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बाहुबली-2 में लोग कमियां देखने को तैयार नहीं लेकिन अब उन्हें देखनी होंगी

डायरेक्टर एसएस राजामौली दिखने में बहुत सज्जन आदमी हैं. मुस्कुराकर बात करते हैं. धीमी आवाज़ में. इतनी सुपर-डूपर और ब्लॉकबस्टर हिट्स बना चुके हैं. न सिर्फ साउथ के बल्कि बॉलीवुड के तोप फिल्ममेकर्स भी बॉक्स ऑफिस पर उनके आगे बौने साबित हो गए लेकिन वे सज्जन ही बने हुए हैं.

उनकी नई फिल्म ‘बाहुबलीः द कनक्लूजन’ ने पहले पार्ट को भी पीछे छोड़ने वाली ओपनिंग ली है. रिलीज के तीसरे दिन तक ये फिल्म दुनिया भर में करीब 540 करोड़ रुपये की कमाई कर चुकी है. ये तय माना जा रहा है कि आज तक हिंदी फिल्म जगत की हर फिल्म को कमाई के मामले में उनकी ये मूवी बहुत पीछे छोड़ देगी. ट्रेड विश्लेषकों ने फिल्म को सराहा है और आलोचकों ने भी. अब धारा के बहाव के खिलाफ कौन जाए, भले ही फिल्म में पकड़ने को कई कमजोर नसें हैं.

कोई फिल्म अगर ज्यादातर दर्शकों को बहुत-बहुत पसंद आई हो, उससे वो अच्छी और आलोचनात्मक रूप से खरी फिल्म नहीं हो जाती. जैसे इसकी एक आलोचना ये है कि ये फिल्म भारत की उस वर्ण व्यवस्था को पॉजिटिव तरीके से दिखाती है जिसे पीछे छोड़ने और नीची जातियों के लोगों को बराबरी के हक दिलाने के लिए न जाने कितने समाज सुधारकों और कार्यकर्ताओं ने अपने पूरे जीवन लगा दिए थे और आज भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ है.

‘बाहुबलीः द बिगिनिंग’ की गलत पॉलिटिक्स के बारे में हम पहले भी बात कर चुके हैं. कैसे उसमें महेंद्र बाहुबली का किरदार मर्दवादी है और वो अवंतिका नाम की युवती को सिर्फ शारीरिक उपभोग की नजर से देखता है. अवंतिका का सपना है कि वो दुष्ट भल्लाल देव से लड़े लेकिन महेंद्र उसका वो सपना भी छीनकर अपने हाथ में ले लेता है. ‘बाहुबलीः द कनक्लूजन’ में भी कुछ ऐसा ही होता है जिसमें अमरेंद्र बाहुबली की कहानी दिखाई गई है जिसमें वो कुंतल राज्य की राजकुमारी देवसेना पर रीझ जाता है. देवसेना वैसे तो बहुत ही सक्षम है लेकिन हीरो को उससे बेपनाह कुशल दिखाया गया है ताकि वो उस पर रीझ जाए और अपनी निजी सत्ता को भूल जाए. होता भी यही है.

महेंद्र बाहुबली-अवंतिका और अमरेंद्र बाहुबली -देवसेना के किरदार.
महेंद्र बाहुबली-अवंतिका और अमरेंद्र बाहुबली -देवसेना के किरदार.

इन दोनों की फिल्मों में महिला किरदारों के साथ जैसा ट्रीटमेंट कहानी में किया जाता है वो उसे पुरुषों से पूरी तरह कमजोर और दोयम दर्जे का ही बनाकर रख देता है. फिल्म में राजमाता सिवगामी को बहुत ताकतवर महिला के रूप में दिखाया गया है लेकिन वो भी गलत फैसले लेने वाली मूर्ख-सेंटीमेंटल औरत साबित कर दी जाती है.

इस फिल्म फ्रैंचाइज़ में ऐसी कई कमियां हैं जिन्हें शायद इस वक्त दर्शक सुनने को तैयार नहीं होंगे. लेकिन फिल्म से इतर भी बातें हैं जिन्हें देखना होगा. खबर है कि राजामौली के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई है कि उन्होंने फिल्म में एक जाति के लिए आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया है.

खबरों के मुताबिक अरेकटिका पोरटा समिति के लोगों ने हैदराबाद के बंजारा हिल पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई है. उन्होंने कहा है कि फिल्म के एक दृश्य में उनके समुदाय का अपमान हुआ है. फिल्म में एक सीन में कटप्पा कहता है – ‘कटिका चीकटी.’ इन लोगों के मुताबिक कटिका एक जातिसूचक शब्द है और उनका अपमान हुआ है. पुलिस द्वारा अभी केस दर्ज करना बाकी है.

डायरेक्टर एस.एस. राजामौली
डायरेक्टर एसएस राजामौली

हमें अमानवीय, कर्कश और असामाजिक दिखाया गया

रिपोर्ट के मुताबिक अपनी शिकायत में इन लोगों ने कहा, “हम कटिका लोग पशुओं के मीट का कारोबार करते हैं. हम बकरी, भेड़ और मुर्गी का मांस बेचते हैं और समाज को हेल्दी फूड उपलब्ध करवाते हैं, ये हमारी जीविका का हिस्सा है. इन फिल्मों में हमें जैसे दिखाया जाता है हम वैसे कर्कश, अमानवीय और असामाजिक लोग नहीं हैं.” इस कम्युनिटी के लोगों ने ये भी कहा कि फिल्मों में उनके लोगों को बुरे और असामाजिक तत्वों के तौर पर दिखाया जाता है जिससे उनके बच्चों के लिए भी समाज में सम्मान से जीना मुश्किल हो जाता है.

इन्होंने सेंसर बोर्ड से भी अपील की है कि फिल्म में से कटिका शब्द हटा दिया जाए.

डायरेक्टर राजामौली ने अभी तक इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन ये बात निराधार नहीं है क्योंकि निजी जिंदगी में भी वे पुरानी जाति व्यवस्था के हिमायती लगते हैं.

मनुस्मृति की वर्ण व्यवस्था उन्हें अच्छी लगी

जैसे उन्होंने 4 अक्टूबर 2012 को एक फेसबुक पोस्ट में लिखा थाः

“हमने जाति व्यवस्था मनुस्मृति से सीखी जो जन्म पर नहीं बल्कि हमारी जीवन शैली पर आधारित थी. मैं मिस्टर प्रसाद नाम के एक व्यक्ति के साथ टैनिस खेलता हूं जिन्होंने इसके बारे में विस्तार से बताया था.

पंचम जाति (अछूत) – वो जो अपने जीने के लिए दूसरे पर आश्रित होता है. (परजीवी)

शुद्र – वो जो अपने और अपने परिवार के लिए ही जीता है.

वैश्य – वो जो अपने और उस व्यक्ति के लिए मुनाफा कमाता है जिसके साथ कारोबार कर रहा है.

क्षत्रिय – वो जो तब भोजन करता है जब उसकी प्रजा ने पेट भर लिया हो.

ब्राह्मण – वो जो पहले खुद सीखता है और बाद में पढ़ाता है.”

राजामौली एक डायरेक्टर हैं, उनके पिता विजयेंद्र प्रसाद कहानियां (बाहुबली, बजरंगी भाईजान) लिखते हैं. ये दोनों भी उसी सामान्य समाज से आते हैं जहां अपने-अपने पूर्वाग्रहों के साथ हर कोई जीता है. असल जिंदगी में और फिल्म में राजामौली का आग्रह साफ दिखता है कि वे कैसे समाज की परिकल्पना करते हैं. उन्होंने अपनी फिल्म में कालकेय और उसकी कम्युनिटी के लोगों को सबसे बुरे और बर्बर राक्षसों के रूप में दिखाया. लोगों को उनसे इतनी घृणा तुरंत हो गई और लोग मान गए कि इन्हें मारा जाना चाहिए. जब हम उनकी पृष्ठभूमि से वाकिफ नहीं तो हमें उनसे इतनी घृणा कैसे हुई? क्योंकि यहां राजामौली ने वो स्टीरियोटाइप इस्तेमाल किए जिनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश करता-करता कथा जगत 2017 में पहुंचा है.

हममें बचपन से जाने-अनजाने में काले रंग, इस रंग की त्वचा, बड़े दांतों, पीले दांतों, बिखरे बालों, विकृत अंगों, कर्कश आवाजों, विकृत आकारों के प्रति अलग ही आग्रह भरा गया है. इसलिए जीवन भर ऐसी कोई चीज हो हमें पसंद नहीं आती. हम दांतों की सुंदर श्रंखला पाने के लिए डेंटिस्ट के पास जाते हैं, हालांकि टेढ़े दांत भी स्वस्थ दांत होते हैं लेकिन सुंदरता के लिए ऐसा किया जाता है. काले से सांवला और सांवले से गोरा बनने के लिए क्रीमें बेची जाती है, हम लगाते हैं. बालों को स्ट्रेट करने के लिए या एकरूपता देने के लिए शैंपू यूज़ करते हैं. फिल्में जहां से समाज का फैशन और सौंदर्य संचालित होने लगा है वहां अगर होठ पतला है तो आप सुंदर स्त्री नहीं हैं, वक्ष स्थल सपाट है तो आप कामुक स्त्री नहीं हैं. इसी वजह से कंगना रनोट और अनुष्का शर्मा जैसी सशक्त, बुद्धिमान अभिनेत्रियों को भी सर्जरी करवानी पड़ती हैं, उसी के बाद उन्हें फिल्मों में स्वीकार किया जाता है.

बाहुबली को पसंद करने वाली हमारी ग्रंथियां

बचपन की नानी की कहानियों, पौराणिक कथाओं या अमर चित्र कथाओं में अलग तरह की पहचान वाले जीवों को दुष्ट बताया जाता था. हमारे मन में वो ग्रंथियां सुरक्षित रखी हैं. इन्हीं ग्रंथियों के कारण इतने बड़े पैमाने पर बाहुबली हमें पसंद आती हैं. ये कितनी दुखद बात है कि 2017 जैसे समय में राजामौली जैसा अच्छी छवि का व्यक्ति अपनी फिल्म में लोगों को मसाला देने और उन्हें आसानी से एक किरदार अतिरिक्त रूप से दुष्ट लगे ये करने के लिए बिज्जलदेव के पात्र को विकृत हाथ देता है. अब आप सोचें कि पहले ही फ्रेम में जब आप नासर द्वारा निभाए इस किरदार को देखते हैं तो आपको कैसे पता लग जाता है कि वो बुरा होगा. क्योंकि अगर सुंदर शरीर वाला व्यक्ति नेगेटिव हो तो हम सिंक इन करने में खुद को समय देते हैं लेकिन अगर कोई औरत, कोई अपंग व्यक्ति या कोई ‘बदसूरत’ आइडेंटिटी वाला कैरेक्टर नेगेटिव हो तो हमें उसे बुरा मानने से पहले पलक भी नहीं झपकानी पड़ती. ये ईज़ी स्टोरीटेलिंग है. फिल्ममेकिंग में इनको शॉर्ट कट माना जाता है जिसे कमर्शियल सिनेमा में ही इस्तेमाल किया जाता है खासकर उन फिल्मकारों द्वारा जिन्होंने अपने ऊपर कोई नैतिक दबाव नहीं रखा होता है. वे सिर्फ मुनाफे की आवाज पर ही चलते हैं.

बिज्जलदेव के रोल में नासर.
बिज्जलदेव के रोल में नासर.

यही पीटर जैक्सन ने अपनी फिल्म ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ में किया था. उनकी फिल्म में भी सबसे बुरे किरदार जंगली, गंदे दांतों वाले, काले-कलूटे और विकृत थे. यही वो फिल्म है जिसने बाहुबली बनाने की इच्छा राजामौली को दी. उन्होंने कालकेय भी बनाया तो ‘लॉर्ड ऑफ..’ के ऊरुक हे की तर्ज पर. ऐसे पात्र हमारी पौराणिक कहानियों में पहले से रहे हैं लेकिन ‘लॉर्ड ऑफ..’ की विहंगम आर्थिक सफलता ने फिर से तय किया कि कहानी कहने में ऐसे स्टीरियोटाइप भयंकर मदद करते हैं.

इनके इस्तेमाल के बाद ये फिल्म सिर्फ बच्चों की फैंटेसी नहीं रह जाती, बल्कि बड़े-बूढ़े भी बड़े परदे पर इन काल्पनिकताओं को साकार होता देखने आते हैं. हालांकि उन्हें देखते समय ये नहीं पता होता है कि ये किरदार असल जिंदगी में उनके पूर्वाग्रहों को और मजबूत ही करते हैं. पूर्वाग्रह जिनकी वजह से हमारे लिए भीड़ बनकर दिल्ली में ‘काले-बदसूरत-अनजान’ अफ्रीकियों पर वहशियाना हमले कर देना आसान हो जाता है, जिनकी वजह से किसी दाढ़ी वाले पहलू खान को सड़क पर पीट-पीटकर मार देना गौरव की बात हो जाती है.

ऐसे पूर्वाग्रहों की सूची बहुत लंबी है और मौजूदा हवा में हम इनको बढ़ता ही देखेंगे. क्योंकि हम ‘बाहुबली’ को इतना पसंद करके इसका संकेत भी दे चुके हैं.

"लॉर्ड ऑफ.." में ऊरूक हे और "बाहुबली" में कालकेय के किरदार.
“लॉर्ड ऑफ..” में ऊरूक हे और “बाहुबली” में कालकेय के किरदार.

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