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एवेंजर्स एंडगेम रिव्यू: 11 साल, 22 फिल्मों का ग्रैंड फिनाले, सुपरहीरोज़ का महाकुंभ और एक थैनोस

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याचना नहीं, अब रण होगा
जीवन-जय या कि मरण होगा.

– दिनकर

थैनोस पगलाया हुआ है. उससे ज़्यादा मार्वल यूनिवर्स के सुपर हीरोज़ पगलाए हैं. लेकिन इनमें से कोई भी पागलपन के इस ग्रैंड मुकाबले में, अंतिम राउंड में, दर्शकों को नहीं हरा पा रहा. दर्शकों की दीवानगी का आलम ये कि सुबह 09:00 बजे के शो में इन्होंने साढ़े आठ बजे से शोर मचाना शुरू कर दिया था. दीवानगी का आलम ये कि हमें अगले तीन दिन तक के टिकट नहीं मिले. फिर हमने वही किया जो हर कोई अपने जीवन में कभी न कभी करता है – कॉमप्रोमाईज़. हमने थ्री डी के बदले टू डी और अंग्रेजी के बदले हिंदी में इस मूवी को देखने की ठानी. तो चलिए बात करते हैं चहुंओर बिखरे इसी पागलपन की. रॉस ब्रदर्स (एंथनी-जो) के ‘एंडगेम’ की. एवेंजर्स एंडगेम की.

इस रिव्यू को हम पूरी तरह स्पॉइलर मुक्त रखेंगे लेकिन अगर अभी तक आपने इस फ्रैंचाइज़ी की पिछली फ़िल्में भी नहीं देखी हैं तो फिर ये उन पिछली फिल्मों का स्पॉइलर हो सकता है. खासतौर पर पिछली एवेंजर्स मूवी यानी ‘इंफिनिटी वार’ का. क्यूंकि ‘इंफिनिटी वार’ और ‘एंडगेम’ का रिश्ता वही है जो ‘बाहुबली: दी बिगनिंग’ और ‘बाहुबली: दी कन्क्लूज़न’ का था. यूं फिल्म वहीं से शुरू होती है जहां पर ‘इंफिनिटी वार’ खत्म हुई थी. फिल्म के शुरुआती कुछ मिनटों में ही थैनोस की एंट्री हो जाती है.

पिछली मूवी में क्या हुआ था, याद है न?
पिछली मूवी के एंड में क्या हुआ था, याद है न?

अपने उद्देश्य में सफल हो चुकने के बाद थैनोस यूनिवर्स के एक कोने में वानप्रस्थ आश्रम में दिखता है-

पशु-खग भी न देख पाएं जहां, छिप किसी
कंदरा में बैठ अश्रु खुलके बहाऊंगा.
जानता हूं, पाप न धुलेगा वनवास से भी
छिप तो रहूंगा, दुःख कुछ तो भुलूंगा.

– दिनकर

फिर कुछ ऐसा होता है जो आपने एक्स्पेक्ट किया था कि फिल्म के अंत में होगा. ‘अब फिल्म में बचा क्या?’ आप यही सोचते हैं, लेकिन फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है आपको ढेरों नई और अन-एक्स्पेक्टेड चीज़ें देखने को मिलती हैं. सरप्राइज़ करती है. लेकिन ये सरप्राइज़, शॉकिंग नहीं हैं, गेम ऑफ़ थ्रोन्स की तरह. अधिकतर सरप्राइज़ेज इमोशनल हैं.

कैप्टन अमेरिका (क्रिस इवांस) पहली बार उससे लड़ता है जिससे आज तक नहीं लड़ा, जिससे दर्शक सोच भी नहीं सकते कि वो लड़ेगा.थॉर (क्रिस हेम्सवर्थ) की स्थिति वो है जो आज तक नहीं हुई. लेकिन फिर भी फिल्म के ह्यूमर वाले डिपार्टमेंट को अबकी बार हल्क के साथ-साथ आश्चर्यजनक रूप से थॉर ने भी संभाला हुआ है. और मार्वल मूवीज़ के सबसे प्रिय करैक्टर आयरन मैन (रॉबर्ट डाउनी जूनियर)  की आयरनी के बारे में तो कवि राजीव सक्सेना कह गए हैं-

जब संध्या की अंतिम लाली
नीलांबर पर बिछ जाएगी
नभ पर छितरे घनदल के संग
जब संध्या रागिनी गाएगी
मन से कुछ कुछ सुन तो लूंगा
पर साथ नहीं गा पाऊंगा
इस बार नहीं आ पाऊंगा

सबसे बूढ़ा एवेंजर्स - कैप्टन अमेरिका
सबसे बूढ़ा एवेंजर्स – कैप्टन अमेरिका

इन सबके अलावा एंट मैन, ब्लैक पैंथर, स्पाइडर मैन, डॉक्टर स्ट्रेंज इस मूवी में है या नहीं, ये बताना स्पॉइलर परंपरा को तोड़ने सरीखा है. हां लेकिन फिल्म में सबसे बढ़िया काम ‘हरी चीज़’ का है. न न हल्क (मार्क रफालो) का नहीं, वीएफएक्स का. मार्वल की सारी ही फ़िल्में इस लिहाज़ से बेहतरीन हैं, तो स्पेशल इफ़ेक्ट इस फिल्म में कुछ भी कमतर नहीं है. फिर भी ‘एंडगेम’ अपनी विशालता में कहीं न कहीं अपने प्रीक्वल ‘इंफिनिटी वार’ से कमतर रह जाती है. लेकिन ऐसा होना ‘एंडगेम’ की दरअसल एक अच्छी बात है. क्यूंकि हर फिल्म के सीक्वल में प्रोड्यूसर्स चाहते हैं कि ये पिछले से ज़्यादा विशाल हो फिल्म से जुड़े लोग उसके सीक्वल को और ज़्यादा विशाल और ज़्यादा मारक बनाने की चाहत रखते हैं. लेकिन ‘एंडगेम’ वालों को इसकी नहीं पड़ी. उन्हें पड़ी है इस पूरे तामझाम को ‘महत्तम बढ़िया’ तरीके से समेटने की. उन्हें पड़ी है तो इस बात की कि कोई भी सिरा छूटा न रह जाए. और इसलिए ही तो इस फिल्म में भी ‘लॉर्ड ऑफ़ दी रिंग्स’ की तरह क्लाइमैक्स खत्म होने का नाम ही नहीं लेता. या यूं कहें कि एक के बाद एक 7-8 क्लाइमेक्स आते रहते हैं, आते रहते हैं.

खचाखच भरे सिनेमाघर में कई ऐसे डायलॉग्स पर तालियां और सीटियां बजती हैं जो कमाल हैं लेकिन अगर महफ़िल लूट के ले जाता है तो अपने कॉन्टेक्स्ट और टाइमिंग के चलते फिल्म का सबसे सिंपल डायलॉग-

आई एम आयरन मैन.

फिल्म इंटरवल से पहले चीज़ों को एक जगह समेटती है और इंटरवल के बाद फैन मोमेंट्स का विस्फोट होना शुरू होता है. सिनेमाहॉल ‘शोरमय’ हो जाता है. जबकि न तो ये 70-80 के दशक का सिनेमाहॉल है, न ही पर्दे पर अमिताभ बच्चन की ‘दीवार’ चल रही है.

एवेंजर्स की पिछली फ़िल्में देखी होंगी तो आप इस बात से सहमत होंगे कि टोनी स्टॉर्क मार्वल स्टूडियो का सबसे प्रिय करैक्टर है.
एवेंजर्स की पिछली फ़िल्में देखी होंगी तो आप इस बात से सहमत होंगे कि टोनी स्टॉर्क मार्वल स्टूडियो का सबसे प्रिय करैक्टर है.

फिल्म में वैसे तो काफी इमोशनल मोमेंट्स हैं लेकिन दूसरा सबसे इमोशनल सीन हॉक आई (जेरेमी रेनर) और नताशा (स्कॉरलेट जॉहैन्सन) की लड़ाई का है जिसमें दरअसल जो जीतेगा वो हार जाएगा. और केवल एक ही सीन इसके इमोशनल कोशेंट को पार कर पाता है, लेकिन उसके बारे में बात करने पर स्पॉइलर हमसे कहेगा कि – इतना टूटा हूं छूने से बिखर जाऊंगा. वैसे उस सीन का हिंट हम आपको रिव्यू में दे चुके हैं.

जब मार्वल के सारे सुपर हीरोज़ अपने पूरे आउटफिट में एक साथ बड़े पर्दे पर आते हैं, तो वो एवेंजर्स सीरीज़ की फिल्मों का सबसे शानदार सीन होता है. इस बार भी ये सब एक साथ आते तो हैं, लेकिन वैसा ‘वॉव मोमेंट’ नहीं क्रिएट कर पाते जैसा ‘एज ऑफ़ अल्ट्रॉन’ या ‘इंफिनिटी वॉर’ में किया था.

फिल्म में कई ऐसे सीन हैं जो बारीक  तरीके से सामाजिक समानता की बात कह जाते हैं. जैसे सभी सुपर वुमन कैरेक्टर्स का एक साथ आना, या जैसे कैप्टन अमेरिका का एक अश्वेत को अपनी ढाल, अपनी विरासत का सौंपना.

इस फिल्म में ढेर सारे रेफरेंसेज हैं, जो बाहर के हैं. लेकिन ये अच्छी बात है कि इन रेफरेंसेज़ को समझने के लिए आपको किताबें पढ़ने की ज़रूरत नहीं है. ना ही किसी भारी ज्ञान की ज़रूरत है. ज़रूरत है तो बस पिछली मूवीज़ को देख चुकने की, क्यूंकि वहीं से आते हैं. यूं ये फिल्म नहीं 22 एपिसोड की एक सीरीज़ की लास्ट एपिसोड कही जा सकती है.

थॉर को कौन नहीं चाहता?
थॉर को कौन नहीं चाहता?

फिल्म के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि ये फिल्म इमोशंस और फीलिंग का अर्थशास्त्र है. और आपने जितना ज़्यादा इन्वेस्ट किया है आपको उतना ज़्यादा रिटर्न मिलेगा. आसान भाषा में कहें तो आपने मार्वल सीरीज़ की जितनी ज़्यादा फ़िल्में इससे पहले देखी होंगी, इस फिल्म से अटैचमेंट उतना ज़्यादा होगा. इस फिल्म में उतना ज़्यादा मज़ा आएगा. और ये फिल्म उतनी ज़्यादा समझ में आएगी. जाइए देख के आइए. एक नए आयाम, एक नए डाइमेंशन को एक्सप्लोर कीजिए. क्यूंकि बिना देखे कैसे पता चलेगा कि-

उस पार नियति का मानव से व्यवहार न जाने क्या होगा,
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

– बच्चन

 

 

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