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फिल्म रिव्यू: ब्लैंक

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इस शुक्रवार थिएटर्स में लगी फिल्म ‘ब्लैंक’. डिंपल कपाड़िया के भतीजे और अक्षय कुमार के साले करण कपाड़िया इससे अपना डेब्यू कर रहे हैं. साथ में सनी देओल भी हैं. ‘ब्लैंक’ को डायरेक्ट किया है बहज़ाद खंबाटा ने. ये उनकी पहली फिल्म है. ‘ब्लैंक’ अपने आइडिया के हिसाब से हाई-एंड थ्रिलर टाइप लगती है. टाइपकास्ट होकर ही रह जाती है कि अपने लिए कुछ कर भी पाती है? इसकी कहानी समेत फिल्म से जुड़ी बाकी चीज़ों के बारे में हम नीचे बात करेंगे.

फिल्म की कहानी

मुंबई में एक लड़के का एक्सीडेंट होता है. हॉस्पिटल पहुंचाया गया, तो पता चला कि उसकी छाती पर एक बम बंधा हुआ है. लड़के की धड़कन रूकी और बम फटा. यानी वो एक सुसाइड बॉम्बर (आत्मघाती हमलावर) है. इस एक्सीडेंट में उसकी यादाश्त भी चली गई है. उसे पुलिस के हवाले किया जाता है, जिस दौरान उसकी मुलाकात होती एटीएस (एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड) चीफ दीवान से. पूछताछ में वो सिर्फ ये बताता है कि उसका नाम हनीफ है. इसके बाद भागने-भगाने का काम शुरू होता है. हनीफ भागकर नए-नए एक्टिव हुए टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन, जो बड़ा ब्रेक ढूंढ़ रही है, उसके हेड से मिलता है. उनका आशीर्वाद लेता है और उसके इशारे पर अपने ब्लास्ट वाले मिशन पर निकल पड़ता है. फिर बहुत सारी पुरानी बातें और इमोशनल ड्रामा होता है. इस लड़के की बैकस्टोरी पता चलती है. पता चलता है कि वो खुद बदला ले रहा है. कहानी खुल जाती है. जब आपको लगता है कि फिल्म खत्म हो गई तभी एक और बड़ा सा राज़ खुलता है, जिसका आपके लिए कोई मतलब नहीं बचता. अगर वो फिल्म में न भी होता, तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता.

फिल्म के इंटररोगेशन सीन में करण और सनी.
फिल्म के एक इंटररोगेशन सीन में करण और सनी.

एक्टिंग

इस फिल्म से करण कपाड़िया ने अपना डेब्यू किया है. और पहली ही फिल्म में उनका सामना सनी देओल से हो गया. फिल्म में करण ने सुसाइड बॉम्बर हनीफ का रोल किया है. सनी देओल इस केस को हैंडल कर रहे एटीएस चीफ दीवान के रोल में हैं. साथ में करणवीर शर्मा, इशिता दत्ता और जमील खान हैं. करण कपाड़िया फिल्म में कॉन्फिडेंट तो लगते हैं लेकिन बहुत सारी सुधार की गुज़ाइश छोड़ जाते हैं. उन्हें देखकर एक बार को सुनील शेट्टी की याद आ जाती है, जो हर दूसरी पर आंख में आंसू भरकर चिल्ला देते हैं. करण फिल्म के अधिकतर सीन्स में इमोशनल मोड में ही हैं. और इस दौरान वो कहीं भी प्रभाव नहीं डाल पाते. वो हर लाइन को डायलॉग समझकर ही बोलते हैं, इसलिए साधारण सी लाइन अपने इमोशन और फील से भटकी हुई सुनाई देती है.

करण ने फिल्म में एक सुसाइड बॉम्बर का रोल किया है.
करण ने फिल्म में एक सुसाइड बॉम्बर का रोल किया है, जिसकी यादाश्त चली जाती है.

आपको अपनी पहली फिल्म से दर्शकों से खुद को जोड़ना होता है, ताकि वो आपको अगली बार देखने आएं. लेकिन करण ये कनेक्शन ही नहीं बिठा पाते हैं. फिल्म में कई एक्शन सीन्स हैं, जिसमें करण को देखकर लगता है कि काश इतनी ही बेहतर इनकी डायलॉग डिलीवरी और एक्सप्रेशंस भी होते. दूसरी तरफ हैं सनी देओल, जिनका फिल्म में पैरलेल लीड है. उनकी एक बनी बनाई इमेज है, वो उसकी हद में ही रहकर परफॉर्म करते हैं. उससे बाहर वो सिर्फ ‘मोहल्ला अस्सी’ में गए थे. वो एक बार फिर वैसे किरदार में हैं, जो वो ‘फर्ज़’ और ‘इंडियन’ जैसी फिल्मों में कर चुके हैं. फर्क बस ये आया है कि उन फिल्मों में उनकी गर्लफ्रेंड्स हुआ करती थीं, इसमें बीस साल का बेटा है. करणवीर शर्मा और इशिता दत्ता के किरदार छिछले हैं, जिनकी कोई डीटेलिंग नहीं है. साथ में जमील खान हैं, जिन्होंने मेन विलेन यानी टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन के हेड का रोल किया है. उस आदमी को देखकर लगता है कि वो कितना कुछ कर सकता है लेकिन उन्हें पांच-छह सीन्स के अलावा कुछ मिलता नहीं है. वो उतने में भी इंप्रेसिव लगते हैं.

सनी देओल का किरदार एटीएस चीफ दीवान का है, जो हनीफ वाले केस को हैंडल कर रहा है.
सनी देओल का किरदार एटीएस चीफ दीवान का है, जो हनीफ वाले केस को हैंडल कर रहा है.

सिनेमैटोग्रफी

फिल्म की शुरुआत में ही एक सीन आता है, जब कैमरा ज़मीन पर रखा हुआ होता है. इस बड़े से फ्रेम में सभी चीज़ें दूर और छोटी दिखाई देती हैं. और दूर-दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता. इस फिल्म के बहुत सारे हिस्से गलियो में शूट किए गए हैं. नीचे से गुज़र रहे आदमी को कैमरा ऐसे घूरता है, जैसे छत से खड़ा कोई आदमी देख रहा हो. लेकिन अच्छा ये लगता है कि गलियों में लटके सारे तार उस फ्रेम में होते हैं. उससे जो जगह बचती है उसमें आपका किरदार दिखाई देता है. लेकिन ऐसे मौके कम ही हैं. एक्शन सीन्स में कैमरा थोड़ा जल्दी में लगता है. अगर डायलॉग्स की बात करें, तो वो बोलचाल की भाषा में कम डायलॉग्स की शैली में ही लिखे गए हैं.

इसी सीन की बात ऊपर वाले पारे में की गई थी.
इसी सीन की बात ऊपर वाले पारे में की गई थी.

म्यूज़िक – बैकग्राउंड स्कोर

म्यूज़िक फिल्म का जबरदस्ती वाला पार्ट है, जिसे सिर्फ इसलिए रखा गया है क्योंकि फिल्म में गाना होना चाहिए. वो कहानी में कही से भी कुछ रोल प्ले नहीं करते हैं. गाने ऑटोपायलट पर लगाकर छोड़े हुए लगते हैं, जो कभी भी बजने लगते हैं, कभी भी बंद हो जाते हैं. फिल्म के आखिर में एक फाइट सीक्वेंस है, जिसके शुरू होने के लिए आप एक्साइटेड हैं. ‘ज़ीरो डार्क थर्टी’ के क्लाइमैक्स जैसा माहौल बना हुआ है. तभी एक गाना बजने लगता है (और इतनी तेज वॉल्यूम में बजता है कि), जिसके बोल तक आपको याद नहीं रहते. वो उस सीन के लिए सारा एक्साइटमेंट किल कर देता है. गानों और बैकग्राउंड स्कोर के लाउडनेस में ज़्यादा अंतर नहीं है. फिल्म का वो गाना आप नीचे सुन सकते हैं:

इस सीन में वही गाना बज रहा है.
इस सीन में वही गाना बज रहा है, जो सारा माहौल खराब करता है.

कोई चीज़ जो ध्यान खींचती है

फिल्म का लीड जो विलन है, उसका नाम हनीफ है. लेकिन फिल्म में इसे बहुत साइलेंट तरीके से डील किया गया है. उसके बारे में मुंह से कुछ भी नहीं कहा जाता, न ही उसे इस तरीके से बेचने की कोशिश होती है. ये एक अच्छी चीज़ है. फिल्म की शुरुआत में ही सनी देओल के कैरेक्टर के साथ उनके बेटे का नैरेटिव जोड़ दिया जाता है. इसका ज़िक्र हर थोड़ी देर में आता है लेकिन आखिर में जिस तरीके से इसे फिल्म से जोड़ा जाता है, वो खटकता है. हल्का लगता है. फिल्म डिटेलिंग के मामले में कमज़ोर है. पूरी फिल्म में सनी देओल एक ही जूते में नज़र आए हैं. वो करंट टाइम में भी वही जूता पहने दिखते हैं और जब कहानी 20 साल पीछे जाती है, तब भी वो उसी जूते में दिखाई देते हैं.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

आइडिया के लेवल पर ये फिल्म बहुत इंट्रेस्टिंग लगती है. लेकिन कागज़ से परदे तक पहुंचने तक में इसका प्रभाव खत्म हो जाता है. फिल्म में दो-तीन टर्न एंड ट्विस्ट आते हैं, जो आपको कहीं से चौंकाते नहीं हैं. ये फिल्म शुरुआत में कम समय में ही अपनी कहानी और किरदारों को एस्टैब्लिश कर देती है. लेकिन उसके बाद ‘ब्लैंक’ का धागा खुलने लगता है. थ्रिलर होने के दावे के मुताबिक वो आखिरी सीन्स के अलावा कहीं आपको अपने कुर्सी के कोने पर बैठकर नाखून काटने पर मजबूर नहीं करती. ओवरऑल एक्सपीरियंस ये है कि प्रेडिक्टेबल नहीं है. ना ही कहीं अझेल नहीं होती. लेकिन जो सामने चल रहा है, वो इतना दिलचस्प भी नहीं है कि वो आपको अपने साथ बनाकर रख पाए.


वीडियो- फिल्म रिव्यू: ब्लैंक

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