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जब नरेंद्र मोदी से एक पत्रकार ने पूछा- आपने मुसलमानों के लिए क्या किया?

नरेंद्र मोदी. 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने. उन पर कई किताबें आ चुकी हैं. मगर एक किताब उन पर लिखी गई 2014 लोकसभा चुनाव के दरमियान. तब जब वो देशभर में घूम-घूमकर प्रचार कर रहे थे. एक और खास बात ये है कि ये किताब लिखी है एक ब्रिटिश लेखक ने. नाम है एंडी मरीनो और किताब का नाम है – नरेंद्र मोदी, एक राजनीतिक यात्रा. मरीनो ने इस किताब के लिए मोदी के साथ काफी वक्त गुजारा. उनके साथ कई यात्राएं कीं, रैलियों में गए और कई सप्ताह तक उनके काम करते वक्त उन्हें गौर से देखा. ऐसा पहली बार था जब मोदी ने किसी पत्रकार या लेखक को अपने इतने करीब आने दिया हो. इतनी खुलकर बात की हो. सो इस किताब में उनके बचपन से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक की पूरी कहानी है. कैसे वो एक साधारण परिवार में जन्म लेने के बाद आरएसएस के करीब आए. फिर राजनीति में एंट्री मारी. सीएम बने. तमाम विरोधों को झेला और आखिरकार देश की सबसे बड़ी गद्दी पर पहुंचे. तो इस किताब के कुछ मजेदार किस्से छांटकर हम आपको बता रहे हैं, पढ़ें –

1. मगरमच्छों वाली झील पर तैरने की कहानी क्या है?

नरेंद्र मोदी वडनगर में जहां रहते थे, वहां एक शर्मिष्ठा झील थी. झील कोई ऐसी वैसी नहीं थी. इसमें मगरमच्छ रहते थे. इससे भी ज्यादा खतरनकाक बात ये है कि मोदी को उसमें तैरना पसंद था. और यहीं से जुड़ा एक किस्सा है जो काफी मशहूर है. दरअसल, झील के बीच एक चट्टान के ऊपर एक प्राचीन मंदिर था. खास धार्मिक अवसरों पर उसका झंडा बदला जाता था. एक दिन जब झंडा बदलना था तो उसी दिन भारी बारिश हो गई. मगरमच्छ आंदोलित हो गए. कोई जाने को तैयार नहीं हो रहा था. तब एक लड़का आया और बोला- मैं जाऊंगा. इस लड़के का नाम था नरेंद्र. फिर नरेंद्र अपने दो दोस्तों महेंद्र तथा बच्चू के साथ उस मंदिर तक तैरकर गए और झंडा बदलकर लौट आए. वहां मौजूद लोग पूरे टाइम नगाड़े बजाते रहे. ताकि मगरमच्छ डरकर ऊपर ना आएं और ये उनके लौटने तक जारी रहा.

नरेंद्र मोदी बचपन में सैनिक स्कूल जाना चाहते थे.
नरेंद्र मोदी बचपन में सैनिक स्कूल जाना चाहते थे.

2.पिता से किस बात पर नाराज हुए मोदी

1962 में जब भारत पर चीन ने आक्रमण किया तो मोदी की उम्र 12 साल थी. इस आक्रमण से पूरा भारत सदमे में था. हार के बाद ये गुस्सा और बढ़ गया. गुस्सा बढ़ा तो देशभक्ति भी जागी. नरेंद्र आरएसएस की शाखा जाते थे तो वहां उन्हें देशभक्ति का एक्सट्रा डोज मिल ही रहा था. उन्होंने अपने पिता से कहा – मुझे सैनिक स्कूल में पढ़ना है. मंशा थी कि वहां से वो सेना में जा सकेंगे और देश के लिए लड़ सकेंगे. पिता ने मना कर दिया. वो इसलिए क्योंकि सैनिक स्कूल जामनगर में था और वहां का खर्च उठाने की क्षमता शायद उनमें नहीं थी. मगर इसी फैसले ने मोदी के दिमाग में ये बात डाल दी कि उनके माता-पिता उन्हें वडनगर में रोककर रखना चाहते हैं.

इसी तरह 1965 में पाकिस्तान से हुए युद्ध का एक किस्सा है. वडनगर सेना के युद्ध मोर्चे की सप्लाई लाइन पर था. सैनिक वडनगर स्टेशन से होकर ही गुजरते थे. कई बार घायल हालत में लौटते थे. मोदी के पिता की वहीं चाय की दुकान थी. वो घायल सैनिकों को चाय पिलाते थे. एक बार तो नरेंद्र इतना गुस्सा गए और बताने लगे कि कैसे सारे पाकिस्तानियों को मिटा देना चाहिए.

मां के साथ नरेंद्र मोदी.
मां के साथ नरेंद्र मोदी.

3.थाने के अंदर से गायब कर दिए कागज

25 जून 1975. इसी दिन इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी. पूरे देश में विपक्ष के नेताओं को ढूंढ-ढूंढकर गिरफ्तार किया जाने लगा. तब गुजरात ही इंदिरा विरोधी नेताओं की पनाहगाह बना. यहीं से इमरजेंसी का प्रतिरोध शुरू किया गया. गुजरात लोक संघर्ष समिति बनी. तब मोदी 25 साल के थे, मगर हेडगेवार भवन में उनको 3 साल हो गए थे. प्रचारक रहते हुए उन्होंने सारे काम सीख लिए थे. यही वजह थी कि उनके गुरु लक्ष्मणराव इनामदार ने उनको इस संगठन का महासचिव बनाया. आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए आरएसएस नेता केशवराव देशमुख के साथ मिलकर काम करना था. मगर पुलिस ने केशवराव को गिरफ्तार कर लिया. मोदी को पता चला कि केशवराव के पास कुछ जरूरी कागजात थे, जिनमें समिति के भावी कार्यों की योजना भी थी. मोदी ने उन कागजों को वापस लाने की ठानी. उन्होंने एक महिला स्वयंसेवक को पुलिस का ध्यान भटकाने के लिए इस्तेमाल किया. महिला ने थाने में खुद को कैदी का रिश्तेदार बताते हुए मिलने देने के लिए बवाल शुरू कर दिया. इसी बीच मौका पाकर मोदी ने वो कागज वहां से लिए और फुर्र हो गए.

इमरजेंसी के दौरान नरेंद्र मोदी.
इमरजेंसी के दौरान नरेंद्र मोदी.

मोदी ने आपातकाल के दौरान इंदिरा सरकार के खिलाफ प्रचार सामग्री देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचाने में भी अहम भूमिका निभाई थी. उनके हुलिए बदलने के किस्से भी मशहूर हैं. कभी संन्यासी के वेश में तो कभी सरदार बनकर घूमने के. ऐसे ही एक बार वो मोटी काली दाढ़ी लगाकर ट्रेन में सफर कर रहे थे. उनके बगल में उनके एक पुराने शिक्षक बैठे थे जो मोदी को पहचान नहीं सके. हालांकि कुछ साल बाद उन टीचर ने बताया कि मोदी ने ट्रेन से उतरते वक्त उन्हें अपनी असलियत बता दी थी.

4.रथयात्रा मास्टर मोदी

1980 में जनसंघ के खत्म होने और बीजेपी के बनने से पहले संघ अपने कुछ प्रचारकों को पार्टी में काम करने के लिए भेजता था. मगर ये सिलसिला 1980 से 1986 तक बंद रहा. मगर फिर 1986 में आडवाणी अटल की जगह पार्टी के अध्यक्ष बने तो ट्रेंड बदला. एक बार फिर संघ अपने प्रचारकों को राजनीति में भेजने को तैयार था. 1987 में इसका फायदा नरेंद्र मोदी को मिला. उन्हें भाजपा गुजरात इकाई का संगठन सचिव बना दिया गया.

न्याय यात्रा के दौरान आडवाणी के साथ मोदी.
न्याय यात्रा के दौरान आडवाणी के साथ मोदी.

भाजपा में एंट्री के कुछ महीनों बाद ही मोदी को वो मौका मिलने वाला था, जिसके लिए आगे चलकर वो स्पेशलिस्ट माने गए. रथयात्रा के संयोजन का. ये उनकी पहली यात्रा थी. नाम था न्याय यात्रा. ये राम मंदिर आंदोलन को तेजी देने के मद्देनजर निकाली गई थी. ये गुजरात के गांव-गांव गई. इस यात्रा को सफल माना गया. इसने मोदी का कद और बढ़ा दिया.

सोमनाथ से अयोध्या के लिए निकली यात्रा.
सोमनाथ से अयोध्या के लिए निकली यात्रा.

दूसरा बड़ा प्रोजेक्ट मोदी को मिला 1989 में. लोक शक्ति रथयात्रा. 31 जनवरी 1989 से शुरू हुई इस रथयात्रा का मकसद शराब माफिया के खिलाफ लामबंदी था. यात्रा 10,000 गांवों से होकर गुजरी. पूर्वी गुजरात के आदिवासी पर प्रभाव डालने वाली ये पहली यात्रा थी. 1990 में निकली सोमनाथ से अयोध्या तक लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा का भी श्रीगणेश नरेंद्र मोदी ने ही करवाया था. हालांकि वो मुंबई तक ही इस यात्रा के साथ गए थे.

इसके साल भर बाद एक बार फिर उनका नंबर लगा. एक और यात्रा. एकता यात्रा. इस बार नेता थे भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी. यात्रा कन्याकुमारी से शुरू होकर कश्मीर तक गई और वहां तिरंगा फहराकर खत्म हुई. इस बार मोदी पूरे 47 दिन रथ पर रहे और यात्रा का पूरा संयोजन संभाला.

जोशी के साथ मोदी.
जोशी के साथ मोदी.

5.1995 में मोदी ने एक कहानी सुनाई थी

दो माताएं एक बच्चे के लिए लड़ रही थीं. दोनों ही दावा कर रही थीं कि वही असली मां हैं. मामला अदालत तक पहुंचा. न्यायाधीश ने कहा – ठीक है हम बच्चे के दो टुकड़े कर देते हैं. असली मां चिल्लाई, नहीं नहीं, बच्चा उसी को दे दो. और न्यायाधीश ने निर्णय कर लिया कि यही असली मां है. दूसरी वाली नकली है.

ये कहानी मोदी ने 28 सितंबर, 1995 को एक पत्र में लिखी थी. ये पत्र उनका इस्तीफा था. वो गुजरात से दिल्ली विदा किए जा रहे थे. इस वक्त शंकर सिंह वाघेला खजुराहो में अपना दरबारा सजाए थे. जोड़तोड़ के लिए. तो ये कहानी उन्हीं के लिए थी. मोदी ने पत्र में आगे लिखा था- मैं अपनी पार्टी को दो तुकड़ों में नहीं तोड़ सकता. इसलिए बेहतर है कि मैं यह पार्टी आपको सौंप दूं. ये मोदी की दिल्ली विदाई का वक्त था. हालांकि 1995 के चुनाव में गुजरात की जीत में उनके रोल के लिए उन्हें महीने भर के अंदर ही तोहफा मिल गया. माने 20 नवंबर 1995 को उनको भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया.

केशुभाई पटेल के साथ मोदी.
केशुभाई पटेल के साथ मोदी.

6.अटल ने कहा- सीएम बनो जाकर, मोदी बोले- नहीं बनना

1 अक्टूबर, 2001. मोदी एक पत्रकार मित्र की अंत्येष्ठी में थे. ये पत्रकार थे गोपाल बिष्ट जोकि माधवराव सिंधिया के साथ कानपुर जाते वक्त एक हवाई दुर्घटना में जान गंवा बैठे थे. इसी दौरान मोदी के मोबाइल फोन की रिंग बजी. फोन किया था तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने. पूछा- कहां हो तुम? फिर शाम को घर बुलाया. मुलाकात के दौरान अटल ने मोदी से कहा – पंजाबी खाना खाकर तुम्हारा वजन बढ़ गया है. तुम्हारे गुजरात लौटने का वक्त आ गया है.

मोदी को लगा उन्हें संगठन का काम देखना होगा तो उन्होंने एक सवाल पूछा- जिन राज्यों का काम वो देख रहे हैं. वो उन्हें छोड़ना होगा क्या?

अटल बोले – हां, तुम्हे केशुभाई की जगह लेनी है. मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालनी है.

मोदी बोले- नहीं. मैं ये जिम्मेदारी नहीं ले सकता. मोदी ने साथ ही गुजरात में महीने में 10 दिन बिताने का प्रस्ताव सामने रख दिया. एक-दो दिन तक मोदी आनाकानी करते रहे. मगर 4 अक्टूबर को वो गुजरात में थे. 7 अक्टूबर को उन्हें सीएम पद की शपथ दिलवाई गई.

अटल बिहारी वाजपेयी के साथ नरेंद्र मोदी.
अटल बिहारी वाजपेयी के साथ नरेंद्र मोदी.

7. जिन चुनाव आयुक्त लिंगदोह को कोसा था, बाद में की उनकी ही तारीफ

गुजरात दंगों के बाद मोदी गुजरात में जल्द चुनाव करवाना चाहते थे. मगर चुनाव आयुक्त लिंगदोह इसके लिए तैयार नहीं हुए. इससे मोदी खिसिया गए और वड़ोदरा के पास बोडेली में एक सार्वजनिक सभा में निशाना साधा. उनका पूरा नाम लिया- जेम्स माइकल लिंगदोह. ये जानबूझकर किया गया था. मोदी उनके धर्म और उनको बाहरी बताने की कोशिश कर रहे थे. वो बता रहे थे कि लिंगदोह एक बाहरी आदमी हैं और उन्हें स्थानीय गुजरातितयों को आदेश देने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. इसके बाद लिंगदोह ने इसका जवाब देते हुए कहा – छोटे लोगों की आलोचना. जिसके बाद ये विवाद और बढ़ गया.

नरेंद्र मोदी एक रैली के दौरान.
नरेंद्र मोदी एक रैली के दौरान.

मोदी ने ये भी खुलासा किया कि उन्हें एक अफसर ने बताया था कि लिंगदोह ने उनको जोकर कहा था. हालांकि लिंगदोह को लेकर मोदी की राय बाद में बदली-बदली नजर आई. वो कहते हैं-

जहां तक करियर का ताल्लुक है, वे अच्छे अफसर थे, लेकिन किन्हीं राजनीतिक कारणों से या मीडिया के प्रभाव से, उनके मन में मेरे खिलाफ कुछ था. उन्होंने वह सब किया जो वो कर सकते थे.

8.जब मोदी से एक पत्रकार ने पूछा – आपने मुस्लिमों के लिए क्या किया?

2013 में जब नरेंद्र मोदी बीजेपी के लिए देशभर में घूम-घूमकर प्रचार कर रहे थे तो एक जगह उनसे एक पत्रकार ने पूछा – आपने मुसलमानों के लिए क्या किया है?

मोदी का जवाब था – कुछ नहीं.

पत्रकार हतप्रभ था. पूछा – तो आप इसे स्वीकार करते हैं?

मोदी बोले – मुझसे पूछें कि मैंने हिंदुओं के लिए क्या किया है?

पत्रकार ने पूछा – आपने हिंदुओं के लिए क्या किया?

मोदी बोले – कुछ नहीं. मैंने जो भी किया है, वो हर गुजराती के लिए किया है.


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