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'भुज' के ट्रेलर में ये पांच गलतियां पकड़ पाए आप?

डिज्नी+ हॉटस्टार स्पेशल अजय देवगन स्टारर ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ का ट्रेलर हमारे सामने है. ये फिल्म भारत-पाकिस्तान के बीच हुए 1971 के युद्ध के दौरान हुई एक लड़ाई की कहानी कहना चाहती है. 8 दिसंबर 1971 की रात पकिस्तानी वायुसेना के हमले से भुज में भारतीय वायुसेना की एयर स्ट्रिप बर्बाद हो गई थी. वायुसेना किसी भी कीमत पर भुज की एयरस्ट्रिप को दोबारा लड़ाकू विमानों के उड़ान भरने लायक बनाना चाहती थी. इलाके में तैनात बीएसएफ ने हाथ बंटाया, लेकिन लोग कम पड़ गए. तब भुज के कलेक्टर से मदद मांगी गई. और जब पास के गांव माधापार में लोगों को इसके बारे में मालूम पड़ा, तो वो युद्ध के बीच वायुसेना की मदद करने को तैयार हो गए. 300 ग्रामीणों – जिनमें से ज़्यादातर महिलाएं थीं, – ने वायुसेना का हाथ बंटाया और एयरस्ट्रिप को दोबारा तैयार किया. ये ऑपरेशन स्कॉड्रन लीडर विजय कर्णिक के नेतृत्व में चला था, जिनकी पहचान आज 71 के युद्ध के वॉर हीरोज़ के रूप में होती है. भुज इसी कहानी को सिनेमा के माध्यम से कहने का प्रयास है.

ये एक बड़ी पुरानी शिकायत है कि भारतीय सिनेमा में सेना का चित्रण सटीक या असलियत के करीब नहीं रह पाता. और भुज भी इससे अछूती नहीं है. फिल्म का पोस्टर आने के साथ ही लोगों ने गलतियों की ओर ध्यान दिलाना शुरू कर दिया था. सो हमने रक्षा विशेषज्ञ संदीप उन्नीथन से गुज़ारिश की कि वो भुज का ट्रेलर देखकर बताएं कि 1971 की लड़ाई का चित्रण करते करते भुज से कौनसी गलतियां हो गईं. संदीप उन्नीथन रक्षा मामलों पर लंबे समय से लिखते रहे हैं और 1971 की लड़ाई में भारतीय नौसेना के कोवर्ट ऑपरेशन्स पर उनकी एक किताब – ‘ऑपरेशन एक्स – द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज़ कोवर्ट नेवल वॉर इन ईस्ट पाकिस्तान 1971’ – भी आई है. तो 71 की लड़ाई पर वो एक एक्सपर्ट माने जाते हैं.

अजय देवगन ने 'भुज' में जो वर्दी पहनी है, उसका इस्तेमाल तब भारतीय वायुसेना नहीं करती थी. (फोटो: 'भुज' के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)
अजय देवगन ने ‘भुज’ में जो वर्दी पहनी है, उसका इस्तेमाल तब भारतीय वायुसेना नहीं करती थी. (फोटो: ‘भुज’ के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)

1. भुज के पोस्टर और ट्रेलर में अजय देवगन के पात्र को वायुसेना की नीली वर्दी पहने दिखाया गया है. जबकि तब भारतीय वायुसेना की वर्दी खाकी हुआ करती थी. इस वर्दी को आप 1971 के युद्ध की सबसे चर्चित तस्वीर में भी देख सकते हैं – सरेंडर वाली तस्वीर. 16 दिसंबर 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की सेना ने भारत की सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. इस तस्वीर में मेज़ पर दो लोग बैठे हुए नज़र आते हैं. पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाज़ी और भारत की तरफ से सेना की पूर्वी कमान के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल जगदीश सिंह अरोड़ा. इनके पीछे, बाएं से दूसरे स्थान पर खड़े हैं एयर मार्शल हरि चंद दीवान. एयर मार्शल दीवान भारतीय वायुसेना की पूर्वी वायु कमान के अध्यक्ष थे और इसी नाते पूर्वी पाकिस्तान पर भारतीय वायुसेना के सभी ऑपरेशन्स के लिए ज़िम्मेदार भी. जो वर्दी एयर मार्शल दीवान ने इस तस्वीर में पहनी है, वही तब वायुसेना की वर्दी थी.

16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया. इस तस्वीर में बाएं से दूसरे हैं एयर मार्शल एच.सी. दीवान.
16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया. इस तस्वीर में बाएं से दूसरे हैं एयर मार्शल एच.सी. दीवान.

2. ट्रेलर में एक पनडुब्बी नज़र आती है जिसपर पाकिस्तान का झंडा बना हुआ है. और इसमें एक नहीं, कई समस्याएं हैं. पनडुब्बी को छुपकर वार करने के मकसद से लड़ाई में उतारा जाता है. इसीलिए दुनिया में कोई देश अपनी पनडुब्बी पर बड़े-बड़े झंडे नहीं बनाता. पनडुब्बी के बाहर उसकी पहचान ज़ाहिर करने वाला कोई निशान नहीं छोड़ा जाता.

पनडुब्बी छिपकर वार करने का हथियार है. लेकिन 'भुज' की पनडुब्बी चीख-चीखकर कह रही है - मैं पाकिस्तान की हूं. (फोटो: 'भुज' के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)
पनडुब्बी छिपकर वार करने का हथियार है. लेकिन ‘भुज’ की पनडुब्बी चीख-चीखकर कह रही है – मैं पाकिस्तान की हूं. (फोटो: ‘भुज’ के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)

इतना ही नहीं, पाकिस्तानी नौसेना ट्रेलर में टाइप 209 पनडुब्बी इस्तेमाल करते नज़र आ रही है. जबकि ये पनडुब्बी पाकिस्तान के पास कभी नहीं रही. ये पनडुब्बी तो भारतीय नौसेना के बेड़े में थी. जर्मन तकनीक वाली ये पनडुब्बियां भारतीय नौसेना के बेड़े में 1986 से शामिल हुईं. इन्हें पहली पनडुब्बी आईएनएस शिशुमार के नाम पर शिशुमार क्लास की पनडुब्बियां कहा जाता है. ऐसी चार पनडुब्बियां आज भी हमारे बेड़े में हैं.

आईएनएस शिशुमार 35 साल से भारतीय नौसेना के बेड़े में तैनात है. (फोटोः भारतीय नौसेना)
आईएनएस शिशुमार 35 साल से भारतीय नौसेना के बेड़े में तैनात है. (फोटोः भारतीय नौसेना)

वैसे अगर ‘भुज’ के फिल्मकार कोई पाकिस्तानी पनडुब्बी दिखाना ही चाहते थे, तो वो पीएनएस गाज़ी को दिखा सकते थे. इस पनडुब्बी को भारत के विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को डुबाने का ज़िम्मा दिया गया था. लेकिन ये पनडुब्बी विशाखापट्टनम नौसैनिक अड्डे के पास डुबा दी गई थी. दो मत हैं – एक कि उसे आईएनएस राजपूत ने डुबाया और दूसरा ये कि वो अपनी ही बिछाई बारूदी सुरंगों से टकराकर नष्ट हो गई. सच जो भी हो, 1971 के संदर्भ में सबसे चर्चित पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाज़ी ही थी.

यूएसएस डिआब्लो - जिसे पाकिस्तान ने अमेरिका से खरीदकर पीएनएस गाज़ी का नाम दिया.
यूएसएस डिआब्लो – जिसे पाकिस्तान ने अमेरिका से खरीदकर पीएनएस गाज़ी का नाम दिया.

3. ट्रेलर में पाकिस्तान की आर्मी टैंक्स लेकर हिंदुस्तान पर हमला करने की तैयारी में नज़र आती है. यहां भी ठीक पनडुब्बी वाली गलती ही हुई है. ये टी-90 टैंक हैं. और इनका इस्तेमाल पाकिस्तान नहीं, भारत की सेना करती है. हम इन्हें टी 90 एस भीष्म कहते हैं.

साबजी, आप गल्त टैंक ले आए. बड़े साब तो पैटन टैंक में हैं. (फोटो: ‘भुज’ के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)
साबजी, आप गल्त टैंक ले आए. बड़े साब तो पैटन टैंक में हैं. (फोटो: ‘भुज’ के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)

1971 के युद्ध के वक्त टी-90 टैंक बने ही नहीं थे. 1992-93 में पहली बार रूस की सेना को मिले और भारत के पास ये आए कारगिल की लड़ाई के भी बाद – जनवरी 2004 में. 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान की तरफ से मुख्यतया पैटन टैंक्स इस्तेमाल हुए थे जो अमेरिका से लाए गए थे. भारत ने टी-55 और सेंचुरियन जैसे टैंक्स इस्तेमाल किए थे.

1971 के युद्ध में सेना ने तकरीबन 100 पैटन टैंक्स को नष्ट किया. लड़ाई के बाद इन सबकी प्रदर्शनी लगा दी गई. आज भी भारत के अलग-अलग हिस्सों में ये जीत के प्रतीक के रूप में स्थापित हैं. (फोटोः संकेत ओसवाल / विकिमीडिया कॉमन्स)
1971 के युद्ध में सेना ने पाकिस्तान के करीब 100 पैटन टैंक्स को नष्ट किया. लड़ाई के बाद इन सबकी प्रदर्शनी लगा दी गई. आज भी भारत के अलग-अलग हिस्सों में ये जीत के प्रतीक के रूप में स्थापित हैं. (फोटोः संकेत ओसवाल / विकिमीडिया कॉमन्स)

4. ट्रेलर में हम भारतीय वायुसेना को एक MiG -21 लड़ाकू विमान इस्तेमाल करते हुए देखते हैं. जबकि ये विमान तब भारतीय वायुसेना के पास था ही नहीं. अब आप कहेंगे कि भैया मिग 21 तो हमने 1962 में ही खरीद लिए थे. और ये भी तथ्य है कि मिग 21 ने 1971 की लड़ाई में हिस्सा लिया था. लेकिन तब हमारे पास मिग 21 के शुरुआती वेरिएंट थे. जैसे मिग 21 FL.

ये करीबी मामला था. लड़ाकू विमान का वेरिएंट सही-सही दिखा देना मुश्किल काम है. (फोटो: ‘भुज’ के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)
ये करीबी मामला था. लड़ाकू विमान का वेरिएंट सही-सही दिखा देना मुश्किल काम है. (फोटो: ‘भुज’ के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)

ट्रेलर में आप जिस विमान को देख रहे हैं, वो है मिग 21 बाइसन. इसे मिग 21 को अपग्रेड करके बनाया गया था. बाइसन 1990 के दशक के आखिर में भारतीय वायुसेना को मिला. बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद जब पाकिस्तानी वायुसेना ने भारत पर हमला करने की कोशिश की, तब विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान मिग 21 बाइसन लेकर ही पाकिस्तानी विमानों का सामना करने उड़े थे.

MiG 21 FL. ये लड़ाकू विमान हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड HAL में बनाए गए थे और 1965 से भारतीय वायुसेना में शामिल हुए. इन्होंने 1971 की लड़ाई में हिस्सा भी लिया था. (फोटोः भारतीय वायुसेना)
MiG 21 FL. ये लड़ाकू विमान हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड HAL में बनाए गए थे और 1965 से भारतीय वायुसेना में शामिल हुए. इन्होंने 1971 की लड़ाई में हिस्सा भी लिया था. (फोटोः भारतीय वायुसेना)

5. ‘भुज’के ट्रेलर में हम एक विमानवाहक पोत को भी देखते हैं. लेकिन जैसा विमानवाहक पोत नज़र आ रहा है, वैसा न भारत और ना पाकिस्तान के पास कभी था. पाकिस्तान की नौसेना के पास तो कभी कोई विमानवाहक पोत नहीं रहा.

लेकिन यहां ‘भुज’ को एक छूट दी जा सकती है. 1971 की लड़ाई में भारत पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत USS एंटरप्राइज़ को भेजा था. अगर फिल्म इस पहलू को दिखाना चाह रही हो, तो ट्रेलर में दिखाए गए विमानवाहक पोत को गलत नहीं कहा जाएगा.

विमानवाहक पोत जैसा फिल्म में नज़र आ रहा है, वैसा सिर्फ अंकल सैम के पास है. (फोटो: ‘भुज’ के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)
विमानवाहक पोत जैसा फिल्म में नज़र आ रहा है, वैसा सिर्फ अंकल सैम के पास है. (फोटो: ‘भुज’ के ट्रेलर से स्क्रीनशॉट)

गलतियां या क्रिएटिव फ्रीडम?

सेना या किसी भी और पेशे का सटीक चित्रण सिनेमा में करना एक मुश्किल काम है. और इसीलिए ऐसी किसी फिल्म को बनाते वक्त सलाहकार रखे जाते हैं. जो बारीकियों का ध्यान रखने में फिल्मकार की मदद करते हैं. फौज का चित्रण करते वक्त फौज में रह चुके या फिर फौज की बारीक समझ रखने वाले सलाहकारों की मदद ली जाती है. लेकिन सेना के मामले में बिलकुल सटीक चित्रण एक समस्या पैदा कर सकता है. वो इतना जटिल हो जाएगा कि आम दर्शक के लिए उसे समझना मुश्किल हो जाएगा. इसीलिए फिल्मकार कई बार कुछ प्रयोग करते हैं, जिनसे दर्शक को ये समझने में आसानी हो कि पर्दे पर घट क्या रहा है.

मिसाल के लिए जब रिडली स्कॉट ने ”ब्लैक हॉक डाउन” बनाई, तो उन्होंने अमेरिकी सैनिकों के हेलमेट पर उनके नाम लिखे. असल ज़िंदगी में ऐसा नहीं होता है. लेकिन रिडली ने तर्क रखा कि ऐसा न किया जाता, तो दर्शकों को अलग-अलग पात्रों में फर्क करने में बहुत मुश्किल होती. क्योंकि वो सब एक जैसे नज़र आते. इसे हम क्रिएटिव फ्रीडम के खांचे में रख सकते हैं. और भुज का ट्रेलर हमें यहीं निराश करता है. क्रिएटिव फ्रीडम के चक्कर में तथ्य ही बदल गए हैं.

'ब्लैक हॉक डाउन' भी विवादों से परे नहीं थी. लेकिन चित्रण के मामले में इसमें 'भुज' जितना बड़ा भूकंप कहीं नहीं आया.
‘ब्लैक हॉक डाउन’ भी विवादों से परे नहीं थी. खासकर सोमालिया और सोमालिया के लोगों के चित्रण को लेकर उसपर बहुत सवाल उठे थे. लेकिन सेना के चित्रण के मामले में इसमें ‘भुज’ जितना बड़ा भूकंप कहीं नहीं आया था.

जब ऐसा किसी फिल्म के साथ होता है, तो ये दर्शक के अनुभव को प्रभावित करता है. जो घटा, जैसा घटा, फिल्म उससे काफी दूर चली जाती है. बारीक गलतियों में छूट दी भी जा सकती है. लेकिन वर्दी का रंग ही बदल जाना थोड़ा खटकता है. खासकर तब, जब 1971 की लड़ाई की सबसे मशहूर तस्वीर को एक बार देख लेने भर से इस गलती से बचा जा सकता था.

इस पूरी बहस का एक और पक्ष है, जिसकी तरफ दी लल्लनटॉप के सिनेमा एडिटर गजेंद्र सिंह भाटी ध्यान दिलाते हैं. भारत में सेना और असल घटनाओं का चित्रण आसान नहीं है. ढेर सारी कानूनी पेचीदगियां होती हैं. इसीलिए फिल्मकार बिलकुल सटीक होने के चक्कर में पड़ना नहीं चाहते. फिर फिल्मकार शुरुआत में ये कह भी देता है कि वो असल घटना से प्रेरित कहानी सुना रहा है, न कि असली कहानी.

इति.


वीडियो : जय देवगन स्टारर फ़िल्म ‘भुज’ किस असल घटना से प्रेरित है?

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