिफ्लेक्ट करने पर मजबूर कर सकते हैं. शायद यही मेकर्स की भी मंशा रही हो. ‘सलाम बॉम्बे’ ने 1988 के कान फेस्टिवल में दो अवॉर्ड्स अपने नाम किए. पहला, कैमरा दॉर और दूसरा ऑडियंस अवॉर्ड.


#5. पिरवी (1989)

डायरेक्टर: साजी एन करुण

भाषा: मलयालम

2015 में एक तमिल फिल्म आई. ‘विसारनाई’. पुलिस ब्रूटैलिटी जैसे सब्जेक्ट पर बेस्ड. फिल्म आने के बाद इस सब्जेक्ट पर बहस और गर्म हुई. आखिर, ये भी सिनेमा का एक पहलू है. कि खुद बदलाव न लाए. बल्कि, उस बदलाव के इर्द-गिर्द एक कॉनवर्सेशन शुरू कर दे. ‘विसारनाई’ ने ये काम बखूबी किया. लेकिन ये काम एक और फिल्म ने किया था. वो भी ‘विसारनाई’ से करीब 25 साल पहले. फिल्म थी ‘पिरवी’. पुलिस ब्रूटैलिटी और सिस्टम की नाइंसाफी को केंद्र में लेकर बनाई गई फिल्म.

Piravi 3
ढूंढकर देखने वाली फिल्म.

फिल्म की कहानी प्रोफेसर टीवी वरियर पर आधारित है. साल था 1976. देश में इमरजेंसी लागू थी. उस दौरान प्रोफेसर वरियर का बेटा कॉलेज में पढ़ता था. जहां से उसे पुलिस अरेस्ट कर लेती है. फिर कुछ पता नहीं चलता कि बेटे का क्या हुआ. बस एक दिन खबर आती है कि वो पुलिस कस्टडी में मारा गया. यहां से शुरू होती है प्रोफेसर वरियर की लड़ाई. खुद से ताकतवर सिस्टम से लड़ाई. झूठ को सच की रोशनी दिखाने की लड़ाई. 1989 के कान फिल्म फेस्टिवल में ‘पिरवी’ कैमरा दॉर की कैटेगरी में नॉमिनेट हुई थी. जहां फिल्म को स्पेशल मेंशन दिया गया.


#6. ओंतरजली यात्रा (1987)

डायरेक्टर: गौतम घोष

भाषा: बांग्ला

कमल कुमार मजूमदार के उपन्यास ‘महायात्रा’ पर आधारित फिल्म. नैशनल अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म के सम्मान से भी नवाजी गई. कहानी है एक आदमी की. जो बस कुछ दिनों का मेहमान है. उसे एक ज्योतिष बताता है कि मरणोपरांत मुक्ति तभी मिलेगी जब तुम्हारी पत्नी जलती चिता पर सती हो जाए. ये वो समय था जब सती प्रथा खत्म हो चुकी थी. बावजूद इसके उस शख्स का परिवार एक गरीब लड़की को ढूंढ लाता है. कैसे-न-कैसे उसे मना भी लेते हैं. लेकिन श्मशान घाट में लाशों का क्रियाकर्म करने वाला आदमी इस घोर अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज उठाने का फैसला लेता है. सफल हो पाता है या नहीं, इसका जवाब आपको फिल्म में मिलेगा.

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‘पार’ और ‘पतंग’ जैसी फिल्में बनाने वाले गौतम घोष की फिल्म.

गौतम घोष के डायरेक्शन में बनी फिल्म 1988 के कान फिल्म फेस्टिवल की अ सर्टेन रिगार्ड सेक्शन में स्क्रीन की गई थी.


#7. मरण सिम्हासनम (1999)

डायरेक्टर: मुरली नायर

भाषा: मलयालम

अगर आप फिल्मों को आईएमडीबी रेटिंग के बेसिस पर जज करते हैं और हाई रेटिंग वाली फिल्में ही देखते हैं तो चांसेज़ हैं कि आप इस फिल्म को मिस कर देंगे. क्योंकि फिल्म की आईएमडीबी रेटिंग है 6.1. जिसे बिलो एवरेज माना जाता है. लेकिन ये मलयालम फिल्म किसी भी मायने में बिलो एवरेज नहीं. फिल्म साल 1999 के कान फिल्म फेस्टिवल की अ सर्टेन रिगार्ड सेक्शन में नॉमिनेट हुई. जहां इसने कैमरा दॉर अवॉर्ड अपने नाम किया. कहानी है कृष्णन की. एक मजदूर. लेकिन अभी हाल ऐसा है कि कोई काम नहीं. खाने को कुछ नहीं. इसलिए कृष्णन अपने ज़मींदार के खेत से कुछ नारियल चुरा लाता है. और पकड़ा जाता है.

Krishnan On Electrical Chair
ये फिल्म मौत में भी आइरनी ढूंढ लाती है.

चोरी की थी नारियल की. लेकिन जल्द ही उसे एक पुराने मर्डर केस का मुख्य आरोपी बना दिया जाता है. चुनाव का वक्त है. माहौल गर्माया हुआ है. इसलिए लोकल नेता भी उसके केस में रुचि लेने लगते हैं. यहां एंट्री होती है इलेक्ट्रिकल चेयर की. अपराधियों को मारने का नया तरीका. चूंकि ये चेयर विदेश से आई है, इसलिए सबके मन में इसे लेकर एक उत्साह है. जैसे सबने राय बना ली हो कि इसपर मरने वाला तो कोई भाग्यशाली ही होगा. अब पूरा गांव एक सर्कस में तब्दील हो जाता है. सबकी एक ही मांग, कि कृष्णन को इलेक्ट्रिकल चेयर पर मौत दी जाए.


#8. उड़ान (2010)

डायरेक्टर: विक्रमादित्य मोटवाने

भाषा: हिंदी

‘उड़ान’, एक कमिंग ऑफ एज ड्रामा. लेकिन टिपिकल कमिंग ऑफ एज फिल्म नहीं. ‘उड़ान’ कहानी थी एक बाप और बेटे के तने हुए रिश्ते की. दोनों अपोज़िट एंड्स. बेटा आर्ट्स पढ़ना चाहता है. राइटर बनना चाहता है. लेकिन बाप को ये मंजूर नहीं. वो चाहता है कि बेटा उसकी शर्तों पर अपनी ज़िंदगी जिए. उसे ‘सर’ कह कर बुलाए. कट्टर पितृसतात्मक सोच एक इंसान के साथ क्या कर सकती है, वो हमें इस फिल्म में लड़के के पिता के जरिए दिखाई देता है. जिसका रोल निभाया रॉनित रॉय ने. फिल्म में रॉनित रॉय वाला किरदार इंडियन सिनेमा में हमें कम ही देखने को मिलता है. लेकिन ऐसा जिसके बारे में हमनें सुना हो. जिसे हम जानते हों.

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‘इक उड़ान कब तलक यूं कैद रहेगी’.

विक्रमादित्य मोटवाने अपनी डेब्यू फिल्म ‘उड़ान’ की कहानी पर लंबे समय से काम कर रहे थे. स्क्रिप्ट लिखने के बाद उनके दिमाग में आया कि पिता वाले रोल के लिए अजय देवगन को अप्रोच करें. लेकिन एक फर्स्ट टाइम डायरेक्टर इतने बड़े सुपरस्टार को अपनी फिल्म में काम करने को कहे, इस थॉट से ही वो घबरा गए. और अजय के पास जाने का फैसला ड्रॉप कर दिया. ये बात खुद विक्रम ने 2018 के टाइम्स लिटरेचर फेस्टिवल में बताई थी. फिल्म का प्रीमियर 2010 कान फिल्म फेस्टिवल के अ सर्टेन रिगार्ड सेक्शन में हुआ. जहां इसे स्टैंडिंग ओवेशन मिला.


#9. गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012)

डायरेक्टर: अनुराग कश्यप

भाषा: हिंदी

‘द गॉडफादर’, ‘गुडफेलाज़’ और ‘सिटी ऑफ गॉड’. वर्ल्ड सिनेमा की तीन क्लासिक फिल्में. अब आप पूछेंगे कि इन फिल्मों का ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से क्या कनेक्शन भला, तो वो भी बता देते हैं. दरअसल, इन तीनों फिल्मों ने किसी-न-किसी हद तक ‘गैंग्स’ को इंस्पायर किया है. जैसे फैज़ल खान, जिसका कैरक्टर ग्राफ काफी हद तक ‘द गॉडफादर’ के माइकल से मिलता है. दोनों पिता के बिज़नेस में नहीं आना चाहते थे, लेकिन मजबूरी में आना पड़ा. और जब बिज़नेस संभाला, तो सिर्फ संभाला नहीं. उसपर राज किया. 2012 के कान फिल्म फेस्टिवल की डायरेक्टर्स फोर्टनाइट में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का प्रीमियर हुआ. पांच घंटे की फिल्म के रूप में. जिसे इंडिया में दो पार्ट्स में रिलीज़ किया गया. फिल्म को कान में खूब पसंद किया गया. यहां तक कि दिग्गज डायरेक्टर मार्टिन स्कोरसेज़ी ने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ देखने के बाद अनुराग कश्यप को एक लेटर भी लिखा. जहां उन्होंने फिल्म को इंस्पायरिंग बताया.

Gangs Of Wasseypur
फैसल और ‘द गॉडफादर’ वाले माइकल का कैरक्टर ग्राफ काफी मिलता-जुलता है.

#10. चौथी कूट (2015)

डायरेक्टर: गुरविंदर सिंह

भाषा: पंजाबी

1984 इंदिरा हत्याकांड के बाद की कहानी. 84 दंगों पर बनी बाकी फिल्मों की तरह ये आपको इतिहास नहीं पढ़ाती. बल्कि इंडियन आर्मी और खालिस्तानी कट्टरपंथियों के बीच फंसे लोगों की कहानी दिखाती है. आम लोग, जो न इस तरफ थे न उस तरफ. इन्ही में से एक, जोगिंदर सिंह का परिवार. गांव में ऑर्डर जारी हो चुका है कि अपने कुत्तों को मार डालें. भौंककर ध्यान खींच सकते हैं. जोगिंदर के परिवार को अपने ‘टॉमी’ से बहुत लगाव है. एक रात घर में कट्टरपंथी घुस आते हैं, और अगली सुबह आर्मी. दोनों अपने ढंग से पेश आते हैं. कुत्ते को मारने को कहते हैं. पर क्या जोगिंदर कुत्ते को मारता है? अपने डर को अपनी इंसानियत पर हावी होने देता है? ये फिल्म ऐसे ही दहशत और शोषण के माहौल में इंसानियत की खोज पर निकली है.

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आर्मी और आतंकियों के बीच फंसे लोगों की कहानी.

फिल्म 2015 के कान फेस्टिवल की अ सर्टेन रिगार्ड सेक्शन में स्क्रीन की गई. साथ ही सिंगापुर इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर स्क्रीन अवॉर्ड भी जीता.


वीडियो: कान फिल्म फेस्टिवल 2021 में इन फिल्मों ने भौकाल मचा रखा है

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