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मूवी रिव्यू: आर्टिकल 15

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आज की फिल्म है ‘आर्टिकल 15’. ‘मुल्क’ के बाद अनुभव सिन्हा एक और सोशल मैसेज वाली फिल्म लेकर आए हैं. इस बार और भी संवेदनशील सब्जेक्ट है. भारतीय समाज के एक कलेक्टिव फेलियर पर बात करती है ये फिल्म. जातिवाद पर. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 देश में किसी भी तरह के भेदभाव को नकारता है. धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग किसी भी आधार पर. लेकिन क्या असल में ऐसा होता है? आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं कि नहीं होता. नहीं ही होता. हम-आपकी इस वास्तविकता से मुंह छुपाकर निकल जाने की कायरता को चैलेंज करती है अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’.

अयान रंजन एक तेज़ तर्रार आईपीएस अफसर है, जिसकी नई पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के लाल गांव में हुई है. उसकी आमद के इर्द-गिर्द ही एक हादसा हो गया है. हादसा, जिसे लोग दो तरह से देखते हैं. कुछ लोगों की दुनिया हिल गई है तो कुछेक के लिए ये एक रेगुलर, नोटिस न करने लायक घटना है. क्यों? क्योंकि ‘उनके’ साथ तो ऐसा होता रहता है. ये ‘उन’ वाले दायरे में आने वाले लोग कौन हैं आखिर? फिल्म के एक किरदार की ज़ुबानी ही कहा जाए तो ये कभी हरिजन हैं, तो कभी बहुजन. बस ‘जन’ नहीं हैं. क्यों? क्योंकि कथित तौर पर उनकी जात ‘नीची’ है. बहरहाल, तीन बच्चियां लापता हैं. जिनमें से दो की लाश अगले दिन एक पेड़ से लटकी पाई जाती है. ये क्रूर क्राइम किसी वर्ग के लिए अपनी श्रेष्ठता दिखाने का ज़रिया है. ज़रिया क्या बल्कि बेशर्म इश्तेहार है. ये चेतावनी है ‘उन’ लोगों के लिए जो ‘औकात’ से बाहर निकल रहे हैं. औकात, जो किसी ख़ास तबके ने तय की है.

ये वो सिस्टम है जहां पीड़ित को ही मुजरिम बना दिया जाता है.
ये वो सिस्टम है जहां पीड़ित को ही मुजरिम बना दिया जाता है.

अयान रंजन, इस क्रूरता से और उससे ज़्यादा इसे मिलने वाले सामान्य ट्रीटमेंट से, ‘हक्का बक्का है. ये दुनिया उसकी समझ से बाहर है. मुल्क पर गर्व करने का आदी अयान मुल्क के इस रूप को पचा ही नहीं पा रहा. कौन किसका छुआ खा पी नहीं सकता, इसके बारे में उसका नॉलेज शून्य है. औकात कैसे निर्धारित होती है इसका उसे कुछ अता पता नहीं. वो अगर कुछ जानता है तो अपना काम ईमानदारी से करना. लेकिन क्या वो ये कर पाता है? दो बच्चियों के हत्यारों और गुमशुदा तीसरी बच्ची को तलाश कर पाता है? उसकी अपनी वर्क बिरादरी उसका कितना साथ देती है? ये सब जानने के लिए फिल्म देखनी होगी आपको.

‘आर्टिकल 15’ कई जगहों पर कमज़ोर होने के बावजूद आपको असहज करके छोड़ने का माद्दा रखती है. दरअसल ऐसी फिल्मों का दो तरह से रिव्यू होना चाहिए. एक सिनेमाई रिव्यू जिसमें फिल्म के क्राफ्ट, पेस, परफॉरमेंसेस आदी की बात हो और दूसरे में इसकी प्रासंगिकता, इसकी बेबाकी, इसके साहस की. सिनेमाई नज़रिए से देखा जाए तो फर्स्ट हाफ में फिल्म कई जगह खिंची हुई सी लगती है. कुछ चीज़े अति मेलोड्रामेटिक लगती हैं. उनसे बचा जा सकता था. लेकिन अपनी बेबाकी के लिए, अपनी स्पष्टवादिता के लिए फिल्म ढेरों नंबर बटोरती है.

डायरेक्टर अनुभव सिन्हा और राइटर गौरव सोलंकी हमारी बोलचाल का हिस्सा बने तमाम रेफरेन्सेस पूरी फिल्म भर इस्तेमाल करते हैं. जैसे कोटे के डॉक्टर जो हमारे टैक्स से पढ़ाई करते हैं. गौरव सोलंकी का लेखन प्रभावी है. फिल्म के कुछेक डायलॉग लंबे समय तक आपके ज़हन में रहते हैं. जैसे एक जगह अयान की गर्लफ्रेंड कहती है, “हमें हीरो नहीं चाहिए, बस ऐसे लोग चाहिए जो हीरो का इंतज़ार न करें”. कुछ सीन बेहद उम्दा बन पड़े हैं. जैसे वो, जब अयान अपने स्टाफ से सबकी जाति पूछता है. या फिर वो जब सब लोग अपना वोटिंग पैटर्न बताते हैं, जहां तमाम पार्टियों के चुनाव चिन्हों का ज़िक्र होता है.

आयुष्मान की एक्टिंग का ग्राफ हर फिल्म के साथ ऊपर की तरफ जा रहा है.
आयुष्मान की एक्टिंग का ग्राफ हर फिल्म के साथ ऊपर की तरफ जा रहा है.

ये फिल्म कई बार प्रतीकों में बात करती है और आपको झिंझोड़ देती है. बशर्ते कि आप उस मेटाफर को पकड़ पाएं. जैसे एक पुलिसवाला सड़क के आवारा कुत्तों के प्रति बहुत दयालु है. उन्हें बिस्कुट खिलाता है, उनके ज़ख्मों पर चिंतित होता है. लेकिन वही पुलिसवाला दलितों से भयानक घृणा रखता है. यानी उसकी करुणा के हकदार कुत्ते तो हैं, मनुष्य नहीं. ये विडंबना किसी भी संवेदनशील इंसान को विचलित कर देगी. एक जगह बेहद गंदे नाले में डुबकी लगाते सफाई कर्मचारी को देखकर आप थर्रा जाते हैं. ये वो दृश्य है जो रोज़ाना हमारे इर्द-गिर्द साकार होता है और जिसे हम सहूलियत से नज़रअंदाज़ करना सीख चुके हैं.

एक्टिंग पर क्या ही बात करें! मुख्य कलाकारों से लेकर सपोर्टिंग कास्ट तक सब शानदार हैं. आयुष्मान तो कमाल हैं ही, मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, सयानी गुप्ता, रोंजिनी चक्रवर्ती सब बेहतरीन अदाकारी कर जाते हैं. मुहम्मद जीशान अय्यूब एक बागी दलित के रोल में बेहद प्रभावित करते हैं. ख़ास ज़िक्र हाउस मेड अमली का किरदार अदा करने वाली लड़की का होना चाहिए. बेहद सहज एक्टिंग. अपने अंतिम सीन में वो आपको मजबूर कर देती हैं कि उन्हें आप फिल्म की सबसे उम्दा एक्टर मान लें. ऐसा टैलेंट खोजने के लिए फिल्म की टीम को साधुवाद.

ज़ीशान छोटे रोल में भी जान डाल देते हैं.
ज़ीशान छोटे रोल में भी जान डाल देते हैं.

सिनेमेटोग्राफी उम्दा है. एक सीन के लिए तो सिनेमेटोग्राफर एवान मलिगन को ख़ास शाबाशी देनी चाहिए. जब लड़कियों की पेड़ से लटकती लाश दिखती है तब कैमरा भी थोड़ा हिलता है. जैसे उस नज़ारे की भयावहता से थर्राया हुआ हो.

बहरहाल, अगर आपने कभी लक्ष्मणपुर बाथे या खैरलांजी का नाम नहीं सुना, घोड़ी पर बारात लाने की वजह से पीटे गए दलित की कोई खबर नहीं पढ़ी, या अपने आसपास, अपने घर में किसी ख़ास जाति वाले लोगों के लिए अलग से रखा गया चाय का कप नहीं देखा तो ये फिल्म आपके लिए एलियन ही साबित होगी. अफ़सोस कि ऐसा नहीं है. हम सब इस सिस्टम का हिस्सा हैं. कुछ रिसीविंग एंड पर हैं, तो कुछ लोग इस क्रूरता का सोर्स हैं. सबको ये फिल्म देखनी चाहिए. कोई एक भी मन मेल्ट हो पाया तो ये सिनेमाई विधा की जीत होगी.

जाते-जाते एक और बात. फिल्म की शुरुआत फेमस अमेरिकन सिंगर बॉब डिलन को धन्यवाद देते हुए होती है. आप चौंकते हैं. फिर आयुष्मान के पहले ही सीन में उनकी गाड़ी में बॉब का Blowing in the wind गाना बजता है. ये वो गाना है, जो कभी रक्तपात विरोधी मुहिमों का एंथम रहा है. जिसमें एक जगह एक सवाल है, “लोग रो रहे हैं ये सुनने के लिए आखिर कितने कान होने चाहिए होते हैं, या कितनी लाशें लगेंगी ये जानने के लिए कि बहुत से लोग मर गए हैं?

ऐसे असहज करने वाले बेशुमार सवालों को आपके सामने खुल्ला छोड़ देती है अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’. ज़रूर देख आइए.


देखें वीडियो: मूवी रिव्यू: आर्टिकल 15

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Article 15 review directed by Anubhav Sinha starring Ayushmann Kurrana, Kumud Mishra, Manoj Pahwa, Sayani Gupta

10 नंबरी

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