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क्या बसपा के मुस्लिम नेता ने सबके सामने दलित महिला के कपड़े उतारे?

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बीच सड़क पर कोई किसी को चाकू मार रहा हो. अगल-बगल खड़ी भीड़ बस तमाशा देखती रहेगी. सड़क पर कोई खून से लथपथ इंसान पड़ा हो. वहां से गुजरने वाले लोग उसको देखकर निकल जाएंगे. मदद को कोई नहीं आएगा. ऐसे लोग हों, तो गुंडों को बीच बाजार गुंडई करने का कॉन्फिडेंस मिल जाता है. सरेआम गुंडई से जुड़ी ऐसी ही एक पोस्ट वायरल हो रही है. इसमें एक आदमी भीड़ के सामने औरत का आंचल खींच रहा है. वायरल पोस्ट का दावा है कि ये आदमी एक पार्टी का नेता है.

क्या है इस वायरल पोस्ट में?
एक तस्वीर है. सफेद रंग की पैंट-शर्ट पहने एक आदमी खड़ा है. उसके सामने एक औरत खड़ी है. महाभारत में दुस्शासन जब द्रौपदी की साड़ी खींचता है, उस प्रकरण को याद करते हुए अपने दिमाग में एक तस्वीर बनाइए. यहां भी कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति है. सफेद कपड़ों वाला वो आदमी सामने खड़ी औरत की साड़ी खींच रहा है. वो औरत अपना पल्लू पकड़कर बहुत असहाय तरीके से एक ओर देख रही है. सफेद कपड़ों वाले आदमी के बगल में दो लोग खड़े हैं. दोनों ये सब देखकर हंस रहे हैं. पीछे एक बड़ी सी भीड़ भी जमा है. औरतें, बच्चे, पुरुष सब खड़े होकर ये तमाशा देख रहे हैं. इस तस्वीर के साथ एक मेसेज भी है, जिसमें लिखा है-

ये कोई फिल्मी सीन नहीं है दलित भाइयों. बसपा (बहुजन समाज पार्टी) के नेता बकरुद्दीन अंसारी ने अपने गुंडों के साथ मिलकर दलित महिला को सरे बाजार नंगा किया. देख लो इन कुत्तों की दबंगई.

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यहां से इस पोस्ट को डेढ़ हजार से ज्यादा लोगों ने शेयर किया.  जिसने पोस्ट किया है, उसका नाम देखिए- अपनी यारी. न नाम, न कोई चेहरा. फेक पेज बनाकर अपवाहें सप्लाई की जा रही हैं. 

 

ये भी फेक अकाउंट है.
ये भी फेक अकाउंट से पोस्ट हुआ है. 

असलियत क्या है?
सिनेमा देखते हैं? हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, तमिल कई सारी भाषाओं में बनती हैं फिल्में. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री भी काफी बड़ी है. वहीं पर एक फिल्म बनी थी. नाम था, औरत खिलौना नहीं. 21 नवंबर, 2014 को रिलीज हुई इस फिल्म को बनाया था डायरेक्टर असलम शेख ने. मनोज तिवारी, जो अभी दिल्ली में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं, इस फिल्म के हीरो थे. हीरोइन थीं मोनालिसा. नाम से ही लगता है, ये फिल्म औरतों पर होने वाले अत्याचारों पर बनी थी. दो घंटे 41 मिनट की इस फिल्म में दो घंटे और 11वें मिनट पर जो सीन है, उसका फ्रेम ही वायरल पोस्ट में इधर-उधर टहल रहा है. मतलब? मतलब ये कि वायरल पोस्ट की पूरी कहानी झूठी है. जैसा बताया गया है, वैसा कुछ नहीं हुआ. फिल्म के इस सीन में गुंडा अपने चमचे-चपाटों के साथ हीरोइन के कपड़े उतारने की कोशिश कर रहा है. और वहां मौजूद चुपचाप सब देख रही है.

फिल्म के इस सीन में हीरोइन के हाथ में पूजा की थाली होती है. विलन अपने गुंडों के साथ वहां आता है. सबके सामने हीरोइन के साथ बेहूदगी करता है. उसके कपड़े खींचता है.
फिल्म के इस सीन में विलन अपने गुंडों के साथ आता है. सबके सामने हीरोइन के साथ बेहूदगी करता है. वही फालतू प्लॉट, जिसमें विलन को विलन साबित करने के लिए उसे रेप करते हुए दिखाना होता था. और औरत को उसके आगे लाचार सी रो रही होती थी. 

फिल्म के इस सीन का स्क्रीनशॉट लेकर उसमें बसपा नेता वाली कहानी घुसेड़ दी गई है. पोस्ट में बसपा नेता के हाथों दलित महिला को नंगा किए जाने का झूठ फैलाकर शायद दलितों को बसपा के खिलाफ करने की राजनीति की जा रही है. आप देखिए. नेता का नामकरण क्या किया है- बकरुद्दीन अंसारी. हमने काफी खोजा. बसपा में इस नाम का कोई नेता नहीं मिला. ऐसे पोस्ट ध्रुवीकरण की कोशिश भी हो सकते हैं. मान लीजिए कि एक पार्टी को दलित वोट भी मिलते है और मुस्लिम वोट भी मिलते हैं. ऐसी अफवाहें इनमें फूट डालने की कोशिश भी हो सकती हैं.

इस फिल्म पर लिखे गए एक ब्लॉग का स्क्रीनशॉट. यहां भी वही तस्वीर है. शायद ऐसी ही किसी जगह पर फोटो देखकर किसी क्रिमिनल माइंड इंसान को अफवाह फैलाने का आइडिया आया हो.
इस फिल्म पर लिखे गए एक ब्लॉग का स्क्रीनशॉट. यहां भी वही तस्वीर है. शायद ऐसी ही किसी जगह पर फोटो देखकर किसी क्रिमिनल माइंड इंसान को अफवाह फैलाने का आइडिया आया हो.

झूठ फैलाने में पहले भी हो चुका है इस तस्वीर का इस्तेमाल
एक विजेता मलिक हैं. हरियाणा बीजेपी की कार्यकारिणी में सदस्य थीं. 2017 में उन्होंने ये तस्वीर अपलोड की. फेसबुक और ट्विटर, दोनों जगहों पर. फोटो के साथ बंगाल में हिंदुओं की हालत पर चिंता जताई. कहा, हिंदुओं को मारा जा रहा है. सरेआम उनकी इज्जत से खेला जा रहा है. मगर कोई कुछ नहीं बोलता. राज्य सरकार सब होने दे रही है. मजे की बात ये है कि विजेता मलिक की ही पार्टी में मनोज तिवारी भी हैं. वही मनोज तिवारी इस फिल्म के हीरो हैं.

विजेता ने जब ये पोस्ट किया, उस समय बंगाल में सांप्रदायिक हालात काफी संवेदनशील थे. कम्युनल हिंसा और दंगों की स्थिति में ऐसी अफवाहें आग में घी की तरह काम करती हैं. सोचिए, नेताओं की समझदारी और संवेदनशीलता का लेवल क्या है.
विजेता ने जब ये पोस्ट किया, उस समय बंगाल में सांप्रदायिक हालात काफी संवेदनशील थे. कम्युनल हिंसा और दंगों की स्थिति में ऐसी अफवाहें आग में घी की तरह काम करती हैं. सोचिए, नेताओं की समझदारी और संवेदनशीलता का लेवल क्या है.

पहले मुंहजुबानी फैलती थीं अफवाहें. सोशल मीडिया के आने से अपवाहों को काफी सहूलियत हो गई है. बैठे-ठाले वायरल हो जाती हैं. इनकी वजह से माहौल खराब होता है. हिंसा भी भड़क जाती है कई बार. दंगे भड़कते हैं. लोगों के दिलों में दूसरे समुदाय के लिए नफरत पैदा होती है. जो पहले से ही नफरत में डूबे हैं, उनकी नफरत और मजबूत होती है.

अडवाइज़री: ऐसे फेक पोस्ट्स अपलोड करना क्राइम है. इनको शेयर करके, लाइक करके या आंख मूंदकर इनके ऊपर भरोसा करके आप क्राइम के भागीदार मत बनिए. आंख-कान और दिमाग खोलकर सोशल मीडिया का इस्तेमाल कीजिए. किसी का अजेंडा पूरा करना का जरिया मत बनिए. बुरी चीजों में खर्च मत होइए.


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