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मोदी से पहले आए 6 मौके, जब अगड़ी जातियों को आरक्षण देने की कोशिश हुई

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शायर महबूब राही की एक नज़्म है- ‘सियासत में.’ इसकी शुरुआत कुछ यूं होती है-

झूठ की होती है बोहतात सियासत में…
सच्चाई खाती है मात सियासत में…
दिन होता है अक्सर रात सियासत में…
गूंगे कर लेते हैं बात सियासत में…
और ही होते हैं हालात सियासत में…
जायज़ होती है हर बात सियासत में…

जी हां. सियासत में हर बात जायज होती है. भले वो बात अदालत में टिके या न टिके. मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 फीसदी रिजर्वेशन देने का ऐलान कर दिया है. ये फैसला मोदी कैबिनेट यानी मंत्रिमंडल ने लिया है. पर जानकार इसे सिर्फ सियासी जुमला ही बता रहे हैं. उनके मुताबिक इस ऐलान का अमल में आना काफी कठिन है. इसके आगे की राह आसान नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय कर रखी है. इससे ज्यादा आरक्षण होने पर इसकी न्यायिक समीक्षा होगी. मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आएगा तो इस फैसले का टिकना मुश्किल होगा. इंदिरा साहनी के केस में साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती. इससे ज्यादा रिजर्वेशन देने पर सरकार के फैसले की अदालत में समीक्षा होगी. पहले भी कई बार सरकारों ने 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने की कोशिश की. मगर सुप्रीम कोर्ट ने उन फैसलों को पलट दिया. सरकार के छह बड़े फैसले अदालत में कब-कब बदले गए, आइए जानते हैं.

1. जब कर्पूरी ठाकुर का सपना टूटा

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, जिन्होंने सबसे पहले सवर्णों को आरक्षण दिया था. फोटो. इंडिया टुडे.
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, जिन्होंने सबसे पहले सवर्णों को आरक्षण दिया था. (फोटो. इंडिया टुडे.)

साल 1978 में बिहार में पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण मिलने के बाद सवर्णों को भी तीन फीसदी आरक्षण दिया गया. कोर्ट ने इस व्यवस्था को नहीं माना और सवर्णों का आरक्षण खत्म कर दिया. उस वक्त की राज्य के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर थे. कर्पूरी ठाकुर का फैसला आदालत के सामने टिक नहीं पाया. और सवर्णों को आरक्षण देने का उनका सपना टूट गया.

2. जब नरसिम्हा राव ने आरक्षण का आधार बदलने की कोशिश की 

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने साल 1992 में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला किया. पर सफल नहीं रहे. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.
पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने साल 1992 में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला किया. पर सफल नहीं रहे. (फाइल फोटो, इंडिया टुडे)

साल 1990 में 13 अगस्त को मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई. इसके बाद पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण दिया. मंडल और कमंडल की राजनीति के दौर में कांग्रेस सरकार चला रहे नरसिम्हा राव इस दांव से सवर्णों को कांग्रेस की तरफ मोड़ने की कोशिश में थे. मगर साल 1992 में अदालत ने उनके इस फैसले को खारिज कर दिया.

3. जब आनंदीबेन पटेल ने पाटीदारों को शांत करने की कोशिश की 

गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का ऐलान किया था. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.
गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का ऐलान किया था. (फाइल फोटो. इंडिया टुडे.)

अप्रैल, 2016 में गुजरात सरकार ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 फीसदी कोटा दिया. अगस्त 2016 में गुजरात हाईकोर्ट ने इसे गैरकानूनी और असंवैधानिक बताकर खत्म कर दिया. पाटीदार आरक्षण आंदोलन के बाद सत्ता में आई भाजपा सरकार ने 1 मई, 2016 को गुजरात स्थापना दिवस पर सवर्णों को आरक्षण देने का निर्णय लिया था. तब की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल का ये फैसला अदालत में टिक नहीं पाया. ये बिल अब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बैंच में विचाराधीन है.

4. तारीख पर तारीख – तमिलनाडु 

तमिलनाडु में आरक्षण सबसे ज्यादा है. इसकी भी सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा हो रही है. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.
तमिलनाडु में आरक्षण सबसे ज्यादा है. इसकी भी सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा हो रही है. (फाइल फोटो. इंडिया टुडे.)

साल 1951 से ही तमिलनाडु में 41 फीसदी आरक्षण है. धीरे-धीरे ये 69 फीसदी तक पहुंच गया. इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है. तब की मुख्यमंत्री जयललिता ने इस पैसले को संविधान की नौवीं अनुसूची में डलवा दिया था. इसके तहत फैसले की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती. फिर भी इस पर अभी अंतिम निर्णय नहीं आया है.

5. मराठा आरक्षण – महाराष्ट्र 

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस. फोटो. इंडिया टुडे.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस. (फोटो. इंडिया टुडे.)

साल 2014 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार का मराठों को 16 फीसदी आरक्षण देने का फैसला पलट दिया. सरकार नौकरी और शिक्षा में रिजर्वेशन देना चाह रही थी. राज्य की देवेंद्र फणनवीस सरकार ने विधानसभा में एक बार फिर प्रस्ताव पास करके मराठों को 16 फीसदी आरक्षण देने का ऐलान किया है. राज्य में 52 फीसदी आरक्षण पहले से है.

6. राजस्थान का स्पेशल बैकवर्ड क्लास कोटा

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत. फोटो. इंडिया टुडे.
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत. (फोटो. इंडिया टुडे.)

राजस्थान सरकार ने स्पेशल बैकवर्ड क्लास को कोटा देते हुए 50 फीसदी की सीमा को पार किया था. ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आया और आरक्षण खारिज हो गया. राजस्थान में सवर्ण जातियों को 14 फीसदी आरक्षण देने की मांग काफी पुरानी है. विधानसभा में इस संबंध में विधेयक पारित हो चुका है. सरकार इस कानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में डलवाने के प्रयास भी करती रही है.

अभी किसको कितना आरक्षण ?

साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आमतौर पर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है. अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण मिलता है-

अनुसूचित जाति (SC)- 15 %

अनुसूचित जनजाति (ST)- 7.5 %

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)- 27 %

कुल आरक्षण- 49.5 %

क्या कहता है संविधान?

संविधान के अनुसार, आरक्षण का पैमाना सामाजिक असमानता है और किसी की आय और संपत्ति के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाता है. संविधान के अनुच्छेद 16(4) के अनुसार, आरक्षण किसी समूह को दिया जाता है और किसी व्यक्ति को नहीं. इस आधार पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट कई बार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के फैसलों पर रोक लगा चुका है. अपने फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है.


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