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फिल्म रिव्यू- बेल बॉटम

‘रूही’ के बाद फाइनली कोई फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई है. अक्षय कुमार की रंजीत तिवारी डायरेक्टेड ‘बेल बॉटम’. फिल्म की कहानी उतनी ही है जितनी हमने ट्रेलर में देखी है. 1984 में 210 सवारियों को लेकर नई दिल्ली से श्रीनगर जा रही एयर इंडिया की फ्लाइट हाइजैक हो गई है. ये पिछले चार-पांच सालों में हुई सातवीं हाइजैकिंग है. हर बार इंडिया अपने लोगों को बचाने के लिए आतंकवादियों से नेगोशिएट करता था. हाइजैकरों की मांगें पूरी कर, अपने लोगों सही-सलामत वापस लाते थे. मगर इस बार बेल बॉटम कोड नेम वाला एक रॉ एजेंट है, जो नेगोशिएशन की जगह कोवर्ट मिशन करने का आइडिया देता है. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इसके लिए राज़ी हो जाती हैं. मगर इस मिशन को अंजाम देने के लिए बेल बॉटम और उसकी टीम को 12 घंटे से भी कम समय दिया जाता है. इस फिल्म के दो मेजर कॉनफ्लिक्ट हैं. पहला, ये पता लगाना कि इस तरह की हरकतें कौन कर रहा है? भारत में रहने वाले अलगाववादी या पाकिस्तान की खूफिया एजेंसी ISI. और दूसरी ये कि बेल बॉटम अपनी टीम के साथ इन स्मार्ट आतंकवादियों से 210 लोगों को बचाकर वापस कैसे लाता है?

अंशुल मल्होत्रा जिसे बेल बॉटम कोड नेम से बुलाया जाता है, उसे 12 घंटे से भी कम समय में प्लेन में सवार 210 सवारियों को सही-सलामत बचाकर वापस लाने का टास्क दिया जाता है.
अंशुल मल्होत्रा जिसे बेल बॉटम कोड नेम से बुलाया जाता है, उसे 12 घंटे से भी कम समय में प्लेन में सवार 210 सवारियों को सही-सलामत बचाकर वापस लाने का टास्क दिया जाता है.

एक्टर्स की परफॉरमेंस

फिल्म में अक्षय कुमार ने बेल बॉटम उर्फ अंशुल मल्होत्रा नाम के एक रॉ एजेंट का रोल किया है. मेंटली स्ट्रॉन्ग मगर फिज़िकली कमज़ोर आदमी, जो एक पर्सनल रीज़न से हाइजैकिंग रोकना चाहता है. इस पूरी फिल्म में अक्षय कुमार अंडरप्ले करने की कोशिश करते हैं. मगर उनके वन-लाइनर्स नहीं रुकते. ऐसा लगता है मानों उन्होंने बहुत देर से वो जोक रोककर रखा है. अगर थोड़ी देर और रुके, तो अपने बाहर आ जाएगा. मगर ओवरऑल इस कैरेक्टर में ऐसा कुछ है नहीं, जिसे निभाने के लिए अक्षय को बहुत मशक्कत लगे. उनकी पत्नी के रोल में हैं वाणी कपूर. उनका रोल एक फिल्मी वाइफ का है, जो फिल्म में इसलिए है क्योंकि वो कहानी उसके पति के बारे में है. हालांकि फिल्म के आखिर में हमें ये रियलाइज़ करवाने की कोशिश की जाती है कि अगर पत्नी का किरदार नहीं होता, तो फिल्म नहीं होती. मगर वो सही तरीके से लैंड नहीं हो पाता. आदिल हुसैन ने बेल बॉटम के मेंटॉर-हैंडलर का रोल किया है. ये किरदार इस पूरे मिशन की प्लानिंग और एग्जीक्यूशन में बड़ी भूमिका अदा करता है. मगर एक डायलॉग इस पूरे कैरेक्टर पर पानी फेर देता है. इस पर आगे बात करेंगे. फिल्म में लारा दत्ता तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बनी हैं. वो कैरेक्टर वजनदार बन पड़ा है. कभी आपको ये महसूस नहीं होता कि ये रोल लारा दत्ता ने किया है. यहीं लारा दत्ता का काम सफल हो जाता है. हुमा कुरैशी भी फिल्म में एक छोटे से रोल में नज़र आती हैं. उसे इमपैक्टफुल तरीके से पेश करने की कोशिश की जाती है. मगर वो हो नहीं पाता.

फिल्म के हीरो की पत्नी और एमटीएनल कर्मचारी के रोल में वाणी कपूर.
फिल्म के हीरो की पत्नी और एमटीएनल कर्मचारी के रोल में वाणी कपूर.

फिल्म की अच्छी बातें

‘बेल बॉटम’ की सबसे अच्छी बात ये लगती है कि ये अक्षय कुमार ब्रांड ऑफ लाउड देशभक्ति सिनेमा नहीं बनती. ज़ाहिर तौर पर देशभक्ति वाला फील फिल्म के साथ है. मगर वो दर्शकों पर लादा हुआ नहीं लगता है. ये बात ठीक लगती. हर लाइन को पंच बनाने की कोशिश नहीं की गई है. बोलचाल की भाषा में बात होती है. इसलिए चीज़ें बेहतर समझ आती हैं. क्लाइमैक्स वाले सीक्वेंस में फिल्म की सिनेमैटोग्रफी नई लगती है. सिचुएशन के काफी मेक बिलीव होने के बावजूद वो आंखों को अच्छा लगता है. सरप्राइज़िंग तरीके से बेल बॉटम के गाने भी किरदारों के बैकग्राउंड के साथ मैच करते हैं. वो बात अलग है कि फिल्म का कोई भी गाना याद नहीं रहता.

‘बेल बॉटम’ बह जाने का भारी-भरकम स्कोप लिए हुए होते भी बड़े कंट्रोल्ड तरीके से आगे बढ़ती है. ओवर द टॉप नहीं जाती. एक औसत फिल्म पर इस तरह का खतरा हमेशा रहता है कि वो अपनी कहानी या इवेंट्स को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की कोशिश करती. इन सब मामलों में ‘बेल बॉटम’ ठीक है.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रोल में लारा दत्ता.
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रोल में लारा दत्ता.

फिल्म की बुरी बातें

‘बेल बॉटम’ किसी घटना की कहानी से ज़्यादा एक व्यक्ति की कहानी लगती है. क्योंकि फिल्म ये बताने में बहुत सारा समय ले लेती है कि अंशुल उर्फ बेल बॉटम जो कर रहा, वो क्यों कर रहा है. इस दौरान आपको फुल फैमिली ड्रामा देखने को मिलता है. ओवरऑल ये बड़ी फ्लैट फिल्म लगती है. क्योंकि फिल्म का अधिकतर हिस्सा फ्लैशबैक में घटता है. इसलिए मुख्य कहानी या घटना के लिए फिल्म में बहुत कम स्पेस बचता है. ये चीज़ आपको फिल्म देखने के दौरान लगातार खलती रहती है. आप कभी भी कंपेल्ड या फिल्म से बंधे हुए महसूस नहीं करते हैं. ना ही आपको कभी एड्रनलीन रश या थ्रिल वाली फीलिंग आती है. इस मामले में ये फिल्म निराश करती है.

वो नेता लोग जो रॉ से हाउज़ द जोश टाइप वॉर क्राई सुनना चाहते हैं.
वो नेता लोग जो रॉ से हाउज़ द जोश टाइप वॉर क्राई सुनना चाहते हैं.

मगर अब भी फिल्म की सबसे बुरी बात का खिताब आदिल हुसैन के डायलॉग के पास ही है. एक सीन है, जिसमें कुछ मंत्री लोग बोलते हैं कि रॉ को हमने बड़ा जोशो-खरोश में देखा है. मगर यहां तो सब शांति से हो रहा है. न कोई वॉर क्राई, न भारत माता की जय. इसके जवाब में आदिल हुसैन का कैरेक्टर कहता है-

”सर मैं आपको एक दुखभरी कहानी सुनाता हूं. एक नवजात कुत्ता अपनी मां से पूछता है कि मां मेरे पिताजी कैसे दिखते थे. इसके जवाब में उसकी मां कहती है कि तुम्हारे पिता पीछे से आए और पीछे से ही चले गए. रॉ वही बाप है सर.”

किसी भी चीज़ का महत्व बताने का इससे बुरा तरीका मैंने आज तक नहीं देखा. ये डायलॉग एक मिनट को फनी लगता है. मगर साथ ही वो बहुत वीयर्ड और अश्लील साउंड करता है. ये एक डायलॉग उस किरदार पर बना-बनाया आपका सारा भरोसा तोड़ देता है.

उन नेताओं को करारा जवाब देता आदिल हुसैन का किरदार.
उन नेताओं को करारा जवाब देता आदिल हुसैन का किरदार.

अगर आप विचार के स्तर पर कुछ नया ढूंढ रहे हैं, तो आप गलत पते पर पहुंचा हुआ फील करते हैं. किसी भी सीक्रेट सर्विस एजेंसी के मिशन पर बनने वाली फिल्मों को एक तय खांचे में फिट करने की कोशिश की जाती है. जो कॉमर्शियल भी हो, उस फिल्म में काम कर रहे एक्टर का सबसे मजबूत डिपार्टमेंट भी हो और दर्शकों को एक देशभक्ति वाला फील भी दे. ‘बेल बॉटम’ इससे अलग होने की भरपूर कोशिश करती है. मगर वो इसमें सफल नहीं हो पाती. एक्साइटिंग और नई कहानी होने के बावजूद वही घिसा-पिटा रेगुलर ट्रीटमेंट फिल्म की आत्मा मार देती है.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखने का फील अलग है. सिर्फ इस भाव को महसूस करने के लिए थिएटर्स में जाया जा सकता है. ‘बेल बॉटम’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है, जिसमें आपको कुछ नया या अनोखा देखने को मिलेगा. किसी अच्छी और औसत फिल्म के बीच जो अंतर होता, वो है ‘बेल बॉटम’.


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