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33 साल पहले लगा था डॉ डैंग को थप्पड़, जिसकी गूंज आज तक सुनाई देती है

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आज़ादी की 39वीं सालगिरह से ठीक एक हफ्ते पहले यानी 8 अगस्त, 1986 को एक फिल्म रिलीज़ हुई थी. दिलीप कुमार, नूतन, जैकी श्रॉफ, अनिल कपूर, श्रीदेवी, नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर और पूनम ढिल्लौं जैसे कलाकार इस फिल्म में काम कर रहे थे. इस भयानक कास्ट के साथ जो फिल्म बनकर तैयार हुई, उसे ‘कर्मा’ बुलाया गया. सुभाष घई की ‘कर्मा’. ये एक पूर्व पुलिस अधिकारी और एक आतंकवादी के बीच की ज़ाती लड़ाई की कहानी थी, जिसमें तीन लड़के भी शामिल थे.

‘मेरी जंग’, ‘विधाता’ और ‘हीरो’ जैसी फिल्में बनाकर सुभाष घई अपने करियर के पीक पर थे. माधुरी दीक्षित को लॉन्च करने का सपना लिए वो पहली बार श्रीदेवी के साथ काम कर रहे थे. ‘कर्मा’ अपने दौर की एक बड़ी फिल्म थी. जब ये रिलीज़ हुई, तो देखने वालों का तांता लग गया. जबरदस्त हिट रही. रिलीज़ के 32 साल पूरे कर रही इस फिल्म के बनने के दौरान कई ऐसी मजेदार और इमोशनल घटनाएं हुई थीं, जो किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींच लें. सारे तो नहीं पर उनमें से कुछ किस्से हम आपके लिए भी लाए हैं.

1.) सुभाष घई फिल्म ‘कर्मा’ की शूटिंग के दौरान नई-नई आईं माधुरी दीक्षित से मिले. माधुरी तब सिर्फ एक फिल्म पुरानी थीं और दूसरी फिल्म ‘आवारा बाप’ (1985) की शूटिंग पास के एक स्टूडियो में कर रही थीं. घई उन्हें बड़े लेवल पर लॉन्च करना चाहते थे. उन्होंने माधुरी से ‘कर्मा’ के लिए एक डांस नंबर शूट करवाया. लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ने लगी, घई को महसूस हुआ कि वो आइटम नंबर इस फिल्म में कहीं फिट नहीं हो पाएगा. फिल्म के फाइनल कट से माधुरी का वो गाना काट दिया गया. लेकिन इसकी भारपाई करने के लिए घई ने माधुरी को अपनी आने वाली फिल्म से लॉन्च करने का वादा किया था. लेकिन जब तक घई फिल्म ‘राम लखन’ (1989) से अपना किया वादा पूरा करते, माधुरी फिल्म ‘तेजाब’ (1988) से स्टार बन चुकी थीं.

बाद में सुभाष घई ने माधुरी के साथ 'राम लखन' (1989) और खलनायक (1993) जैसी फिल्मों में काम किया.
बाद में सुभाष घई ने माधुरी के साथ ‘राम लखन’ (1989) और ‘खलनायक’ (1993) जैसी फिल्मों में काम किया.

2.) फिल्म की कास्टिंग पूरी हो चुकी थी. सभी कलाकार चुन लिए गए थे. विलेन के किरदार के लिए अमरीश पुरी को कंसिडर किया जा रहा था क्योंकि इस तरह के रोल्स में उन्हें महारत हासिल थी. लेकिन घई अमरीश को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थे. उन्हें लग रहा था कि अमरीश पुरी परदे पर बहुत बार मर चुके हैं, ऐसे में दर्शक उन्हें फिर से वैसे ही किरदार में देखना पसंद नहीं करेंगे. इसी सोच-विचार में डूबे वो मुंबई में एक पार्टी से निकल रहे थे. उन्होंने दूसरे वाले गेट से अनुपम खेर को निकलते देखा. उन्होंने खेर को तुरंत अपने पास बुलाया और अगले दिन अपने ऑफिस आने को कहा.

अगली सुबह अनुपम खेर तय समय और जगह पर पहुंच गए. उन्हें देखते ही सुभाई घई ने कहा कि तुम मेरी अगली फिल्म में मेन विलेन का रोल कर रहे हो. अनुपम खेर ने कहा कि उन्होंने कभी ऐसा रोल किया नहीं है, इसलिए वो श्योर नहीं है. इसके जवाब में घई ने कहा कि मेरा विलेन वैसे ही चलेगा, जैसे तुम चलते हो. अनुपम की चाल पर मुग्ध होकर ही घई ने उन्हें डॉ. डैंग का रोल दिया था.

अनुपम ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने रात भर राहुल रवैल (‘बेताब’, ‘अंजाम’, ‘अर्जुन पंडित’) की फिल्म शूट की. सुबह पांच बजे वहां का काम निपटाकर वो ‘कर्मा’ के पहले दिन की शूटिंग के लिए के सेट पर पहुंच गए. उस दिन अनुपम का एक सीन दिलीप कुमार के साथ होने वाला था. लेकिन जब अनुपम ने वो सीन पढ़ा, तो उनका सारा भूत उतर गया. उस सीन में दिलीप कुमार को उनसे 100 फीट दूर खड़े होकर उनके डायलॉग पर सिर्फ रिएक्शन देना था. हालांकि इन दोनों के बीच फिल्माए गए थप्पड़ वाले सीन को खेर की एक्टिंग के लिए आज भी याद किया जाता है. यहां देखिए वो सीन:

3.) फिल्म में काम कर रहे अधिकतर कलाकार दिलीप कुमार के दीवाने थे. साथ ही इज़्ज़त भी बहुत करते थे. दिलीप कुमार के साथ काम करना कोई छोटी बात तो थी नहीं. जैकी श्रॉफ को इन चीज़ों के चक्कर में बहुत दिक्कत हो रही थी. दिलीप कुमार के साथ हर सीन में वो नर्वस होने के चलते कुछ न कुछ गड़बड़ कर देते थे. कभी डायलॉग भूल जाते, तो कभी उल्टा-पुल्टा कुछ भी बोल देते. एक सीन को कई बार करने के बाद दिलीप कुमार परेशान हो गए. उन्होंने घई को अपने पास बुलाया और कहा कि जैकी श्रॉफ को सेट पर अच्छे से तैयारी करके आने के लिए कह दें. लेकिन तुरंत उसका कोई फायदा नहीं हुआ. कुछ समय बाद जैकी खुद ही नॉर्मल हो गए.

इस फिल्म से पहले भी जैकी श्रॉफ सुभाष घई के साथ 'हीरो' जैसी हिट फिल्म दे चुके थे.
इस फिल्म से पहले भी जैकी श्रॉफ सुभाष घई के साथ ‘हीरो’ जैसी हिट फिल्म दे चुके थे.

4.) जो जैकी श्रॉफ के साथ हो रहा था, उसका ठीक उल्टा नसीरुद्दीन शाह के साथ हुआ. फिल्म के नैरेशन में घई ने उन्हें बताया था कि उनका दिलीप साहब के साथ एक कंफ्रंटेशन सीन होगा. फिल्म शुरू होने से पहले ही नसीर इस बात को लेकर बहुत एक्साइटेड थे कि उन्हें दिलीप कुमार के सामने एक्टिंग करने को मिलेगा. लेकिन जब सीन शूट होने की बारी आई, तो घई ने नसीर को अकेले कैमरे के सामने खड़ा कर दिया. और दिलीप कुमार के नाम पर एक आदमी को खड़ा कर दिया. नसीर को इस आदमी को दिलीप कुमार मानकर डायलॉग बोलना था. इस सीन को दिलीप कुमार ने भी इसी तरह से किया.

सीन तो शूट हो गया लेकिन नसीर इस बात से बहुत खफा थे. उन्हें लग रहा था कि सुभाष घई ने उनके साथ धोखा किया है. इस घटना के 19 साल बाद तक नसीर ने उनके साथ काम नहीं किया. लेकिन साल 2005 आई फिल्म ‘इकबाल’ में नसीर ने बॉलिंग कोच का एक अहम किरदार निभाया था. इस फिल्म को सुभाष घई प्रोड्यूस कर रहे थे.

नसीरुद्दीन शाह पैरलेल सिनेमा में ज़्यादा एक्टिव थे, वो कई फिल्में बिना पैसे लिए भी कर देते थे. इस बिग बजट फिल्म में भी घई उनसे फ्री में काम करवाना चाहते थे. लेकिन बात नहीं बनी.
नसीरुद्दीन शाह पैरलेल सिनेमा में ज़्यादा एक्टिव थे, वो कई फिल्में बिना पैसे लिए भी कर देते थे. इस बिग बजट फिल्म में भी घई उनसे फ्री में काम करवाना चाहते थे. लेकिन बात नहीं बनी.

5.) फिल्म के लिए ऐसे म्यूज़िक की तैयारी चल रही थी, जो सबकी जुबान पर चढ़ जाए. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी इसका म्यूज़िक कर रही थी. लिरिक्स लिखने जिम्मा आनंद बख्शी के कंधे पर था. 3 अगस्त, 1984 को घई अपने घर, बख्शी के साथ बैठे थे. बख्शी ने डायरेक्टर के निर्देशानुसार कुछ लाइनें लिखी थीं, वही दिखाने वो घई के पास आए थे. ये लाइनें कुछ यूं थीं – ‘दिल दिया है, जान भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए.’

ये लाइन सुनकर घई एकदम इमोशनल हो गए. उन्होंने अपने जेब से 100 रुपए का नोट निकाला और तारीख और अपना नाम लिखकर आनंद बख्शी को नज़र कर दी. बख्शी सन्न बैठे बस ये सब देख रहे थे. उन्होंने नोट अपने जेब में डाला और चले गए. इस घटना के 29 साल और आनंद बख्शी की डेथ के 11 साल बाद यानी 2013 में बख्शी के बेटे अपने पिता की चीज़ें देख रहे थे. इसी समय उनके हाथ पापा का वॉलेट लग गया. इसके एक कोने में 100 का एक पुराना नोट छिपा हुआ था. निकालकर देखा तो उसपर 3 अगस्त, 1984 की तारीख और सुभाष घई का नाम लिखा हुआ था. आनंद ने वो 100 का नोट आजीवन संभालकर रखा था. यहां सुनिए वो गाना:


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