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पापा, अल्लाह और जय जय एक होते हैं

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यही कोई दसेक बरस पहले की बात है. बीबीसी के लिए निदा फाजली कॉलम जैसा कुछ लिखते थे. इसमें किस्से होते थे. शायरी होती थी. औरों की. उनकी भी. और इन सबके बीच बेहतर इंसान बनने की कुछ थपकियां होती थीं. उस दौरान पढ़े दो किस्से अब याद आ रहे हैं. जब निदा फाजली की देह ठंडी हो गई. गोया गर्माहट की अब ज्यादा जरूरत है. सुनाता हूं साहेबान. अपनी कच्ची जबान में.

1 बेटी मम्मी के मंदिर में पूजा कर रही थी

निदा की बेटी. नाम तहरीर. और उसकी अम्मा. गुजरात की हिंदू. जाहिर है कि इश्क हुआ. फिर शादी की रसम निभाई गई. ये उसके कई बरसों बाद की बात है. मुंबई में निदा का फ्लैट. एक तरफ पढ़ाई लिखाई का कमरा. बीच में गलियारा. किनारे की तरफ चौका. यहां तहरीर अपनी अम्मी के मंदिर के सामने हाथ जोड़े खड़ी थी. निदा ने शोख ढंग से पूछा. क्या कर रही है तहरीर. बच्ची बोली. जय जय. निदा ने चुहल की. जय जय नहीं अल्ला अल्ला करो. और ये कह कमरे में चले आए.
किताब खोली. यगाना चंगेजी की गजल सामने थी. उसका एक शेर है.

कृष्ण का हूं मैं पुजारी, अली का बंदा हूं.
यगाना शाने खुदा देखकर रहा न गया.

तब तक तहरीर भी कमरे में आ गई. बोली. पापा, अल्ला और जय जय एक होते हैं. बकौल निदा. उस दिन समझ आया.चाइल्ड इज द फादर ऑफ मैन.

निदा की ये कविता पढ़ता हूं. तो तहरीर याद आती है. एक बाप का बड़प्पन भी दिखता है.

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूं
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे

मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशां
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं

मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे

यहां ठहर सुनें ‘इस रात की सुबह नहीं’ के लिए लिखा निदा का ये नगमा

2 बुद्ध की मूरत जला दी बौद्ध भिक्षु ने

खुदा में बुराई नहीं है. उसके घर बनाने में भी नहीं. मगर घरों के बाहर ही शैतान भी छप्पर डाल लेता है. और फिर उनके भक्त अल्लाह की इबादत को तिजारत बना देते हैं. नफरत से तय होता है कि कौन कितना धार्मिक है. इसी के चलते पैदा हुआ एक रोज गुस्सा. तब ये शेर लिखा.

उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया

लोगों को बड़ी चिनगी लगी. पर ये सच बात है. खुदा कोई भी हो. कहीं महफूज नजर नहीं आता. उसके अपने ही डर पैदा करने बरपाने में लगे रहते हैं. जबकि इंसान की जिंदगी किसी भी इबादत से बड़ी है. एक किस्सा याद आता है. बुद्ध को गुजरे सैकड़ों साल बीत गए थे. एक जंगल में उनका एक मठ था. सर्दी की रात वहां एक भिक्षु पहुंचा. सेवक ने उसे अंदर आने दिया. खुद खाना बनाने चला गया. लौटा तो देखा. बुद्ध की मूर्ति धूधू जल रही है. और संत उस आग को सेंक रहा है. सेवक भड़क गया. कहा, ये क्या अधर्म है. भिक्षु बोला. मेरे अंदर जो महात्मा है, उसे ठंड लग रही थी. उसे बचाने के लिए इस लकड़ी की मूरत को आग लगा दी.


ऐसी ही सोच बौद्ध धर्म की एक शाखा रखती है. उसका दिलचस्प वाक्य है. अगर तुम बुद्धा को सड़क पर देखो तो मार दो. पहली मर्तबा ये चौंकाने वाला लगेगा. पर माने क्या हैं. यही कि अपना बुद्ध खुद भीतर खोजना होगा. राह चलते नहीं मिलेगा. जो मिलेगा, वो बुद्ध नहीं होगा. बन जाओ अपने पैगंबर. 

अब आखिर में क्या. नीम का पेड़. राही मासूम रजा का लिखा नॉवेल. जिस पर जब सीरियल बना तो लीड रोल में थे पंकज कपूर. इसके लिए गाना लिखा निदा ने. गाया उन्हें जमकर गाने वाले जगजीत ने. जिनकी आज पैदाइश का दिन है. जगजीत की जिंदगी के तीन किस्से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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